हनुमान् द्वारा अंगद को सलाह

किष्किन्धाकाण्ड के चौवनवें सर्ग में वानरों द्वारा सीता की खोज के दौरान निराश अंगद को हनुमान् द्वारा दिये गये साहसपूर्ण उपदेश का वर्णन है। हनुमान् उन्हें धैर्य, कर्तव्य और राम की शक्ति का स्मरण दिलाते हैं।

विवरण

सुग्रीव के आदेश पर चारों दिशाओं में वानर दल भेजे गए। दक्षिण दिशा के दल का नेतृत्व अंगद को सौंपा गया, जिसमें हनुमान्, जाम्बवान्, नील, नल आदि महावीर वानर थे। वे विन्ध्य पर्वत, गोदावरी नदी, विभिन्न देशों और वनों का भ्रमण करते हुए सीता की खोज करते रहे, किन्तु कहीं उनका पता नहीं चला। अनेक कठिनाइयाँ झेलने के बाद वे अत्यन्त थक गए और निराश हो गए। तब अंगद ने सभी वानरों को सम्बोधित कर कहा कि हम सब व्यर्थ ही परिश्रम कर रहे हैं। यदि हम सीता को नहीं ढूँढ पाए तो सुग्रीव हमें दण्डित करेंगे। अतः यहाँ प्राण त्याग देना ही उचित होगा। उनकी यह बात सुनकर सब वानर निराश हो गए। तब हनुमान् ने अंगद को सान्त्वना दी और उन्हें उनके कर्तव्य और राम की महिमा का स्मरण दिलाया। उन्होंने कहा कि हमें धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए; राम जैसे प्रभु का कार्य अवश्य पूरा होगा। यदि हम प्राण भी देंगे तो राम का कार्य अधूरा रह जाएगा। हनुमान् के उपदेश से सभी वानरों में नई ऊर्जा का संचार हुआ और वे पुनः खोज में जुट गए। इस प्रकार इस सर्ग में हनुमान् की बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता का परिचय मिलता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५४

(हनुमान् द्वारा अंगद को सलाह – निराश वानरों का उत्साहवर्धन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव से वानर सेनाएँ सीता की खोज में चारों दिशाओं को प्रस्थान कर चुकी हैं। दक्षिण दिशा का दल अंगद के नेतृत्व में, हनुमान्, जाम्बवान् आदि वीरों के साथ विन्ध्याचल के दुर्गम मार्गों में भटक रहा है। अनेक प्रयत्नों के बाद भी जब सीता का कोई पता नहीं चलता, तो अंगद निराश होकर प्राण त्यागने का विचार करते हैं। तब हनुमान् उन्हें कर्तव्य और धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं। यह सर्ग हनुमान् के कूटनीतिक ज्ञान और प्रेरणा-शक्ति का अद्भुत उदाहरण है।

