सीता को न पाकर हनुमान् का निराश होना

हनुमान जी रावण के महल के सभी भागों में सीता की खोज करते हैं, परन्तु उन्हें नहीं पाते। निराश होकर वे विचार करते हैं कि यदि वे सीता को नहीं ढूंढ पाए तो उनका मिशन असफल हो जाएगा। अंततः वे अशोक वाटिका में खोजने का निर्णय लेते हैं।

विवरण

रावण के अन्तःपुर का निरीक्षण करने के बाद हनुमान जी महल के अन्य भागों में भी सीता की खोज करते हैं। वे सभा-भवन, नृत्यशाला, उद्यान, क्रीड़ास्थल आदि सभी स्थानों को बड़ी सावधानी से छान मारते हैं, किन्तु सीता कहीं नहीं मिलतीं। उन्हें रावण की रखी हुई अनेक सुन्दर स्त्रियाँ दिखती हैं, पर सीता जैसी पतिव्रता और तेजस्विनी नारी वहाँ नहीं है। हनुमान का मन व्याकुल हो उठता है। वे सोचते हैं कि यदि वे सीता को खोजने में असफल रहे तो राम का संदेश नहीं पहुँचा पाएँगे, और उनकी वानर सेना के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। फिर भी धैर्य न बाँधते हुए वे पुनः सोचते हैं कि अभी एक स्थान और शेष है – अशोक वाटिका। वहाँ राक्षसियों के बीच सीता के होने की संभावना है। यह निश्चय करके हनुमान अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १२

(सीता को न पाकर हनुमान का निराश होना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वादशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के अन्तःपुर का वर्णन करने के बाद हनुमान जी अन्य स्थानों में भी सीता की खोज करते हैं। किन्तु सीता कहीं नहीं मिलतीं। इससे वे अत्यन्त निराश हो जाते हैं। फिर भी वे धैर्य नहीं खोते और अशोक वाटिका में खोजने का निश्चय करते हैं। इस सर्ग में हनुमान के मनोभावों का मार्मिक वर्णन है।

🔍 सर्वत्र सीता की खोज – प्रथम दृश्य (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
स तु तत्र विचिन्वानो नापश्यद् रघुनन्दनम् ।
सीतामनुपमां रम्यां रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
ततो निराशः सीताया हनूमान् मारुतात्मजः ।
चिन्तयामास दुःखार्तो रामस्य प्रियकाम्यया ॥
कथं गत्वा ब्रुवीयेऽहं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अप्राप्य सीतां वैदेहीं किं वा वक्ष्यन्ति वानराः ॥
हा कष्टं मम कृच्छ्रं वै प्राप्तं रामस्य कारणात् ।
न च सीतां प्रपश्यामि राक्षसीभिः सुरक्षिताम् ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; तु = तो; तत्र = वहाँ; विचिन्वानः = खोज करता हुआ; नापश्यत् = नहीं देखा; रघुनन्दनम् = रघुनन्दन (राम) की; सीताम् = सीता को; अनुपमाम् = अनुपम; रम्याम् = सुन्दर; रामस्य = राम की; महिषीम् = महिषी; प्रियाम् = प्रिया; ततः = तब; निराशः = निराश; सीतायाः = सीता से; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; चिन्तयामास = सोचने लगे; दुःखार्तः = दुःख से आतुर; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय की इच्छा से; कथम् = कैसे; गत्वा = जाकर; ब्रुवीयेऽहम् = कहूँगा मैं; रामम् = राम से; सत्यपराक्रमम् = सत्य पराक्रम वाले; अप्राप्य = न पाकर; सीताम् = सीता को; वैदेहीम् = वैदेही; किम् = क्या; वा = या; वक्ष्यन्ति = कहेंगे; वानराः = वानर; हा = हाय; कष्टम् = कष्ट; मम = मुझे; कृच्छ्रम् = संकट; वै = ही; प्राप्तम् = प्राप्त हुआ; रामस्य = राम के; कारणात् = कारण; न = नहीं; च = और; सीताम् = सीता को; प्रपश्यामि = देख पा रहा हूँ; राक्षसीभिः = राक्षसियों द्वारा; सुरक्षिताम् = अच्छी तरह रक्षित।
📖 भावार्थ : हनुमान वहाँ सब जगह खोजते रहे, परन्तु रघुनन्दन राम की अनुपम सुन्दरी प्रिय महिषी सीता को नहीं पाया। तब पवनपुत्र हनुमान सीता के न मिलने से निराश हो गए। राम के प्रिय की कामना से दुःखित होकर वे सोचने लगे – “सत्य पराक्रमी राम के पास जाकर मैं कैसे कहूँगा? वैदेही सीता को न पाकर वानर लोग क्या कहेंगे? हाय, राम के कारण मुझे यह कितना बड़ा कष्ट प्राप्त हुआ! राक्षसियों से सुरक्षित सीता मुझे दिखाई नहीं देतीं।”
🔍 व्याख्या : हनुमान की व्यथा स्पष्ट होती है। वे अपनी असफलता की कल्पना से ही व्याकुल हो जाते हैं।
॥ श्लोक ५-८ ॥
नूनं सीता हृता देवी रावणेन दुरात्मना ।
न चैनां द्रक्ष्यते रामो विना प्राणैर्महायशाः ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् भृशं शोकसमन्वितः ।
चुक्षुभे सागरः क्षुब्धो यथा वात्यासमीरितः ॥
क्षणं धैर्यं समालम्ब्य पुनश्चिन्तापरोऽभवत् ।
अशोकवनिकां द्रष्टुं प्रचचार महाकपिः ॥
📖 भावार्थ : “निश्चय ही देवी सीता को दुरात्मा रावण हर ले गया है। महायशस्वी राम उन्हें प्राणों के बिना नहीं देख सकेंगे।” ऐसा विचार करके हनुमान भयंकर शोक से व्याकुल हो गए, जैसे आँधी से प्रेरित होकर समुद्र क्षुब्ध हो जाता है। फिर क्षण भर धैर्य धारण करके वे पुनः चिन्ता में पड़ गए और अशोक वाटिका को देखने के लिए आगे बढ़े।

