सुग्रीव का राम के पास जाना

चार मास की वर्षा ऋतु समाप्त होने पर सुग्रीव को अपने वचन का स्मरण होता है। वह राम के पास जाने का निश्चय करता है और हनुमान को साथ लेकर राम-लक्ष्मण से मिलने जाता है। राम को अपने विलम्ब का कारण बताते हुए वह क्षमा याचना करता है और फिर सीता की खोज में सहायता का आश्वासन देता है।

विवरण

वर्षा ऋतु के चार मास बीत जाने पर सुग्रीव राज्य-सुख में इतना मग्न हो जाता है कि वह राम से किए गए वचन को भूल जाता है। इधर राम और लक्ष्मण प्रतिदिन प्रतीक्षा करते हैं। राम की व्याकुलता देख लक्ष्मण क्रोधित होकर सुग्रीव को सबक सिखाने का निश्चय करते हैं। उसी समय सुग्रीव को अपनी भूल का अहसास होता है। वह हनुमान को बुलाकर अपनी चिन्ता व्यक्त करता है। हनुमान उसे समझाते हैं कि अब वानरों की सेना एकत्रित कर राम की सहायता के लिए आगे बढ़ना चाहिए। सुग्रीव तुरन्त राम के पास जाने को तैयार हो जाता है। वह हनुमान सहित राम के आश्रम पहुँचता है। राम को देखकर वह लज्जित होता है और हाथ जोड़कर क्षमा माँगता है। राम स्नेहपूर्वक उसे गले लगाते हैं और कहते हैं कि उन्हें कोई क्रोध नहीं है। फिर सुग्रीव अपनी सेना के साथ सीता की खोज में वानरों को चारों दिशाओं में भेजने की योजना बताता है। राम उसकी योजना का अनुमोदन करते हैं और उसे अग्रसर होने का आदेश देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३८

(सुग्रीव का राम के पास जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टात्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वर्षा ऋतु के चार मास बीत चुके हैं। राम प्रतिदिन प्रतीक्षा करते हैं कि सुग्रीव सीता की खोज में सहायता हेतु वानर सेना भेजेगा, किन्तु सुग्रीव राज्यसुख में मग्न होकर अपना वचन भूल गया है। लक्ष्मण क्रोध में आकर सुग्रीव को दण्ड देने का निश्चय करते हैं, तभी हनुमान की सूझ-बूझ से सुग्रीव को अपनी भूल का अहसास होता है और वह स्वयं राम के पास क्षमा माँगने जाता है। यह सर्ग मित्रता, कर्तव्य और क्षमा का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।

