सम्पाती द्वारा अंगद को सीता के बारे में बताना
इस सर्ग में हनुमान एवं अन्य वानर समुद्र तट पर निराश होकर प्राणत्याग का निश्चय करते हैं। तभी सम्पाती नामक गृध्र आता है, जो जटायु का बड़ा भाई है। वह उन्हें बताता है कि सीता को रावण दक्षिण दिशा में ले गया है और वह लंका में है। वानरों को यह जानकर आशा मिलती है और वे समुद्र पार करने की योजना बनाते हैं।
विवरण
सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में बहुत दूर तक भटकते हैं, किन्तु उन्हें सीता का कोई पता नहीं चलता। अन्त में वे समुद्र के तट पर पहुँचते हैं। वहाँ अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि सभी वानर निराश होकर प्राण त्यागने का निश्चय कर लेते हैं। वे सूखी घास पर बैठकर उपवास करने लगते हैं। तभी वहाँ सम्पाती नामक एक विशाल गृध्र आता है, जो जटायु का बड़ा भाई है। वह वानरों को देखकर उन्हें खाने के लिए झपटता है, किन्तु उनमें से एक वानर (जाम्बवान) उसे बताता है कि वे लोग श्रीराम के दूत हैं और उनका नाम जटायु लेता है। जटायु का नाम सुनते ही सम्पाती को अपने भाई की याद आती है और वह उसके बारे में पूछता है। वानर जटायु के राम के लिए युद्ध करते हुए मृत्यु का वृत्तान्त सुनाते हैं। यह सुन सम्पाती अत्यन्त दुःखी होता है, किन्तु साथ ही उसे यह जानकर हर्ष भी होता है कि उसके भाई को मोक्ष मिला। तब सम्पाती वानरों को बताता है कि जब वह सूर्य के बहुत निकट जाने से पंख जलाकर गिर रहा था, तब उसने रावण को सीता को लेकर दक्षिण की ओर जाते देखा था। वह पुष्पक विमान पर बैठी सीता को देख सका क्योंकि उसकी दृष्टि अति तीक्ष्ण थी। उसने सीता को 'राम-राम' पुकारते सुना था और उनके गहने उतारकर फेंकते देखे थे। सम्पाती यह भी बताता है कि रावण उन्हें लंका ले गया होगा, क्योंकि वहाँ उसका वास है। वह वानरों को आश्वस्त करता है कि सीता सुरक्षित हैं और उन्हें ढूँढ़ने के लिए वानरों को समुद्र पार करना होगा। यह सुनकर वानरों में नवजीवन का संचार होता है और वे समुद्र पार करने की योजना बनाने लगते हैं। सम्पाती उन्हें लंका तक पहुँचने का मार्ग बताता है और उन्हें आशीर्वाद देता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५८
(सम्पाती द्वारा अंगद को सीता के बारे में बताना)
🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में बहुत दूर तक भटक चुके हैं, किन्तु उन्हें सीता का कोई पता नहीं चल पाया। अन्त में वे समुद्र के तट पर आ बैठते हैं और निराश होकर प्राण त्यागने का निश्चय कर लेते हैं। तभी वहाँ सम्पाती नामक गृध्र आता है, जो जटायु का बड़ा भाई है। वह वानरों को सीता के विषय में महत्वपूर्ण सूचना देता है और उनकी आशा को पुनर्जीवित करता है।
🐒 वानरों का निराशा में प्राणत्याग निश्चय (श्लोक १-५)
उपविष्टा महात्मानः प्राणत्यागे कृतक्षणाः ॥
सूर्यस्यापि गतिं प्राप्य विषण्णवदना भृशम् ।
चिन्तयन्तो महाबाहो सीतायाः परिमार्गणम् ॥
शुष्कतृणास्तरौ चक्रुः प्राङ्मुखाः सुसमाहिताः ।
प्राणत्यागाय सङ्कल्पं कृत्वा ते वानरर्षभाः ॥
🦅 सम्पाती का आगमन और जटायु की चर्चा (श्लोक ६-१५)
ददर्श च वनोद्देशे वानरान् प्राणधारिणः ॥
स तान् दृष्ट्वा महाकायः क्षुधार्तो भीमदर्शनः ।
अभ्यधावत वेगेन भक्षयिष्यन् हरीश्वरान् ॥
