अंगद द्वारा सम्पाती को अपनी दशा बताना

किष्किन्धाकाण्ड के सप्तपञ्चाशत्तमे सर्गे अंगदः सम्पातिं स्ववृत्तान्तं कथयति। सम्पातिपृष्टः सन् अंगदः रामकथां, सीताहरणं, सुग्रीवमित्रतां, वालिवधं, सीतान्वेषणं च वर्णयति।

विवरण

समुद्रतीरे विशालायां गुहायां निवसन् जटायुर्ज्येष्ठः सम्पाती नाम गृध्रराजः क्षुधापीडितः तान् वानरान् दृष्ट्वा तान् भक्षयितुम् उद्यतः। परन्तु निकटे आगत्य तेषां संवादं श्रुत्वा स ज्ञातवान् यत् एते रामस्य दूताः सीताम् अन्विष्यन्ति। ततः स मैत्रीं कृत्वा पृष्टवान् – “कुतः आगताः? कस्य पुत्राः? किं कर्तुम् इच्छथ?” इति। अंगदः वालिपुत्रः सन् विनयेन उत्तरम् अदात्। सः अंगदः सम्पातये अयोध्यायाः रामकथाम्, सीताहरणम्, रावणस्य दुष्कर्म, सुग्रीवेण सह मैत्री, वालिवधम्, दिशि-दिशि वानरप्रेषणम्, स्वयं च दक्षिणाशायाम् आगत्य सीतायाः अन्वेषणम्, इदानीम् आत्मनः दुर्दशाम् च वर्णितवान्। अनेन आख्यानेन सम्पाती सन्तुष्टः अभवत्। एतस्य सर्गस्य अन्ते सम्पाती स्ववृत्तान्तं वक्तुम् आरभते, येन सीतायाः स्थिति: ज्ञाता भवति।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५७

(अंगद द्वारा सम्पाती को अपनी दशा बताना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में दक्षिण दिशा में भेजे गए वानर निराश होकर समुद्र तट पर बैठे हैं। उनकी थकान और भूख चरम पर है। तभी उन्हें एक विशाल गृध्र दिखाई देता है – यह है जटायु का ज्येष्ठ भ्राता सम्पाती। भूख से व्याकुल सम्पाती उन्हें खाने का विचार करता है, किन्तु निकट आकर वह उनकी बातें सुनता है। राम-सीता का नाम सुनते ही वह सजग हो जाता है और मैत्रीपूर्वक उनसे पूछता है – "तुम लोग कौन हो? कहाँ से आए हो?" तब वालि-पुत्र अंगद आगे बढ़कर अपना परिचय देते हैं और सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाते हैं। यह सर्ग अंगद के उसी उद्बोधन को समर्पित है।

