सम्पाती की कथा (जारी)

इस सर्ग में सम्पाती अपने जीवन की घटना सुनाते हैं कि कैसे उनके पंख जल गए और वे विन्ध्याचल पर गिरे। फिर वे वानरों को बताते हैं कि उन्होंने रावण को सीता का हरण करते देखा था और लंका की स्थिति का वर्णन करते हैं। वानरों को सीता का पता चल जाता है और वे लंका जाने का संकल्प करते हैं।

विवरण

अंगद के नेतृत्व में वानर दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए थकान और निराशा से घिर जाते हैं। वे प्राण त्यागने का निश्चय करते हैं, तभी उन्हें एक गुफा में गिद्धराज सम्पाती दिखाई देते हैं। सम्पाती जटायु के ज्येष्ठ भ्राता हैं। वानरों को देखकर वे उन्हें खाने के लिए झपटते हैं, परन्तु जाम्बवान् उन्हें समझाते हैं कि ये वानर राम के दूत हैं। जब सम्पाती को जटायु के मरण का समाचार मिलता है तो वे शोकाकुल हो जाते हैं और वानरों से मित्रता कर लेते हैं। तत्पश्चात सम्पाती अपनी कथा सुनाते हैं – वे और जटायु सूर्य की ओर उड़े थे, अत्यधिक ताप से उनके पंख जल गए और वे विन्ध्याचल पर गिर पड़े। तभी उन्होंने देखा कि रावण एक स्त्री (सीता) को ले जा रहा है, जो राम-लक्ष्मण पुकार रही थी। उसके आभूषण नीचे गिर रहे थे। सम्पाती ने उसे दक्षिण दिशा में समुद्र के पार लंका में देखा। अब वे वानरों को लंका जाने का मार्ग बताते हैं – समुद्र के पार सौ योजन दूर स्थित सुवर्णमयी नगरी लंका में सीता अशोक वाटिका में है। वानरों को यह समाचार पाकर अत्यन्त हर्ष होता है और वे समुद्र पार करने का संकल्प करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६१

(सम्पाती की कथा – जारी)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में सम्पाती ने वानरों से जटायु के बारे में पूछा और जाना कि रावण ने उनके भाई का वध किया। अब वे स्वयं अपनी कथा सुनाते हैं और वानरों को सीता के वास्तविक स्थान की सूचना देते हैं। यह सर्ग वानरों की निराशा को दूर कर उनमें नवजीवन भर देता है।

