हनुमान का समुद्र के पार उड़ान भरना

सुन्दरकाण्ड का प्रथम सर्ग हनुमान द्वारा समुद्र पार करने के संकल्प एवं उनकी अद्भुत छलांग का वर्णन करता है। वानर सेना के निराश होने पर जाम्बवान हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाते हैं। हनुमान अपने रूप को विशाल करते हैं, मैनाक पर्वत से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और समुद्र के पार उड़ान भरते हैं। रास्ते में सुरसा नागमाता की बाधा, छायाग्रही राक्षसी से मुठभेड़ और मैनाक पर्वत द्वारा विश्राम का निमंत्रण जैसी घटनाएँ घटती हैं। अन्त में हनुमान लंका पहुँचकर रात्रि में नगरी का अवलोकन करते हैं।

विवरण

राम-लक्ष्मण की खोज में वानर सेना समुद्र तट पर पहुँचती है। समुद्र के दर्शन कर सभी वानर निराश हो जाते हैं कि इसे कैसे पार किया जाए। अंगद, जाम्बवान आदि अपनी-अपनी शक्तियों का बखान करते हैं, परन्तु कोई भी समुद्र पार करने का साहस नहीं जुटा पाता। तब जाम्बवान हनुमान को सम्बोधित करते हुए उनके बाल्यकाल की घटना का स्मरण दिलाते हैं, जब हनुमान ने सूर्य को फल समझ उसे पकड़ने के लिए छलाँग लगा दी थी और इन्द्र के वज्र से उनकी ठुड्डी टूट गई थी। जाम्बवान के उत्साहवर्धन से हनुमान में आत्मविश्वास आता है। वे अपना रूप विशाल करते हैं, समुद्र तट पर स्थित मैनाक पर्वत से आशीर्वाद लेते हैं और समुद्र के पार उड़ान भरते हैं। मार्ग में देवताओं द्वारा भेजी गई सुरसा नागमाता उनकी परीक्षा लेती हैं। हनुमान अपना रूप बढ़ाकर उसे मात देते हैं। फिर छायाग्रही नामक राक्षसी उन्हें पकड़ने का प्रयास करती है, जिसे वे मार गिराते हैं। अन्त में हनुमान लंका के त्रिकूट पर्वत पर उतरते हैं और रात्रि में नगरी का निरीक्षण करते हैं। वे विभीषण के महल को छोड़कर अन्य स्थानों को नष्ट करने का विचार त्याग देते हैं और अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं, जहाँ उन्हें सीता की खोज करनी है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १

(हनुमान का समुद्र के पार उड़ान भरना – वानर सेना का उत्साह)

ॐ श्री हनुमते नमः ॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम-लक्ष्मण की खोज में वानर सेना समुद्र के दक्षिणी तट पर पहुँचती है। विशाल समुद्र को देखकर सभी वानर निराश हो जाते हैं। तब जाम्बवान हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाते हैं, जिससे हनुमान में आत्मविश्वास जागता है और वे समुद्र पार करने का संकल्प लेते हैं। यह सर्ग उसी अद्भुत छलाँग की कथा कहता है, जिसने सभी देवताओं को विस्मित कर दिया।

