हनुमान् के जन्म की कथा

किष्किन्धाकाण्ड का यह सर्ग हनुमान् जी के जन्म की अद्भुत कथा का वर्णन करता है। राम-लक्ष्मण से भेंट होने पर हनुमान् अपने जन्म की कथा सुनाते हैं - कैसे वे अंजना और केसरी के पुत्र हैं, और पवनदेव के आशीर्वाद से उनका जन्म हुआ।

विवरण

राम और लक्ष्मण, सुग्रीव की सहायता के लिए ऋष्यमूक पर्वत पर आए हुए हैं। सुग्रीव ने हनुमान् को राम-लक्ष्मण से मिलने भेजा। हनुमान् वानर-रूप में उनके पास जाते हैं और अपना परिचय देते हैं। राम उनकी विनम्रता और बुद्धिमत्ता देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उनसे उनके कुल एवं जन्म के बारे में पूछते हैं। तब हनुमान् अपने जन्म की कथा सुनाते हैं। वे बताते हैं कि उनकी माता अंजना नामक अप्सरा थीं, जो शापवश वानरी बन गई थीं। उनका विवाह केसरी नामक वानर से हुआ। पुत्र की कामना से अंजना ने घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर पवनदेव ने उन्हें अपना तेज प्रदान किया। इस प्रकार हनुमान् का जन्म हुआ, जो पवनदेव के अंश से उत्पन्न होने के कारण पवनपुत्र कहलाए। बाल्यकाल में हनुमान् ने सूर्य को फल समझकर खाने का प्रयत्न किया, जिससे इन्द्र क्रोधित हो गए और उन्होंने वज्र से हनुमान् पर आघात किया। इससे उनकी हनु (ठुड्डी) टूट गई, और वे हनुमान् नाम से विख्यात हुए। तब पवनदेव ने समस्त वायु रोक दी, जिससे सृष्टि संकट में पड़ गई। देवताओं ने आकर हनुमान् को अनेक वरदान दिए। ब्रह्मा ने उन्हें अजेयता का वरदान दिया, विष्णु ने अस्त्र-शस्त्रों से अभेद्यता, शिव ने अमरत्व, इन्द्र ने इच्छानुसार मृत्यु का वरदान दिया। इस प्रकार हनुमान् अत्यंत बलशाली और वरदानों से युक्त हुए। यह सुनकर राम अत्यंत प्रसन्न हुए और हनुमान् को आशीर्वाद दिया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६६

(हनुमान् के जन्म की कथा – हनुमान् द्वारा आत्मकथन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और लक्ष्मण, सुग्रीव से मित्रता करने के उद्देश्य से ऋष्यमूक पर्वत पर आए हैं। सुग्रीव ने हनुमान् को उनके पास भेजा। हनुमान् वानर-रूप में राम-लक्ष्मण के समीप जाते हैं और विनयपूर्वक अपना परिचय देते हैं। राम उनकी वाणी और बुद्धि से प्रभावित होकर उनके कुल एवं जन्म के विषय में पूछते हैं। तब हनुमान् अपने जन्म की अद्भुत कथा सुनाते हैं, जो इस सर्ग का मुख्य विषय है।

