मैत्रीपूर्ण संवाद

किष्किन्धाकाण्ड के सातवें सर्ग में भगवान श्रीराम और वानरराज सुग्रीव के बीच मैत्री का अटूट बन्धन स्थापित होता है। सुग्रीव अपने भाई बाली के अत्याचारों का वर्णन करते हैं और श्रीराम उन्हें बाली का वध करने का आश्वासन देते हैं। अग्नि को साक्षी मानकर दोनों मित्रता का वचन लेते हैं।

विवरण

सीता की खोज में निकले श्रीराम और लक्ष्मण, हनुमान के माध्यम से सुग्रीव से मिलते हैं। प्रभु राम सुग्रीव को उनके वास्तविक स्वरूप में पहचानते हैं और मित्रता का हाथ बढ़ाते हैं। सुग्रीव अपनी व्यथा सुनाते हैं—कैसे उनके बड़े भाई बाली ने राज्य हड़प लिया और उनकी पत्नी रुमा का हरण कर लिया। राम सुग्रीव को अभयदान देते हैं और बाली के वध का संकल्प करते हैं। सुग्रीव को प्रभु की शक्ति पर संदेह होता है, किन्तु राम उन्हें अपने बल का प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं। तत्पश्चात् दोनों अग्नि की साक्षी लेकर मित्रता स्थापित करते हैं। यह सर्ग राम-सुग्रीव मैत्री की आधारशिला है, जो आगे चलकर सीता की खोज और रावण-वध का मार्ग प्रशस्त करती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ७

(मैत्रीपूर्ण संवाद – राम-सुग्रीव मित्रता)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पम्पा सरोवर के तट पर हनुमान के माध्यम से श्रीराम का सुग्रीव से मिलन हुआ। अब दोनों एकान्त में बैठकर मैत्री का सूत्र बुन रहे हैं। सुग्रीव ने सीता की पहचान के लिए राम को मुग्धा के आभूषण दिखाए, और राम ने उन्हें पहचान लिया। अब सुग्रीव अपने दुःखों को राम के समक्ष रखते हैं, और राम उन्हें हर संकट से मुक्त कराने का वचन देते हैं। यह सर्ग उसी वार्तालाप और मैत्री-बन्धन की कथा कहता है।

