सम्पाती अपनी कथा सुनाते हैं

किष्किन्धाकाण्ड के साठवें सर्ग में महापराक्रमी सम्पाती वानरों को अपनी जीवन-गाथा सुनाते हैं – कैसे सूर्य की तपिश से उनके पंख जल गए और वे अपने अनुज जटायु से बिछड़ गए। साथ ही वे सीता के लंका में होने की पुष्टि करते हैं और वानरों को समुद्र पार करने का मार्ग बताते हैं।

विवरण

सीता की खोज में दक्षिण दिशा को गए वानर (अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि) जब समुद्र तट पर निराश होकर बैठे थे, तब उनकी भेंट एक भयंकर गृध्र से होती है, जो पहले उन्हें खा जाना चाहता है, परन्तु शीघ्र ही वह स्वयं को जटायु का बड़ा भाई सम्पाती बताता है। सम्पाती ने अपनी कथा सुनाई – कैसे एक बार सूर्य के निकट उड़ान भरते समय अपने पंख जल गए, और जटायु से उनका वियोग हो गया। तब से वह इस पर्वत पर निवास कर रहे हैं। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि राम और लक्ष्मण जटायु की मृत्यु के कारण दुःखी हैं, तो उन्होंने सीता के बारे में जानकारी दी। सम्पाती ने बताया कि उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से सीता को लंका में रावण के अशोक वाटिका में देखा है। उन्होंने वानरों का उत्साह बढ़ाते हुए समुद्र पार करने का सुझाव दिया और हनुमान की प्रशंसा करते हुए उन्हें इस कार्य के लिए सबसे योग्य बताया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ६०

(सम्पाती अपनी कथा सुनाते हैं – सीता का पता)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में दक्षिण दिशा में भटकते वानर जब समुद्र के किनारे निराश बैठे थे, तब अचानक एक विशाल गृध्र प्रकट होता है। वह उन्हें खा जाने की धमकी देता है, परन्तु अंगद के समझाने पर वह अपना परिचय देता है – वह जटायु का अग्रज सम्पाती है। यह सर्ग उसी सम्पाती के जीवन-वृत्तांत और सीता के रहस्योद्घाटन की कथा कहता है।

🦅 सम्पाती का परिचय और पंख जलने की कथा (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सम्पातिराकाशे ददर्श हरियूथपान् ।
स तान् दृष्ट्वा महाकायः प्रहृष्टः समभाषत ॥
भक्षयिष्ये हरीन् सर्वान् बुभुक्षाक्षाममानसः ।
इत्युक्त्वा सहसा तूर्णमपतत्तेष्ववाङ्मुखः ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ वानराः सहसोत्थिताः ।
प्रगृहीतशिलावृक्षाः परिवव्रुः समन्ततः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सम्पातिः = सम्पाती; आकाशे = आकाश में; ददर्श = देखा; हरियूथपान् = वानरों के नेताओं को; सः = वह; तान् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; महाकायः = विशाल शरीर वाला; प्रहृष्टः = प्रसन्न होकर; समभाषत = बोला; भक्षयिष्ये = खा जाऊँगा; हरीन् = वानरों को; सर्वान् = सबको; बुभुक्षाक्षाममानसः = भूख से व्याकुल; इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; सहसा = सहसा; तूर्णम् = शीघ्र; अपतत् = गिरा; तेषु = उन पर; अवाङ्मुखः = नीचे मुँह किये हुए; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; पतितम् = गिरा हुआ; भूमौ = भूमि पर; वानराः = वानर; सहसा = तुरन्त; उत्थिताः = खड़े हो गये; प्रगृहीतशिलावृक्षाः = उठाये हुए पत्थर और वृक्ष वाले; परिवव्रुः = चारों ओर से घेर लिया; समन्ततः = सब ओर से।
📖 भावार्थ : तब आकाश में उड़ते हुए सम्पाती ने वानरों को देखा। विशालकाय सम्पाती उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ और बोला, "भूख से व्याकुल मैं इन सब वानरों को खा जाऊँगा।" ऐसा कहकर वह तेजी से उन पर झपटा। उसे गिरता देख सभी वानर तुरंत उठ खड़े हुए और पत्थर-वृक्ष उठाकर उसे चारों ओर से घेर लिया।
🔍 व्याख्या : वानरों ने विशाल गृध्र को अपनी ओर आते देख आत्मरक्षार्थ शस्त्र उठा लिए। अंगद ने उसे रोकते हुए पूछा – तू कौन है?