🙏 हनुमान् का विनयपूर्ण परिचय (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
अहं केसरिणः पुत्रः पवनस्यौरसः सुतः।
अंजनायाश्च गर्भेण जातः श्रीराम ते प्रियः॥
वानरः कामरूपी च बलवान् बुद्धिमानपि।
तव दर्शनलालसः प्राप्तोऽस्मि शरणार्थिनः॥
तन्मे कुलं च जन्म च श्रोतुमिच्छामि राघव।
कथयस्व यथातत्त्वं यदि प्रीतोऽसि मेऽनघ॥
🔹 पदच्छेद : अहम् = मैं; केसरिणः = केसरी का; पुत्रः = पुत्र; पवनस्य = पवनदेव का; औरसः = औरस (पिता-पुत्र संबंध से); सुतः = पुत्र; अंजनायाः = अंजना के; च = और; गर्भेण = गर्भ से; जातः = उत्पन्न; श्रीराम = हे श्रीराम; ते = आपके; प्रियः = प्रिय; वानरः = वानर; कामरूपी = मनचाहा रूप धारण करने वाला; च = और; बलवान् = बलवान्; बुद्धिमान् = बुद्धिमान्; अपि = भी; तव = आपका; दर्शनलालसः = दर्शन की अभिलाषा रखने वाला; प्राप्तः अस्मि = प्राप्त हुआ हूँ; शरणार्थिनः = शरण माँगने वाला; तत् = इसलिए; मे = मेरे; कुलम् = कुल; च = और; जन्म = जन्म; च = और; श्रोतुम् = सुनने की; इच्छामि = इच्छा रखता हूँ; राघव = हे राघव; कथयस्व = कहिए; यथातत्त्वम् = यथार्थ रूप से; यदि = यदि; प्रीतः = प्रसन्न; असि = हो; मे = मुझ पर; अनघ = निष्पाप।
📖 भावार्थ : हनुमान् ने कहा – हे राम! मैं केसरी का पुत्र हूँ और पवनदेव का औरस पुत्र हूँ। मेरा जन्म माता अंजना के गर्भ से हुआ है। मैं आपका प्रिय हूँ। मैं वानर हूँ, मनचाहा रूप धारण कर सकता हूँ, बलवान् और बुद्धिमान् भी हूँ। आपके दर्शन की लालसा से मैं शरण माँगने आया हूँ। अतः हे राघव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपया मेरे कुल और जन्म के विषय में यथार्थ रूप से कहिए।
🔍 व्याख्या : हनुमान् ने यहाँ अपना परिचय देते हुए राम से उनके कुल और जन्म के विषय में जानने की इच्छा व्यक्त की। वस्तुतः राम ने पूर्व में हनुमान् से उनके कुल के विषय में पूछा था, और हनुमान् इस प्रश्न के उत्तर में अपना वंश बताते हुए आगे जन्म-वृत्तांत कहते हैं।
॥ श्लोक ४-६ ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं हनुमन्तमुवाच ह।
श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते जन्म चैव तवानघ॥
यथा च ते मतिः सूक्ष्मा यथा बुद्धिश्च केवला।
यथा च बलमप्राप्तं यथा वीर्यं च नित्यदा॥
तन्मे विस्तरतः सर्वं कथयस्व महामते।
हनूमन् जन्म चैव ते वीर्यं चैव महाबल॥
📖 भावार्थ : राम ने हनुमान् के वचन सुनकर कहा – हे हनुमान्! मैं तुम्हारा जन्म सुनना चाहता हूँ। तुम्हारी बुद्धि कैसी है, तुम्हारा बल कैसा है, और तुम्हारा वीर्य कैसा है – यह सब विस्तार से बताओ। हे महामते हनुमान्! तुम्हारा जन्म और तुम्हारा वीर्य – यह सब मुझे विस्तार से बताओ।

🌬️ अंजना का तप और पवनदेव का वरदान (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-१० ॥
अंजना नाम मे माता केसरी तु पिता मम।
तौ तु दम्पती धर्मज्ञौ तपस्तेपतुरुत्तमम्॥
पुत्रार्थिनौ महाभागौ वायुमभ्यर्च्य भक्तितः।
वायुः प्रीतो ददौ पुत्रं तेजसा सदृशं स्वयम्॥
ततो मां वायुना सार्धं मातुर्गर्भे निवेशितम्।
अहं केसरिणः पुत्रः पवनस्यौरसः सुतः॥
ततः प्रभृति मां लोके पवनपुत्र इति स्मृतम्।
📖 भावार्थ : हनुमान् ने कहा – मेरी माता का नाम अंजना है और पिता केसरी हैं। वे दोनों धर्मज्ञ दम्पति थे और उन्होंने उत्तम तप किया। पुत्र की कामना से उन्होंने वायु की भक्तिपूर्वक आराधना की। वायु ने प्रसन्न होकर उन्हें अपने समान तेजस्वी पुत्र प्रदान किया। तब मुझे वायु के साथ माता के गर्भ में स्थापित किया गया। इस प्रकार मैं केसरी का पुत्र हूँ और पवनदेव का औरस पुत्र हूँ। तभी से लोक में मैं पवनपुत्र के नाम से जाना जाता हूँ।
🔍 व्याख्या : हनुमान् के जन्म की यह कथा अत्यन्त प्रचलित है। पवनदेव ने अपने तेज को अंजना के गर्भ में स्थापित किया, जिससे हनुमान् का जन्म हुआ। वे वायुपुत्र होने के कारण अत्यन्त बलशाली, वेगशाली और तेजस्वी हुए।

