हनुमान् का रावण के भवन में प्रवेश

सुन्दरकाण्ड के दशम सर्ग में हनुमान् लंका में प्रवेश कर रावण के भवन में जाते हैं। वहाँ वे रावण की शय्या पर उसे मन्दोदरी सहित सोता देखते हैं और सीता को न पाकर आगे खोजने का निश्चय करते हैं।

विवरण

लंका में प्रवेश करने के बाद हनुमान् ने नगरी का भ्रमण किया और रात्रि के समय रावण के महल में प्रवेश किया। महल अनेक प्रकार के रत्नों, स्वर्ण, मणियों से सुसज्जित था। हनुमान् ने वहाँ रावण की सभा, भवन, उद्यान आदि देखे। फिर वे अन्तःपुर में गए जहाँ रावण अपनी पटरानियों के साथ सोया हुआ था। हनुमान् ने उन स्त्रियों की सुन्दरता और विलासिता देखी। रावण के पास सोई हुई मन्दोदरी को देखकर हनुमान् को क्षण भर के लिए भ्रम हुआ कि यह सीता हो सकती है, परन्तु उन्होंने विचार किया कि सीता रावण के पास स्वेच्छा से नहीं रह सकती। फिर वे सीता की खोज जारी रखने के लिए वहाँ से निकल गए। इस सर्ग में हनुमान् की सूक्ष्मबुद्धि, संयम और भक्ति का परिचय मिलता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १०

(हनुमान् का रावण के भवन में प्रवेश – रावण का शयन-वैभव)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ दशमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : समुद्र लाँघकर लंका में प्रविष्ट हनुमान् रात्रि के समय रावण के भवन में जाते हैं। वहाँ वे अद्भुत वैभव, रावण के दरबार और अन्तःपुर का निरीक्षण करते हैं। रावण को मन्दोदरी सहित सोता देख वे क्षणभर को उसे सीता समझ बैठते हैं, किन्तु तुरन्त विवेक से काम लेते हुए पुनः सीता की खोज प्रारम्भ करते हैं।

🌴 हनुमान् का लंका में प्रवेश और रावण-भवन की ओर गमन (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
प्रविश्य तु गृहं रम्यं रावणस्य दुरात्मनः ।
ददर्श हनुमान् वीरो वितानशतसंकुलम् ॥
स सौधाग्रैर्विचित्रैश्च ज्वलन्निव विभाति च ।
नानारत्नसमुद्भासैः प्रासादैरुपशोभितम् ॥
तत्र गीतं च नृत्तं च वादित्राणां च निस्वनः ।
प्रशान्तः सर्व एवासीत् प्रसुप्ते निशि राक्षसे ॥
🔹 पदच्छेद : प्रविश्य = प्रवेश करके; तु = तो; गृहम् = घर में; रम्यम् = सुन्दर; रावणस्य = रावण के; दुरात्मनः = दुष्टात्मा; ददर्श = देखा; हनुमान् = हनुमान ने; वीरः = वीर; वितानशतसंकुलम् = सैकड़ों वितानों से युक्त; सः = वह; सौधाग्रैः = महलों के शिखरों से; विचित्रैः = विचित्र; च = और; ज्वलन्निव = जलता हुआ सा; विभाति = शोभित होता है; च = भी; नानारत्नसमुद्भासैः = अनेक रत्नों से प्रकाशित; प्रासादैः = महलों से; उपशोभितम् = सुशोभित; तत्र = वहाँ; गीतम् = गान; च = और; नृत्तम् = नृत्य; च = तथा; वादित्राणाम् = वाद्यों का; च = और; निस्वनः = शब्द; प्रशान्तः = शान्त; सर्वः = सब; एव = ही; आसीत् = था; प्रसुप्ते = सोते हुए; निशि = रात में; राक्षसे = राक्षस के।
📖 भावार्थ : रावण के सुन्दर भवन में प्रवेश करके वीर हनुमान् ने उसे सैकड़ों वितानों से युक्त देखा। वह भवन अनेक प्रकार के रत्नों से जगमगाते हुए विचित्र महलों के शिखरों से सुशोभित था, मानो जल रहा हो। उस समय रात्रि में राक्षसों के सो जाने के कारण वहाँ गान, नृत्य और वाद्यों के सब शब्द शान्त हो गए थे।
🔍 व्याख्या : हनुमान् जब रावण के भवन में प्रवेश करते हैं तो रात्रि का समय है। सम्पूर्ण नगरी निद्रा में मग्न है। रावण का महल अद्भुत वैभव से सज्जा है, किन्तु सब सन्नाटे में डूबा है।