🔥 लक्ष्मण का क्रोध और हनुमान की सूझ-बूझ (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
अथ सम्प्रस्थिते काले वर्षारात्रे व्यतीतयोः ।
रामः प्रव्यथितो दीनो लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥
कच्चित्सुग्रीवमद्य त्वं सौमित्रे गन्तुमर्हसि ।
यथासौ वानरश्रेष्ठो मैथिलीं दर्शयिष्यति ॥
स त्वं गत्वा महाप्राज्ञ सुग्रीवं वानराधिपम् ।
प्रष्टुमर्हसि कल्याणं वृत्तं वा तस्य वानर ॥
एवमुक्तस्तु सौमित्री रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
जगाम सहसा तत्र सुग्रीवं प्रति वीर्यवान् ॥
🔹 पदच्छेद : अथ = अब; सम्प्रस्थिते = व्यतीत होने पर; काले = समय में; वर्षारात्रे = वर्षा की रातें; व्यतीतयोः = बीत जाने पर; रामः = राम; प्रव्यथितः = अत्यन्त व्याकुल; दीनः = दीन; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; वाक्यम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; कच्चित् = क्या; सुग्रीवम् = सुग्रीव के पास; अद्य = आज; त्वम् = तुम; सौमित्रे = सुमित्रानन्दन; गन्तुम् = जाना; अर्हसि = चाहिए; यथा = जिससे; असौ = वह; वानरश्रेष्ठः = वानरश्रेष्ठ; मैथिलीम् = मैथिली को; दर्शयिष्यति = दिखा सके; सः = वह; त्वम् = तुम; गत्वा = जाकर; महाप्राज्ञ = महाबुद्धिमान्; सुग्रीवम् = सुग्रीव; वानराधिपम् = वानरराज से; प्रष्टुम् = पूछना; अर्हसि = चाहिए; कल्याणम् = कुशल; वृत्तम् = वृत्तान्त; वा = अथवा; तस्य = उसके; वानर = हे वानर; एवम् = इस प्रकार; उक्तः = कहे गये; तु = तब; सौमित्री = लक्ष्मण; रामेण = राम द्वारा; अक्लिष्टकर्मणा = सरल कर्म वाले; जगाम = गये; सहसा = शीघ्र; तत्र = वहाँ; सुग्रीवम् = सुग्रीव के पास; प्रति = प्रति; वीर्यवान् = वीर।
📖 भावार्थ : वर्षा ऋतु की रातें बीत जाने पर राम अत्यन्त व्याकुल और दीन होकर लक्ष्मण से बोले: "हे सौमित्रे! क्या तुम आज सुग्रीव के पास जाकर यह पूछ सकते हो कि वह वानरश्रेष्ठ कब मैथिली को दिखाएगा? हे महाप्राज्ञ, तुम जाकर वानरराज सुग्रीव का कुशल-क्षेम पूछो और यह भी जानो कि उसने सीता की खोज में क्या किया है।" राम के ऐसा कहने पर अक्लिष्टकर्मा लक्ष्मण तुरन्त सुग्रीव के पास गये।
🔍 व्याख्या : राम की व्याकुलता अब सीमा पार कर रही है। वे स्वयं सुग्रीव के पास न जाकर लक्ष्मण को भेजते हैं, क्योंकि क्षत्रिय धर्म के अनुसार राजा को बुलाकर बात करना उचित होता है।
॥ श्लोक ५-१२ ॥
स प्रविश्य महाबाहुः सुग्रीवस्य निवेशनम् ।
अपश्यत्तत्र सुग्रीवं हनूमन्तं च वानरम् ॥
तं दृष्ट्वा सहसा क्रोधादुवाच लक्ष्मणो वचः ।
राज्यमत्तोऽसि सौमित्रे न स्मरस्युपकारिणम् ॥
हनूमांस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा लक्ष्मणभाषितम् ।
उवाच सुग्रीवमिदं हितं सत्यपराक्रमः ॥
न ते रामेण सदृशो मित्रार्थे यः प्रियः सखा ।
तस्य त्वमपराद्धोऽसि क्षन्तुमर्हसि वानर ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो हनूमन्तमुवाच ह ।
गच्छ हनूमन् रामाय निवेदय ममागमम् ॥
📖 भावार्थ : महाबाहु लक्ष्मण सुग्रीव के महल में प्रवेश कर वहाँ सुग्रीव और हनुमान को देखा। उन्हें देखते ही क्रोध से लक्ष्मण ने कहा: "हे सौमित्रे! तुम राज्य के मद में मतवाले हो गये हो, अपने उपकारी को नहीं स्मरण करते।" तब हनुमान ने लक्ष्मण की बात सुनकर सुग्रीव से हितकारी वचन कहे: "राम के समान तुम्हारा कोई मित्र नहीं है, जो तुम्हारे प्रिय के लिए सब कुछ त्याग दे। तुमने उनका अपराध किया है, अब क्षमा माँगनी चाहिए।" हनुमान के ऐसा कहने पर सुग्रीव बोले: "हे हनुमान! जाओ, राम को मेरे आगमन की सूचना दो।"
🔍 व्याख्या : हनुमान की बुद्धिमत्ता यहाँ दिखती है। वे लक्ष्मण के क्रोध को शान्त करते हैं और सुग्रीव को उचित मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। सुग्रीव तुरन्त स्वयं चलने को तैयार हो जाते हैं।

