वानरों का मृत्यु तक उपवास करने का निर्णय

किष्किन्धाकाण्ड के पचपनवें सर्ग में वानर सेना के दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए निराश होने और समुद्र तट पर आत्मघाती उपवास (प्रायोपवेश) का निर्णय लेने का वर्णन है। अंगद के नेतृत्व में वे सभी मृत्यु तक उपवास करने का प्रण लेते हैं।

विवरण

सुग्रीव की आज्ञा से वानर चारों दिशाओं में सीता की खोज में निकलते हैं। दक्षिण दिशा में जाने वाले वानर अंगद, हनुमान, जाम्बवान, नल, नील, तार आदि अनेक पराक्रमी वानर थे। वे बहुत दूर तक जाते हैं और अनेक प्रदेशों, पर्वतों, वनों, नगरों का भ्रमण करते हैं, किन्तु सीता का कोई पता नहीं चलता। निर्धारित समय (एक मास) समाप्त हो जाता है। वे दक्षिण दिशा में सबसे आगे बढ़कर अन्त में महासागर के तट पर पहुँचते हैं। विशाल समुद्र को देखकर उनके सामने कोई मार्ग नहीं सूझता। उन्हें लगता है कि वे सीता को नहीं खोज पाए और अब सुग्रीव के क्रोध का भाजन बनेंगे। सीता को न पाने पर वापस लौटना व्यर्थ है, क्योंकि तब सुग्रीव उन्हें मृत्यु दण्ड दे सकते हैं। अतः वे निर्णय लेते हैं कि वे इसी समुद्र तट पर प्रायोपवेश (भूखे रहकर प्राण त्याग) करेंगे। अंगद सभी को समझाते हैं कि बिना सीता का पता लगाए लौटना उचित नहीं। सभी वानर इस प्रस्ताव पर सहमत हो जाते हैं और मृत्यु तक उपवास करने का संकल्प लेते हैं। वे समुद्र तट पर दर्भ बिछाकर पूर्व की ओर मुख करके उपवास पर बैठ जाते हैं। यह सर्ग वानरों की कर्तव्यनिष्ठा, आत्मसमर्पण और संकट की घड़ी में एकजुटता को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५५

(वानरों का मृत्यु तक उपवास करने का निर्णय)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव के आदेश पर वानर चारों दिशाओं में सीता की खोज में निकल पड़े हैं। दक्षिण दिशा में अंगद के नेतृत्व में हनुमान, जाम्बवान आदि पराक्रमी वानर गये हैं। वे अनेक स्थानों की खोज करते हुए अन्त में विशाल दक्षिण समुद्र के तट पर पहुँचते हैं। सीता का कोई पता नहीं चलता और निर्धारित समय भी समाप्त हो जाता है। असफलता और सुग्रीव के क्रोध के भय से वे अत्यन्त निराश हो जाते हैं। तब अंगद उन्हें प्रायोपवेश (आमरण उपवास) का सुझाव देते हैं। यह सर्ग उसी निर्णय और उपवास पर बैठने की कथा कहता है।

🌊 समुद्र तट पर निराशा और विचार-विमर्श (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततस्ते दक्षिणां दिश्वं विचिन्वन्तो महाबलाः ।
नदीः पर्वतकुञ्जांश्च वनानि च सरांसि च ॥
न ददृशुः सतीं देवीं सीतां रामस्य वल्लभाम् ।
ततस्ते भृशदुःखार्ता निराशाः प्रत्यपद्यत ॥
सागरं दक्षिणं प्राप्य समीक्ष्य विपुलं जलम् ।
निषेदुस्ते महात्मानश्चिन्तयन्तः सुदुःखिताः ॥
अतीतः समयश्चैव सुग्रीवेण समाहितः ।
अस्माभिर्न च सीता सा दृष्टा रामस्य वल्लभा ॥
ततो वयं गमिष्यामः किं वक्ष्यामः सुग्रीवम् ।
स क्रोधवशमापन्नो हन्यादस्मान्न संशयः ॥
📖 भावार्थ : तब वे महाबली वानर दक्षिण दिशा में खोज करते हुए नदियों, पर्वतों की कन्दराओं, वनों और सरोवरों में गए। उन्होंने राम की प्रिय देवी सीता को नहीं देखा। तब वे अत्यन्त दुःखी और निराश हो गए। दक्षिण समुद्र के तट पर पहुँचकर उस विशाल जलराशि को देखकर वे महात्मा अत्यन्त दुःखी होकर चिन्ता में बैठ गए। उन्होंने विचार किया, “सुग्रीव द्वारा निर्धारित समय भी बीत गया और हमने राम की प्रिया सीता को नहीं देखा। अब यदि हम लौटेंगे तो सुग्रीव से क्या कहेंगे? वे क्रोध में आकर हमें अवश्य मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं।”
🔍 व्याख्या : वानरों की निराशा दोहरी है: एक तो सीता का पता न चलना, दूसरे सुग्रीव के क्रोध का भय। समुद्र का विशाल जल उनके सामने बाधा बनकर खड़ा है, आगे का मार्ग अज्ञात है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततोऽङ्गदो महातेजा जाम्बवन्तमुवाच ह ।
भयार्तान् वानरान् दृष्ट्वा चिन्तयित्वा पुनः पुनः ॥
अहं तु जीवितं त्यक्तुं वनमेव गमिष्यामि ।
अन्ये च वानराः सर्वे यदि वा जीवितुं क्षमाः ॥
एवमुक्त्वा ततो वीरो दर्भानास्तीर्य वीर्यवान् ।
प्राङ्मुखः प्रयतः स्थित्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि निश्चितः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी अंगद ने भय से पीड़ित वानरों को देखकर और बारम्बार चिन्ता करके जाम्बवान से कहा, “मैं तो यहीं प्राण त्याग दूंगा। अन्य वानर यदि चाहें तो जीवित रह सकते हैं।” ऐसा कहकर वे वीर अंगद ने दर्भ बिछाकर पूर्व की ओर मुख करके शुद्धतापूर्वक बैठकर प्राण त्यागने का निश्चय किया।
🔍 व्याख्या : अंगद का प्रस्ताव वीरता और कर्तव्यपरायणता का चरम उदाहरण है। वे असफलता की जिम्मेदारी लेते हुए आत्मदाह का निर्णय लेते हैं, जिससे अन्य वानरों को बचाने का प्रयास करते हैं।

