वानरों का समुद्र लांघने का भय
किष्किन्धाकाण्ड के पैंसठवें सर्ग में वानर सेना का दक्षिण समुद्र तट पर पहुँचना और उसकी अपार विशालता को देखकर निराश होना वर्णित है। अंगद द्वारा उत्साहवर्धन के बावजूद सभी वानर समुद्र लांघने में असमर्थता स्वीकार कर लेते हैं और प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं। तब जाम्बवान हनुमान को उनकी दिव्य शक्तियों का स्मरण दिलाकर उन्हें समुद्र लांघने के लिए प्रेरित करते हैं।
विवरण
सीता की खोज में निकले वानर दल दक्षिण दिशा में बढ़ते हुए अन्ततः महेन्द्र पर्वत के समीप स्थित दक्षिण समुद्र के तट पर पहुँचते हैं। वहाँ विशाल एवं अथाह जलराशि को देखकर सभी वानर भयभीत एवं निराश हो जाते हैं। उनके मुख्य सेनापति अंगद उन्हें साहस बँधाते हैं और कहते हैं कि हमें किसी न किसी प्रकार समुद्र पार करना ही होगा, अन्यथा वापस लौटकर सुग्रीव को क्या मुँह दिखाएँगे? किन्तु वानर अपनी सीमित शक्तियों का हवाला देकर असमर्थता जताते हैं। वे एक स्वर में कहते हैं कि यह समुद्र सौ योजन विस्तृत है, इसे लाँघना हमारे वश की बात नहीं। निराश होकर वे सभी वहीं प्राण त्यागने का निश्चय कर लेते हैं और आमरण अनशन पर बैठ जाते हैं। तभे जाम्बवान नामक वृद्ध भालू (ऋक्षराज) हनुमान की ओर देखते हैं। वे हनुमान को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे वानरश्रेष्ठ! तुममें अपार शक्ति है। तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारे पिता वायु हैं। बाल्यकाल में तुमने सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने के लिए तीन सौ योजन की छलांग लगा दी थी। तुम्हारी शक्ति अद्भुत है। तुम ही इस समुद्र को पार करने में समर्थ हो। अतः उठो और इस कार्य को सिद्ध करो। जाम्बवान के इन प्रेरणादायक वचनों को सुनकर हनुमान का आत्मविश्वास जाग्रत हो जाता है। वे अपने वास्तविक बल को पहचानते हैं और समुद्र लाँघने का संकल्प करते हैं। इस प्रकार यह सर्ग वानरों की निराशा और हनुमान के प्रोत्साहन की कथा कहता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६५
(वानरों का समुद्र लांघने का भय – जाम्बवान द्वारा हनुमान को प्रोत्साहन)
🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में निकले वानर दल दक्षिण दिशा की ओर बढ़ते हुए अन्ततः महेन्द्र पर्वत के समीप विशाल दक्षिण समुद्र के तट पर जा पहुँचते हैं। वहाँ उस असीम जलराशि को देखकर सभी वानर भय से व्याकुल हो उठते हैं। यह सर्ग उनके उस भय, निराशा और फिर जाम्बवान के द्वारा हनुमान में आत्मविश्वास जगाने की कथा प्रस्तुत करता है।
🌊 समुद्र के दर्शन से उत्पन्न भय (श्लोक १-८)
ददृशुर्वारिधिं घोरं गम्भीरं भीमनिस्वनम् ॥
तस्य मध्ये महानादं जलान्ते जलदोपमम् ।
अपारमक्षोभ्यमसह्यं दुःखं चिन्तापरायणाः ॥
तमपारं समुद्रं तु दृष्ट्वा ते हरियूथपाः ।
विषण्णवदना भूत्वा न शर्म पर्युपागमन् ॥
विचेरुश्चिन्तयाविष्टाः समीपे लवणाम्भसः ।
न च स्म लङ्घने शक्तिं ददृशुर्वानरर्षभाः ॥
कथं वयं निवर्तिष्यो वैफल्येन समन्विताः ॥
न चेद्द्रक्ष्यामहे सीतां रामस्य महिषीं प्रियाम् ।
किं वक्ष्यामो गता रामं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
इति तेषां प्रलापांस्तु श्रुत्वा वचनमब्रुवन् ।
न शक्यो लङ्घितुं राजन् समुद्रो मकरालयः ॥
अपारो ह्यक्षयश्चैव गम्भीरश्च महोदधिः ।
न चास्ति लङ्घने शक्तिः कस्यचिद्वानरर्षभ ॥