🦅 सम्पाती का आत्म-वृत्तांत – पंखों का दाह (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः सम्पातिराकाशे वानरान् समभाषत ।
शृणुध्वं वानरश्रेष्ठा यथा वृत्तं पुरातनम् ॥
अहं जटायुषा सार्धं सहोदरेण धीमता ।
प्रवृद्धौ गरुडाद्वीर्ये वयसा चापि तेजसा ॥
आवां समुद्रमासाद्य सूर्यमार्गं प्रति प्रभो ।
उत्पेततुर्नभो गत्वा त्वरितौ जातसंभ्रमौ ॥
तत्र मां दहति सूर्ये पक्षौ संतापयत्यपि ।
अहमात्मानमाधाय निपतितो विन्ध्यपर्वते ॥
जटायुस्तु मया मुक्तः सूर्यात्समभिपालितः ।
स गतः सुखमेवाशु पितुः सकाशमेव च ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सम्पातिः = सम्पाती; आकाशे = आकाश में; वानरान् = वानरों को; समभाषत = बोले; शृणुध्वम् = सुनो; वानरश्रेष्ठाः = हे वानरश्रेष्ठो; यथा = जैसे; वृत्तम् = वृत्तांत; पुरातनम् = पुराना; अहम् = मैं; जटायुषा = जटायु के; सार्धम् = साथ; सहोदरेण = सहोदर भाई; धीमता = बुद्धिमान; प्रवृद्धौ = बढ़े हुए; गरुडात् = गरुड़ से; वीर्ये = वीर्य में; वयसा = उम्र में; च = और; अपि = भी; तेजसा = तेज में; आवाम् = हम दोनों; समुद्रम् = समुद्र को; आसाद्य = पाकर; सूर्यमार्गम् = सूर्य के मार्ग को; प्रति = के प्रति; प्रभो = हे प्रभु; उत्पेततुः = उड़े; नभः = आकाश में; गत्वा = जाकर; त्वरितौ = शीघ्र; जातसंभ्रमौ = उत्सुक हुए; तत्र = वहाँ; माम् = मुझे; दहति = जलाता है; सूर्ये = सूर्य; पक्षौ = पंखों को; संतापयति = संतप्त करता है; अपि = भी; अहम् = मैं; आत्मानम् = स्वयं को; आधाय = स्थित कर; निपतितः = गिर पड़ा; विन्ध्यपर्वते = विन्ध्य पर्वत पर; जटायुः = जटायु; तु = तो; मया = मेरे द्वारा; मुक्तः = छोड़ा गया; सूर्यात् = सूर्य से; समभिपालितः = अच्छी तरह बचाया गया; सः = वह; गतः = गया; सुखम् = सुखपूर्वक; एव = ही; आशु = शीघ्र; पितुः = पिता के; सकाशम् = पास; एव = ही; च = और।
📖 भावार्थ : तब सम्पाती ने आकाश में वानरों से कहा: हे वानरश्रेष्ठो! मेरा पुराना वृत्तांत सुनो। मैं और मेरा सहोदर बुद्धिमान भाई जटायु – हम दोनों वीर्य, आयु और तेज में गरुड़ से भी बढ़े हुए थे। एक बार हम सूर्य के मार्ग की ओर समुद्र के पास उड़े। वहाँ सूर्य के ताप ने मुझे जलाना शुरू कर दिया और मेरे पंख संतप्त हो गए। मैंने स्वयं को संभालते हुए विन्ध्य पर्वत पर गिरना स्वीकार किया, पर जटायु को मैंने सूर्य से बचा लिया और वह सुरक्षित पिता के पास चला गया।
🔍 व्याख्या : सम्पाती बताते हैं कि उनका बल देखकर उन्हें अहंकार हो गया था और वे सूर्य तक पहुँचना चाहते थे। फलस्वरूप उनके पंख जल गए। यह घटना उनके जीवन का मोड़ है और इसी कारण वे विन्ध्याचल पर पड़े रहे।
॥ श्लोक ७-१५ ॥
ततोऽहं विन्ध्यशिखरे पतितः पक्षवर्जितः ।
अचिन्तयं च तत्रस्थो जटायुर्मे गतः कुतः ॥
एवं चिन्तयतस्तस्य मम संवत्सरा दश ।
व्यतीता विन्ध्यशिखरे पक्षिणः पर्युपासितुः ॥
अथापश्यं महद्वीर्यं रावणं राक्षसाधिपम् ।
सीतया सह दुर्धर्षं वैदेह्या राघवप्रियम् ॥
📖 भावार्थ : तब पंखों से रहित मैं विन्ध्याचल की चोटी पर गिरा। वहाँ रहते हुए मैं सोचता रहा कि मेरा भाई जटायु कहाँ गया। इस प्रकार चिन्ता करते हुए मुझे दस वर्ष बीत गए, और मैं विन्ध्यशिखर पर ही पक्षियों की सेवा में लगा रहा। फिर मैंने एक बार महापराक्रमी राक्षसराज रावण को देखा, जो अत्यन्त दुर्धर्ष था और वह सीता को लिए जा रहा था – वैदेही जो राम की प्रिया थीं।
🔍 व्याख्या : यहाँ सम्पाती बताते हैं कि किस प्रकार उन्होंने रावण को सीता के साथ जाते देखा। यह दृश्य उनके मानस में अंकित हो गया।