🙏 सामूहिक प्रायोपवेश का निर्णय (श्लोक ११-२४)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्व एव वानराः ।
दर्भानास्तीर्य तीरे तु समुद्रस्य महात्मनः ॥
प्राङ्मुखाः प्रयताः स्थित्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामहे इति ।
एवं ते निश्चयं कृत्वा तोयं स्पृष्ट्वा कृताञ्जलिः ॥
न्यवर्तन्त न चाहारं चिन्तयन्ति कथञ्चन ।
ततः सागरवेलायां ते वानरमहाबलाः ॥
उपविष्टा महात्मानः प्राणांस्त्यक्तुं कृतक्षणाः ।
📖 भावार्थ : अंगद के वचन सुनकर सभी वानरों ने भी उसी महान समुद्र के तट पर दर्भ बिछाये और पूर्व की ओर मुख करके शुद्धतापूर्वक बैठ गये। वे बोले, “हम भी प्राण त्यागेंगे।” इस प्रकार निश्चय करके उन्होंने जल स्पर्श करके हाथ जोड़े और वहीं रुक गये। उन्होंने किसी प्रकार का आहार नहीं लिया। फिर वे महाबली वानर समुद्र की तटरेखा पर बैठ गये, प्राण त्यागने के लिए कृतसंकल्प होकर।
🔍 व्याख्या : अंगद के नेतृत्व में सभी वानर एकजुट होकर आत्मघाती उपवास पर बैठ जाते हैं। यह उनकी एकता, धैर्य और कर्तव्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है। उपवास का यह व्रत प्रायोपवेश कहलाता है, जो धर्मशास्त्रों में आपत्तिकालीन प्राणत्याग का एक मान्य मार्ग है।
॥ श्लोक १६-२४ ॥
अथ ते चिन्तयन्तो वै सीतां रामस्य वल्लभाम् ।
निराशाः प्रत्यपद्यन्त पुनः पुनरुदीक्ष्य च ॥
एवं तेषामुपविष्टानां दुःखार्तानां महात्मनाम् ।
स सम्पातिर्नाम गृध्रस्तत्रायातो महाबलः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब वे राम की प्रिया सीता का चिन्तन करते हुए निराश होकर बारम्बार समुद्र को देखते रहे। इस प्रकार उन महात्मा वानरों के दुःखी होकर बैठे रहने पर, उसी समय वहाँ सम्पाति नामक महाबली गिद्ध आया।
🔍 व्याख्या : सर्ग का अन्त सम्पाति के आगमन की सूचना देता है, जो अगले सर्ग का विषय है। यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा से संकट की घड़ी में ही समाधान आता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 प्रायोपवेश : धार्मिक संकल्प

प्रायोपवेश (आमरण अनशन) धर्मशास्त्रों में तब स्वीकार्य है जब व्यक्ति असाध्य रोग, महापाप, या कर्तव्य की असमर्थता से ग्रस्त हो। वानरों का यह निर्णय उनकी धर्मनिष्ठा और आत्मसम्मान को दर्शाता है। वे असफलता के दण्डस्वरूप या सुग्रीव के क्रोध से बचने के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण के कारण यह व्रत लेते हैं।

🤝 नेतृत्व और एकता

अंगद का नेतृत्व और सभी वानरों का एकमत होकर उपवास पर बैठना उनकी एकजुटता और आपसी विश्वास को दर्शाता है। कोई भी अलग नहीं होता; सब एक साथ संकट सहने को तैयार हैं। यही एकता आगे चलकर सम्पाति और फिर हनुमान की लंका यात्रा का आधार बनती है।

🌅 आशा का संदेश

इस सर्ग के अन्त में सम्पाति के आगमन की सूचना है। यह बताता है कि जीवन में अन्तिम निराशा के क्षण में भी ईश्वरीय सहायता अवश्य मिलती है। वानरों का उपवास व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि उनके संकल्प और त्याग ने ही उन्हें सम्पाति से मिलने का अवसर दिया।

📜 धर्म और कर्तव्य का संघर्ष

वानरों के सामने दो विकल्प हैं: असफल होकर सुग्रीव के सामने जाना और संभावित दण्ड भोगना, या यहीं प्राण त्याग देना। वे तीसरा मार्ग चुनते हैं – प्रायोपवेश, जो धर्म की दृष्टि से उचित माना गया है। यह संकट में धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि जीवन में विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए यदि असफलता मिले, तो उसका दण्ड स्वयं को देना वीरों का कर्म है। लेकिन साथ ही यह भी सन्देश है कि अन्तिम साँस तक आशा बनाए रखनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर की कृपा कभी भी प्रकट हो सकती है। वानरों के समर्पण ने ही सम्पाति को आकर्षित किया और आगे का मार्ग प्रशस्त हुआ।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।