हनुमान् का अशोक वाटिका में प्रवेश

हनुमान जी रावण के महल का निरीक्षण करने के बाद अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं। वहाँ वे सीता जी को अशोक वृक्ष के नीचे देखते हैं, जो राक्षसियों से घिरी हुई हैं और रावण द्वारा सताई जा रही हैं। वे सीता की दीन-हीन दशा देखकर अत्यन्त दुःखी होते हैं और उनकी प्रतीक्षा करने का निश्चय करते हैं।

विवरण

हनुमान जी रावण के अन्तःपुर में सीता को न पाकर वहाँ से निकल जाते हैं और लंका के भवनों, उद्यानों एवं वाटिकाओं में उनकी खोज जारी रखते हैं। वे सुन्दर अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं, जो नाना प्रकार के पुष्पों, फलों और वृक्षों से सुसज्जित है। वहाँ वे एक अशोक वृक्ष के नीचे सीता जी को देखते हैं – वे अत्यन्त कृश, मलिन वस्त्रधारी, निरन्तर राम का ध्यान करती हुई, राक्षसियों से घिरी हुई हैं। हनुमान उनकी दशा देखकर विचलित हो जाते हैं, किन्तु धैर्य रखते हैं। तभी रावण वहाँ आता है और सीता को प्रलोभन एवं धमकी देता है। सीता उसकी बातों को अनसुना कर देती हैं। रावण क्रोधित होकर उन्हें एक मास की समय-सीमा देकर चला जाता है। तब हनुमान सोचते हैं कि किस प्रकार सीता से सम्पर्क किया जाए। वे राक्षसियों के चले जाने की प्रतीक्षा करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १४

(हनुमान का अशोक वाटिका में प्रवेश – सीता के दर्शन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्दशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी रावण के अन्तःपुर में सीता को न पाकर आगे खोज करते हैं। वे लंका के विविध भवनों और उद्यानों का निरीक्षण करते हुए अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं। यह वाटिका रावण की निजी वाटिका है, जहाँ वह सीता को रखवाया है। इस सर्ग में हनुमान सर्वप्रथम सीता के दर्शन करते हैं और उनकी करुण दशा देखकर व्यथित होते हैं।

🌳 अशोक वाटिका का वर्णन एवं हनुमान का प्रवेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रविश्य हनुमान् वाटीं परिखया वृताम् ।
ददर्श विविधान् वृक्षान् सीतायाः प्रियकाङ्क्षया ॥
सर्वकालफलैः स्निग्धैः पुष्पैरुपचितान् बहून् ।
पुंनागान् नागवृक्षांश्च चूतान् सालान् सुपुष्पितान् ॥
तिलकान् बकुलान् राजन् केतकान् चम्पकानपि ।
अशोकान् शिंशुपाश्चैव पाटलान् कोविदारकान् ॥
तान् दृष्ट्वा विविधान् वृक्षान् फलपुष्पोपशोभितान् ।
विस्मयं परमं गत्वा हनूमान् समचिन्तयत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रविश्य = प्रवेश करके; हनुमान् = हनुमान; वाटीम् = वाटिका में; परिखया = खाई से; वृताम् = घिरी हुई; ददर्श = देखा; विविधान् = अनेक प्रकार के; वृक्षान् = वृक्षों को; सीतायाः = सीता की; प्रियकाङ्क्षया = इच्छा से; सर्वकालफलैः = सब ऋतुओं में फलने वाले; स्निग्धैः = चिकने; पुष्पैः = फूलों से; उपचितान् = सुसज्जित; बहून् = बहुत से; पुंनागान् = पुन्नाग; नागवृक्षान् = नागकेसर; चूतान् = आम; सालान् = साल; सुपुष्पितान् = सुन्दर फूलों वाले; तिलकान् = तिलक; बकुलान् = मौलसिरी; राजन् = राजन् (यहाँ हनुमान कह रहे हैं); केतकान् = केतकी; चम्पकान् = चम्पा; अशोकान् = अशोक; शिंशुपान् = शिंशुपा; एव = भी; पाटलान् = पाटला; कोविदारकान् = कोविदार; तान् = उन; दृष्ट्वा = देखकर; विविधान् = अनेक; वृक्षान् = वृक्षों को; फलपुष्पोपशोभितान् = फल-फूलों से सुशोभित; विस्मयम् = आश्चर्य; परमम् = अत्यधिक; गत्वा = प्राप्त कर; हनूमान् = हनुमान; समचिन्तयत् = सोचने लगे।
📖 भावार्थ : सीता की खोज की इच्छा से हनुमान उस खाई से घिरी वाटिका में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकार के वृक्ष देखे – पुन्नाग, नागकेसर, आम, साल, तिलक, मौलसिरी, केतकी, चम्पा, अशोक, शिंशुपा, पाटला और कोविदार – सभी सुन्दर फूलों और फलों से लदे हुए थे। उन्हें देखकर हनुमान अत्यधिक आश्चर्यचकित हो गए और विचार करने लगे।
🔍 व्याख्या : अशोक वाटिका रावण की निजी उद्यान थी, जहाँ वह सीता को रखवाना चाहता था। हनुमान ने उसके अद्भुत सौन्दर्य का वर्णन किया है। यह स्थान उन्हें राम के आश्रम-उद्यानों की याद दिलाता है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
स तत्र वृक्षमारुह्य शिंशुपामशोभनाम् ।
ददर्श जानकीं दीनां ध्यानव्याकुलितेन्द्रियाम् ॥
कृशां मलपरीताङ्गीं शोकभारप्रपीडिताम् ।
वराङ्गनां महाभागां रक्षोभिः परिरक्षिताम् ॥
📖 भावार्थ : वहाँ हनुमान उस सुन्दर शिंशुपा वृक्ष पर चढ़ गए। उस पर से उन्होंने जानकी को देखा – वे अत्यन्त दीन, ध्यान में मग्न, इन्द्रियों से व्याकुल, कृशकाय, मलिन वस्त्रों वाली, शोक के भार से पीड़ित, महाभागा वराङ्गना (सीता) राक्षसों द्वारा घिरी हुई थीं।