🌴 सीता का पता और लंका का वर्णन (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२२ ॥
सा तु सीता वरारोहा रामपत्नी यशस्विनी ।
रावणस्य वशं प्राप्ता विललाप सुदुःखिता ॥
राम रामेति रामेति लक्ष्मणेति च सा सती ।
विललाप महानादं त्राहि मामिति दुःखिता ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा मया दृष्टा ततो दिशि ।
दक्षिणस्यां समुद्रस्य पारे लंका समृद्धिनी ॥
तत्र सा राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।
रुद्धा सीता वरारोहा अशोकवनिकां गता ॥
तस्मात्तु दक्षिणं गत्वा समुद्रं शीघ्रगामिनः ।
द्रक्ष्यथ ध्वस्तसंकाशां लंकां मालिनिभूषिताम् ॥
📖 भावार्थ : वह उत्तम शरीर वाली यशस्विनी सीता, राम की पत्नी, रावण के वश में पड़कर अत्यन्त दुःखी होकर विलाप कर रही थी। वह सती "राम! राम! राम! लक्ष्मण!" इस प्रकार पुकारती हुई करुण स्वर में "मुझे बचाओ" कह रही थी। उसके उन वचनों को सुनकर मैंने दक्षिण दिशा में देखा तो समुद्र के पार समृद्धिशाली लंका नगरी दिखी। वहाँ उस दुरात्मा राक्षसराज रावण ने सीता को रोक रखा है, और वह अशोक वाटिका में रखी गई है। इसलिए तुम लोग दक्षिण की ओर जाकर समुद्र को शीघ्र पार करो, तुम उस सुन्दर मालिनी नदी से विभूषित लंका को देखोगे।
🔍 व्याख्या : सम्पाती ने स्पष्ट शब्दों में वानरों को बता दिया कि सीता लंका में हैं। अशोक वाटिका का उल्लेख महत्वपूर्ण है।
॥ श्लोक २३-३० ॥
लंका हि त्रिषु लोकेषु विश्रुता पुरसत्तमा ।
सागरेण परिक्षिप्ता हेमप्राकारतोरणा ॥
तस्यां सीता वरारोहा राक्षसीभिः सुरक्षिता ।
रावणस्य वशे सुप्ता रम्भेव कदलीव च ॥
यूयं समुद्रमुत्तीर्य लंकां प्राप्य च वानराः ।
तत्र सीतां महाभागां द्रक्ष्यथ क्लेशवर्जिताः ॥
इत्युक्त्वा विररामाथ सम्पातिर्विन्ध्यवासिनः ।
श्रुत्वा तु वचनं तस्य वानराः परमं ययुः ॥
📖 भावार्थ : लंका तीनों लोकों में प्रसिद्ध उत्तम पुरी है। वह सागर से घिरी है तथा सोने के परकोटे और द्वारों से सुशोभित है। उस नगरी में वह उत्तम अंगों वाली सीता राक्षसियों द्वारा सुरक्षित है, और रावण के वश में ऐसे पड़ी है जैसे केले का पेड़ या कदली स्तब्ध हो। हे वानरो! तुम समुद्र पार करके लंका को प्राप्त करो और वहाँ उस महाभागा सीता को क्लेशरहित देखोगे। ऐसा कहकर विन्ध्यवासी सम्पाती रुक गए। उनका वचन सुनकर वानरों को परम हर्ष हुआ।

🚀 वानरों का उत्साह और समुद्र पार करने का संकल्प (श्लोक ३१-४२)