😔 प्रायोपवेशन का संकल्प (श्लोक ९-१६)
प्रायोपवेशनं कर्तुं समुद्रस्यान्तमाश्रिताः ॥
न वयं लङ्घयिष्यामो न च द्रक्ष्याम मैथिलीम् ।
इह प्राणान् परित्यज्य यास्यामः परमां गतिम् ॥
एवमुक्त्वा महात्मानः कृत्वा चित्ते दृढां स्थितिम् ।
उपाविशंस्ते सहिता दर्भानास्तीर्य सर्वतः ॥
तान् दृष्ट्वा वानरान् सर्वान् प्रायोपवेशने स्थितान् ।
अंगदः पुनरेवेदं वचनं समभाषत ॥
🐻 जाम्बवान द्वारा हनुमान को जगाना (श्लोक १७-३०)
किमिदं वानरश्रेष्ठ विषादमुपगच्छसि ॥
त्वं वीरः पवनपुत्रश्च शक्तश्चासि महाबलः ।
बाल्ये तव प्रभावोऽयं सूर्यमारोहता कृतः ॥
शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं लवणाम्भसम् ।
लङ्घयित्वा प्रवेष्टव्यं लङ्कायां वै रावणालयम् ॥
त्वत्तो बलवत्तरो नास्ति त्रिषु लोकेषु वानर ।
तत्किमर्थमिदानीं त्वं विषादमुपगच्छसि ॥
उत्तिष्ठ कुरु वीर्यं स्वं कार्यमेतत्समापय ।
राघवस्य प्रियं कृत्वा सुग्रीवस्य महात्मनः ॥
चकार मनसा कार्यं वर्धमान इवोदधिः ॥
ततः प्रहर्षमतुलं लेभे वानरपुङ्गवः ।
श्रुत्वा जाम्बवता वाक्यं हेतुभिर्बहुभिर्युतम् ॥
प्रतिजज्ञे च तत्कार्यं करिष्यामीति वानरः ।
लङ्घयिष्ये महासिन्धुं लङ्कां द्रक्ष्यामि चापि वै ॥
सीतां च देवयुक्ताभिरुपायैरन्ववेक्ष्य च ।
रामाय कुशलं ब्रूयामिति विज्ञाय निश्चयम् ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः प्रणम्य च पितामहम् ।
जाम्बवन्तं च मेधावी लङ्घनाय मनो दधे ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥
✨ हनुमान का संकल्प
इस प्रकार जाम्बवान के उपदेश से हनुमान में आत्मविश्वास जाग्रत हुआ। उन्होंने समुद्र लाँघने का दृढ़ संकल्प किया। यह सर्ग वानरों की निराशा से उत्साह की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है। अगले सर्ग में हनुमान की अद्भुत छलांग का वर्णन होगा।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧠 आत्मविश्वास का जागरण
यह सर्ग हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन कार्य के लिए आत्मविश्वास आवश्यक है। हनुमान में अपार शक्ति थी, पर वे भूल गए थे। गुरु के उपदेश से उन्हें अपनी क्षमता का बोध हुआ।
🤝 नेतृत्व और प्रेरणा
जाम्बवान ने हनुमान को प्रेरित कर दिखाया कि सच्चा नेता दूसरों की क्षमता को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ाता है। अंगद ने भी प्रयास किया, पर जाम्बवान का अनुभव और ज्ञान कारगर सिद्ध हुआ।
🌉 संकट में धैर्य
वानरों ने संकट में धैर्य खो दिया और प्राण त्यागने का निश्चय किया, लेकिन सच्चा मार्गदर्शन मिलने पर वे पुनः उत्साहित हुए। यह दर्शाता है कि संकटकाल में धैर्य और सही सलाह की आवश्यकता होती है।
🕉️ भक्ति और सेवा
हनुमान की प्रतिज्ञा राम के प्रति उनकी अनन्य भक्ति को दर्शाती है। वे केवल शक्ति से नहीं, बल्कि समर्पण भाव से कार्य करते हैं। यह भक्ति का आदर्श उदाहरण है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे भीतर असीम शक्तियाँ छिपी होती हैं, जिनका ज्ञान हमें गुरु या अनुभवी जनों के सान्निध्य से होता है। जीवन में आने वाली बाधाएँ हमें निराश कर सकती हैं, पर सही प्रेरणा और आत्मबल से हर असम्भव कार्य सम्भव बन जाता है। हनुमान ने केवल संकल्प मात्र से वह कार्य कर दिखाया, जिसे असंख्य वानर असम्भव मान रहे थे। हमें भी अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास रखना चाहिए।