सम्पाती को नए पंख मिले और वे उड़ गए
किष्किन्धाकाण्ड के त्रेसठवें सर्ग में, सम्पाती द्वारा सीता का समाचार बताने के पश्चात, उनके पुराने जले हुए पंख पुनः उग आते हैं। नए पंखों से युक्त होकर सम्पाती आकाश में उड़ान भरते हैं और वानरों को आशीर्वाद देकर समुद्र पार जाने का मार्ग बताते हैं।
विवरण
यह सर्ग सम्पाती और वानरों के मिलन की कहानी का सुखद अंत है। अंगद के नेतृत्व में वानर दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए समुद्र तट पर पहुँचते हैं, जहाँ उनकी भेंट गिद्धराज सम्पाती से होती है। पिछले सर्ग में सम्पाती ने अपने भाई जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर वानरों को सीता के बारे में पूरी जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया है और वे लंका में हैं। समाचार देने के बाद, सम्पाती वानरों को लंका तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं। इसी दौरान, चमत्कारिक रूप से उनके वे पंख, जो सूर्य के निकट जाने के कारण बचपन में जल गए थे, पुनः उग आते हैं। नए पंखों को पाकर सम्पाती अत्यंत प्रसन्न होते हैं और वानरों को आशीर्वाद देते हैं कि वे सफल हों। तत्पश्चात, वे आकाश में उड़ान भरकर चले जाते हैं, जिससे वानरों का मनोबल और भी बढ़ जाता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६३
(सम्पाती को नए पंख मिले और वे उड़ गए)
🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में सम्पाती ने वानरों को सीता के बारे में महत्वपूर्ण सूचना दी थी कि वे लंका में हैं। अब वही सम्पाती, अपने इस परोपकार के फलस्वरूप, अपने खोए हुए पंखों को वापस पाकर गगन में विचरण करने में समर्थ हो जाते हैं। यह सर्ग करुणा, परोपकार और दैवीय कृपा का सुंदर मिलन है।
🧭 सम्पाती का मार्गदर्शन और आशीर्वाद (श्लोक १-१२)
उवाच परमप्रीतो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥
अहमद्य गमिष्यामि यथाकामं खगोत्तमः ।
द्रष्टुं रावणसंयुक्तां वैदेहीं जनकात्मजाम् ॥
इत्युक्त्वा स महातेजाः सम्पातिः शोककर्शितः ।
जगाम गगनं वीरो वेगेन महता हरिः ॥
तं प्रयान्तं समालोक्य हरयः परमार्थतः ।
विस्मयं परमं जग्मुः सम्पातिं गगने स्थितम् ॥
अहो नूनं महाभागः सम्पातिः पक्षिसत्तमः ।
यस्येयं दृश्यते शक्तिर्गमने च महात्मनः ॥
इति ते हरयः सर्वे सम्पातिं समपूजयन् ।
यूयं वै हरयः सर्वे शीघ्रं गच्छत माचिरम् ॥
एष पन्थाः सुगम्यो वो येन गच्छथ माचिरम् ।
रावणस्य पुरी रम्या लङ्का नाम सुदुर्गमा ॥
तस्यां सीता स्थिता देवी राक्षसीनां शतैर्वृता ।
तां द्रक्ष्यथ न सन्देहः क्षिप्रं द्रक्ष्यथ मैथिलीम् ॥
इत्युक्त्वा हरिशार्दूलान्सम्पातिः पक्षिसत्तमः ।
जगाम गगनं वीरो हर्षेण महता वृतः ॥
🪶 पंखों का चमत्कारिक पुनरुद्भव (श्लोक १३-२४)
पुराणौ पतितौ यस्य तप्तौ सूर्यस्य तेजसा ॥
स तु नवौ पक्षौ संप्रेक्ष्य सम्पातिः परवीरहा ।
मुमुदे प्रीतिसंयुक्तो हर्षेण महता वृतः ॥