😢 सीता की दीन दशा एवं राक्षसियों का वर्णन (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
तास्तु राक्षस्य दीर्घास्या विकृताः कामरूपिणीः ।
एकाक्ष्य एककर्णाश्च विकटाः कृष्णपिङ्गलाः ॥
भीमरूपा महाकाया नानारूपविभूषिताः ।
सीतां परिवृतास्तत्र सुप्ताः प्रासादवर्येषु ॥
📖 भावार्थ : वहाँ सीता के चारों ओर भयंकर राक्षसियाँ थीं – लम्बे मुँह वाली, विकृत, मनमाना रूप धारण करने वाली, एक आँख वाली, एक कान वाली, विकट, काले और पीले रंग की, भीमकाय, अनेक रूपों से विभूषित – वे सब वहाँ सो रही थीं।
🔍 व्याख्या : इन भयानक राक्षसियों के मध्य सीता का होना उनके धैर्य और सतीत्व का प्रतीक है। हनुमान ने देखा कि सीता कितनी कठिन परिस्थितियों में हैं।
॥ श्लोक १३-१६ ॥
सा तु तासां मध्यगता देवी वैदेही निराश्रया ।
शोकभारसमाविष्टा ध्यानं परममास्थिता ॥
तामश्रुपूर्णनयनां कृशामन्नभोजनैः ।
ददर्श हनुमान् सीतां प्रियार्हां प्रियदर्शनाम् ॥
📖 भावार्थ : वह वैदेही देवी उन राक्षसियों के मध्य बिना किसी आश्रय के, शोक के भार से व्याकुल, परम ध्यान में लीन थी। हनुमान ने उस प्रियदर्शना सीता को देखा, जिनके नेत्र अश्रुओं से भरे थे और जो भोजन के अभाव में कृश हो गई थीं।
॥ श्लोक १७-२० ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् देवीं सीतामनुपमां तदा ।
चकार मतिमान् बुद्धिं सीतायाः सम्प्रहर्षणे ॥
नूनमेषा भवेत् सीता रामस्य महिषी प्रिया ।
यस्यार्थे सागरं लङ्घ्य प्रविष्टोऽहं विहायसा ॥
📖 भावार्थ : उस अनुपम देवी सीता को देखकर हनुमान ने मन-ही-मन विचार किया कि निश्चय ही यही सीता है – राम की प्रिय महिषी, जिसके लिए मैंने समुद्र लाँघकर आकाश मार्ग से लंका में प्रवेश किया है।