☀️ बाल्यकाल की लीला – सूर्य को निगलने का प्रयास (श्लोक १३-१८)

॥ श्लोक १३-१५ ॥
बाल्ये मया रविर्ग्रस्तः फलबुद्ध्या महाद्युतिः।
तस्य ग्रासार्थिनं दृष्ट्वा देवाः सर्वे भयार्दिताः॥
इन्द्रः सम्भ्रममापन्नो वज्रमुद्यम्य वेगवान्।
चिक्षेप मयि संक्रुद्धः प्रहारं सुमहाबलः॥
तेन वज्रप्रहारेण हनुर्मे भग्न आसुरी।
ततो हनुमानित्युक्तो नाम्ना लोके च विश्रुतः॥
📖 भावार्थ : बाल्यकाल में मैंने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयत्न किया। मुझे ऐसा करते देख सभी देवता भयभीत हो गए। इन्द्र ने शीघ्र ही वज्र उठाया और क्रोधित होकर मुझ पर बड़ा जोरदार प्रहार किया। उस वज्र के प्रहार से मेरी हनु (ठुड्डी) टूट गई। तभी से मैं संसार में 'हनुमान्' नाम से प्रसिद्ध हुआ।
🔍 व्याख्या : हनुमान् की इस बाललीला का वर्णन अनेक पुराणों में मिलता है। सूर्य को फल समझ खाने का प्रयत्न उनके अपार बल और बालसुलभ निर्भीकता को दर्शाता है। वज्राघात से हनु के टूटने पर उनका नाम 'हनुमान्' पड़ा।

🌀 पवनदेव का कोप और देवताओं के वरदान (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
ततो वायुः सुसंक्रुद्धो जगत्संचालयन् बलात्।
प्राणान् संयम्य सर्वेषां स्तब्धं सर्वमचेष्टत॥
ततो देवाः समागम्य ब्रह्माणं शरणं ययुः।
ब्रह्मा देवैः समं गत्वा वायुमेवान्वबोधयत्॥
ब्रह्मोवाच – त्यज कोपं महाभाग प्रसीद पवन प्रभो।
हनूमति च वज्राघातं क्षमस्व सुरसत्तम॥
वरं ददामि हनुमते यथेष्टं वरमुत्तमम्।
अजेयत्वं च देवेषु अस्त्रशस्त्रैः सदैव हि॥
📖 भावार्थ : तब पवनदेव अत्यन्त क्रोधित हुए और बलपूर्वक सम्पूर्ण जगत् को हिलाने लगे। उन्होंने सबके प्राण वायु को रोक दिया, जिससे सारा संसार निश्चेष्ट हो गया। तब सब देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी देवताओं के साथ वायु के पास गए और उन्हें समझाया। ब्रह्मा जी ने कहा – हे महाभाग! क्रोध त्यागें, प्रसन्न हों। हनुमान् पर वज्राघात के लिए क्षमा करें। मैं हनुमान् को मनचाहा उत्तम वरदान देता हूँ – वे सदैव देवताओं से भी अजेय रहेंगे, अस्त्र-शस्त्र उन्हें कभी प्रभावित न कर सकेंगे।
🔍 व्याख्या : ब्रह्मा जी के इस वरदान से हनुमान् अमरत्व और अजेयता के अधिकारी बने।
॥ श्लोक २३-२८ ॥
इन्द्रः प्राह – वज्राघाताद् व्रणं ते न भविष्यति।
स्वेच्छया मृत्युरस्यास्तु देवदेवैः समन्वितः॥
विष्णुः प्राह – ममांशेन त्वं रामस्य प्रियो भव।
सर्वास्त्रज्ञानसम्पन्नः सर्वज्ञश्च भविष्यसि॥
शिवः प्राह – ममांशेन अमरत्वं च लप्स्यते।
अष्टसिद्धियुतश्चैव भविष्यति न संशयः॥
एवं दत्त्वा वरान् सर्वे देवाः स्वं स्वं धाम ययुः।
ततः प्रभृति मे देवा वरदानैरलंकृताः॥
📖 भावार्थ : इन्द्र ने कहा – वज्राघात से तुम्हारे शरीर पर कोई घाव नहीं होगा। देवताओं की कृपा से तुम्हें इच्छानुसार मृत्यु प्राप्त होगी। विष्णु ने कहा – मेरे अंश से तुम राम के प्रिय होओगे, सब अस्त्रों के ज्ञान से सम्पन्न और सर्वज्ञ होओगे। शिव ने कहा – मेरे अंश से तुम अमरत्व प्राप्त करोगे और आठों सिद्धियों से युक्त होगे, इसमें संशय नहीं। इस प्रकार वरदान देकर सभी देवता अपने-अपने लोकों को चले गए। तभी से मैं देवताओं के वरदानों से अलंकृत हूँ।