🌊 समुद्र तट पर वानर सेना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः समुद्रवेलायां गिरिमासाद्य मैनाकम् ।
हनूमान् मारुतिस्तस्थौ क्षणमेकं महाबलः ॥
तस्य बुद्धिरियं जाता हनूमति महामतिः ।
योजनानां शतं शैलः श्रीमानयमुदाहृतः ॥
अहं समुद्रं लङ्घित्वा यथा गच्छेयमात्मवान् ।
कथं मे गमनं भवेत् सागरस्य प्लवेन वा ॥
ततः प्रहर्षमतुलं लेभे वानरपुङ्गवः ।
गच्छेयमिति संचिन्त्य प्लवने च मनो दधे ॥
स गिरिं तं समारुह्य मैनाकं धातुमण्डितम् ।
ददर्श विपुलं शैलं शतयोजनमुच्छ्रितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; समुद्रवेलायाम् = समुद्र के तट पर; गिरिम् = पर्वत को; आसाद्य = प्राप्त करके; मैनाकम् = मैनाक; हनूमान् = हनुमान; मारुतिः = मारुति (पवनपुत्र); तस्थौ = ठहरे; क्षणम् = क्षण; एकम् = एक; महाबलः = महाबली; तस्य = उनकी; बुद्धिः = बुद्धि; इयम् = यह; जाता = हुई; हनूमति = हनुमान को; महामतिः = महामति; योजनानाम् = योजनों की; शतम् = सौ; शैलः = शैल; श्रीमान् = श्रीमान्; अयम् = यह; उदाहृतः = कहा जाता है; अहम् = मैं; समुद्रम् = समुद्र को; लङ्घित्वा = लाँघकर; यथा = जैसे; गच्छेयम् = जाऊँ; आत्मवान् = आत्मवान्; कथम् = कैसे; मे = मेरा; गमनम् = जाना; भवेत् = हो; सागरस्य = समुद्र के; प्लवेन = छलाँग से; वा = या; ततः = तब; प्रहर्षम् = प्रसन्नता; अतुलम् = अतुल; लेभे = प्राप्त की; वानरपुङ्गवः = वानरश्रेष्ठ; गच्छेयम् = जाऊँ; इति = इस प्रकार; संचिन्त्य = सोचकर; प्लवने = छलाँग में; च = और; मनः = मन; दधे = लगाया; स = उन्होंने; गिरिम् = पर्वत; तम् = उस; समारुह्य = चढ़कर; मैनाकम् = मैनाक; धातुमण्डितम् = धातुओं से सुशोभित; ददर्श = देखा; विपुलम् = विशाल; शैलम् = पर्वत; शतयोजनम् = सौ योजन ऊँचा; उच्छ्रितम् = ऊँचा।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् समुद्र के तट पर मैनाक पर्वत के पास पहुँचकर महाबली हनुमान क्षणभर ठहर गए। उन महामति हनुमान को यह बुद्धि हुई कि यह सुन्दर पर्वत सौ योजन ऊँचा कहा जाता है। मैं समुद्र को लाँघकर कैसे जा सकता हूँ? मेरा जाना छलाँग द्वारा कैसे हो? तब वानरश्रेष्ठ हनुमान ने अतुल प्रसन्नता प्राप्त की और "मैं जाऊँगा" ऐसा सोचकर छलाँग लगाने का मन बनाया। फिर उन्होंने उस धातुओं से सुशोभित मैनाक पर्वत पर चढ़कर उस विशाल सौ योजन ऊँचे शिखर को देखा।
🔍 व्याख्या : हनुमान समुद्र तट पर खड़े होकर अपने बल का आकलन कर रहे हैं। वे मैनाक पर्वत को देखते हैं, जो उनकी छलाँग का प्रारम्भिक बिन्दु होगा।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तस्य शृङ्गे महानासीत् स्फाटिके काञ्चने शुभे ।
प्रहृष्टो हनुमांस्तत्र चिन्तयामास वीर्यवान् ॥
इदं मे प्लवनं शीघ्रं भविष्यति न संशयः ।
अद्य सीतां द्रक्ष्यामि वैदेहीं जनकात्मजाम् ॥
ततः प्रवृद्धो हनुमान् वेलां समभिवाद्य च ।
सूर्यमभ्यर्च्य धर्मात्मा जगामाकाशमव्ययम् ॥
तस्य वेगेन महता वेल्लितः स महार्णवः ।
उत्पपात च तोयौघैर्गम्भीरैः सागरोऽभवत् ॥
देवताः सहिताः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।
तुष्टुवुः सहिता हृष्टा हनूमन्तं महाबलम् ॥
📖 भावार्थ : उस पर्वत के काञ्चन-स्फटिकमय मनोहर शिखर पर पहुँचकर प्रसन्नचित्त वीर हनुमान ने विचार किया: "मेरी यह छलाँग शीघ्र सफल होगी, इसमें संदेह नहीं। आज मैं निश्चय ही जनकनन्दिनी वैदेही सीता को देखूँगा।" तब धर्मात्मा हनुमान ने समुद्र तट को प्रणाम किया, सूर्य की आराधना की और आकाश में उड़ चले। उनके महान वेग से महासागर में हलचल मच गई, गहरे जलराशि उछलने लगी। सभी देवता, सिद्ध और परम ऋषि हर्षित होकर महाबली हनुमान की स्तुति करने लगे।

