हनुमान् द्वारा समुद्र लांघने की अपनी क्षमता का दावा

किष्किन्धाकाण्ड का सड़सठवाँ सर्ग वानर सेना के समुद्र तट पर पहुँचने और वहाँ हनुमान द्वारा अपनी शक्तियों का परिचय देते हुए समुद्र लांघने का दावा करने का वर्णन करता है। जाम्बवान द्वारा उनकी शक्तियों का स्मरण दिलाने पर हनुमान अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हैं और समुद्र पार करने का संकल्प लेते हैं।

विवरण

सीता की खोज में निकली वानर सेला ऋष्यमूक पर्वत से दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए अनेक पर्वतों, वनों और नदियों को पार करती हुई अन्त में दक्षिण के महासागर (हिन्द महासागर) के तट पर पहुँचती है। विशाल एवं अथाह समुद्र को देखकर सभी वानर निराश और चिन्तित हो जाते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कि इतना विशाल समुद्र कैसे पार किया जाए। उसी समय अंगद, जयन्त आदि वीर वानर अपनी-अपनी शक्तियों का बखान करने लगते हैं, परन्तु वास्तविक समाधान नहीं निकलता। तब जाम्बवान, जो वानरों के सबसे वृद्ध एवं बुद्धिमान नेता हैं, हनुमान की ओर देखते हैं। वे हनुमान को उनके जन्म, उनकी अपार शक्तियों और पवनदेव के पुत्र होने का स्मरण दिलाते हैं। वे कहते हैं कि हे वानरश्रेष्ठ! तुममें समुद्र लांघने की अद्भुत क्षमता है, तुम ही इस कार्य को कर सकते हो। जाम्बवान के वचनों को सुनकर हनुमान अपने वास्तविक, विशाल स्वरूप को प्रकट करते हैं। वे समुद्र पार कर लंका जाने, सीता का पता लगाने और राक्षसों का संहार करने का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हैं। यह सर्ग हनुमान के शौर्य, सामर्थ्य और आत्मविश्वास के उदय का अद्भुत वर्णन करता है, जो आगे चलकर सम्पूर्ण रामायण की दिशा बदल देता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६७

(हनुमान् द्वारा समुद्र लांघने की अपनी क्षमता का दावा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव के आदेश पर सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए अन्तिम छोर पर पहुँच गए हैं। उनके सामने अब विशाल एवं अथाह समुद्र है। उसे पार किए बिना लंका तक पहुँचना और सीता का पता लगाना असम्भव प्रतीत हो रहा है। सभी वानर निराशा में डूब रहे होते हैं कि तभी वृद्ध जाम्बवान हनुमान का परिचय देते हुए उनकी शक्तियों को जाग्रत करते हैं। यह सर्ग उसी आत्म-साक्षात्कार और शक्ति के उद्घोष की कथा है।

🌊 समुद्र तट पर वानर सेना का आगमन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततस्ते ददृशुः सर्वे समुद्रमपराजितम् ।
गम्भीरं श्वसतः शीघ्रं वेलावनविभूषितम् ॥
तं दृष्ट्वा तु समुद्रस्य पारावारनिषेवितम् ।
विषण्णवदना ह्यासन् सर्वे वानरपुंगवाः ॥
न हि पारं समुद्रस्य पश्यामः सुमहोदधेः ।
कथं तारयितुं शक्यं नूनं नो निष्फलः श्रमः ॥
एवं ब्रुवाणान् सहसा वानरान् हरियूथपाः ।
समाश्वासयितुं प्राप्ता न च शेकुः समुद्रतः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = उन्होंने; ददृशुः = देखा; सर्वे = सबने; समुद्रम् = समुद्र को; अपराजितम् = अपराजित; गम्भीरम् = गहरा; श्वसतः = श्वास लेता हुआ सा; शीघ्रम् = तीव्र गति वाला; वेलावनविभूषितम् = तट के वनों से सुशोभित; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; तु = तो; समुद्रस्य = समुद्र के; पारावारनिषेवितम् = पार-अवार (दोनों तटों) से युक्त; विषण्णवदनाः = उदास मुख वाले; हि = ही; आसन् = हो गए; सर्वे = सब; वानरपुंगवाः = श्रेष्ठ वानर; न = नहीं; हि = ही; पारम् = पार; समुद्रस्य = समुद्र का; पश्यामः = हम देख पा रहे हैं; सुमहोदधेः = महान सागर का; कथम् = कैसे; तारयितुम् = पार करना; शक्यम् = सम्भव है; नूनम् = निश्चय ही; नः = हमारा; निष्फलः = व्यर्थ; श्रमः = परिश्रम; एवम् = इस प्रकार; ब्रुवाणान् = कहते हुए; सहसा = अचानक; वानरान् = वानरों को; हरियूथपाः = वानर-सेनापति; समाश्वासयितुम् = ढाढ़स बँधाने; प्राप्ताः = उद्यत हुए; न च शेकुः = और समर्थ न हुए; समुद्रतः = समुद्र के कारण।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात उन सब वानरों ने उस अपराजित, गम्भीर, वेग से श्वास लेते हुए से एवं तट के वनों से सुशोभित समुद्र को देखा। उस दोनों तटों से युक्त महासागर को देखकर सभी श्रेष्ठ वानर उदास मुख हो गए। वे सोचने लगे, हम इस महासागर का पार नहीं देख पा रहे हैं। इसे पार करना कैसे सम्भव है? निश्चय ही हमारा यह परिश्रम व्यर्थ हो गया। इस प्रकार कहते हुए वानरों को देखकर सेनापति उन्हें ढाढ़स बँधाने का प्रयास करते हैं, परन्तु समुद्र को देखकर वे स्वयं भी ऐसा करने में समर्थ नहीं हो पाते।
🔍 व्याख्या : समुद्र का यह वर्णन उसकी विशालता और दुर्गमता को दर्शाता है। यहाँ तक कि वीर वानर भी उसे देखकर निराश हो जाते हैं। यह निराशा हनुमान के उदय के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार करती है।