😔 सुग्रीव का विलाप और राम का आश्वासन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सुग्रीवो धर्मात्मा रामं सत्यपराक्रमम् ।
उवाच परमप्रीतो वचनं हेतुमत्तरम् ॥
ममापि किञ्चिद् दुःखं हि शृणु राम महाबल ।
बालिना मे महद्वैरं भ्रात्रा धर्मविवर्जितम् ॥
स धर्मं परित्यज्य बलदर्पितः ।
मया सह बलाद् राज्यं भुङ्क्ते परमधार्मिकः ॥
रुमा नाम वरारोहा पत्नी मम सुभाषिणी ।
तामपि प्रसभं हृत्वा मम शोकविवर्धनः ॥
तस्य दर्पस्य दुष्टस्य वधं कर्तुं त्वमर्हसि ।
त्वया रक्षामहे वीर वत्स्यामो विगतज्वराः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सुग्रीवः = सुग्रीव; धर्मात्मा = धर्मात्मा; रामम् = राम से; सत्यपराक्रमम् = सत्य पराक्रमी; उवाच = बोला; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न होकर; वचनम् = वचन; हेतुमत्तरम् = तर्कपूर्ण; ममापि = मुझे भी; किञ्चित् = कुछ; दुःखम् = दुःख; हि = ही; शृणु = सुनो; राम = हे राम; महाबल = महान बल वाले; बालिना = बाली के द्वारा; मे = मेरा; महद्वैरम् = बड़ा वैर; भ्रात्रा = भाई के द्वारा; धर्मविवर्जितम् = धर्म से रहित; सः = वह; धर्मम् = धर्म; परित्यज्य = त्याग कर; बलदर्पितः = बल के अभिमान से युक्त; मया = मेरे; सह = साथ; बलात् = बलपूर्वक; राज्यम् = राज्य; भुङ्क्ते = भोगता है; परमधार्मिकः = (व्यंग्य) परम धार्मिक; रुमा = रुमा; नाम = नाम से; वरारोहा = सुन्दर नितम्बों वाली; पत्नी = पत्नी; मम = मेरी; सुभाषिणी = मधुरभाषिणी; ताम् = उसे; अपि = भी; प्रसभम् = बलपूर्वक; हृत्वा = हर कर; मम = मेरे; शोकविवर्धनः = शोक बढ़ाने वाला; तस्य = उसके; दर्पस्य = दर्पयुक्त; दुष्टस्य = दुष्ट; वधम् = वध; कर्तुम् = करने के लिए; त्वम् = आप; अर्हसि = योग्य हैं; त्वया = आपके द्वारा; रक्षामहे = रक्षा पा सकें; वीर = हे वीर; वत्स्यामः = निवास करेंगे; विगतज्वराः = भयरहित।
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा सुग्रीव सत्यपराक्रमी राम से अत्यन्त प्रसन्न होकर तर्कपूर्ण वचन बोले: “हे महाबली राम! मेरा भी कुछ दुःख सुनो। मेरे धर्मरहित भाई बाली से मेरा बड़ा वैर है। वह बल के अभिमान से धर्म को त्यागकर बलपूर्वक मेरा राज्य भोग रहा है। और मेरी सुन्दर नितम्बों वाली, मधुरभाषिणी पत्नी रुमा को भी बलात् हर ले गया, जिससे मेरा शोक बढ़ गया है। हे वीर! आप उस दर्पी दुष्ट का वध करने योग्य हैं। आपसे रक्षा पाकर हम निर्भय होकर यहाँ निवास करेंगे।”
🔍 व्याख्या : सुग्रीव राम के सामने अपनी पीड़ा रखते हैं। वे बाली को धर्मविहीन बताते हैं, क्योंकि उसने छोटे भाई की पत्नी का हरण किया और राज्य हड़पा। राम के रक्षक-धर्म के अनुरूप यह याचना है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं सुग्रीवस्य महात्मनः ।
प्रत्युवाच महातेजा हनूमन्तं समीक्ष्य च ॥
अहं ते हनिष्ये वालिनं सुग्रीव सायकैः ।
पश्य मे बाहुवीर्यं च धनुषश्च पराक्रमम् ॥
यथा हि मम बाणौघा निर्विषन्ति महीतले ।
तथा वाली हतो युद्धे वर्तते नात्र संशयः ॥
सुग्रीवस्तु ततो रामं प्रणम्य शिरसा भुवि ।
उवाच हर्षितो वाक्यं राघवं सत्यविक्रमम् ॥
अहं वानरमुख्यानां निवेशयितुमिच्छुकः ।
त्वया सह महाबाहो सीतायाः परिमार्गणे ॥
📖 भावार्थ : महात्मा सुग्रीव के उस वचन को सुनकर महातेजा राघव ने हनुमान की ओर देखते हुए उत्तर दिया: “हे सुग्रीव! मैं अपने बाणों से बाली का वध कर दूँगा। मेरी भुजाओं के बल और धनुष के पराक्रम को देखो। जिस प्रकार मेरे बाण पृथ्वी पर (लक्ष्य को) बींधते हैं, उसी प्रकार बाली युद्ध में मारा जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं।” तब सुग्रीव ने सत्यविक्रमी राघव को भूमि पर सिर रखकर प्रणाम किया और हर्षित होकर वचन बोले: “हे महाबाहो! मैं वानरश्रेष्ठों के साथ आपके सहयोग से सीता की खोज करना चाहता हूँ।”
🔍 व्याख्या : राम ने तुरन्त बाली वध का वचन दिया। उनका आत्मविश्वास उनके बल और धनुष के प्रति अटूट है। सुग्रीव राम के इस साहस से प्रेरित होकर उनकी सहायता का वचन देते हैं।