👑 रावण का आगमन और सीता पर अत्याचार (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
ततः प्रविश्य रावणः सर्वाभरणभूषितः ।
ददर्श जानकीं दीनां ध्यानव्याकुलितेन्द्रियाम् ॥
उपेत्य च सुसंरब्धो रावणो राक्षसेश्वरः ।
उवाच परुषं वाक्यं सीतां मधुरया गिरा ॥
"किमिदं ध्यानमित्येवं शोककालो न विद्यते ।
भजस्व मां वरारोहे सर्वभोगसमन्वितम् ॥
राज्ञी त्वं सर्वराक्षसीनां भविष्यसि न संशयः ।
मयि जीवति वैदेहि किं करिष्यति राघवः ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् रावण सब आभूषणों से सुसज्जित होकर वहाँ आया। उसने ध्यान में व्याकुल इन्द्रियों वाली दीन जानकी को देखा। अत्यन्त क्रोधित होकर राक्षसराज रावण ने सीता से कठोर वचन कहे – "यह ध्यान किस लिए? शोक का समय नहीं है। हे सुन्दरी, मेरा वरण करो, मैं समस्त भोगों से सम्पन्न हूँ। तुम सम्पूर्ण राक्षसियों की रानी बनोगी। मेरे जीवित रहते वैदेहि, वह राघव क्या कर लेगा?"
🔍 व्याख्या : रावण ने पहले प्रलोभन दिया, फिर धमकी। सीता ने उसकी एक न सुनी।
॥ श्लोक २७-३१ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सीता रामानुगामिनी ।
उवाच परुषं वाक्यं रावणं प्रति गर्विता ॥
"किं त्वया राक्षसश्रेष्ठ ममैवं परिभाषितम् ।
पतिव्रतां हि मां जानन् रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥
अहं त्वां न भजिष्यामि कथमन्यस्य वै पतिम् ।
अवज्ञाय च रामं त्वं वृथा गर्जसि राक्षस ॥
हिरण्यरश्मिर्वै देवो रामो वै शत्रुकर्शनः ।
न चिरात् त्वां वधिष्यन्ति रामबाणाः समर्पिताः ॥
📖 भावार्थ : राम का अनुसरण करने वाली सीता ने उसके वचन सुनकर गर्व से कठोर उत्तर दिया – "हे राक्षसश्रेष्ठ, तू मुझसे ऐसी बातें कैसे कर रहा है? तू जानता है कि मैं पतिव्रता हूँ, राम की यशस्विनी पत्नी हूँ। मैं तेरा वरण कैसे कर सकती हूँ, जो दूसरे की पत्नी हूँ? राम की अवज्ञा करके तू व्यर्थ गरज रहा है। राम सूर्य के समान तेजस्वी और शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। उनके बाण चिरकाल न बीतेगा कि तेरा वध कर डालेंगे।"
॥ श्लोक ३२-३५ ॥
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रुद्धः सीताया वचनं तदा ।
उद्यम्य चासिमसितं वध्यां प्रति महाबलः ॥
राक्षस्यः सम्परिष्वज्य सीतां रक्षितुमिच्छया ।
न्यवर्तयन् सुसंरब्धं रावणं राक्षसेश्वरम् ॥
ततः स रावणः क्रोधात् सीतां दृष्ट्वा निराश्रयाम् ।
उवाच परमक्रुद्धो मासान् द्वौ जीव मे मते ॥
📖 भावार्थ : सीता के ये वचन सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने तलवार निकाल ली। तब राक्षसियों ने सीता की रक्षा की इच्छा से उन्हें घेर लिया और क्रोधित रावण को रोका। तब रावण ने क्रोध में आकर कहा – "दो मास तक जीवित रह, मेरी आज्ञा से।" (कुछ पाठों में चार मास)
🔍 व्याख्या : राक्षसियों ने सीता को बचा लिया, क्योंकि उन्हें डर था कि सीता के मरने पर रावण उन्हें दण्ड देगा। रावण ने सीता को चार मास की मोहलत दी, जिसके बाद वह उसे मार डालेगा यदि वह नहीं मानी।