🦅 सम्पाती का प्रश्न और अंगद का विनम्र उत्तर (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः सम्पातिर्बलवान् गृध्रराजः प्रतापवान् ।
ददर्श तान् वानरमुख्यान् समुद्रानूपसंस्थितान् ॥
स तान् दृष्ट्वा महाकायः क्षुधितः पर्वतोपमः ।
अभ्यधावत वेगेन भक्षयिष्यन् वनौकसः ॥
तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा वानरपुंगवाः ।
व्यथिताः सम्परित्रस्ता विविधाश्च विचेतसः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सम्पातिः = सम्पाति; बलवान् = बलवान्; गृध्रराजः = गृध्रों के राजा; प्रतापवान् = प्रतापी; ददर्श = देखा; तान् = उन; वानरमुख्यान् = वानरश्रेष्ठों को; समुद्रानूपसंस्थितान् = समुद्र के जलाशय के समीप स्थित; सः = वह; तान् = उन्हें; दृष्ट्वा = देखकर; महाकायः = विशाल शरीर वाला; क्षुधितः = भूखा; पर्वतोपमः = पर्वत के समान; अभ्यधावत = दौड़ा; वेगेन = वेग से; भक्षयिष्यन् = खाने की इच्छा से; वनौकसः = वानरों को; तम् = उसे; आपतन्तम् = आते हुए; सहसा = सहसा; दृष्ट्वा = देखकर; वानरपुंगवाः = वानरश्रेष्ठ; व्यथिताः = व्यथित हो गए; सम्परित्रस्ताः = भयभीत हो गए; विविधाश्च = अनेक प्रकार से; विचेतसः = विचलित चित्त वाले।
📖 भावार्थ : उसके बाद बलवान् प्रतापी गृध्रराज सम्पाती ने समुद्र के तट पर स्थित उन वानरश्रेष्ठों को देखा। विशालकाय, पर्वत के समान भूखा वह उन वानरों को खाने के लिए तीव्र वेग से दौड़ा। उसे सहसा आते देख सभी वानर अत्यन्त भयभीत हो गए और उनके होश उड़ गए।
🔍 व्याख्या : वानरों की निराशा और भूख में एक और भय जुड़ गया। किन्तु यह भय क्षणिक ही सिद्ध हुआ, क्योंकि सम्पाती राम-कथा सुनकर मित्र बन जाता है।
॥ श्लोक ४-८ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे सम्पातिमभिवाद्य च ।
प्राञ्जलयः स्थिता राजन् वाक्यमूचुरिदं तदा ॥
स तेषां वचनं श्रुत्वा सम्पातिः प्रत्युवाच ह ।
के यूयं कस्य पुत्रा वः किमर्थमिह चागताः ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य अंगदो वाक्यमब्रवीत् ।
शृणु त्वं गृध्रराजेन्द्र वक्तुमर्हसि यत्स्थितम् ॥
📖 भावार्थ : तब उन सब वानरों ने सम्पाती को प्रणाम करके हाथ जोड़कर विनम्र वचन कहे। उनके वचन सुनकर सम्पाती ने प्रत्युत्तर में पूछा: "तुम लोग कौन हो? किसके पुत्र हो? यहाँ किस कार्य से आए हो?" उसके इन वचनों को सुनकर अंगद ने उत्तर दिया: "हे गृध्रराजेन्द्र! सुनिए, मैं आपको अपनी स्थिति बताता हूँ।"