🔥 अग्नि-साक्षी मैत्री और वचनबद्धता (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततस्तु धर्मसंयुक्तं वचनं राघवोऽब्रवीत् ।
अग्निं साक्षीकृत्य ततः करिष्ये मित्रतां त्वया ॥
अग्नेः सकाशं गच्छावो यत्राग्निः क्रियते द्विजैः ।
तत्र साक्ष्ये हुताशनं कृत्वा मित्रं भवाम्यहम् ॥
तथेति सुग्रीवो राममादाय च धनुर्धरम् ।
जगाम सहितस्तेन यत्राग्निः समुपस्थितः ॥
तत्रावभृथसंकाशे समिद्धे जातवेदसि ।
रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य प्रीत्या परमया युतः ॥
उभौ तौ मित्रतां प्राप्तौ सुग्रीवरघुनन्दनौ ।
प्रदक्षिणं चक्रतुश्च हुताशनमरिन्दमौ ॥
📖 भावार्थ : तब राघव ने धर्मयुक्त वचन कहा: “अग्नि को साक्षी करके मैं तुमसे मित्रता करूँगा। आओ हम अग्नि के पास चलें, जहाँ द्विज अग्नि स्थापित करते हैं। वहाँ हुताशन को साक्षी बनाकर मैं मित्र बनूँगा।” सुग्रीव ने ‘तथास्तु’ कहा और धनुर्धर राम को लेकर वहाँ गए जहाँ अग्नि प्रज्वलित थी। वहाँ स्नान-संस्कार के समान प्रज्वलित अग्नि के समीप राम ने परम प्रीति से सुग्रीव का आलिंगन किया। वे दोनों – सुग्रीव और रघुनन्दन – मित्रता को प्राप्त हुए और अरिन्दम (शत्रुदमन) दोनों ने हुताशन की प्रदक्षिणा की।
🔍 व्याख्या : अग्नि को साक्षी मानकर मैत्री करना वैदिक परम्परा है। यह मित्रता अटूट और पवित्र मानी जाती है। राम और सुग्रीव ने इसी प्रकार मित्रता की, जो आदर्श मैत्री का प्रतीक है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः कृताञ्जलिः सुग्रीवो रामं वचनमब्रवीत् ।
त्वं नाथः सर्वभूतानां देवानामपि राघव ॥
मया च सह मित्रत्वं करोषि विगतज्वरः ।
यथा वानरमुख्यानामधिपः स्यां तथा कुरु ॥
रामस्तु प्रहसन्वाक्यं सुग्रीवं प्रत्युवाच ह ।
वधेन बालिनः सुग्रीव राज्यं ते प्रददाम्यहम् ॥
एवमुक्त्वा तु रामस्तु सुग्रीवं वानरेश्वरम् ।
उवाच लक्ष्मणं वीरं वचनं धर्मसंहितम् ॥
प्रीतोऽस्मि सुग्रीवेण वीर बालिवधेप्सुना ।
अस्यार्थे यत्नमातिष्ठ यथा शीघ्रं वयं व्रजेम ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने हाथ जोड़कर राम से कहा: “हे राघव! आप सब प्राणियों के स्वामी हैं, देवताओं के भी। और आप मेरे साथ निर्भय होकर मित्रता कर रहे हैं। जैसे मैं वानरश्रेष्ठों का अधिपति बन सकूँ, वैसा कीजिए।” राम ने मुस्कुराकर सुग्रीव को उत्तर दिया: “बाली के वध से मैं तुम्हें राज्य प्रदान करूँगा।” ऐसा कहकर राम ने वीर लक्ष्मण से धर्मसंहित वचन कहा: “हे वीर! बाली के वध की इच्छा रखने वाले सुग्रीव से मैं प्रसन्न हूँ। इसके लिए ऐसा यत्न करो कि हम शीघ्र ही वहाँ जा सकें।”