॥ श्लोक ३१-३६ ॥
ततस्ते हृष्टमनसो वानराः सम्पतिं प्रति ।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं प्रणम्य च पुनः पुनः ॥
त्वत्प्रसादान्महाभाग लंकां द्रक्ष्यामहे वयम् ।
सीतां च रामपत्नीं तां प्राप्स्यामो नात्र संशयः ॥
कः समर्थः समुद्रस्य प्लवने वानरर्षभः ।
को वा लंकां प्रवेक्ष्यति रावणं च निहन्ति वा ॥
एवं ब्रुवाणान् वानरान् अंगदः प्रत्यभाषत ।
अहं गमिष्ये लंकायां सीतायाश्चान्वेषणे क्षमः ॥
📖 भावार्थ : तब हर्षित मन वाले वानर सम्पाती की ओर हाथ जोड़कर बारंबार प्रणाम करते हुए बोले: हे महाभाग! आपके प्रसाद से हम लंका को देखेंगे और राम की पत्नी सीता को प्राप्त करेंगे – इसमें संशय नहीं। अब कौन वानर समुद्र पार करने में समर्थ है? कौन लंका में प्रवेश करेगा और रावण का वध करेगा? ऐसा कहते हुए वानरों से अंगद ने कहा: मैं लंका जाऊँगा और सीता की खोज में समर्थ हूँ।
🔍 व्याख्या : अंगद में आत्मविश्वास है, परन्तु आगे हनुमान् अपनी शक्ति प्रदर्शित करेंगे।
॥ श्लोक ३७-४२ ॥
ततो हनुमता वाक्यमुक्तं शृणुत वानराः ।
यथाबलं यथान्यायं कर्तव्यं कार्यमुत्तमम् ॥
अहं समुद्रमुत्प्लुत्य लंकां द्रक्ष्यामि वानराः ।
यदि वा नोपलप्स्यामि सीतां रामस्य वल्लभाम् ॥
ततः सर्वे समुत्पेतुर्वानरा हर्षनिःस्वनाः ।
जय रामेति जय रामेति सिंहनादं प्रचक्रिरे ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान् ने कहा: हे वानरो, सुनो। बल और न्याय के अनुसार इस उत्तम कार्य को करना चाहिए। मैं समुद्र को लाँघकर लंका देखूँगा। यदि राम की प्रिया सीता न भी मिले तो भी मैं प्रयास करूँगा। तब सब वानर हर्ष से उछल पड़े और जय राम, जय राम का सिंहनाद करने लगे।
🔍 व्याख्या : हनुमान् ने समुद्र लाँघने का बीड़ा उठाया, जो आगे के सर्गों में पूर्ण होगा। इस प्रकार सम्पाती की कथा समाप्त होती है और वानरों का अभियान प्रारम्भ होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦅 सम्पाती का त्याग और वात्सल्य

सम्पाती ने अपने भाई जटायु की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया। यह भ्रातृप्रेम का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने वानरों को सीता का पता बताकर राम के कार्य में अप्रत्यक्ष सहायता की।

🗺️ दिशा-निर्देश और लंका का वर्णन

सम्पाती ने वानरों को स्पष्ट रूप से दक्षिण दिशा, समुद्र पार और लंका की स्थिति बताई। इससे वानरों का खोज कार्य सफल होता है। लंका का वैभवशाली वर्णन बाद में हनुमान् के लंका दर्शन का आधार बनता है।

🐒 वानरों का नेतृत्व और हनुमान् की भूमिका

अंगद और हनुमान् के संवाद से वानरों में नेतृत्व की भावना जागती है। हनुमान् का समुद्र लाँघने का संकल्प आगे की गाथा का प्रारम्भ है।

🔱 नियति का चक्र

सम्पाती के पंख जलने की घटना से उन्हें विन्ध्याचल पर रहना पड़ा, और वहीं से उन्होंने रावण को सीता के साथ जाते देखा। यह संयोग राम के कार्य की सिद्धि के लिए हुआ।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कभी-कभी हमारे दुःख और विपत्तियाँ भी किसी बड़े कल्याण के लिए सहायक बन जाती हैं। सम्पाती के पंख जलने से वे विन्ध्याचल पर ठहरे और उन्होंने सीता का पता बताया। हमें धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। दूसरों की सहायता करने से हमारा जीवन सार्थक होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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