इसके बाद अंगद के प्रश्न पर सम्पाती ने अपना परिचय देते हुए कहा – “मैं जटायु का अग्रज सम्पाती हूँ। एक बार हम दोनों भाइयों ने सूर्य तक पहुँचने की प्रतिस्पर्धा की। सूर्य के अत्यधिक ताप से मेरे पंख जल गए और मैं यहाँ विन्ध्याचल पर गिर पड़ा। जटायु नीचे उतर आया और मुझसे बिछुड़ गया। तब से मैं यहाँ निवास कर रहा हूँ।”

अहं ज्यायान् भ्राता जटायोः सम्पातिर्नाम वानरः।
गृध्रौ स्वौ च महावेगौ जटायुश्चाहमेव च॥
🔹 पदच्छेद : अहम् = मैं; ज्यायान् = बड़ा; भ्राता = भाई; जटायोः = जटायु का; सम्पातिः = सम्पाती; नाम = नाम से; वानरः = गृध्र (यहाँ गृध्रविशेष); गृध्रौ = दो गृध्र; स्वौ = स्वयं; च = और; महावेगौ = महान वेग वाले; जटायुः = जटायु; च = और; अहम् = मैं; एव = ही; च = भी।
📖 भावार्थ : “मैं जटायु का बड़ा भाई सम्पाती हूँ। हम दोनों महावेगवान गृध्र थे – जटायु और मैं।”

🔍 जटायु का वृत्तांत और सीता का पता (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२२ ॥
युवां तु सुग्रीवसखं हनूमन्तं महाबलम् ।
जानामि वानरश्रेष्ठं वायुपुत्रं यशस्विनम् ॥
तस्य चाप्रतिमं वीर्यं प्लवने च महाबलम् ।
येन लङ्का समुद्रेण गन्तुं शक्या न संशयः ॥
📖 भावार्थ : सम्पाती ने कहा – “मैं तुम लोगों को पहचानता हूँ। तुम सुग्रीव के मित्र हनुमान हो, जो वायुपुत्र और महाबली हैं। तुम्हारे प्लवन (उड़ने) के वीर्य की कोई तुलना नहीं। तुम समुद्र को पार करके लंका तक जा सकते हो – इसमें संशय नहीं।”
🔍 व्याख्या : सम्पाती ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा था कि सीता लंका में हैं। वे जानते थे कि केवल हनुमान ही समुद्र लाँघ सकते हैं।

तत्पश्चात सम्पाती ने बताया – “जब मैं इस पर्वत पर निवास करता था, तब एक दिन मैंने देखा कि एक राक्षस सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। वह रावण था। सीता विलाप कर रही थीं और उन्होंने अपने गहने नीचे फेंक दिए। वह लंका में रावण के अशोक वाटिका में है। अब तुम लोग निर्भय होकर वहाँ जाओ।”

रावणेन हृता देवी लङ्कां नीता च मैथिली।
रुदन्ती करुणं तत्र वृक्षमूलेऽवतिष्ठति॥
📖 भावार्थ : “देवी सीता को रावण हरकर लंका ले गया है। वहाँ वह एक वृक्ष के नीचे करुण विलाप करती रहती है।”

🌊 समुद्र पार करने का आदेश (श्लोक ३१-४२)

॥ श्लोक ३१-४२ ॥
समुद्रं लङ्घयित्वा तु गत्वा लङ्कां महोदयाम् ।
तत्र सीतां परिक्षीणां पश्यध्वं मा विचारयेत् ॥
अहं च वो महाप्राज्ञो यथावत् समुदाहरम् ।
सत्येन महता वाक्यं शृणुध्वं हरियूथपाः ॥
📖 भावार्थ : “तुम लोग समुद्र लाँघकर लंका में जाओ और वहाँ सीता को देखो – अब और विलंब मत करो। हे वानरों! मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ, यही उपाय है।”
🔍 व्याख्या : इस प्रकार सम्पाती ने वानरों का उत्साह बढ़ाया और हनुमान को समुद्र पार करने के लिए प्रेरित किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦅 भ्रातृप्रेम की अग्नि-परीक्षा

सम्पाती के पंख सूर्य के ताप से जल गए, पर उन्होंने अपने अनुज जटायु की रक्षा की। यह बलिदान भ्रातृप्रेम का परम उदाहरण है। जटायु के प्रति सम्पाती का स्नेह और उनकी मृत्यु पर शोक उनकी करुणा को दर्शाता है।

📜 सीता के रहस्योद्घाटन का महत्त्व

सम्पाती द्वारा सीता के लंका में होने की पुष्टि से वानरों को सही दिशा मिली। इसके बिना वे कभी सीता का पता न लगा पाते। यह घटना राम-रावण युद्ध की भूमिका तैयार करती है।

🌗 सम्पाती का तप और उसका फल

पंख जलने के बाद सम्पाती ने वर्षों तक विन्ध्याचल पर तपस्या की। उसी के फलस्वरूप उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई और उन्होंने सीता को देखा। यह सिद्ध करता है कि तप का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।

🚀 हनुमान की सामर्थ्य का बखान

सम्पाती ने हनुमान को समुद्र लाँघने योग्य बताया। इससे हनुमान का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने आगे चलकर अद्भुत कार्य किए। यह सर्ग हनुमान की महिमा को भी उजागर करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि सही समय पर सही सूचना और प्रोत्साहन किसी भी कठिन कार्य को संभव बना सकते हैं। सम्पाती ने अपनी पीड़ा को भुलाकर राम के कार्य में सहायता की। हमें भी दूसरों के कल्याण के लिए अपने दुखों को तिलांजलि देनी चाहिए। साथ ही, भाइयों के बीच प्रेम और बलिदान ही सच्चे संस्कार हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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