सम्पाती की कथा (जारी)

किष्किन्धाकाण्ड का बासठवाँ सर्ग सम्पाती की कथा को आगे बढ़ाता है। पिछले सर्ग में अपने पंख गँवाने का कारण बताने के बाद, अब सम्पाती वानरों को सीता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने रावण को सीता को ले जाते हुए देखा था और अब वह दक्षिण दिशा में लंका नामक नगरी में है।

विवरण

अंगद के नेतृत्व में वानर दल सीता की खोज में दक्षिण दिशा की ओर बढ़ा। बहुत प्रयास के बाद भी जब उन्हें सीता का कोई सुराग नहीं मिला, तो वे निराश होकर प्राण त्यागने का निश्चय कर बैठे। उसी समय उनकी भेंट गिद्धराज सम्पाती से हुई। पिछले सर्ग (सर्ग ६१) में सम्पाती ने अपने भाई जटायु के बारे में जानने के बाद वानरों से मैत्री की और अपने पंख खोने की कथा सुनाई। अब इस सर्ग में, सम्पाती अपनी दिव्य दृष्टि का उपयोग करते हुए वानरों को बताते हैं कि उन्होंने राक्षसों के राजा रावण को एक अत्यंत सुंदर स्त्री (सीता) को बलपूर्वक दक्षिण दिशा की ओर ले जाते हुए देखा था। वह उन्हें यह भी बताते हैं कि सीता उस पार, समुद्र के दूसरी ओर स्थित लंका नामक सुन्दर नगरी में रावण के अशोक वाटिका में है। सम्पाती वानरों को आश्वस्त करते हैं कि सीता जीवित है और उनके पास अब समुद्र पार करने का कोई न कोई उपाय अवश्य खोजना चाहिए। इस अमूल्य सूचना से वानरों का उत्साह लौट आता है और वे आगे की योजना बनाने लगते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६२

(सम्पाती की कथा – सीता का पता)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वानरों को अब तक सीता का कोई सुराग नहीं मिला था। निराशा की सीमा पर पहुँचकर वे अन्न-जल त्याग कर प्राण देने को तैयार हो गए थे। तभी गिद्धराज सम्पाती ने उनसे सम्पर्क किया। पिछले सर्ग में उनकी पहचान और परिचय हुआ। अब इस सर्ग में, सम्पाती वानरों की खोज को सफल बनाने वाली अमूल्य सूचना देते हैं।

😔 वानरों की निराशा और सम्पाती का आश्वासन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा सम्पातेः भयविह्वलाः।
उपाविशन्नरा वीराः सम्पातिमभितः स्थिताः॥
स तान् दृष्ट्वा महातेजाः सम्पाती परमार्थवित्।
उवाच वचनं धीमान् सर्वान् सम्पूजयन्निव॥
अहं वः श्रोतुमिच्छामि कच्चित्सफलमागताः।
भवन्तो मार्गिणः केन किं वा कार्यं चिकीर्षितम्॥
🔹 पदच्छेद : ते = वे; तु = तो; तत् = उस; वचनम् = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; सम्पातेः = सम्पाती के; भयविह्वलाः = भय से व्याकुल; उपाविशन् = बैठ गए; वीराः = वीर; सम्पातिम् = सम्पाती के; अभितः = चारों ओर; स्थिताः = स्थित हुए; सः = वह; तान् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; महातेजाः = महान तेजस्वी; सम्पाती = सम्पाती; परमार्थवित् = परम सत्य को जानने वाला; उवाच = बोला; वचनम् = वचन; धीमान् = बुद्धिमान; सर्वान् = सबको; सम्पूजयन् = सम्मान देते हुए; इव = समान; अहम् = मैं; वः = आप लोगों से; श्रोतुम् = सुनना; इच्छामि = चाहता हूँ; कच्चित् = क्या; सफलम् = सफल; आगताः = आए हो; भवन्तः = आप लोग; मार्गिणः = खोज करने वाले; केन = किसके लिए; किम् = क्या; वा = अथवा; कार्यम् = प्रयोजन; चिकीर्षितम् = करना चाहते हो।
📖 भावार्थ : सम्पाती के उन वचनों को सुनकर वे भयभीत वीर वानर उसके चारों ओर बैठ गए। उन्हें देखकर महातेजस्वी, परमार्थ के ज्ञाता, बुद्धिमान सम्पाती उनका सम्मान करते हुए बोले: "मैं आप लोगों से सुनना चाहता हूँ। क्या आप लोग सफल होकर आए हैं? आप किसकी खोज कर रहे हैं और आपका क्या कार्य सिद्ध करना है?"
🔍 व्याख्या : सम्पाती वानरों की दशा देखकर उनका कुशल-मंगल पूछते हैं। यह उनके मैत्रीभाव और सहृदयता को दर्शाता है। वे जानना चाहते हैं कि आखिर इन वानरों की खोज का उद्देश्य क्या है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततस्ते वानराः सर्वे सम्पातिमिदमब्रुवन्।
रामस्य दूता राजेन्द्र वयं त्वामुपस्थिताः॥
सीतां मार्गामहे भार्यां रावणेन हृतां बलात्।
तां नः शंसस्व यदि वा दृष्टा ते राक्षसीक्षणा॥
📖 भावार्थ : तब उन सब वानरों ने सम्पाती से कहा: "हे राजेन्द्र! हम राम के दूत हैं और आपके पास आए हैं। हम रावण द्वारा बलपूर्वक हरी गई सीता नामक राम की पत्नी को ढूँढ रहे हैं। यदि आपने उस राक्षसीदृष्टि (रावण) को देखा हो या सीता के बारे में कुछ जानते हों तो हमें बताइए।"