अहो नूनं महद्ब्रह्म तपसा संशितात्मनाम् ।
सद्यः फलति कर्माणि यदिदं मे नवौ पक्षौ ॥
इति संचिन्त्य मनसा सम्पातिः पक्षिसत्तमः ।
जगाम गगनं वीरो वेगेन महता हरिः ॥
तं प्रयान्तं समालोक्य हरयः परमार्थतः ।
विस्मयं परमं जग्मुः सम्पातिं गगने स्थितम् ॥
यस्येयं दृश्यते शक्तिर्गमने च महात्मनः ॥
इति ते हरयः सर्वे सम्पातिं समपूजयन् ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा सम्पातिं प्रति हर्षिताः ॥
ततः सम्पातिराकाशे स्थित्वा वचनमब्रवीत् ।
यूयं वै हरयः सर्वे शीघ्रं गच्छत माचिरम् ॥
एष पन्थाः सुगम्यो वो येन गच्छथ माचिरम् ।
रावणस्य पुरी रम्या लङ्का नाम सुदुर्गमा ॥
तस्यां सीता स्थिता देवी राक्षसीनां शतैर्वृता ।
तां द्रक्ष्यथ न सन्देहः क्षिप्रं द्रक्ष्यथ मैथिलीम् ॥
🚀 सम्पाती का प्रस्थान और वानरों में नवजीवन (श्लोक २५-३२)
जगाम गगनं वीरो हर्षेण महता वृतः ॥
तस्मिन्प्रयाते सम्पातौ हरयः परमार्थतः ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा सम्पातिं प्रति हर्षिताः ॥
अयं स नः प्रदीप्तोऽग्निरयं स भुवि नायकः ।
अयं स नः परित्राता सम्पातिः पक्षिसत्तमः ॥
इति ते हरयः सर्वे सम्पातिं समपूजयन् ।
प्रहृष्टमनसो भूत्वा सम्पातिं प्रति हर्षिताः ॥
ततः सम्पातिमामन्त्र्य हरयः परमार्थतः ।
प्रययुः परमप्रीता लङ्कां प्रति महाबलाः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🪶 परोपकार का फल
सम्पाती ने बिना किसी स्वार्थ के वानरों की सहायता की। इस परोपकार के फलस्वरूप उन्हें अपने खोए हुए पंख वापस मिल गये। यह सिखाता है कि निस्वार्थ परोपकार का फल अवश्य मिलता है, चाहे वह कितने भी समय बाद क्यों न मिले।
🧭 दिशा-निर्देश और आत्मविश्वास
सम्पाती ने वानरों को केवल सूचना ही नहीं दी, बल्कि सही मार्ग भी बताया और उन्हें सफलता का विश्वास दिलाया। एक सफल नेता के लिए अपने साथियों का मार्गदर्शन करना और उनका मनोबल बढ़ाना आवश्यक है।
🔥 जटायु से मिलन
हालाँकि यह प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहा गया, लेकिन सम्पाती का पंखों का पुनः प्राप्त होना और उनका उड़ जाना, उनके छोटे भाई जटायु की आत्मा से मिलन का प्रतीक हो सकता है। यह घटना अरण्यकाण्ड की त्रासदी (जटायु वध) का एक सुखद अंत प्रस्तुत करती है।
💪 अगले अभियान की तैयारी
यह सर्ग किष्किन्धाकाण्ड का अंतिम चरण है और सुन्दरकाण्ड की भूमिका तैयार करता है। वानर अब लंका की ओर प्रस्थान कर चुके हैं और दर्शकों के मन में यह उत्सुकता है कि वे समुद्र को कैसे पार करेंगे।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करते हैं, तो ईश्वर की कृपा हमें अवश्य प्राप्त होती है। सम्पाती को उनके परोपकार का फल तुरन्त मिला। हमें भी बिना किसी लाभ की आशा के दूसरों की सहायता करनी चाहिए। साथ ही, कठिन से कठिन कार्य के लिए भी सही मार्गदर्शन और आत्मविश्वास मिल जाए तो सफलता अवश्य मिलती है।