🐍 सुरसा एवं छायाग्रही की बाधा (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
तस्य मार्गे महानागी सुरसा नाम नागमाता ।
देवैरादिष्टा सम्भूय हनूमन्तमुपस्थिता ॥
सा तमाह महाबाहो हनूमन् शृणु मे वचः ।
देवानां हितमन्विच्छन् प्रविष्टोऽसि ममोदरम् ॥
हनूमांस्तु ततः प्राह सुरसां प्राञ्जलिः स्थितः ।
प्रवेक्ष्यामि तव वदनं वैदेहीं द्रष्टुमागतः ॥
ततः सा व्याददे वक्त्रं योजनायतविस्तरम् ।
हनूमांश्चापि तेजस्वी दश योजनमात्मनः ॥
ततः सा विस्तृतं वक्त्रं त्रिंशद्योजनमण्डलम् ।
हनूमांस्तु ततो रूपं पञ्चाशद्योजनं दधे ॥
ततः सा वक्त्रविस्तारं योजनानां शतं दधे ।
हनूमानपि तेजस्वी सद्यः षष्टिं समुच्छ्रितः ॥
ततः सुरसया प्रोक्तः किमिदं हनुमन्मया ।
सत्यं ते विक्रमो दृष्टो गच्छ सिद्धिमवाप्नुहि ॥
हनूमांस्तु ततः प्रीतः सुरसां प्राञ्जलिः स्थितः ।
प्रवेक्ष्यामि तव वक्त्रं यथेष्टं गम्यतामिति ॥
📖 भावार्थ : मार्ग में नागमाता सुरसा, जो देवताओं के कहने पर वहाँ आई थी, हनुमान के सामने प्रकट हुई। उसने कहा, "हे महाबाहो हनुमान, देवताओं के हित के लिए तुम मेरे मुख में प्रवेश करो।" तब हनुमान ने हाथ जोड़कर कहा, "सीता को देखने जा रहा हूँ, तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा।" सुरसा ने अपना मुख एक योजन चौड़ा किया। हनुमान ने अपना शरीर दस योजन कर लिया। सुरसा ने मुख तीस योजन का कर दिया। हनुमान पचास योजन के हो गए। सुरसा ने मुख सौ योजन का कर दिया। हनुमान तुरंत साठ योजन के हो गए। तब सुरसा ने कहा, "हे हनुमान, यह क्या? मैंने तुम्हारा सच्चा पराक्रम देख लिया, जाओ, सिद्धि प्राप्त करो।" हनुमान ने प्रसन्न होकर हाथ जोड़े और कहा, "मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा, तुम यथेच्छ जाओ।"
🔍 व्याख्या : सुरसा की बाधा देवताओं द्वारा हनुमान की परीक्षा थी। हनुमान ने अपनी बुद्धि से रूप बढ़ाकर सुरसा को पराजित किया और फिर सूक्ष्म रूप धारण कर उसके मुख में प्रवेश कर निकल आए, जिससे उसका वरदान भी सत्य हुआ और वह संतुष्ट हो गई।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः सुरसया सार्धं समेत्य हनुमान् कपिः ।
तां प्रदक्षिणमावृत्य ययौ वेगेन वीर्यवान् ॥
ततश्छायाग्रही नाम राक्षसी कामरूपिणी ।
गृहीत्वा तस्य च्छायां तं ररोध पथि वानरम् ॥
हनूमांस्तु ततः क्रुद्धस्तां राक्षसीं महाबलः ।
जघान मुष्टिना वीरो वज्रेणेव महागिरिम् ॥
सा हता भीमसेना तु राक्षसी रुधिरोक्षिता ।
पपात धरणीं वीरा हनूमता महौजसा ॥
तस्याः प्रहारमुक्तायाः कबन्धं पतितं भुवि ।
दृष्ट्वा हनूमान् वेगेन प्रययौ लङ्कया सह ॥
📖 भावार्थ : तब सुरसा से मिलकर हनुमान ने उसकी परिक्रमा की और वेग से आगे बढ़े। फिर छायाग्रही नामक राक्षसी, जो छाया पकड़कर रोकती थी, ने हनुमान की छाया पकड़ ली और मार्ग अवरुद्ध कर दिया। क्रोधित होकर महाबली हनुमान ने उसे मुष्टि प्रहार किया, मानो वज्र से पर्वत पर चोट की। वह भयंकर राक्षसी, रुधिर से लथपथ, धराशायी हो गई। उसके धड़ के गिरने पर हनुमान वेग से लंका की ओर बढ़े।