🤝 सुग्रीव का राम से मिलन और क्षमा-प्रार्थना (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-२० ॥
हनूमान् राममासाद्य कृताञ्जलिरुवाच ह ।
एष सुग्रीवो धर्मात्मा त्वां द्रष्टुमुपयाति वै ॥
ततः सुग्रीवमायान्तं दृष्ट्वा रामो महायशाः ।
लक्ष्मणं सम्परिष्वज्य हर्षाद्वाक्यमुवाच ह ॥
सुग्रीवः सचिवैः सार्धं हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ।
उपयाति महातेजा मम दर्शनकाङ्क्षया ॥
एष मे मित्र वर्योऽसौ सुग्रीवः सचिवैः सह ।
प्रणयादुपयातो मां द्रष्टुमर्हति वीर्यवान् ॥
ततः सुग्रीवमायान्तं दृष्ट्वा रामो महायशाः ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं स्नेहात्परमविक्लवः ॥
सुग्रीवः सचिवैः सार्धं हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ।
उपयाति महातेजा मम दर्शनकाङ्क्षया ॥
ततः सुग्रीव आसाद्य रामं सत्यपराक्रमम् ।
कृताञ्जलिरुवाचेदं वचनं शोककर्शितः ॥
अपराद्धं मया राम न क्षमां कर्तुमर्हसि ।
राज्यमदेन विक्षिप्तो न स्मरामि तव प्रियम् ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने राम के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा: "यह धर्मात्मा सुग्रीव आपसे मिलने आ रहे हैं।" तब राम ने सुग्रीव को आते देख लक्ष्मण से हर्षित होकर कहा: "महातेजस्वी सुग्रीव अपने मन्त्रियों, हनुमान आदि के साथ मुझसे मिलने आ रहे हैं। यह मेरे मित्र हैं, वीर्यवान् हैं, अब इनका उचित स्वागत होना चाहिए।" फिर जब सुग्रीव राम के पास पहुँचे, तो वे शोक से पीड़ित होकर हाथ जोड़कर बोले: "हे राम! मुझसे अपराध हुआ है। कृपया क्षमा करें। राज्य के मद में विचलित होकर मैं आपका प्रिय कार्य न कर सका।"
॥ श्लोक २१-२५ ॥
तमुवाच ततो रामः सुग्रीवं सत्यविक्रमः ।
मैवं वोचः सुग्रीव त्वं न ते किञ्चिदपक्रियाम् ॥
क्षमा मित्रेषु सततं कर्तव्येति मतिर्मम ।
त्वं हि मित्रं प्रियं मह्यं न ते किञ्चिदपक्रियाम् ॥
अहं तु विगतक्रोधः सुग्रीव त्वयि वानर ।
यत्कार्यं तत्कुरुष्वाद्य सीतायाः परिमार्गणम् ॥
ततः सुग्रीवो धर्मात्मा रामवाक्येन हर्षितः ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं हनूमन्तं समीपगम् ॥
सेनापतीन् समानय ये चान्ये वानरर्षभाः ।
क्षिप्रं समागच्छन्त्वद्य सीतायाः परिमार्गणे ॥
📖 भावार्थ : तब सत्यविक्रम राम ने सुग्रीव से कहा: "हे सुग्रीव! ऐसा मत कहो। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है। मेरा मत है कि मित्रों पर सदा क्षमा करनी चाहिए। तुम मेरे प्रिय मित्र हो, तुमसे कोई अपराध नहीं। मैं तुम पर सर्वथा क्रोधरहित हूँ। अब तुम वह कार्य करो जो आवश्यक है – सीता की खोज का प्रबन्ध करो।" राम के वचन सुनकर धर्मात्मा सुग्रीव अत्यन्त हर्षित हुए और पास खड़े हनुमान से बोले: "सेनापतियों और अन्य वानरश्रेष्ठों को बुलाओ। आज ही वे शीघ्र सीता की खोज में प्रस्थान करें।"
🔍 व्याख्या : राम की उदारता और स्नेह देखिए – वे सुग्रीव की भूल को दरकिनार करते हैं और केवल सीता की खोज पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। यही सच्ची मित्रता है। सुग्रीव भी तुरन्त कार्रवाई में जुट जाता है।

