सम्पाती द्वारा जटायु की मृत्यु की सूचना

किष्किन्धाकाण्ड का 56वाँ सर्ग सम्पाती और वानरों के मिलन का वर्णन करता है। वानरों की निराशा देख सम्पाती उन्हें जटायु की मृत्यु और सीता के लंका में होने की सूचना देते हैं, जिससे वानरों को नई आशा मिलती है।

विवरण

सीता की खोज में दक्षिण दिशा को गए वानर (हनुमान, अंगद, जाम्बवान आदि) समुद्र तट पर पहुँचकर निराश हो जाते हैं क्योंकि समुद्र पार करना असंभव प्रतीत होता है। वे आत्महत्या करने का विचार करने लगते हैं। तभी उन्हें एक भयंकर गृध्र (सम्पाती) दिखाई देता है। सम्पाती उनकी बातें सुनकर प्रकट होता है और जटायु का समाचार पूछता है। वानर उसे जटायु के रावण से युद्ध और मृत्यु की कथा सुनाते हैं। यह सुन सम्पाती अत्यन्त दुःखी होता है, क्योंकि जटायु उसका छोटा भाई था। फिर सम्पाती वानरों को बताता है कि उसने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा था कि रावण सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया और लंका में रावण के अन्तःपुर में सीता है। वह यह भी बताता है कि लंका समुद्र से सौ योजन दूर स्थित है। यह सुनकर वानरों का उत्साह बढ़ जाता है और वे लंका जाने का संकल्प करते हैं। सम्पाती उन्हें आशीर्वाद देता है और अपने पंखों के बल से उन्हें उड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५६

(सम्पाती द्वारा जटायु की मृत्यु की सूचना सुनना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में समुद्र के तट पर पहुँचकर निराश हो जाते हैं। विशाल समुद्र को पार करना असम्भव लगता है। तभी वहाँ एक विशाल गृध्र (सम्पाती) आता है। वह वानरों से अपने भाई जटायु का समाचार पूछता है। यह सर्ग सम्पाती और वानरों के इस मिलन तथा सम्पाती द्वारा सीता के लंका में होने की पुष्टि का वर्णन करता है।

🌊 वानरों की निराशा और सम्पाती का आगमन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे समुद्रं दक्षिणं प्रति ।
गत्वा निराशाः सञ्जाता न पश्यन्ति स्म जानकीम् ॥
ततः सम्पातिराकाशे श्रुत्वा तद्वानरवाक्यतः ।
अवतीर्य महातेजा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
के यूयं कस्य पुत्रा वा किमर्थं चात्र संस्थिताः ।
शोकसागरमध्यस्थाः सत्यं वदत मा चिरम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; वानराः = वानर; सर्वे = सब; समुद्रम् = समुद्र के; दक्षिणम् = दक्षिण; प्रति = की ओर; गत्वा = जाकर; निराशाः = निराश; सञ्जाताः = हो गए; न पश्यन्ति स्म = नहीं देखा; जानकीम् = जानकी को; ततः = तब; सम्पातिः = सम्पाति; आकाशे = आकाश में; श्रुत्वा = सुनकर; तत् = उन; वानरवाक्यतः = वानरों के वचनों को; अवतीर्य = उतरकर; महातेजाः = महातेजस्वी; वचनम् = वचन; च = और; इदम् = यह; अब्रवीत् = बोले; के = कौन; यूयम् = तुम; कस्य = किसके; पुत्राः = पुत्र; वा = या; किमर्थम् = किसलिए; च = और; अत्र = यहाँ; संस्थिताः = ठहरे हो; शोकसागरमध्यस्थाः = शोक सागर में डूबे हुए; सत्यम् = सत्य; वदत = बोलो; मा चिरम् = देर न करो।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् वे सब वानर दक्षिण समुद्र के तट पर जाकर निराश हो गए क्योंकि उन्हें सीता नहीं मिली। तभी आकाश में स्थित सम्पाती ने उन वानरों की बातें सुनीं। वे महातेजस्वी वहाँ उतरे और बोले: "तुम लोग कौन हो? किसके पुत्र हो? और यहाँ शोकसागर में डूबे हुए क्यों ठहरे हो? सत्य बात जल्दी बताओ।"
🔍 व्याख्या : समुद्र के दर्शन मात्र से वानर निराश हो गए, क्योंकि उन्हें पार करने का कोई उपाय न दिखा। तभी सम्पाती नामक विशाल गृध्र वहाँ आता है, जो जटायु का बड़ा भाई था। वह उनसे परिचय पूछता है।
॥ श्लोक ४-८ ॥
तच्छ्रुत्वा हनुमान्वाक्यं सम्पातेरमितौजसः ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥
रामस्य दूता वैदेह्या मार्गामो यत्र सा स्थिता ।
राक्षसेन हृता सीता त्वं हि जानासि राघवीम् ॥
इत्युक्तः स तदा तेन सम्पातिर्वाक्यमब्रवीत् ।
जटायुरिति विख्यातो मम भ्राता महाबलः ॥
स रामकार्ये निधनं गतः सत्यपराक्रमः ।
तस्य मे श्रूयतां वाक्यं यद्वृत्तं पूर्वमेव हि ॥
📖 भावार्थ : सम्पाती के उस वचन को सुनकर हनुमान ने हाथ जोड़कर, विनत होकर कहा: "हम राम के दूत हैं और वैदेही सीता को ढूँढ रहे हैं, जो राक्षस द्वारा हर ली गई हैं। आप उनके बारे में जानते होंगे।" ऐसा कहने पर सम्पाती ने उत्तर दिया: "जटायु नाम से विख्यात महाबली मेरा भाई था। वह सत्यपराक्रमी राम के कार्य में मारा गया। उसके विषय में मेरी बात सुनो कि पूर्व में क्या हुआ।"
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सम्पाती को सीता की खोज का उद्देश्य बताया। सम्पाती को जटायु के बारे में सुनकर दुःख होता है, और वह अपने भाई की कथा सुनाने लगता है।