🏰 रावण के भवन का वैभव और सभा-भवन (श्लोक ७-१५)

॥ श्लोक ७-१० ॥
स तत्र शयनं दिव्यं रावणस्य महात्मनः ।
ददर्श हेमपर्यङ्कं रत्नजालविभूषितम् ॥
तस्मिन् पर्यङ्कमुख्ये तु महार्हास्तरणास्तृते ।
सुष्वाप स महातेजा राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥
तं च स्त्रियः समासाद्य सर्वतः पर्यवारयन् ।
विचित्राभरणा हृष्टा यथा शक्रं दिवौकसः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ हनुमान् ने महात्मा रावण का दिव्य शयनागार देखा, जो सोने के पलंग से युक्त और रत्नजालों से विभूषित था। उस श्रेष्ठ पलंग पर बहुमूल्य आस्तरण बिछे थे, उस पर महाबली राक्षसेन्द्र महातेजा रावण सो रहा था। उसके चारों ओर विचित्र आभूषणों से सुसज्जित स्त्रियाँ हर्षित होकर उसकी सेवा में स्थित थीं, जैसे देवतागण शक्र के आस-पास रहते हैं।
॥ श्लोक ११-१५ ॥
तासां मुखवरैः शुभ्रैश्चन्द्रकान्तिनिभैः शुभैः ।
प्रदीप्तमिव तद्वेश्म निशीथे समदृश्यत ॥
न त्वेव सीता तत्रासीत् सर्वलक्षणसंयुता ।
वैदेही जनकात्मजा रामपत्नी यशस्विनी ॥
📖 भावार्थ : उन स्त्रियों के उज्ज्वल मुख, जो चन्द्रमा के समान कान्तियुक्त थे, से वह भवन रात्रि में जगमगा रहा था। किन्तु वहाँ सीता नहीं थी, जो सब लक्षणों से युक्त, वैदेही, जनकात्मजा, राम की यशस्विनी पत्नी थी।

💤 रावण का शयन और मन्दोदरी का दर्शन (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १६-२० ॥
तासां मध्ये तु राजेन्द्र रावणं दीप्ततेजसम् ।
ददर्श हनुमान् सुप्तं मन्दोदर्या समन्वितम् ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् वीरो मन्दोदरीमनिन्दिताम् ।
अमन्यत तदा सीतां रावणं चान्तिके स्थितम् ॥
सीतेयं रावणस्याङ्के सुप्ता भर्तुरनन्तरम् ।
नूनं कामवशं प्राप्ता रामं त्यक्त्वा नरर्षभम् ॥
📖 भावार्थ : उन स्त्रियों के बीच में हनुमान् ने दीप्त तेज वाले रावण को मन्दोदरी के साथ सोते देखा। उस अनिन्दिता मन्दोदरी को देखकर वीर हनुमान् ने पहले तो उसे ही सीता समझ लिया और रावण को उसके पास सोता देख सोचा – यह सीता है, जो रावण की गोद में सो रही है, निश्चय ही यह राम को त्यागकर काम के वशीभूत हो गई है।
🔍 व्याख्या : हनुमान् को मन्दोदरी को देखकर भ्रम होता है क्योंकि वह अत्यन्त सुन्दरी है और रावण के साथ शयन कर रही है। लेकिन तत्काल ही उन्हें विवेक होता है।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः स ध्यानमास्थाय हनुमान् मारुतात्मजः ।
नैषा सीतेति संचिन्त्य बुद्ध्या पर्यचिन्तयत् ॥
नैषा रामस्य महिषी रावणाङ्कगता शुभा ।
भवितुं युक्तरूपा हि साध्वी सीता पतिव्रता ॥
पतिं हित्वा तु रामं सा रावणं नैव मंस्यते ।
कथं हि रावणं प्राप्ता सीता रामपरायणा ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान् ने ध्यान करके विचार किया कि यह सीता नहीं है। राम की महिषी, पतिव्रता साध्वी सीता रावण के अंक में शोभित नहीं हो सकती। जो राम में परायण है, वह राम को छोड़कर रावण को कैसे स्वीकार कर सकती है?