🦅 सम्पाती का सीता के बारे में बताना (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-२० ॥
श्रुत्वा तु वचनं तेषां सम्पाती वाक्यमब्रवीत्।
जानामि तां महाभागां वैदेहीं जनकात्मजाम्॥
दृष्टा मया हियमाणा सीता रावणवाहिना।
रुदतीं करुणं वाक्यं रामरामेति भाषिणीम्॥
तामहं सांत्वयामासुर्भयार्तां परिदेविताम्।
मा भैषीरिति वैदेहि भर्तारं द्रक्ष्यसेऽचिरात्॥
📖 भावार्थ : उन वानरों के वचनों को सुनकर सम्पाती ने कहा: "मैं उन महाभागा जनकनन्दिनी सीता को जानता हूँ। मैंने सीता को रावण के रथ द्वारा ले जाते हुए देखा था। वह रो रही थीं और करुण स्वर में राम! राम! कह रही थीं। उस भयभीत और विलाप करती हुई सीता को मैंने सांत्वना दी थी। मैंने कहा था, हे वैदेही! डरो मत, तुम शीघ्र ही अपने पति को देखोगी।"
🔍 व्याख्या : सम्पाती न केवल सीता को देखते हैं, बल्कि उनकी दयनीय दशा पर द्रवित होकर उन्हें सांत्वना भी देते हैं। यह घटना सम्पाती के करुणामय और न्यायपरायण हृदय को उजागर करती है।
॥ श्लोक २१-२५ ॥
लङ्का नाम महानगरी दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे स्थिता।
तस्यामशोकवनिकायां सीता राक्षसाधिपेन रक्ष्यते॥
जीवन्तीं तां प्रपद्यध्वं यत्नं कुरुत वानराः।
अहं हि बलवान् पक्षैर्हीनः सागरलङ्घने॥
📖 भावार्थ : "दक्षिण समुद्र के तट पर लंका नामक एक महान नगरी है। उस नगरी के अशोक वाटिका में राक्षसों के स्वामी रावण द्वारा सीता की रक्षा की जाती है। हे वानरों! उन्हें जीवित जानकर तुम प्रयत्न करो। मैं स्वयं तो पंखों से रहित होने के कारण समुद्र पार करने में असमर्थ हूँ।"
🔍 व्याख्या : सम्पाती सीता के सटीक स्थान, लंका और अशोक वाटिका का उल्लेख करते हैं। वह यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि वह शारीरिक रूप से सहायता नहीं कर सकते, परंतु सूचना देकर अपना कर्तव्य निभाते हैं।

🙌 वानरों का उत्साह और सम्पाती को धन्यवाद

॥ श्लोक २६-३४ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हर्षनिर्भरमानसाः।
प्रणेमुस्ते महात्मानं सम्पातिं जयशंसिनः॥
भवता नः कृतं कार्यं महद्गुरु च सुप्रियम्।
देवानामपि दुष्करं तद्भवान् कर्तुमिच्छति॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : उसके उन वचनों को सुनकर हर्ष से भरे हुए उन वानरों ने जय की सूचना देने वाले उस महात्मा सम्पाती को प्रणाम किया और कहा: "आपने हमारा बहुत बड़ा, कठिन और अत्यन्त प्रिय कार्य कर दिया है, जो देवताओं के लिए भी दुष्कर था, उसे आपने कर दिखाया।"
🔍 व्याख्या : इस प्रकार सम्पाती की कृपा से वानरों को सीता के होने का सही पता चल गया। उनके हृदय में आशा का संचार हुआ और वे अगले कार्य (समुद्र पार करने) की योजना बनाने लगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛤️ मार्गदर्शन का महत्व

यह सर्ग दर्शाता है कि जीवन में कितनी ही बड़ी विपत्ति क्यों न हो, सही मार्गदर्शन मिलने पर निराशा आशा में बदल सकती है। सम्पाती उस मार्गदर्शक का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो निःस्वार्थ भाव से सही दिशा दिखाते हैं।

📜 सम्पाती का त्याग और करुणा

सम्पाती ने स्वयं पंखहीन होने के बावजूद दूसरों की मदद करने का हरसंभव प्रयास किया। उन्होंने न केवल सूचना दी, बल्कि सीता को सांत्वना देकर उनका मनोबल भी बढ़ाया था। यह करुणा का सर्वोत्तम उदाहरण है।

🌊 किष्किन्धा से सुन्दरकाण्ड की ओर

यह सर्ग किष्किन्धाकाण्ड का अंतिम चरण है, जो सीता के स्थान की सूचना देकर सुन्दरकाण्ड (लंका प्रवेश) की नींव रखता है। इसके बाद ही हनुमान की विशाल छलांग और लंका दहन की कहानी शुरू होती है।

🔱 जटायु का बदला

सम्पाती के मन में जटायु की मृत्यु का दुःख था। राम के दूतों की मदद करके वह अप्रत्यक्ष रूप से अपने भाई की हत्या का बदला लेने में सहायक बनते हैं। यह भ्रातृप्रेम का भी एक महत्वपूर्ण पहलू है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। ईश्वर सदा किसी न किसी रूप में सहायता भेजते हैं। साथ ही, यदि हममें किसी की सहायता करने की सामर्थ्य है, तो उसे अवश्य करना चाहिए, भले ही वह केवल सही जानकारी या मार्गदर्शन के रूप में ही क्यों न हो।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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