🌿 अंगद का आत्म-परिचय और राम-सीता की कथा (श्लोक ९-२५)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
अहं वालिसुतः श्रीमान् अंगदो नाम नामतः ।
रामस्यानुचराः सर्वे भवन्तो वानरर्षभाः ॥
अयोध्याधिपतिर्वीरो दशरथो नृपोत्तमः ।
तस्य पुत्रो महातेजा रामो नाम जनैः श्रुतः ॥
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च प्रजाकामहिते रतः ।
पितुर्वचनमास्थाय वनं प्रस्थित आश्रमम् ॥
तस्य भार्या वैदेही जनकस्य सुता सती ।
अनुजग्मे वनं रामं पतिव्रतपरायणा ॥
📖 भावार्थ : "मैं वालि का पुत्र हूँ, नाम से अंगद कहाता हूँ। ये सभी वानरश्रेष्ठ राम के अनुचर हैं। अयोध्या के अधिपति वीर नरेश दशरथ थे। उनके महातेजस्वी पुत्र का नाम राम है, जो सब जनों में प्रसिद्ध हैं। वे धर्मज्ञ, सत्यवादी और प्रजा के हित में तत्पर रहते हैं। पिता के वचन का पालन करते हुए वे वन को चले गए। उनकी पत्नी वैदेही (सीता), जनक की पुत्री, पतिव्रता धर्म में लीन होकर राम के साथ वन गईं।"
🔍 व्याख्या : अंगद संक्षेप में राम का परिचय देते हैं, जिससे सम्पाती को पता चलता है कि वानर किनके दूत हैं।
॥ श्लोक १३-१८ ॥
तस्य भ्राता लक्ष्मणो नाम धन्वी नित्यमनुव्रतः ।
रामस्यैव हिते युक्तः सीतायाश्च विशेषतः ॥
तैस्तु तत्र वसद्भिस्तु वने वन्यैः फलादिभिः ।
वर्तयद्भिर्यथाकालं न्यवसत्सुखिनस्तदा ॥
जटायुर्नाम गृध्रेन्द्रो रामस्य सुहृदभवत् ।
स तेषां रक्षणार्थाय न्यवसत्सततं वने ॥
एकदा तु वने तस्मिन् रावणो नाम राक्षसः ।
बलात् प्रमथ्य वैदेहीं जहार मुनिवेषधृक् ॥
तं जटायुर्युधा रक्षन् यत्नवानपि रावणम् ।
नाशक्नोद्युधि निर्जेतुं पक्षच्छेदमवाप च ॥
हते जटायुषि तदा रावणो जनकात्मजाम् ।
दक्षिणां दिशमाक्रम्य लङ्कायां प्रत्यवस्थितः ॥
📖 भावार्थ : "राम के अनुज लक्ष्मण नित्य धनुषधारी, राम के हित में तत्पर और विशेष रूप से सीता की रक्षा में संलग्न रहते थे। वे तीनों उस वन में वन्य फलों से निर्वाह करते हुए सुखपूर्वक निवास कर रहे थे। जटायु नामक गृध्रराज राम के मित्र बन गए और उनकी रक्षा के लिए सदा वन में रहने लगे। एक दिन उस वन में रावण नामक राक्षस मुनि का वेष धारण कर बलपूर्वक वैदेही का हरण कर ले गया। जटायु ने युद्ध करके रावण को रोकने का बहुत प्रयास किया, किन्तु वह उसे पराजित न कर सका और उसके पंख कट गए। जटायु के मारे जाने पर रावण जनक-पुत्री को दक्षिण दिशा में ले जाकर लंका में रखे हुए है।"
🔍 व्याख्या : अंगद ने सीता हरण की घटना और जटायु के बलिदान का सजीव चित्रण किया, जिससे सम्पाती को अपने भाई का स्मरण हो आता है।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततो रामो महातेजाः सीतां दृष्ट्वा हृतां वने ।
शोकाकुलो भृशं राजन् विललाप सुदुःखितः ॥
ततः सुग्रीवमित्रत्वं कृत्वा वालिवधेन च ।
तार्क्ष्यं निर्मथ्य च बलात् सुग्रीवः स्थापितो नृपः ॥
सुग्रीवप्रेषिताः सर्वे दिशो विदिश एव च ।
वानराः सीतया नाथं मार्गामो विवशा वयम् ॥
इतः प्रभृति चोद्युक्ता दक्षिणामाश्रिता दिशम् ।
न चापश्याम वैदेहीं शोकेन महता वृताः ॥
अद्य सप्तदशो राजन् दिवसः परिवर्तते ।
न चापश्याम वैदेहीं सीतां जनकनन्दिनीम् ॥
इदानीं त्वां समासाद्य शरण्यं शरणार्थिनः ।
प्राप्ताः स्मो गृध्रराजेन्द्र सीतायाश्चिन्तया वयम् ॥
यदि जानासि वैदेहीं कुत्र सा वसते प्रिया ।
तद् ब्रूहि गृध्रशार्दूल पृच्छामस्त्वां प्रयत्नतः ॥
📖 भावार्थ : "तब महातेजस्वी राम ने वन में सीता का हरण देखा तो अत्यन्त शोकाकुल होकर विलाप करने लगे। फिर सुग्रीव से मित्रता की, वालि का वध किया और तार्क्ष्य (बालि के आभूषण) को बलपूर्वक छीनकर सुग्रीव को राजा बनाया। सुग्रीव द्वारा भेजे गए हम सब वानर दिशाओं और विदिशाओं में सीता की खोज कर रहे हैं। हम विवश होकर इस दक्षिण दिशा में आए हैं, किन्तु अब तक वैदेही को नहीं पाया। हे राजन्! आज सत्रहवाँ दिन बीत गया और हम जनकनन्दिनी सीता को नहीं देख पाए। अब हम आप शरणदाता के पास शरण चाहते हुए सीता की चिन्ता में आए हैं। हे गृध्रश्रेष्ठ! यदि आप जानते हैं कि वह प्रिया वैदेही कहाँ रहती है, तो कृपया बताइए, हम आपसे पूछते हैं।"
🔍 व्याख्या : अंगद ने विनम्रतापूर्वक सम्पाती से सहायता की याचना की। उनके शब्दों में निराशा और आशा का मिश्रण है।