🙏 जाम्बवान का उपदेश और हनुमान की स्तुति (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-२० ॥
ततो जाम्बवता वाक्यमुक्तं हनुमतः प्रति ।
किमत्र चिरसंसुप्तं वीर्यं हनुमन् त्वया ॥
पवनस्यौरसः पुत्रः प्लवगेश्वर यः प्रभुः ।
तस्य ते सदृशं वीर्यं वक्तुमर्हसि वानर ॥
उत्पत्तिश्चैव ते वीर जाम्बवद्भिः पुरा श्रुता ।
यथा प्लवगशार्दूल लङ्कायां पर्वतो महान् ॥
मैनाकस्ते पुरा वीर वेगमाश्रित्य तिष्ठति ।
स त्वं वेगवतां श्रेष्ठ वेगं दर्शय वानर ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा जाम्बवतो महात्मनः ।
प्रहृष्टवदनो वीरो हनुमान् वाक्यमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : तब जाम्बवान ने हनुमान से यह वचन कहा: "हे हनुमन! तुमने अपना वीर्य (शक्ति) क्यों भुला दिया है? हे वानरेश्वर! जो पवनदेव के औरस पुत्र हैं और प्रभु हैं, उन तुम्हें अपने समान वीर्य (शक्ति) का वर्णन करना चाहिए। हे वीर! तुम्हारी उत्पत्ति की कथा मैंने पहले सुनी थी, कि हे वानरश्रेष्ठ! पूर्व काल में लंका का महान पर्वत मैनाक तुम्हारे वेग का आश्रय लेकर स्थित हुआ था। हे वेगवानों में श्रेष्ठ वानर! तुम अब अपना वेग दिखाओ।" उस महात्मा जाम्बवान के उस वचन को सुनकर हनुमान प्रसन्न मुख वाले होकर वीरतापूर्ण वाक्य बोले।
🔍 व्याख्या : जाम्बवान सबसे वृद्ध और ज्ञानी हैं। वे हनुमान को उनके बचपन के उस घटना की याद दिलाते हैं जब उन्होंने सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिए छलाँग लगाई थी और रास्ते में मैनाक पर्वत ने उन्हें विश्राम के लिए आमंत्रित किया था। इस प्रकार वे हनुमान के भीतर छिपी अपार शक्ति को जाग्रत करते हैं।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
श्रूयतां वचनं वीरा यथा शक्तिर्ममात्मनः ।
शतयोजनविस्तीर्णं तरिष्यामि महोदधिम् ॥
लङ्कां च द्रक्ष्यते सीतां रावणं च महाबलम् ।
हत्वा राक्षससंघातान् सीतामानेष्यते मयि ॥
अथवा नैष मे बुद्धिर्युक्ता वानरपुंगवाः ।
यदहं तारयिष्यामि समुद्रमपि वानरान् ॥
एतावदुक्त्वा वचनं हनुमान् मारुतात्मजः ।
प्रहृष्टवदनो वीरो वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : "हे वीरो! मेरी शक्ति के विषय में मेरा वचन सुनिए। मैं इस विस्तृत (सौ योजन) महासागर को लांघ जाऊँगा। मैं लंका को, सीता को और महाबली रावण को भी देखूँगा। राक्षसों के समूहों को मारकर सीता को (लंका से) ले आऊँगा। अथवा हे वानरश्रेष्ठों! यह मेरी बुद्धि उचित नहीं है कि मैं समुद्र को लांघकर वानरों को भी (वहाँ) ले जाऊँ (अकेले ही यह कार्य करूँ)।" इतना वचन कहकर वीर हनुमान, पवन के पुत्र, प्रसन्न मुख वाले होकर यह उत्तर देने लगे।
🔍 व्याख्या : हनुमान सबसे पहले आत्मविश्वास के साथ यह घोषणा करते हैं कि वे सौ योजन विस्तृत समुद्र को लांघ सकते हैं। यह उनके अप्रतिम शौर्य और सामर्थ्य का परिचायक है।

