हनुमान् द्वारा सीता की खोज जारी रखना

हनुमान जी रावण के अन्तःपुर से निकलकर लंका के अन्य भागों में सीता की खोज करते हैं। वे अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं, जहाँ उन्हें राक्षसियों से घिरी हुई सीता माता दिखाई देती हैं। वे एक वृक्ष की शाखा पर छिपकर सीता की दशा का निरीक्षण करते हैं।

विवरण

हनुमान जी रावण के महल के आंतरिक भाग में सीता को न पाकर वहाँ से निकल जाते हैं। वे सोचते हैं कि सीता किसी अन्य स्थान पर हो सकती हैं। वे लंका के विभिन्न भवनों, उद्यानों और उपवनों की खोज करते हैं। अंत में वे अशोक वाटिका में पहुँचते हैं, जो रावण का प्रिय उद्यान है। वहाँ उन्हें एक अशोक वृक्ष के नीचे मलिन वस्त्र धारण किए, राक्षसियों से घिरी हुई, ध्यानमग्न सीता दिखाई देती हैं। हनुमान एक पेड़ पर चढ़कर छिप जाते हैं और सीता की गतिविधियों को देखते हैं। वे सीता के राम-वियोग की दशा को देखकर अत्यंत दुखी होते हैं और उनके धैर्य की प्रशंसा करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ११

(हनुमान् द्वारा सीता की खोज जारी रखना – अशोक वाटिका में प्रवेश एवं सीता के दर्शन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकादशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने रावण के अन्तःपुर में सीता को न पाया। अब वे नगर के अन्य भागों में खोज जारी रखते हैं। भ्रमण करते हुए वे रावण की अशोक वाटिका में पहुँचते हैं, जहाँ उन्हें अंततः सीता के दर्शन होते हैं। यह सर्ग उस मिलन की भूमिका है।

🏰 अन्तःपुर से निकलना और लंका नगरी का भ्रमण (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः स निर्गत्य गृहात् सुविभ्रष्ट इव द्विपः ।
चचार नगरीं सर्वां सीतामन्वेष्टुमुद्यतः ॥
स राजमार्गान् विविधान् चतुष्पथान् शुभान् प्रपन्नान् सुविभक्तरथ्यया ।
अपश्यदावृत्तविचित्रवेश्मनः प्रवेशनिर्याणविभक्तमण्डलान् ॥
ददर्श चारामवरान् प्रपान् वापीः प्रतिष्ठिताः ।
नानाविहगसङ्घुष्टान् नानाद्रुमलतायुतान् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह (हनुमान); निर्गत्य = निकलकर; गृहात् = महल से; सुविभ्रष्टः = भ्रष्ट (भटका हुआ) सा; इव = मानो; द्विपः = हाथी; चचार = घूमा; नगरीम् = नगरी में; सर्वाम् = सब जगह; सीताम् = सीता को; अन्वेष्टुम् = खोजने के लिए; उद्यतः = उद्यत; सः = उसने; राजमार्गान् = राजमार्गों को; विविधान् = अनेक प्रकार के; चतुष्पथान् = चौराहों को; शुभान् = शुभ; प्रपन्नान् = सुसज्जित; सुविभक्तरथ्यया = सुन्दर विभाजित सड़कों वाले; अपश्यत् = देखा; आवृत्तविचित्रवेश्मनः = चारों ओर अद्भुत भवनों वाले; प्रवेशनिर्याणविभक्तमण्डलान् = प्रवेश-निर्गम से युक्त मण्डल वाले; ददर्श = देखा; च = और; आरामवरान् = उत्तम उद्यानों को; प्रपान् = प्याऊ को; वापीः = बावड़ियों को; प्रतिष्ठिताः = स्थित; नानाविहगसङ्घुष्टान् = अनेक पक्षियों से शोभित; नानाद्रुमलतायुतान् = अनेक वृक्षों और लताओं से युक्त।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् हनुमान उस महल से बाहर निकले, मानो कोई हाथी अपने बंधन से छूटकर विचर रहा हो। वे सीता की खोज में सम्पूर्ण नगरी में घूमे। उन्होंने विविध राजमार्ग, चौराहे, सुन्दर सड़कें, अद्भुत भवन, उद्यान, प्याऊ और बावड़ियाँ देखीं, जो अनेक पक्षियों, वृक्षों और लताओं से सुशोभित थीं।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने लंका के समृद्ध नगर का अवलोकन किया, किंतु उनका ध्यान केवल सीता की खोज में था।
॥ श्लोक ५-८ ॥
स तत्र तत्र विचिन्वानो नापश्यद् रघुनन्दनम् ।
सीतामनुपमां रम्यां रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
ततो निवृत्तः सहसा रावणस्य निवेशनात् ।
प्राचीनमभितो राजन् ददर्शाशोककाननम् ॥
📖 भावार्थ : वहाँ-वहाँ खोजते हुए भी उन्हें रघुनन्दन राम की अनुपमा, रमणीय और प्रिय महिषी सीता नहीं दिखीं। तब वे रावण के निवास से सहसा लौटकर पूर्व दिशा की ओर स्थित अशोक वन को देखा।
॥ श्लोक ९-१२ ॥
तत् प्रविश्याशोकवनं राक्षसाधिपतिपालितम् ।
वृतं राक्षससङ्घैश्च सुपुष्पितद्रुमैः शुभैः ॥
ददर्श तत्र वैदेहीं ध्यानस्थां मलिनाम्बराम् ।
राक्षसीभिः परिवृतां क्षुत्पिपासाश्रमान्विताम् ॥
📖 भावार्थ : राक्षसराज द्वारा पालित, राक्षस समूहों से घिरे, सुपुष्पित वृक्षों वाले उस अशोक वन में प्रवेश करके उन्होंने वहाँ वैदेही सीता को देखा, जो ध्यान में मग्न थीं, मलिन वस्त्र धारण किए थीं, राक्षसियों से घिरी हुई थीं और भूख-प्यास से श्रान्त थीं।

