वानरों का समुद्र तट पर आगमन

किष्किन्धाकाण्ड के चौंसठवें सर्ग में वानरों का दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर पहुँचना वर्णित है। सीता की खोज में निकले वानर समुद्र तट पर पहुँचकर निराश हो जाते हैं और आत्मदाह का निर्णय लेते हैं। हनुमान उन्हें प्रोत्साहित करते हैं।

विवरण

सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में बहुत दूर तक गए, परन्तु उन्हें सीता का कोई सुराग नहीं मिला। अन्त में वे विशाल समुद्र के तट पर पहुँचे। समुद्र के भयानक रूप को देखकर और सीता का पता न चलने पर वे अत्यन्त निराश हो गए। अंगद ने सुझाव दिया कि वे सुग्रीव के आदेश का पालन न कर पाने के कारण प्राण त्याग दें। सभी वानर आत्मदाह के लिए तैयार हो गए। तब हनुमान ने उन्हें समझाया कि प्राण त्यागना उचित नहीं है, जब तक अंतिम प्रयास न किया जाए। उन्होंने समुद्र पार करने और लंका में सीता की खोज करने का संकल्प लिया। इस प्रकार हनुमान के प्रोत्साहन से वानरों में नई आशा का संचार हुआ।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६४

(वानरों का समुद्र तट पर आगमन – निराशा और आत्मदाह का निर्णय)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में बहुत दूर तक गए, परन्तु उन्हें सीता का कोई पता न चला। अन्त में वे समुद्र के तट पर पहुँचे। विशाल समुद्र को देखकर वे निराश हो गए और प्राण त्यागने का निश्चय किया। यह सर्ग उसी घटना का वर्णन करता है।

🌊 समुद्र तट पर आगमन और समुद्र का वर्णन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे समुद्रं ददृशुस्तदा ।
गम्भीरं भीमनिर्घोषं ग्राहनक्रनिषेवितम् ॥
तिमितिमिङ्गिलाकीर्णं मकरैश्च समाकुलम् ।
उर्मिमालाकुलं भीमं वेलाकालान्तरच्युतम् ॥
दृष्ट्वा ते वानराः सर्वे विषण्णवदना भृशम् ।
निराशाः सीतायास्ते सिन्धुं वीक्ष्य महोदधिम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; वानराः = वानर; सर्वे = सब; समुद्रम् = समुद्र को; ददृशुः = देखा; तदा = तब; गम्भीरम् = गम्भीर; भीमनिर्घोषम् = भयंकर शब्द वाला; ग्राहनक्रनिषेवितम् = ग्राह और नक्र (मगर) से युक्त; तिमितिमिङ्गिलाकीर्णम् = तिमि और तिमिङ्गिल मछलियों से भरा; मकरैः = मकरों से; च = और; समाकुलम् = व्याप्त; उर्मिमालाकुलम् = लहरों के समूह से युक्त; भीमम् = भयानक; वेलाकालान्तरच्युतम् = ज्वार के समय सीमा का उल्लंघन करने वाला; दृष्ट्वा = देखकर; ते = वे; वानराः = वानर; सर्वे = सब; विषण्णवदनाः = उदास मुख वाले; भृशम् = अत्यन्त; निराशाः = निराश; सीतायाः = सीता के; ते = वे; सिन्धुम् = समुद्र को; वीक्ष्य = देखकर; महोदधिम् = महासागर को।
📖 भावार्थ : तब वे सब वानर उस समुद्र को देखा, जो अत्यन्त गम्भीर, भयंकर शब्द वाला, ग्राह और नक्र (मगर) से युक्त था। वह तिमि और तिमिङ्गिल मछलियों से भरा हुआ, मकरों से व्याप्त, लहरों के समूह से युक्त, भयानक और वेला (ज्वार) के समय अपनी सीमा का उल्लंघन करने वाला था। उस महासागर को देखकर सब वानर अत्यन्त विषण्ण हो गए और सीता की प्राप्ति से निराश हो गए।
🔍 व्याख्या : समुद्र का यह वर्णन उसकी विशालता और दुर्गमता को दर्शाता है, जिससे वानरों की निराशा और गहरी होती है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ते समुद्रमनाधृष्यं दृष्ट्वा परमदुर्गमम् ।
सीतामप्राप्य दुःखार्ता निपेतुर्धरणीतले ॥
केचिन्मोहमुपागच्छन् केचिद् विलपितुं ययुः ।
केचिद् रुदन्ति सहसा केचिद् ध्यानपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : उस अजेय और अत्यन्त दुर्गम समुद्र को देखकर और सीता को न पाकर दुःख से पीड़ित वे सब वानर धरती पर गिर पड़े। कुछ मूर्छित हो गए, कुछ विलाप करने लगे, कुछ अचानक रोने लगे और कुछ ध्यान में लीन हो गए।

