सम्पाती द्वारा अंगद को सीता का वृत्तांत
किष्किन्धाकाण्ड के उनचासवें सर्ग में सम्पाती नामक गृध्रराज वानरों को सीता के बारे में बताता है। वह बताता है कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा में गया है और वह लंका में अशोक वाटिका में है। साथ ही सम्पाती अपने पंख गँवाने की कथा भी सुनाता है।
विवरण
सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर पहुँचकर निराश हो बैठते हैं। उन्हें सीता का कोई सुराग नहीं मिलता। तब उनकी भेंट सम्पाती नामक गृध्रराज से होती है, जो जटायु का बड़ा भाई है। प्रारम्भ में सम्पाती उन्हें खा जाना चाहता है, परन्तु जाम्बवान उसे जटायु का मित्र बताकर समझाते हैं। जटायु के वध का समाचार सुनकर सम्पाती को अत्यन्त दुःख होता है और वह वानरों को बताता है कि उसने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से रावण को सीता को लेकर दक्षिण की ओर जाते देखा था। वह उन्हें यह भी बताता है कि सीता लंका में अशोक वाटिका में है। साथ ही सम्पाती अपने पंखों के गिरने की कथा सुनाता है – वह और जटायु सूर्य के निकट जाने का दुस्साहस कर बैठे थे, जिससे उसके पंख जल गए, परन्तु जटायु ने उसे बचा लिया था। अब उसके पंख फिर से उग आए हैं। वह वानरों को लंका पहुँचने का मार्ग बताता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५९
(सम्पाती द्वारा अंगद को सीता के बारे में विस्तार से बताना)
🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में समुद्र के तट तक आ पहुँचे हैं, किन्तु कहीं भी सीता का पता नहीं चला। सभी वानर निराश होकर प्राण त्यागने का विचार करने लगे हैं। तभी उन्हें एक भयंकर गृध्र दिखाई देता है – वह है सम्पाती, जटायु का बड़ा भाई। यह सर्ग उसी मिलन और सीता के रहस्य के उद्घाटन की कथा कहता है।
🏝️ वानरों की निराशा और सम्पाती का दर्शन (श्लोक १-८)
निषेदुर्विगतोत्साहा दुःखोपहतचेतसः ॥
तेषां निपतितानां तु निःश्वासान् मुमुचुर्भृशम् ।
चिन्तया अभिपरीतानां मार्गाणां च अदर्शनात् ॥
तान्निरानन्दनिर्वीर्यान्विह्वलान्भयशोकितान् ।
ददर्श गृध्रराजस्तु सम्पातिर्नाम नामतः ॥
स्नेहात्समुद्रमासाद्य किमर्थमिह आगताः ॥
भवन्तो वदतां श्रेष्ठाः के चैते हरियूथपाः ।
कस्य वा कार्यमुद्दिश्य समुद्रं शरणं गताः ॥
एवमुक्त्वा तु तान्सर्वानभ्यभाषत वीर्यवान् ।
अहो दुःखसमाक्रान्ता विपन्ना इव लक्ष्यन्ते ॥
🦅 अंगद-जाम्बवान का सम्पाती से संवाद और जटायु का समाचार (श्लोक ९-२२)
तब अंगद और जाम्बवान सम्पाती को अपना परिचय देते हैं। सम्पाती जटायु के बारे में पूछता है। जाम्बवान उसे जटायु के रावण द्वारा वध की दुःखद सूचना देता है। यह सुन सम्पाती अत्यन्त शोकाकुल हो जाता है और कहता है कि जटायु उसका छोटा भाई था। तत्पश्चात् सम्पाती अपने पंख गँवाने की कथा सुनाता है – कैसे वह और जटायु युवावस्था में सूर्य के पास जाने का दुस्साहस कर बैठे, जिससे उसके पंख जल गए और जटायु ने उसे बचाया। वह बताता है कि अब उसके नए पंख उग आए हैं।
✍️ मुख्य श्लोक १९-२० (संक्षेप में):
तदा ममापतन्पक्षाः सम्पतन्तः खमण्डले ॥
जटायुस्तु मया रक्ष्यः प्राणैर्नोत्सृज्यते प्रियः ।
स मया सह सम्पाताद्बालो रक्षित आत्मवान् ॥
भावार्थ : जब हम उदीयमान सूर्य की ओर बढ़े, तब आकाश में उड़ते हुए मेरे पंख गिर गए। जटायु मुझे प्राणों से भी प्रिय था, उसे मैंने नहीं छोड़ा। वह बालक मेरे साथ ही उस उड़ान में बच गया, क्योंकि वह सावधान था।
🔍 सम्पाती का सीता-वृत्तांत (श्लोक २३-४५)
या मे सूर्यप्रसादेन दत्ता पूर्वं महात्मना ॥
रावणं च अपश्यं तं सीतया सह दक्षिणम् ।
व्रजन्तं वेगनिर्धूतमेघजालमिवाम्बरे ॥
सा तु सीता तदा तेन राक्षसेन बलीयसा ।
व्रजन्ती दक्षिणं गत्वा लङ्कायां समुदाहृता ॥
अशोकवाटिकामध्ये रक्षिता च महाबला ।
न तां शक्नोति रक्षोभिः कश्चिद्धर्षयितुं बली ॥
✨ पंखों का पुनरुद्भव और वानरों को आशीर्वाद (श्लोक ४६-५२)
प्रहृष्टाः सम्प्रतस्थिरे लङ्कां प्रति महाबलाः ॥
सम्पातिरपि तान्दृष्ट्वा प्रस्थितान्हरियूथपान् ।
आशीर्भिरभ्यनन्दच्च पुनः पक्षौ व्यरोहताम् ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕊️ भ्रातृप्रेम की मिसाल
जटायु और सम्पाती का अनन्य प्रेम इस सर्ग में उभरकर आता है। सम्पाती जटायु के वध का समाचार सुनकर विलाप करता है और अपने जीवन की कथा सुनाता है। यह भाई-भाई के सम्बन्ध की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
🔮 दिव्य दृष्टि का वरदान
सूर्य की तपस्या से सम्पाती को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई, जिसके कारण वह रावण को सीता के साथ देख पाया। यह दैवीय सहायता को दर्शाता है जो साधकों को प्राप्त होती है।
🌉 लंका के मार्ग का निर्देश
सम्पाती ने स्पष्ट किया कि लंका समुद्र के पार सौ योजन पर है। इससे वानरों को लक्ष्य का पता चलता है और आगे हनुमान की छलांग की पृष्ठभूमि तैयार होती है।
🦅 पुण्य का फल – पंखों का पुनरुद्भव
सम्पाती के सत्कर्म और वानरों की सहायता के फलस्वरूप उसके पंख फिर से उग आते हैं। यह बताता है कि धर्म का पालन करने से खोई हुई वस्तुएँ भी पुनः प्राप्त हो सकती हैं।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आपत्ति में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। जब सब आशाएँ समाप्त होने लगें, तब कहीं न कहीं से सहायता अवश्य पहुँचती है। वानरों को जहाँ कहीं सीता का पता नहीं चल रहा था, वहाँ सम्पाती के रूप में सहायक मिला। साथ ही, भ्रातृप्रेम और त्याग का महत्त्व भी प्रतिपादित होता है।