🏹 राम का बल प्रदर्शन – सात साल वृक्ष भेदन (श्लोक २१-३४)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
सुग्रीवस्तु ततो राममुवाच प्रणतात्मवान् ।
अस्मिन्वने महाभाग निहता दुष्टराक्षसाः ॥
किन्तु बाली महातेजा वरदानेन दुर्जयः ।
यस्य बाणाः सुविहिताः शत्रून्नाशयते युधि ॥
रामस्तु तद्वचः श्रुत्वा सुग्रीवस्य महात्मनः ।
उवाच परमक्रुद्धो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
सुग्रीव पश्य मे वीर्यं बाणानां च पराक्रमम् ।
येन हत्वा दुराधर्षं बालिनं तोषये तव ॥
इत्युक्त्वा राघवो धन्वी विष्फार्य सशरं धनुः ।
ज्याशब्दं सृजतां श्रेष्ठश्चकाराद्भुतदर्शनम् ॥
तस्य शब्देन वित्रेसुर्वानराः सर्व एव हि ।
पेतुः सर्वे महीपृष्ठे हाहाकारं प्रचक्रिरे ॥
ततः सालान्सप्त विव्याध रामः ।
एकेषुणा भूमिगतान्प्रकम्प्य ॥
ते सप्त साला विद्धाः सर्वे ।
निपेतुर्धरणीतले ॥
दृष्ट्वा तदद्भुतं कर्म सुग्रीवो विस्मयान्वितः ।
प्रणम्य राघवं प्रीत इदं वचनमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने विनम्रता से राम से कहा: “हे महाभाग! इस वन में बहुत से दुष्ट राक्षस मारे गए हैं, परन्तु महातेजा बाली वरदान के कारण दुर्जय है, जिसके बाण सुविधिपूर्वक शत्रुओं का नाश करते हैं।” राम ने महात्मा सुग्रीव का यह वचन सुनकर क्रोधपूर्वक कहा: “हे सुग्रीव! मेरे बल और बाणों के पराक्रम को देखो, जिससे दुर्धर्ष बाली को मारकर तुम्हें संतुष्ट करूँगा।” ऐसा कहकर राम ने धनुष चढ़ाया और ज्याशब्द किया, जिससे सब वानर भयभीत होकर गिर पड़े। फिर राम ने एक ही बाण से सातों साल वृक्षों को बींध डाला। वे सातों साल वृक्ष पृथ्वी पर गिर पड़े। यह अद्भुत कर्म देख सुग्रीव विस्मित हो गए और राम को प्रणाम करके प्रसन्न होकर बोले।
🔍 व्याख्या : सुग्रीव को राम की शक्ति पर विश्वास हो गया। यह बल प्रदर्शन आगे बाली-वध का आधार बना।
॥ श्लोक २९-३४ ॥
अहो बलमहो वीर्यं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
य एकेषुणा सप्त सालान्निर्बिभिदे रणे ॥
न मेऽस्ति सदृशो राम त्वया सख्यं कृतं महत् ।
अद्यप्रभृति भवता सह मित्रं भवाम्यहम् ॥
प्रीतोऽस्मि राम भद्रं ते वरं दास्यामि याचितः ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रयतिष्यामि सर्वथा ॥
एवमुक्त्वा तु सुग्रीवो रामं प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
आज्ञापय किम् कुर्वे त्वं प्राणानामपि संकटे ॥
रामस्तु सुग्रीवमालिङ्ग्य हर्षात् ।
लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ॥
अयं सखा मम सुहृत् सुग्रीवः सर्वकार्यकृत् ।
अनेन सह वत्स्यामो यथेष्टं विगतज्वराः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : “अहो! अक्लिष्टकर्मा राम का बल और वीर्य अद्भुत है, जिन्होंने एक ही बाण से सात साल वृक्षों को बींध दिया। हे राम! आपके समान मेरा कोई नहीं है। आपसे बड़ी मित्रता हुई। आज से मैं आपके साथ मित्र हूँ। हे राम! मैं प्रसन्न हूँ, आपका कल्याण हो। माँगने पर मैं वर दूँगा। सीता की खोज के लिए मैं सब प्रयत्न करूँगा।” ऐसा कहकर सुग्रीव ने हाथ जोड़कर राम से कहा: “आज्ञा दीजिए, प्राणों के संकट में भी मैं क्या करूँ?” राम ने सुग्रीव को हर्ष से आलिंगन किया और लक्ष्मण से कहा: “यह मेरा मित्र सुग्रीव सब कार्यों का साधक है। इसके साथ हम निर्भय होकर यथेच्छ निवास करेंगे।”
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने राम की शक्ति देखकर उनकी मित्रता को सार्थक माना और सीता की खोज का वचन दिया। यह मित्रता आगे चलकर विशाल वानर सेना के रूप में परिणत हुई।

🔱 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤝 आदर्श मैत्री

यह सर्ग मित्रता के उच्च आदर्शों को प्रस्तुत करता है। राम और सुग्रीव ने अग्नि को साक्षी मानकर जो मित्रता की, वह स्वार्थरहित और परोपकार पर आधारित थी। सुग्रीव को राम से राज्य की आशा थी, तो राम को सुग्रीव से सीता की खोज में सहायता। किन्तु दोनों ने एक-दूसरे के दुःख को समझा और निःस्वार्थ भाव से मित्रता निभाई।

⚔️ बलिदान और पराक्रम

राम ने सुग्रीव को अपने बल का प्रत्यक्ष प्रमाण देकर उनका विश्वास जीता। सात साल वृक्षों को एक बाण से बेधना राम के अद्वितीय पराक्रम को दर्शाता है। यह घटना बताती है कि सच्ची मित्रता में परस्पर विश्वास आवश्यक है, और विश्वास के लिए योग्यता का प्रदर्शन भी कभी-कभी अपेक्षित होता है।

🌳 वानरराज का कर्तव्य

सुग्रीव ने राम से सहायता पाकर तुरन्त सीता की खोज का बीड़ा उठाया। यह कृतज्ञता और कर्तव्यपरायणता का आदर्श है। मित्रता केवल लाभ के लिए नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे के काम आने के लिए होती है।

🔥 अग्नि-साक्ष्य

अग्नि को साक्षी मानकर की गई मैत्री वैदिक काल से प्रचलित है। यह बन्धन सर्वोच्च और अटूट माना जाता है। राम और सुग्रीव की मैत्री ने इस परम्परा को पुनर्जीवित किया और युगों तक आदर्श बना रहा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें मित्रता का सच्चा अर्थ समझने को मिलता है। मित्र वही जो विपत्ति में काम आए। राम और सुग्रीव ने एक-दूसरे के कष्टों को दूर करने का संकल्प लिया और उसे निभाया। हमें भी अपने मित्रों के प्रति ऐसी ही निष्ठा और समर्पण रखना चाहिए। साथ ही, जब कोई हमारी सहायता करे, तो उसका उचित प्रत्युपकार करना भी हमारा कर्तव्य है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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