😔 निराशा और आत्मदाह का निर्णय (श्लोक ९-१५)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
ततः शोकसमाविष्टा अङ्गदो वाक्यमब्रवीत् ।
न सीता दृश्यते देवी हताः स्म वनगोचराः ॥
अकृत्वा वचनं राज्ञः सुग्रीवस्य महात्मनः ।
कथं वयमियं दुर्गां समासाद्य महार्णवम् ॥
प्राणांस्त्यक्ष्यामहे सर्वे निवेश्य ध्यानमात्मनि ।
अनाश्रित्य पुरीं लङ्कां राक्षसाधिपतिं विना ॥
📖 भावार्थ : तब शोक से व्याप्त अंगद ने कहा: "देवी सीता नहीं दिखती, हम सब वनवासी नष्ट हो गए। महात्मा सुग्रीव का वचन पूरा न कर पाने के कारण, इस दुर्गम समुद्र को देखकर, हम सब यहाँ प्राण त्याग देंगे। लंका और राक्षसों के अधिपति रावण का वध किए बिना ही हम आत्म-ध्यान में लीन होकर प्राण त्यागेंगे।"
🔍 व्याख्या : अंगद का यह प्रस्ताव वानरों की हताशा को दर्शाता है। वे कर्तव्य में असफल होने पर मृत्यु को ही श्रेयस्कर मानते हैं।
॥ श्लोक १३-१५ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे ते वानरर्षभाः ।
प्राणांस्त्यक्ष्यामहे सर्वे इत्यूचुः सहिता मुदा ॥
ततः कृत्वा व्यवस्थानं सर्वे ते वानरोत्तमाः ।
ध्यानमेव परं लेभुः प्राणत्यागाय निश्चिताः ॥
📖 भावार्थ : अंगद के उस वचन को सुनकर वे सब श्रेष्ठ वानर एक साथ प्रसन्नता से बोले: "हम सब प्राण त्याग देंगे।" तब उन सब उत्तम वानरों ने निश्चय करके ध्यान लगाया और प्राण त्यागने के लिए दृढ़ हो गए।

💪 हनुमान का प्रोत्साहन (श्लोक १६-२०)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततो हनूमान् धीमांस्तान् समाश्वास्य महाबलः ।
उवाच वचनं वीरः सर्वानेव वनौकसः ॥
नैषा धर्मस्य सन्धिर्वै प्राणत्यागो विगर्हितः ।
यावद्यत्नो न कर्तव्यः सीतायाः परिमार्गणे ॥
अहं तरामि सिन्धुं च लङ्कां द्रक्ष्यामि राक्षसीम् ।
यावच्छेषं करिष्यामि सीतायाः परिमार्गणम् ॥
अन्वेष्टव्या च वैदेही यावन्न प्राप्यते पुनः ।
तावदेव हि कर्तव्यो यत्नः सर्वात्मना हि नः ॥
📖 भावार्थ : तब महाबली हनुमान ने उन सब वानरों को आश्वासन दिया और कहा: "यह प्राणत्याग धर्मसंगत नहीं है, यह निन्दित है। जब तक सीता की खोज का प्रयत्न न किया जाए, हमें प्राण नहीं त्यागने चाहिए। मैं इस समुद्र को पार करूँगा और लंका को देखूंगा। मैं सीता की खोज का अंतिम प्रयास करूंगा। जब तक वैदेही पुनः प्राप्त न हो जाएँ, तब तक हमें पूरे प्रयत्न से खोज करनी चाहिए।"
🔍 व्याख्या : हनुमान का यह उत्साहवर्धक वचन वानरों में नई ऊर्जा भर देता है। वे धैर्य और साहस का संदेश देते हैं।

🏝️ उपसंहार

इस प्रकार हनुमान के वचन सुनकर सभी वानरों को कुछ आशा हुई। उन्होंने हनुमान को समुद्र पार करने की आज्ञा दी। अगले सर्ग में हनुमान का समुद्र पार करना और लंका में प्रवेश वर्णित होगा।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😢 निराशा में धैर्य

यह सर्ग मनुष्य की निराशा और आत्महत्या की प्रवृत्ति को दर्शाता है, परन्तु हनुमान के रूप में हमें सीख मिलती है कि अंतिम सांस तक प्रयास करना चाहिए।

🦸 हनुमान का नेतृत्व

हनुमान का प्रोत्साहन उनके कूटनीतिक और साहसिक व्यक्तित्व को उजागर करता है। वे सेना के प्रेरणास्रोत बनते हैं।

🌊 समुद्र : बाधा और अवसर

समुद्र यहाँ एक बाधा है, परन्तु हनुमान के लिए यह अपनी शक्ति प्रदर्शित करने का अवसर बनता है। यह आगे सुन्दरकाण्ड की भूमिका तैयार करता है।

🔱 आत्मदाह का प्रस्ताव

अंगद का आत्मदाह प्रस्ताव वानरों की कर्तव्यनिष्ठा और सुग्रीव के प्रति समर्पण को दर्शाता है, किन्तु यह अविवेकपूर्ण भी है।

🎯 शिक्षा : कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए और अंतिम प्रयास करना चाहिए। हनुमान का साहस और विवेक ही सफलता की कुंजी है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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