🦅 सम्पाती-जटायु की कथा और जटायु के वध का वृत्तान्त (श्लोक ९-२२)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
अहं हि तेन वृद्धेन जटायुना महात्मना ।
भ्रात्रा दशरथस्यैष मम भ्राता महाबलः ॥
श्रूयतां यदि तत्सर्वं यथा वृत्तं पुरातनम् ।
पूर्वमावां महावेगौ सूर्यमार्गजिगीषया ॥
उत्पत्य गगनं प्राप्तौ भ्रातरौ रविमण्डलम् ।
तत्र मे दह्यमानस्य पक्षौ निपतितौ भुवि ॥
जटायुस्तु कृच्छ्रेण रक्षितो मां समुद्धरन् ।
ततः प्रभृति मे पक्षौ न वृद्धिं यात कर्हिचित् ॥
स एष रावणेनाद्य हतो दृष्टो मया पुरा ।
युध्यमानः सुबहुशो रामकार्ये दृढव्रतः ॥
📖 भावार्थ : "महात्मा वृद्ध जटायु मेरे भाई थे। वे महाबली थे और राम के पिता दशरथ के मित्र थे। सुनो, प्राचीन काल में हम दोनों भाई सूर्य के मार्ग को जीतने की इच्छा से आकाश में उड़े और सूर्यमण्डल तक पहुँच गए। वहाँ मेरे पंख जलने लगे और वे पृथ्वी पर गिर पड़े। जटायु ने किसी प्रकार मेरी रक्षा की और मुझे बचाया। तभी से मेरे पंख फिर से नहीं बढ़े। आज उसी जटायु को मैंने पहले देखा था, वह रावण से बहुत युद्ध करता हुआ राम के कार्य में व्रतधारी होकर मारा गया।"
🔍 व्याख्या : सम्पाती यहाँ अपने और जटायु के सूर्य की ओर उड़ने की प्रसिद्ध कथा सुनाता है। जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर वह शोक करता है।
॥ श्लोक १६-२२ ॥
ततः प्रवृत्तः सहसा रावणो राक्षसाधिपः ।
जहार जानकीं सीतां मायामास्थाय दारुणाम् ॥
तं दृष्ट्वा जटायुः संग्रामे निवार्य रथिनां वरः ।
युयुधे बहुभिः शस्त्रै रावणेन बलीयसा ॥
स रावणबलोद्भूतैः शरैर्भिन्नतनुच्छदः ।
पपात धरणीं वीरो जटायुर्विनदन्मुहुः ॥
ततो रावणमासाद्य सीतां कृत्वा च दक्षिणे ।
जगाम लङ्कां दुर्धर्षो राक्षसैः परिवारितः ॥
तत्र सीता हि वैदेही रावणस्य निवेशने ।
रक्ष्यते राक्षसीभिश्च शोकाकुलितचेतना ॥
📖 भावार्थ : "तब सहसा राक्षसराज रावण ने भयंकर माया का आश्रय लेकर सीता का हरण किया। युद्ध में जटायु ने उसे रोका और रथियों में श्रेष्ठ जटायु ने बलशाली रावण से बहुत से शस्त्रों से युद्ध किया। रावण के बाणों से शरीर बिंध जाने पर वह वीर जटायु बार-बार चिल्लाता हुआ धरती पर गिर पड़ा। तब रावण ने सीता को दक्षिण दिशा में करके, राक्षसों से घिरा हुआ, दुर्धर्ष लंका को प्रस्थान किया। वहाँ वैदेही सीता रावण के निवास में राक्षसियों द्वारा रक्षित हैं, शोक से आकुल चित्त वाली।"
🔍 व्याख्या : सम्पाती ने स्वयं देखा था कि रावण सीता को लेकर दक्षिण की ओर गया और लंका में है। अतः वह पुष्टि करता है कि सीता लंका में रावण के महल में है।