💔 सीता के दर्शन और हनुमान की प्रतिक्रिया (श्लोक १३-३०)

॥ श्लोक १३-१७ ॥
तामेकवेणीं ध्यानस्थां चिन्तापरिगतां सतीम् ।
राक्षसीभिः परिवृतां दृष्ट्वा हनुमान् स्थितः ॥
स वृक्षमारुह्य महानुभावः प्रच्छन्नरूपो लतया पिधानः ।
ददर्श सीतां परिदीनसत्त्वां तपस्विनीं शोकपरिप्लुताङ्गीम् ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् दीनो बाष्पपूर्णेक्षणोऽभवत् ।
रामस्य महिषीं दीनां विलपन्तीमनाथवत् ॥
🔹 पदच्छेद : ताम् = उस; एकवेणीम् = एक चोटी वाली; ध्यानस्थाम् = ध्यान में स्थित; चिन्तापरिगताम् = चिन्ता से ग्रसित; सतीम् = सती को; राक्षसीभिः = राक्षसियों से; परिवृताम् = घिरी हुई; दृष्ट्वा = देखकर; हनुमान् = हनुमान; स्थितः = स्थिर हो गए; सः = उन्होंने; वृक्षम् = वृक्ष पर; आरुह्य = चढ़कर; महानुभावः = महानुभाव; प्रच्छन्नरूपः = गुप्त रूप धारण किए; लतया = लता से; पिधानः = छिपे हुए; ददर्श = देखा; सीताम् = सीता को; परिदीनसत्त्वाम् = अत्यन्त दीन स्वभाव वाली; तपस्विनीम् = तपस्विनी; शोकपरिप्लुताङ्गीम् = शोक से आर्द्र अंगों वाली; ताम् = उन्हें; दृष्ट्वा = देखकर; हनुमान् = हनुमान; दीनः = दीन; बाष्पपूर्णेक्षणः = अश्रुपूर्ण नेत्र वाले; अभवत् = हो गए; रामस्य = राम की; महिषीम् = महिषी; दीनाम् = दीन; विलपन्तीम् = विलाप करती हुई; अनाथवत् = अनाथ की तरह।
📖 भावार्थ : एक चोटी वाली, ध्यान में स्थित, चिन्ता से ग्रसित, राक्षसियों से घिरी उस सती सीता को देखकर हनुमान स्थिर खड़े हो गए। फिर वे महानुभाव हनुमान वृक्ष पर चढ़ गए और लता से छिपकर उन्होंने सीता को देखा, जो अत्यन्त दीन, तपस्विनी और शोक से पीड़ित थीं। उन्हें देखकर हनुमान की आँखें अश्रुओं से भर गईं – राम की वह महिषी दीन-हीन होकर अनाथ की भाँति विलाप कर रही थीं।
🔍 व्याख्या : सीता की दशा देख हनुमान का हृदय पिघल गया। उनकी सहानुभूति और करुणा उमड़ पड़ी।
॥ श्लोक १८-२४ ॥
सीता हि देवी रामस्य पतिव्रता महाव्रता ।
रावणेन हृता लङ्कां रमते न स्म निर्जने ॥
तस्याः शोकाभिभूताया रावणो नावबुध्यते ।
न हि बुध्यन्ति मूढात्मा परदाराभिमर्शनाः ॥
एवं बहुविधां चिन्तां चिन्तयित्वा महामतिः ।
हनुमान् राक्षसीं मायां विज्ञाय स्थिरतां गतः ॥
📖 भावार्थ : सीता राम की पतिव्रता देवी हैं, महान व्रतधारिणी हैं। रावण द्वारा हर कर लंका में लायी गयीं, किन्तु वे एकान्त में भी नहीं रमतीं। उनके शोक से पीड़ित होने को रावण नहीं समझता। मूढ़ात्मा परायी स्त्रियों का स्पर्श करने वाले इसे नहीं समझ सकते। इस प्रकार अनेक प्रकार से चिन्ता करके महामति हनुमान राक्षसी माया को समझकर स्थिर हो गए।