🙏 अंगद की विनती और सम्पाती का आश्वासन (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३० ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य सम्पातिर्वाक्यमब्रवीत् ।
अहो धन्यतमो रामो यस्य भक्ताः समागताः ॥
जानामि वैदेहीं सीतां रावणेन हृतां बलात् ।
लङ्कायां वसते देवी अशोकवनिकाश्रिता ॥
भवन्तो मा विषादं वै कुर्वन्तु वानरर्षभाः ।
अहं तां दर्शयिष्यामि यत्नेनैव न संशयः ॥
जटायुर्मम भ्राता वै हतः तेन दुरात्मना ।
तस्य शोकेन संतप्तः सीतामोक्षं च चिन्तयन् ॥
स्वस्ति प्राप्स्यथ वैदेहीं रामं द्रक्ष्यथ चाच्युतम् ।
इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रहृष्टाः सर्ववानराः ॥
📖 भावार्थ : "उनकी बात सुनकर सम्पाती ने कहा: अहो! राम अत्यन्त धन्य हैं, जिनके ऐसे भक्त यहाँ आए हैं। मैं जानता हूँ कि वैदेही सीता को रावण बलपूर्वक हरकर लंका में अशोक वाटिका में रखे हुए है। हे वानरश्रेष्ठ! आप लोग विषाद न करें। मैं उन्हें अवश्य दिखा दूँगा, इसमें संदेह नहीं। जटायु मेरा भाई था, उस दुरात्मा ने उसे मार डाला। उसके शोक से तप्त होकर मैं सीता के मोक्ष की भी चिन्ता करता हूँ। तुम लोग सीता को पाकर कुशलपूर्वक राम से मिलोगे।" उनके वचन सुनकर सब वानर हर्षित हो गए।
🔍 व्याख्या : सम्पाती न केवल सीता का पता बताते हैं, बल्कि अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए भी उत्सुक हैं। उनका यह आश्वासन वानरों में नई आशा का संचार करता है।
॥ श्लोक ३१-३८ ॥
संक्षेप में : अगले श्लोकों में सम्पाती अपनी शक्ति का परिचय देते हैं और बताते हैं कि वे सूर्य की ओर उड़ते समय पंख जला बैठे थे। वे वानरों को लंका जाने का मार्ग बताते हैं और हनुमान की प्रशंसा करते हैं। यह सुनकर अंगद और सभी वानर आश्वस्त होकर सम्पाती का अभिनन्दन करते हैं।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग के अन्त तक सम्पाती का हृदय परिवर्तन हो चुका है। वह अब वानरों का मित्र और पथ-प्रदर्शक बन गया है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🕊️ जटायु-सम्पाती का सम्बन्ध

इस सर्ग में अंगद ने जटायु के बलिदान का उल्लेख किया, जिससे सम्पाती का वात्सल्य जागृत होता है। यह दर्शाता है कि पुण्यकर्म अप्रत्यक्ष रूप से भी सहायता प्रदान करते हैं – जटायु के बलिदान ने ही सम्पाती को वानरों का सहायक बनाया।

🗣️ अंगद का दूत-धर्म

अंगद ने अत्यन्त विनम्रता और कुशलता से सम्पूर्ण रामकथा का सार प्रस्तुत किया। उनके वाक्चातुर्य से ही सम्पाती विश्वास कर पाया। यह दूत के कर्तव्य का उत्तम उदाहरण है।

🌏 सीता के पते का रहस्योद्घाटन

इस सर्ग के माध्यम से सर्वप्रथम सीता के स्थान (लंका) का पता चलता है। यह आगे के सम्पूर्ण युद्ध का आधार बनता है।

⚡ निराशा से आशा का संचार

सत्रह दिनों की निरर्थक खोज के बाद वानर निराश हो चुके थे। सम्पाती के आश्वासन ने उनमें नवजीवन भर दिया। यह सिखाता है कि कभी हार नहीं माननी चाहिए।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हम निष्ठापूर्वक किसी महान कार्य में लगे रहें, तो ईश्वर की कृपा से कहीं न कहीं सहायता अवश्य मिलती है। सम्पाती जैसे अप्रत्याशित मित्र मिल जाते हैं। साथ ही, अपने कर्तव्य का पालन करते समय धैर्य और विनम्रता अत्यन्त आवश्यक है – जैसा अंगद ने दिखाया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।