🌿 अंगद की निराशा और आत्मत्याग का प्रस्ताव (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे दक्षिणां दिशमास्थिताः ।
विचिन्वन्तो वनं सर्वं नापश्यन् जनकात्मजाम् ॥
विषण्णवदनाः सर्वे परिश्रान्ता श्रमान्विताः ।
निषेदुः पर्वतस्याग्रे चिन्तयन्तो महद्भयम् ॥
ततः संचिन्त्य बहुधा नष्टसर्वाश्रयाः कृशाः ।
अंगदो वाक्यमत्यर्थं धर्मार्थसहितं ब्रवीत् ॥
किं करिष्यामहे सर्वे वृथा श्रमपरिश्रमाः ।
न हि पश्यामि वैदेहीं सुग्रीवस्य भयं च नः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; वानराः = वानर; सर्वे = सब; दक्षिणाम् = दक्षिण; दिशम् = दिशा को; आस्थिताः = प्राप्त होकर; विचिन्वन्तः = खोज करते हुए; वनम् = वन; सर्वम् = सब; न = नहीं; अपश्यन् = देखा; जनकात्मजाम् = जनकपुत्री को; विषण्णवदनाः = उदास मुख वाले; सर्वे = सब; परिश्रान्ताः = अत्यधिक थके हुए; श्रमान्विताः = परिश्रम से पीड़ित; निषेदुः = बैठ गए; पर्वतस्य = पर्वत के; अग्रे = शिखर पर; चिन्तयन्तः = सोचते हुए; महद्भयम् = बड़ा भय; ततः = तब; संचिन्त्य = विचार कर; बहुधा = अनेक प्रकार से; नष्टसर्वाश्रयाः = सब आश्रयों से रहित; कृशाः = दुबले; अंगदः = अंगद; वाक्यम् = वचन; अत्यर्थम् = अत्यन्त; धर्मार्थसहितम् = धर्म और अर्थ सहित; ब्रवीत् = बोले; किम् = क्या; करिष्यामहे = करेंगे; सर्वे = हम सब; वृथा = व्यर्थ; श्रमपरिश्रमाः = श्रम से परिश्रान्त; न हि = नहीं ही; पश्यामि = देखता हूँ; वैदेहीम् = वैदेही को; सुग्रीवस्य = सुग्रीव का; भयम् = भय; च = और; नः = हमें।
📖 भावार्थ : उसके बाद वे सब वानर दक्षिण दिशा में जाकर सम्पूर्ण वन में सीता को खोजते रहे, परन्तु उन्हें जनकपुत्री नहीं मिली। तब सब वानर उदास मुख, अत्यधिक थके हुए और परिश्रम से पीड़ित होकर पर्वत के शिखर पर बैठ गए तथा बड़े भय से चिन्ता करने लगे। तब अंगद ने बहुत प्रकार से विचार करके, सभी आशाओं से रहित होकर, धर्म और अर्थ से युक्त यह वचन कहा – “हम सब व्यर्थ ही परिश्रम करके अब क्या करेंगे? मैं वैदेही को नहीं देख पा रहा हूँ और हमें सुग्रीव का भय भी सता रहा है।”
🔍 व्याख्या : अंगद का यह कथन उनकी मानसिक दशा को दर्शाता है। एक ओर वे स्वयं राजकुमार हैं, दूसरी ओर सुग्रीव के भय से वे सीता को न ढूँढ पाने पर दण्ड की आशंका से व्याकुल हैं।
॥ श्लोक ५-८ ॥
अवश्यं निधनं यामः सुग्रीवस्य भयात् कपे ।
तदत्रैव परित्यज्य प्राणान् याम सुखं वयम् ॥
न हि नः सदृशं किंचिदन्यत् कार्यमुपस्थितम् ।
अनाशाय हि सीताया मरणाद्भयमस्ति नः ॥
इत्युक्त्वा वानराः सर्वे बाष्पपूर्णमुखाः स्थिताः ।
अंगदस्य वचः श्रुत्वा निराशा जीविते तदा ॥
📖 भावार्थ : “हे वानरो! सुग्रीव के भय से हम सबको अवश्य मृत्यु को प्राप्त होना है। इसलिए हम यहीं प्राणों का त्याग करके सुखपूर्वक (मृत्यु) को प्राप्त हो जाएँ। हमारे लिए इससे उचित कोई दूसरा कार्य उपस्थित नहीं है। सीता के न मिलने पर मृत्यु ही हमारा एकमात्र भय है।” ऐसा कहकर और अंगद के वचन सुनकर सभी वानर बाष्प से भरे मुख वाले होकर जीवन से निराश हो गए।
🔍 व्याख्या : अंगद का यह आत्मघाती प्रस्ताव वानरों के सम्मुख सबसे बड़ा संकट खड़ा करता है। हनुमान् का आगमन इसी संकट को टालने के लिए होता है।

🙏 हनुमान् का उपदेश और अंगद को सान्त्वना (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१७ ॥
ततः प्रोवाच हनुमान् अंगदं वाक्यकोविदः ।
मा विषादं कृथाः सौम्य नैतद् युक्तं तवानघ ॥
राघवस्य प्रियार्थाय वयं सर्वे समुद्यताः ।
त्यक्त्वा प्राणान् गमिष्यामः कृतार्था यदि वा न वा ॥
धैर्यमालम्ब्य कर्तव्यं सर्वैरेव समाहितैः ।
रामस्य कार्यं सिद्ध्यर्थं यत्नः कार्यः पुनः पुनः ॥
न हि दैवात् कृतं कार्यं सिध्यत्येव न संशयः ।
पुरुषार्थेन युक्तेन सिध्यत्येव न संशयः ॥
तस्मात् त्यजत नैराश्यं कुरुध्वं पुरुषोचितम् ।
अहं वः साहाय्यदाता न चिरात् सीतया मिलेत ॥
📖 भावार्थ : तब वाक्य-कुशल हनुमान् ने अंगद से कहा – “हे सौम्य! विषाद मत करो, हे निष्पाप! यह तुम्हें उचित नहीं है। राघव के प्रिय के लिए हम सब तत्पर हैं। यदि हम प्राण त्याग भी देंगे, तब भी हम कृतार्थ होंगे, चाहे कार्य सिद्ध हो या न हो। धैर्य धारण करके सबको एकाग्रचित्त होकर राम के कार्य की सिद्धि के लिए बार-बार प्रयत्न करना चाहिए। दैव से किया गया कार्य सन्देह रहित होकर सिद्ध होता है, परन्तु पुरुषार्थ से किया गया कार्य भी निःसन्देह सिद्ध होता है। अतः निराशा त्याग दो और पुरुषोचित कर्म करो। मैं तुम्हारा सहायक हूँ; शीघ्र ही सीता से मिलन होगा।”
🔍 व्याख्या : हनुमान् ने अंगद को यह सिखाया कि केवल दैव पर निर्भर न रहकर पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने स्वयं सहायता का वचन देकर सबका उत्साह बढ़ाया।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं सर्वे ते वानरर्षभाः ।
विस्मयं परमं जग्मुः प्रहर्षं चोपपेदिरे ॥
अंगदोऽपि महातेजाः प्रत्युवाच हनूमतः ।
भवान् नेता वयं सर्वे त्वदधीना वयं कपे ॥
यथा वदसि धर्मज्ञ तथा कार्यं हि नः प्रभो ।
त्वया सह महाबाहो यास्यामो रिपुनाशनम् ॥
एवमुक्त्वा समुत्तस्थुः सर्व एव हरीश्वराः ।
हनुमत्प्रतिवाक्येन हर्षिताः पुनरेव हि ॥
📖 भावार्थ : हनुमान् के वचन सुनकर वे सब वानरश्रेष्ठ अत्यन्त विस्मित हुए और हर्ष से भर गए। महातेजस्वी अंगद ने भी हनुमान् से कहा – “आप नेता हैं, हम सब आपके अधीन हैं। हे धर्मज्ञ! आप जैसा कहें, वैसा ही हमें करना चाहिए। हे महाबाहो! आपके साथ हम शत्रुओं का नाश करने वाले कार्य में जाएँगे।” ऐसा कहकर हनुमान् के उत्तर से हर्षित होकर वे सब वानरश्रेष्ठ पुनः उठ खड़े हुए।
🔍 व्याख्या : हनुमान् की बात ने न केवल अंगद बल्कि पूरे दल में नवचेतना भर दी। अब वे पुनः खोज में जुटने को तत्पर हो गए।