🏝️ सीता के लंका में होने की पुष्टि और वानरों का उत्साह (श्लोक २३-३५)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
लङ्का नाम समुद्रस्य मध्ये वरनगरी मम ।
शतयोजनविस्तीर्णा दुर्गा रावणपालिता ॥
तत्र सीता स्थिता देवी राक्षसीभिः सुरक्षिता ।
रावणेन समानीता क्रोशन्ती रामरामेति ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य सम्पातेर्हृष्टमानसाः ।
वानराः सहसोत्पेतुः कृतकृत्याश्च तेऽभवन् ॥
ततो हनूमतः प्रीतिः सम्बभूव महात्मनः ।
लङ्कायाश्च समुद्रस्य पारं गन्तुं मनो दधे ॥
सम्पातिरपि तान्सर्वानाशीर्भिरभिनन्द्य च ।
उवाच गम्यतां शीघ्रं सिद्धिं यास्यथ पुष्कलाम् ॥
📖 भावार्थ : "समुद्र के मध्य में लंका नाम की श्रेष्ठ नगरी है, जो सौ योजन विस्तृत है और रावण द्वारा पालित दुर्ग है। वहाँ देवी सीता रावण द्वारा लाई गई राक्षसियों से सुरक्षित स्थित हैं, राम-राम पुकारती हुई।" सम्पाती के ये वचन सुनकर वानर हर्षित हो गए और सफलता का अनुभव करने लगे। तब महात्मा हनुमान को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने लंका और समुद्र को पार करने का मन बनाया। सम्पाती ने भी उन सबको आशीर्वाद देकर कहा: "शीघ्र जाओ, तुम्हें पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी।"
🔍 व्याख्या : सम्पाती न केवल सीता के स्थान की पुष्टि करता है, वरन् वानरों को आशीर्वाद देकर उनका उत्साह बढ़ाता है। यहीं से हनुमान का लंका जाने का संकल्प दृढ़ होता है।
॥ श्लोक २९-३५ ॥
ते वानराः सम्पतिना समादिष्टा हि ते तदा ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रययुर्दक्षिणामुखाः ॥
सम्पातिरपि तान्दृष्ट्वा प्रस्थितान्हृष्टमानसः ।
अनुज्ञाप्य च तान्सर्वान्स्वमाश्रममुपागमत् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब सम्पाती द्वारा आदिष्ट वे वानर, धरती पर सिर झुकाकर प्रणाम कर, दक्षिण की ओर प्रस्थित हुए। सम्पाती भी उन्हें प्रसन्नतापूर्वक जाते देख, सबको अनुज्ञा देकर, अपने आश्रम को लौट गए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार सम्पाती के मार्गदर्शन से वानरों को सीता के स्थान का पता चल गया और वे नए उत्साह से आगे बढ़े। यह सर्ग हनुमान के लंका प्रस्थान की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦅 सम्पाती की भूमिका

सम्पाती इस सर्ग में मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। वे न केवल सीता के ठिकाने की जानकारी देते हैं, बल्कि जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर भी वानरों को प्रोत्साहित करते हैं। उनके बिना वानरों का अभियान अधूरा रह जाता।

❤️ भ्रातृप्रेम

सम्पाती और जटायु की कथा भ्रातृप्रेम का अद्भुत उदाहरण है। सम्पाती ने अपने भाई को खोया, फिर भी वह राम के कार्य में सहायता करता है।

🗺️ लंका का वर्णन

इस सर्ग में लंका की स्थिति, दूरी (सौ योजन) और वहाँ सीता की अवस्था का वर्णन है, जो आगे के सुन्दरकाण्ड की नींव रखता है।

🚀 हनुमान का संकल्प

सम्पाती के वचनों से हनुमान में लंका जाने का दृढ़ संकल्प जागता है, जो अगले सर्गों में फलीभूत होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि निराशा के क्षणों में भी सही मार्गदर्शन मिलने पर नई आशा जागती है। हमें दूसरों की सहायता के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए, जैसे सम्पाती ने वानरों की सहायता की।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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