तं दृष्ट्वा धावमानं ते जाम्बवान् वाक्यमब्रवीत् ।
एष गृध्रपतिर्घोरः सम्पातिर्नाम नामतः ॥
जटायुर्भ्राता चैषां प्राणदः सर्वदेहिनाम् ।
नैनं भक्षयितुं शक्ता वयं सर्वे महाबलम् ॥
भ्राता प्राणसमो राजन् स च रामार्थमाप्तवान् ॥
तस्य मृत्युः कथं वृत्तः श्रूयतां वदतां वराः ।
यूयं हि रामदूताश्च कच्चिज्जानीत तत्त्वतः ॥
ततस्ते वानराः सर्वे सम्पातिमिदमब्रुवन् ।
शृणु सर्वं यथावृत्तं जटायोः पततां वर ॥
रावणो नाम दुष्टात्मा सीतां हृत्वा ययौ बली ।
जटायुस्तेन युयुधे प्राणांस्त्यक्त्वा महाबलः ॥
रामाय कथयामास रावणस्य पराक्रमम् ।
ततः प्राणान् परित्यज्य गतः स्वर्गं महायशाः ॥
🗻 सम्पाती का वृत्तान्त और सीता का लंका में होना (श्लोक १६-३०)
अहो धन्यो जटायुर्वै यो रामार्थे मृतो युधि ॥
शृणुध्वं वानराः सर्वे यन्मया दृष्टमन्तरा ।
पुरा युवां महावेगौ सूर्यमभ्युद्यतौ यदा ॥
तदा पक्षौ मम दग्धौ सूर्यतेजः समीरितौ ।
पतता च मया दृष्टा रावणेन प्रधर्षिता ॥
सीता विलपती दीना रामरामेति दुःखिता ।
रावणः प्रययौ दक्षिणां दिशं सह सीतया ॥
आक्रन्दन्ती वरारोहा रामरामेति दुःखिता ॥
दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे लङ्का समृद्धिनी ।
तत्र सीता स्थिता दीना राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥
अतः परं न वः कार्यो विषादो वानरोत्तमाः ।
प्लवितुं सागरं शक्ताः प्लवतां यदि निश्चयः ॥
लङ्का समुद्रमध्यस्था शतयोजनविस्तृता ।
तत्र गत्वा हनुमता द्रष्टव्या जानकी सती ॥
इत्युक्त्वा विररामाथ सम्पातिः पततां वरः ।
ते च सर्वे हरीश्वराः परं हर्षमुपागमन् ॥
🎉 वानरों का हर्ष और सम्पाती का आशीर्वाद (श्लोक ३१-३८)
अङ्गदः प्राह धर्मात्मा श्रुत्वा तद्वचनं महत् ॥
कृतकृत्याः स्म भद्रं ते सम्पाते पततां वर ।
इदानीं ज्ञास्यते यत्नो हनुमान् प्लवतां वरः ॥
सम्पातिरपि तान् प्राह गच्छध्वं स्वस्ति वोऽस्तु च ।
द्रक्ष्यथासीतया सार्धं रामं दाशरथिं वने ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं सम्पातिर्गृध्रपुङ्गवः ।
तेऽपि सर्वे महात्मानो हनूमन्तमपूजयन् ॥
ततो जाम्बवता सार्धं हनुमान् वाक्यमब्रवीत् ।
अहं गमिष्ये लङ्कायां सीतादर्शनकाङ्क्षया ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🦅 सम्पाती – जटायु का भाई
इस सर्ग में सम्पाती के माध्यम से यह दिखाया गया है कि जटायु का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसके भाई ने वानरों को सीता का पता बताकर राम के कार्य को आगे बढ़ाया।
🔭 दिव्य दृष्टि का महत्व
सम्पाती की दिव्य दृष्टि (सूर्य की ओर जाने के कारण) से सीता के हरण का साक्षात्कार हुआ। यह बताता है कि कभी-कभी कष्ट भी काम आ जाते हैं।
🌊 समुद्रलङ्घन की प्रेरणा
सम्पाती ने वानरों को समुद्र पार करने की शक्ति का विश्वास दिलाया। इससे हनुमान की लंका यात्रा का मार्ग प्रशस्त हुआ।
🙏 भक्ति और कृतज्ञता
जटायु के प्रति सम्पाती का प्रेम और राम के प्रति उसकी श्रद्धा दर्शाती है कि राम के कार्य में सभी का सहयोग मिलता है।
🎯 शिक्षा : निराशा के क्षणों में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, सत्य और धर्म की सहायता अवश्य होती है। सम्पाती ने वानरों को नया जीवनदान दिया। हमें भी दूसरों के दुःख में मदद करनी चाहिए और उनकी आशा बनाए रखनी चाहिए।