🚩 वानरों का उत्साह और आगे की खोज का संकल्प (श्लोक २६-३२)

॥ श्लोक २६-२९ ॥
ततः प्रतस्थुर्वेगेन दिशं दक्षिणपश्चिमाम् ।
गहनं च वनं सर्वं पर्वतांश्च विचिन्वते ॥
तेषां मार्गपरिश्रान्तो जाम्बवान् वाक्यमब्रवीत् ।
अहो वत महत् कर्म कर्तव्यं नोऽत्र वानराः ॥
ततो हनूमता सार्धं विचिन्वन्तो महावनम् ।
आसाद्य पर्वतं घोरं ददृशुस्ते महागुहाम् ॥
तस्यां गुहायां घोरायां निविष्टा वानरर्षभाः ।
सीतान्वेषणसंयुक्ताः प्रहृष्टा युद्धदुर्मदाः ॥
📖 भावार्थ : तब वे सब वेगपूर्वक दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर बढ़े और सम्पूर्ण गहन वन तथा पर्वतों को खोजने लगे। उनके मार्ग में थके हुए जाम्बवान् ने कहा – “अहो! हमें अब बहुत बड़ा कार्य करना है।” तब हनुमान् के साथ उस महावन में खोज करते हुए वे एक भयंकर पर्वत के पास पहुँचे और उन्होंने एक बड़ी गुफा देखी। उस भयानक गुफा में वे वानरश्रेष्ठ, सीता की खोज में लगे हुए, युद्ध के नशे में चूर होकर प्रविष्ट हुए।
🔍 व्याख्या : यह गुफा ही आगे चलकर सम्पाती से भेंट और सीता के समाचार का कारण बनती है। इस प्रकार हनुमान् के उपदेश ने वानरों को न केवल निराशा से बचाया, बल्कि उन्हें सफलता की ओर अग्रसर किया।
॥ श्लोक ३०-३२ ॥
ततस्ते विश्रमं प्राप्य गुहायां तपस्विनाम् ।
चक्रुः सीतान्वेषणार्थं यत्नं चैव पुनः पुनः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब उस गुफा में विश्राम करके उन्होंने सीता की खोज के लिए बार-बार प्रयत्न किए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार हनुमान् के उपदेश ने वानरों में नया जीवन फूँक दिया। वे अब दृढ़ संकल्प के साथ खोज में जुट गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 हनुमान् की बुद्धिमत्ता

इस सर्ग में हनुमान् न केवल शारीरिक बल से, बल्कि बुद्धि और कूटनीति से कार्य साधते हैं। वे अंगद की निराशा को तुरंत भाँप लेते हैं और उचित शब्दों में उनका उत्साहवर्धन करते हैं।

👑 नेतृत्व का महत्व

अंगद युवा राजकुमार हैं, किंतु संकट में वे विचलित हो जाते हैं। हनुमान् एक वफादार सेवक होते हुए भी मार्गदर्शक बनकर दल को सही दिशा देते हैं। यह दर्शाता है कि नेता को केवल पद से नहीं, बल्कि गुणों से प्रभावशाली होना चाहिए।

⚓ धैर्य और पुरुषार्थ

हनुमान् का उपदेश ‘दैव और पुरुषार्थ’ के संतुलन पर आधारित है। वे कहते हैं कि मनुष्य को केवल भाग्य पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्वयं प्रयत्न करना चाहिए। यह शिक्षा सार्वकालिक है।

🔱 रामभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा

हनुमान् राम के कार्य को सर्वोपरि मानते हैं। वे स्वयं को उस कार्य के लिए समर्पित करते हैं और दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। यही समर्पण भाव आगे चलकर सीता की खोज में सफलता दिलाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि जीवन में कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। एक अच्छा मित्र और मार्गदर्शक हमारा उत्साह बढ़ा सकता है। हनुमान् ने सिद्ध किया कि सच्चा सहायक वही है जो विपत्ति में संबल प्रदान करे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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