🔍 भ्रम निवृत्ति और सीता की खोज जारी (श्लोक २६-३३)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः स निर्गम्य तस्माद्वेश्मनो हनुमान् कपिः ।
अन्यत्र गन्तुं मनसा चक्रे यत्नं सुदुःखितः ॥
क्व नु सीता भवेदत्र क्व वा तां द्रक्ष्यते कपिः ।
इति संचिन्त्य मनसा प्रययावन्तरं पुनः ॥
ततः प्रासादमुख्येषु सीतामन्वेषते कपिः ।
न चापश्यत तत्रापि वैदेहीं जनकात्मजाम् ॥
📖 भावार्थ : फिर हनुमान् उस भवन से निकलकर दुःखपूर्वक अन्यत्र जाने का प्रयत्न करने लगे। सोचने लगे कि सीता कहाँ होगी? कहाँ देखी जा सकेगी? ऐसा मन में विचार कर वे फिर दूसरे भाग में गए। तब वे मुख्य मुख्य प्रासादों में सीता को ढूँढ़ने लगे, परन्तु वहाँ भी उन्हें जनकात्मजा वैदेही नहीं दिखाई दीं।
॥ श्लोक ३१-३३ ॥
न दैत्येषु न यक्षेषु न गन्धर्वकुलेषु च ।
न किन्नरेषु नागेषु न मनुष्येषु क्वचित् ॥
सीतादर्शनमासाद्य हनुमान् विस्मयं गतः ।
ततो रामस्य महिषीं नापश्यद्धनुमान् कपिः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे दशमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : न दैत्यों में, न यक्षों में, न गन्धर्वकुल में, न किन्नरों में, न नागों में, न कहीं मनुष्यों में – कहीं भी सीता के दर्शन न पाकर हनुमान् विस्मय में पड़ गए। इस प्रकार हनुमान् को राम की महिषी सीता नहीं मिलीं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕊️ हनुमान् का विवेक

मन्दोदरी को देखकर क्षणिक भ्रम के बावजूद हनुमान् तुरन्त सही निर्णय लेते हैं। यह उनके तीक्ष्ण बुद्धि और रामभक्ति का प्रमाण है। वे जानते हैं कि सीता पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए रावण के समीप नहीं रह सकतीं।

🏰 रावण का ऐश्वर्य

इस सर्ग में रावण के भवन का विस्तृत वर्णन है। यह दर्शाता है कि रावण अत्यन्त वैभवशाली और बलशाली था, फिर भी उसके पापों के कारण उसका पतन निश्चित था। हनुमान् इस वैभव से प्रभावित नहीं होते।

🌑 रात्रि का सन्नाटा

रात्रि के सम्पूर्ण सन्नाटे में हनुमान् का अकेले भवन में भ्रमण करना उनके साहस और आत्मविश्वास को दर्शाता है। वे किसी भी स्थिति में अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होते।

🔱 सीता की खोज का संकल्प

सीता को न पाकर हनुमान् निराश नहीं होते, वरन् पुनः खोज जारी रखते हैं। यह दृढ़ संकल्प और कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, हमें विवेक से काम लेना चाहिए। भ्रम की स्थिति में सत्य को पहचानने की शक्ति विकसित करनी चाहिए। हनुमान् की तरह हमें अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहना चाहिए और निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे दशमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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