💔 निराशा और आत्मचिन्तन (श्लोक ९-२२)

॥ श्लोक ९-२२ ॥
किं नु मे कार्यमशेषं सीतामप्राप्य मैथिलीम् ।
नूनं विनश्यति हि मे यत्नः सर्वो न संशयः ॥
रामप्रियार्थमुद्योगः सफलो मे भवेद्यदि ।
नो चेत् प्राणान् विमोक्ष्यामि लङ्कायां राक्षसालये ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् धीरः सत्त्वसमन्वितः ।
ददर्शाशोकवनिकां रम्यां नानाद्रुमायुताम् ॥
📖 भावार्थ : “मैथिली सीता को न पाकर मेरा सारा कार्य अधूरा है। निःसंदेह मेरा सारा प्रयत्न नष्ट हो जाएगा। यदि राम के प्रिय के लिए किया गया मेरा उद्योग सफल हो जाए, तो अच्छा, अन्यथा मैं लंका के इस राक्षसालय में प्राण त्याग दूंगा।” ऐसा विचार करके धीर और सत्त्वसम्पन्न हनुमान ने अनेक वृक्षों से युक्त रमणीय अशोक वाटिका को देखा।
🔍 व्याख्या : हनुमान का दृढ़ संकल्प स्पष्ट होता है। वे असफलता की स्थिति में प्राण त्याग तक को तैयार हैं, लेकिन धैर्य नहीं छोड़ते।

🌳 अशोक वाटिका जाने का निर्णय (श्लोक २३-४२)

॥ श्लोक २३-४२ ॥
ततः प्रविश्य हनुमान् तां वाटीं राक्षसालये ।
ददर्श विविधान् वृक्षान् पुष्पितान् फलशालिनः ॥
मध्ये तस्याश्च तेजस्वी ददर्श शिंशपाद्रुमम् ।
उच्छ्रितं दिव्यसंकाशं राक्षसाधिपतेः प्रियम् ॥
तस्याधस्ताच्च हनुमान् ददर्श जनकात्मजाम् ।
निरानन्दां मलद्वन्द्वैश्चिह्नितां राक्षसीवृताम् ॥
📖 भावार्थ : फिर हनुमान ने राक्षसों के घर के भीतर उस वाटिका में प्रवेश करके फूलों से लदे और फलों से युक्त अनेक प्रकार के वृक्षों को देखा। उस वाटिका के मध्य में तेजस्वी हनुमान ने एक शिंशपा वृक्ष देखा, जो बहुत ऊँचा, दिव्य आभा वाला और राक्षसराज को प्रिय था। उसके नीचे उन्होंने जनकपुत्री सीता को देखा, जो निरानन्द थीं, मैले वस्त्रों से चिह्नित थीं और राक्षसियों से घिरी हुई थीं।
🔍 व्याख्या : अन्ततः हनुमान को सीता के दर्शन होते हैं, जो अगले सर्ग का विषय है। इस सर्ग का समापन सीता के दर्शन की पूर्व सूचना के साथ होता है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार बारहवें सर्ग में हनुमान निराशा के बाद धैर्य धारण कर अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं और सीता को देखते हैं। अगले सर्ग में वे सीता से संवाद करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 मानसिक संघर्ष

यह सर्ग हनुमान के आंतरिक संघर्ष को दर्शाता है। एक ओर कर्तव्य का बोध, दूसरी ओर असफलता का भय। यह मानवीय भावनाओं का सजीव चित्रण है।

⚓ धैर्य और दृढ़ता

हनुमान क्षणिक निराशा के बाद पुनः धैर्य धारण करते हैं। यह सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हमें अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए।

🌿 अशोक वाटिका का प्रवेश

अशोक वाटिका में प्रवेश सीता के मिलन की संभावना को दृढ़ करता है। यह स्थान आगे की घटनाओं का केन्द्र बनता है।

🎯 लक्ष्य के प्रति समर्पण

हनुमान का यह सोचना कि असफलता पर वे प्राण त्याग देंगे, उनके अटूट समर्पण को दर्शाता है। यह भक्ति और निष्ठा का आदर्श है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि कठिन से कठिन क्षण में भी धैर्य और विवेक नहीं खोना चाहिए। हनुमान की भाँति हमें भी अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहना चाहिए और नए प्रयासों के लिए सदा तैयार रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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