🎉 राम की प्रसन्नता और आशीर्वाद (श्लोक २९-३५)

॥ श्लोक २९-३५ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु रामो वै हनुमन्तमुवाच ह।
प्रीतोऽस्मि हनुमन्नद्य जन्म ते श्रुतवानहम्॥
तव रूपं च वीर्यं च बुद्धिश्चातुलविक्रम।
सुग्रीवसख्यमिच्छामि त्वया सह महाबल॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामो दाशरथिस्तदा।
परिष्वज्य हनूमन्तं पुनः प्रीतो महायशाः॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : यह सब सुनकर राम ने हनुमान् से कहा – हे हनुमान्! आज मैं तुम्हारा जन्म सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। तुम्हारा रूप, वीर्य और बुद्धि अतुलनीय है। मैं तुम्हारे साथ सुग्रीव से मित्रता करना चाहता हूँ। ऐसा कहकर महातेजा राम ने हनुमान् को भुजाओं से पकड़कर आलिंगन किया और पुनः प्रसन्न हुए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार हनुमान् के जन्म की कथा सुनकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने हनुमान् का आलिंगन किया। यहीं से राम-हनुमान् की अटूट मित्रता का बीजारोपण हुआ।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ हनुमान् के दिव्य स्वरूप का उद्घाटन

इस सर्ग में हनुमान् स्वयं अपने दिव्य जन्म और देवताओं से प्राप्त वरदानों का वर्णन करते हैं। वे केवल वानर नहीं, अपितु पवनदेव के अंशावतार तथा अनेक देवताओं के वरदानों से युक्त महाशक्ति हैं। यह उनके चरित्र की नींव रखता है।

🤝 राम-हनुमान् मिलन की पृष्ठभूमि

हनुमान् के जन्म-वृत्तांत के माध्यम से राम उनकी महानता को समझते हैं और उनसे प्रेम करने लगते हैं। यह प्रसंग आगे चलकर सुन्दरकाण्ड में हनुमान् द्वारा सीता की खोज और लंका-दहन जैसी अद्भुत घटनाओं का मार्ग प्रशस्त करता है।

🌀 वायु का महत्त्व

पवनपुत्र के रूप में हनुमान् वायुतत्त्व के प्रतीक हैं। वायु ही सृष्टि में प्राण-शक्ति का संचार करती है। हनुमान् की अदम्य शक्ति, वेग और गति उनके पिता वायु से प्राप्त गुण हैं।

🎁 देवताओं के वरदानों का संग्रह

हनुमान् को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि सभी देवताओं ने वरदान दिए। इससे वे अमर, अजेय, सर्वसिद्धियुक्त और सर्वज्ञ बने। यही कारण है कि रामायण में वे सबसे अधिक शक्तिशाली पात्र हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि विनम्रता और भक्ति से हम दिव्य शक्तियों को भी अपना सकते हैं। हनुमान् ने स्वयं को राम के समक्ष निवेदित किया और राम ने उन्हें हृदय से लगा लिया। सच्ची भक्ति ही सबसे बड़ा बल है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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