🚀 हनुमान का संकल्प और विशाल रूप धारण (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३८ ॥
ततः स ववृधे वीरो हनुमान् मारुतात्मजः ।
पर्वताग्रसमः कायमकरोल्लोकविश्रुतः ॥
स तु वृद्ध्वा महातेजा हनुमान् पवनात्मजः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः समुत्पतितुमुद्यतः ॥
तस्योत्पतितुकामस्य वेगवान् पवनात्मजः ।
वेलां समुद्रमासाद्य वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ॥
यथा शक्रस्य वज्रं वै यथा विष्णोः सुदर्शनम् ।
तथा ममापि वेगेन प्लवनं भविता ध्रुवम् ॥
अद्य प्राप्स्यामि लङ्कां तु द्रक्ष्यामि जनकात्मजाम् ।
इत्युक्त्वा वचनं वीरो हनुमान् मारुतात्मजः ।
प्रहृष्टवदनो वेगादुत्पपात नभस्तलम् ॥
📖 भावार्थ : तब वीर हनुमान, पवन के पुत्र, बढ़ने लगे। लोकविख्यात उस वीर ने अपने शरीर को पर्वत के शिखर के समान विशाल बना लिया। फिर उस महातेजस्वी हनुमान ने बढ़कर ऊँचा सिंहनाद किया और ऊपर उड़ने के लिए उद्यत हो गए। उनके उड़ने की इच्छा से वेगशाली पवनपुत्र हनुमान ने समुद्र के तट पर आकर यह उत्तर वचन कहा: "जैसे इन्द्र का वज्र और विष्णु का सुदर्शन चक्र अस्त्र हैं, वैसे ही मेरे वेग से कूदना निश्चित रूप से सफल होगा। आज मैं निश्चय ही लंका को प्राप्त करूँगा और जनकनंदिनी सीता को देखूँगा।" ऐसा वचन कहकर वीर हनुमान, पवनपुत्र, प्रसन्न मुख वाले होकर वेग से आकाश में उड़ चले।
🔍 व्याख्या : यहाँ हनुमान अपने संकल्प को दृढ़ करते हुए अपना विराट स्वरूप धारण करते हैं। उनका आत्मविश्वास और शक्ति अद्वितीय है। वे समुद्र लांघने के लिए आकाश की ओर उड़ान भरते हैं, जो रामकथा की सबसे रोमांचक घटनाओं में से एक है। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है।
तस्य वेगेन महता वेलाभंगः सुघोरवत् ।
बभूव स महासत्त्वो हनुमान् मारुतात्मजः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : उस महान वेग से समुद्र की तटरेखा टूटने जैसा प्रचण्ड शब्द हुआ। वे महासत्त्वशाली हनुमान, पवनपुत्र, (उड़ चले)।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🚀 आत्म-विश्वास का उदय

यह सर्ग बताता है कि कैसे एक गुरु (जाम्बवान) के सान्निध्य और मार्गदर्शन से छिपी हुई प्रतिभा और शक्ति जाग्रत हो सकती है। हनुमान अपनी शक्तियों को भूल चुके थे, किंतु जाम्बवान के वचनों ने उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप का बोध कराया।

🦸 हनुमान का चरित्र

इस सर्ग में हनुमान के चरित्र के अनेक पक्ष उभरकर आते हैं – विनम्रता (शुरुआत में चुप रहना), शक्ति (विशाल रूप धारण करना), आत्मविश्वास (समुद्र लांघने का दावा) और वीरता (सिंहनाद)।

🌉 कथा का मोड़

यह वह महत्वपूर्ण बिंदु है जहाँ से खोज अभियान सफलता की ओर बढ़ता है। हनुमान के इस संकल्प ने आगे चलकर सीता का पता लगाने, रावण का बल देखने और अन्ततः सम्पूर्ण रामायण के युद्ध की नींव रखी।

⚡ पवनपुत्र की महिमा

हनुमान की शक्ति का स्रोत उनके पिता पवनदेव को माना गया है। उनके वेग और उड़ने की क्षमता का वर्णन पवन के साथ उनके अटूट सम्बन्ध को दर्शाता है। वे केवल एक वानर नहीं, अपितु दैवीय शक्तियों से सम्पन्न महान योद्धा हैं।

🎯 शिक्षा : हमें अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचानना चाहिए और उन पर विश्वास करना चाहिए। कठिन से कठिन कार्य भी आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प से किए जा सकते हैं। जीवन में जाम्बवान जैसे मार्गदर्शक का महत्व भी इस सर्ग से सीखने को मिलता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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