⏳ रावण का प्रस्थान और हनुमान की योजना (श्लोक ३६-४४)

॥ श्लोक ३६-४० ॥
एवमुक्त्वा तु तां देवीं रावणो राक्षसेश्वरः ।
निश्चक्राम ततो वाट्याः सीतया सह राक्षसः ॥
ततः प्रव्रजिते तस्मिन् राक्षसे राक्षसेश्वरे ।
राक्षस्यः सीतया सार्धं विविशुस्ता निवेशनम् ॥
सीता तु राक्षसीमध्ये शोकभारसमन्विता ।
विललाप महाभागा राममेवानुचिन्तयन्ती ॥
हनूमानपि तां दृष्ट्वा देवीं शोकपरायणाम् ।
चकार मतिमान् बुद्धिं सम्भाष्यार्थं सुदुर्लभम् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर रावण उस वाटिका से निकल गया। उसके चले जाने पर राक्षसियाँ सीता को लेकर उनके निवास-स्थान में चली गईं। सीता राक्षसियों के बीच शोक के भार से व्याकुल होकर राम का ही ध्यान करती हुई विलाप करने लगीं। हनुमान ने उस देवी को शोकाकुल देखकर उनसे सम्भाषण का दुर्लभ अवसर खोजने की बुद्धि बनाई।
॥ श्लोक ४१-४४ ॥
ततो राक्षस्य एता याः सीतां परिचरन्ति ह ।
त्रिजटा नाम तासां या वृद्धा मातृका समा ॥
सा चासीद् धर्मशीला च सीतायाः प्रियकाम्यया ।
प्रसादयन्ती तां देवीं राक्षसीनां भयेन च ॥
हनूमांस्तु तदा तत्र शिंशुपाश्रयणे स्थितः ।
प्रतीक्षते स्म तां रात्रिं यावत् प्राप्स्यति शोभनाम् ॥
📖 भावार्थ : उन राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक वृद्धा थी, जो माता के समान धर्मशीला और सीता पर दया करने वाली थी। वह राक्षसियों के भय से भी सीता को धीरज बँधाती थी। हनुमान उस समय शिंशुपा वृक्ष पर स्थित होकर उपयुक्त रात्रि की प्रतीक्षा करने लगे, जब वे सीता से सम्पर्क कर सकें।
🔍 व्याख्या : त्रिजटा का नाम यहाँ आता है, जो आगे चलकर सीता को सान्त्वना देती है। हनुमान ने धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार चौदहवें सर्ग में हनुमान अशोक वाटिका में सीता को ढूँढ़ लेते हैं, उनकी दुर्दशा देखते हैं, रावण के आतंक को देखते हैं, और अब अगले सर्ग में वे सीता से सम्पर्क करने का अवसर खोजेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌿 अशोक वाटिका का प्रतीकात्मक अर्थ

अशोक वाटिका केवल एक उद्यान नहीं, बल्कि संसार के दुःखों और विलासिता का प्रतीक है। सीता इस वाटिका में रहकर भी अशोक (शोकरहित) नहीं हैं, अपितु राम के वियोग में शोकाकुला हैं। यह स्थान उनके पातिव्रत्य और धैर्य की परीक्षा है।

🛡️ सीता का सतीत्व

रावण के प्रलोभन और धमकी के बावजूद सीता का अडिग रहना उनके सतीत्व की अटल निष्ठा को दर्शाता है। वे राम को ही अपना एकमात्र आश्रय मानती हैं।

🐒 हनुमान का धैर्य

हनुमान ने सीता को देखकर तुरंत प्रकट न होकर उचित समय की प्रतीक्षा की। यह उनके कूटनीतिक ज्ञान और धैर्य का परिचय है।

🔱 रावण का पतन

रावण का सीता के प्रति आकर्षण और उनका तिरस्कार उसके अहंकार और अधर्म का परिचायक है। यह उसके विनाश का कारण बनेगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीता के समान धैर्य, पतिव्रत धर्म में अडिग रहना तथा हनुमान के समान कठिन परिस्थितियों में धैर्य और विवेक से काम लेना सीखना चाहिए। अच्छे कार्य के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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