🌍 सीता की खोज हेतु वानरों का प्रस्थान (श्लोक २६-४०)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः सुग्रीवो धर्मात्मा हनूमन्तमुवाच ह ।
गच्छ हनूमन् सुग्रीवो वानरान् समुपानय ॥
ते तु सर्वे समागम्य सुग्रीववचनात्तदा ।
रामं प्रदक्षिणीकृत्य ययुः सर्वे दिशो दश ॥
गवाक्षः गजः शरभो विद्युन्माली च वानरः ।
सुषेणः सहदेवश्च जाम्बवानृक्षपुङ्गवः ॥
एते चान्ये च बहवो वानराः कामरूपिणः ।
रामस्य प्रियकामार्थं ययुः सर्वे दिशो दश ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा सुग्रीव ने हनुमान से कहा: "हे हनुमान! जाओ, सब वानरों को बुला लाओ।" सुग्रीव के आदेश से सभी वानर इकट्ठे हुए, राम की परिक्रमा करके दसों दिशाओं में चले गये। गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सुषेण, सहदेव और जाम्बवान् (ऋक्षराज) – ये सब तथा अन्य अनेक कामरूपधारी वानर राम के प्रिय कार्य के लिए दसों दिशाओं में चले गये।
🔍 व्याख्या : यहाँ से सीता की खोज का महाभियान आरम्भ होता है। सभी वानर दिशाओं में बँट जाते हैं, जिसकी विस्तृत कथा आगे के सर्गों में मिलेगी।
॥ श्लोक ३१-४० ॥
ततो रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः ।
सुग्रीवेण समागम्य मन्त्रयामासतुस्तदा ॥
सुग्रीवस्तु तदा राममुवाच प्राञ्जलिर्वचः ।
यदा न दृश्यते सीता तदा किं करवाण्यहम् ॥
रामस्तु सुग्रीववचः श्रुत्वा ध्यानपरोऽभवत् ।
लक्ष्मणं चाब्रवीद्वाक्यं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
न मे जीवितमर्थाय सीतां विना निशाचर ।
तस्मात्त्वरितमेवात्र कुरु यत्नं महामते ॥
सुग्रीवस्त्वब्रवीद्वाक्यं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अद्यैव वानराः सर्वे यास्यन्ति नगरं तव ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम और महाबली लक्ष्मण ने सुग्रीव के साथ मिलकर मन्त्रणा की। सुग्रीव ने हाथ जोड़कर राम से पूछा: "यदि सीता न मिले तो मैं क्या करूँ?" राम ने सुग्रीव की बात सुनकर ध्यान में लीन होकर लक्ष्मण और सुग्रीव से कहा: "सीता के बिना मुझे जीवन अर्थहीन है। अतः हे महामते! शीघ्र ही यहाँ प्रयत्न करो।" तब सुग्रीव ने सत्यपराक्रमी राम से कहा: "आज ही सब वानर आपके कार्य में लग जायेंगे।"

🔍 सर्ग का विशेष महत्त्व

🤲 क्षमा का आदर्श

राम ने सुग्रीव की भूल पर क्रोध न करके उसे स्नेह से गले लगाया। यह मित्रता में क्षमा का अनुपम उदाहरण है।

🧠 हनुमान की कूटनीति

हनुमान ने सुग्रीव को उचित मार्ग दिखाकर दोनों मित्रों के बीच अनबन को टाला। वे एक कुशल मन्त्री के रूप में उभरते हैं।

⚡ लक्ष्मण का तेज

लक्ष्मण का क्रोध राम के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा और भक्ति को दर्शाता है। वे राम के कष्ट को सहन नहीं कर पाते।

🗓️ समय का महत्व

सुग्रीव को राज्यमद ने समय का अहसास नहीं रहने दिया, लेकिन जागते ही वह तुरन्त कर्तव्य पर लौट आया। यह संदेश देता है कि भूल सुधारने में देर नहीं करनी चाहिए।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें मित्रता में कर्तव्य-पालन का पाठ मिलता है। राज्य-सुख में डूबकर अपने वचन को न भूलें, और यदि भूल हो जाए तो उसे स्वीकार कर क्षमा माँगने में संकोच न करें। सच्चा मित्र वही है जो अपराध क्षमा करके पुनः सहयोग हेतु तैयार हो जाए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे अष्टात्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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