🧘 हनुमान का निर्णय और प्रतीक्षा (श्लोक ३१-४९)

॥ श्लोक ३१-३९ ॥
ततः स निश्चितां बुद्धिं चकार मारुतात्मजः ।
इमामुपायेन सीतां पश्यामि विजने स्थिताम् ॥
प्रहर्षं च परं लेभे दृष्ट्वा जानकीम् कपिः ।
नूनं रामस्य महिषी सीता भर्तृहिते रता ॥
एवं संचिन्त्य हनुमान् वृक्षशाखान्तरस्थितः ।
प्रतीक्षते स्म वैदेहीं भर्तृदर्शनलालसाम् ॥
📖 भावार्थ : तब मारुतात्मज हनुमान ने निश्चित बुद्धि बनाई: “मैं उपाय से सीता को एकान्त में देखूंगा।” जानकी को देखकर उन कपि को अत्यधिक हर्ष हुआ। “निश्चय ही यह राम की महिषी सीता है, जो पति के हित में रत है।” ऐसा सोचकर हनुमान वृक्ष की शाखाओं के बीच छिपकर वैदेही की प्रतीक्षा करने लगे, जो पति के दर्शन के लिए लालायित थीं।
🔍 व्याख्या : हनुमान अब सीता की प्रतीक्षा करते हैं कि जब वे अकेली हों, तब वे उनसे संवाद कर सकें।
॥ श्लोक ४०-४९ ॥
अन्तरं सम्प्रतीक्षन् स तस्या राक्षससेनयोः ।
हनुमान् ध्यानमास्थाय तस्थौ पर्वतमूर्धनि ॥
ततः प्रभाते विमले सूर्योदये महात्मनः ।
सीता ददर्श विकृतां राक्षसीं भीमदर्शनाम् ॥
तामुवाच ततः सीता रावणान्तःपुरे स्थिता ।
भर्तृचिन्तापरा दीना हनूमन्तं निरीक्ष्य सा ॥
📖 भावार्थ : हनुमान उस सीता और राक्षसियों के बीच का अवसर देखते हुए ध्यान में स्थित होकर पर्वत की चोटी पर ठहर गए। तब प्रभात काल में सूर्योदय के समय सीता ने एक विकृत, भयंकर राक्षसी को देखा। तब रावण के अन्तःपुर में स्थित, भर्तृचिन्ता में लीन, दीना सीता ने हनुमान की ओर देखकर उससे कहा... (आगे अगले सर्ग में)

📌 सर्गान्त : इस प्रकार एकादश सर्ग में हनुमान ने सीता को अशोक वाटिका में खोज निकाला और उनके दर्शन किए। अब वे संवाद के लिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अगले सर्ग में हनुमान-सीता संवाद होगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 सीता का धैर्य

इस सर्ग में सीता के धैर्य और पतिव्रता धर्म की झलक मिलती है। वे राक्षसियों से घिरी होने पर भी राम के अतिरिक्त किसी अन्य का चिन्तन नहीं करतीं।

💔 हनुमान की करुणा

हनुमान का सीता की दशा देखकर द्रवित होना उनके मानवीय करुण पक्ष को दर्शाता है। वे केवल वीर नहीं, संवेदनशील भी हैं।

🧘 योग्य अवसर की प्रतीक्षा

हनुमान तुरंत सीता के पास नहीं जाते, वे उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं। यह उनके कूटनीतिक ज्ञान को दर्शाता है।

🌺 अशोक वाटिका का प्रतीक

अशोक वाटिका नाम ही शोक-रहित स्थान का द्योतक है, किन्तु यहाँ सीता शोक में हैं। इस विरोधाभास से कवि का कौशल दिखता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा प्रेम और धैर्य ही कठिन समय में सहारा देते हैं। हनुमान की भाँति हमें भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए सही समय और मौके की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और बिना विचले अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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