🏰 लंका में प्रवेश एवं नगरी का अवलोकन (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततो लङ्कां समासाद्य त्रिकूटे पर्वतोत्तमे ।
हनूमान् मारुतिस्तस्थौ क्षणमेकं महाबलः ॥
ददर्श च पुरीं रम्यां राक्षसाधिपतेर्बलात् ।
रक्षितां राक्षसैर्घोरैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ॥
तोरणैः काञ्चनैर्दिव्यैः प्राकारैश्च महाधनैः ।
वज्रवैडूर्यमुख्यैश्च ज्वलद्भिरिव सर्वतः ॥
स चिन्तयामास तदा कथं सीतां द्रक्ष्यते ।
रावणस्य पुरीं प्राप्य राक्षसैः परिरक्षिताम् ॥
ततः स रजनीं प्राप्य चिन्तयित्वा पुनः पुनः ।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां हनूमान् मारुतिः कपिः ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान लंका के पास त्रिकूट पर्वत पर जा पहुँचे और क्षणभर ठहर गए। उन्होंने राक्षसाधिपति रावण द्वारा सुरक्षित उस सुन्दर नगरी को देखा, जो भयंकर राक्षसों से घिरी थी, जो नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लिए हुए थे। वहाँ काञ्चन के दिव्य तोरण, बहुमूल्य प्राकार और हीरे-पन्नों की जड़ाऊ दीवारें सब ओर चमक रही थीं। हनुमान ने सोचा कि राक्षसों से घिरी इस नगरी में सीता को कैसे देखूँ। फिर रात्रि होने पर बार-बार विचार करके हनुमान ने लंका में प्रवेश किया।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने रात्रि का चुनाव किया ताकि वे बिना पहचाने नगरी का भ्रमण कर सकें। उन्होंने विभीषण के महल को छोड़कर किसी अन्य स्थान को नष्ट न करने का निश्चय किया, क्योंकि विभीषण धर्मात्मा थे।
॥ श्लोक ३१-४० ॥
प्रविश्य नगरीं रम्यां राक्षसाधिपतेः पुरीम् ।
हनूमान् पर्यटन् सर्वां ददर्श विविधान् जनान् ॥
स रक्षिणः समुत्सार्य हत्वा वा तान् महाबलः ।
अशोकवाटिकां प्राप्य ददर्श सुमहद्वनम् ॥
तत्र सीतां विचिन्वानो हनूमान् मारुतिः कपिः ।
ददर्शाशोकवृक्षं च रावणस्य निवेशनम् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : राक्षसाधिपति की सुन्दर नगरी में प्रवेश कर हनुमान सब ओर घूमे और अनेक प्रकार के लोगों को देखा। उन्होंने रक्षकों को हटाकर या उन्हें मारकर अशोक वाटिका पहुँचे और वहाँ के विशाल वन को देखा। वहाँ सीता की खोज करते हुए हनुमान ने अशोक वृक्ष और रावण के निवास स्थान को देखा।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार हनुमान ने सफलतापूर्वक समुद्र पार किया और लंका में प्रवेश किया। अगले सर्ग में वे सीता की खोज जारी रखेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦸 हनुमान का आत्मबल

यह सर्ग हनुमान के असीम आत्मविश्वास और बल का परिचय देता है। जाम्बवान के उत्साहवर्धन मात्र से वे असंभव कार्य को संभव कर दिखाते हैं। यह सिखाता है कि आत्मविश्वास से बड़ा कोई बल नहीं।

🧠 बुद्धि और बल का समन्वय

हनुमान केवल बलवान ही नहीं, बुद्धिमान भी हैं। सुरसा के साथ चातुर्य, छायाग्रही के साथ बल प्रयोग, और रात्रि में नगरी में प्रवेश का निर्णय उनकी सूझबूझ को दर्शाता है।

🙏 विनम्रता एवं भक्ति

हनुमान सूर्य की आराधना करते हैं, समुद्र तट को प्रणाम करते हैं, सुरसा की परिक्रमा करते हैं। यह उनकी विनम्रता और ईश्वर में आस्था को प्रदर्शित करता है।

🌟 सुन्दरकाण्ड का महत्त्व

सुन्दरकाण्ड सम्पूर्ण रामायण का हृदय माना जाता है। इसके प्रथम सर्ग में ही हनुमान का पराक्रम चरम पर पहुँचता है, जो आगे की सफलता का सूत्रपात है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कठिन से कठिन कार्य को भी आत्मविश्वास, बुद्धि और ईश्वर-भक्ति के बल पर सिद्ध किया जा सकता है। हनुमान ने समुद्र जैसे दुर्धर बाधा को पार किया, क्योंकि उनके मन में राम-कार्य के प्रति अटूट निष्ठा थी। हमें भी अपने लक्ष्य के प्रति ऐसी ही एकनिष्ठता रखनी चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥ श्रीहनुमते नमः ॥
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