अंगद द्वारा मृत्यु तक उपवास का प्रस्ताव

दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए अंगद के नेतृत्व में वानर सेना निराश होकर समुद्र तट पर पहुँचती है। समय सीमा समाप्त होने पर सुग्रीव के क्रोध से भयभीत होकर अंगद मृत्यु तक उपवास (प्रायोपवेश) करने का प्रस्ताव रखते हैं।

विवरण

सीता की खोज में निकले वानर दल को कोई सफलता नहीं मिलती। सुग्रीव द्वारा निर्धारित एक मास की समय सीमा समाप्त होने वाली है। सुग्रीव के क्रोध और अवज्ञा के दण्ड से भयभीत होकर सभी वानर निराश हो जाते हैं। तब अंगद, जो इस दल के नेता हैं, सभी वानरों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि बिना सीता का पता लगाए लौटना उचित नहीं है। वे सुझाव देते हैं कि यदि वे सुग्रीव के सम्मुख निराश होकर जाएंगे तो उन्हें मृत्युदण्ड मिल सकता है। अतः वे प्रस्ताव करते हैं कि वे सभी यहीं समुद्र तट पर मृत्यु तक उपवास (प्रायोपवेश) करेंगे। वानरगण अंगद की बात का समर्थन करते हैं और सभी उपवास का संकल्प लेते हैं। इसी बीच, वहाँ एक गृध्रराज सम्पाती आता है, जो उनकी बातें सुनता है और राम-सीता की कथा से जुड़ जाता है। यह सर्ग उसी मार्मिक प्रस्ताव और वानरों के निर्णय का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५३

(अंगद द्वारा मृत्यु तक उपवास का प्रस्ताव)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : माता सीता की खोज में निकले वानर दल को कोई सफलता नहीं मिलती। सुग्रीव द्वारा निर्धारित एक मास की समय सीमा समाप्त होने वाली है। सुग्रीव के क्रोध से भयभीत होकर वानर निराश हो जाते हैं। तब अंगद, इस दल के नेता, सभी वानरों के सामने मृत्यु तक उपवास करने का प्रस्ताव रखते हैं। यह सर्ग उसी मार्मिक प्रस्ताव का वर्णन करता है।

🌊 वानरों की निराशा और अंगद का संबोधन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे दिशं दक्षिणमन्वयुः ।
न ददृशुश्च वैदेहीं निराशा भयमाप्नुवन् ॥
सागरं प्राप्य ते सर्वे विषण्णवदना भृशम् ।
निषेदुश्चिन्तया युक्ताः सुग्रीवभयकर्शिताः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; ते = वे; वानराः = वानर; सर्वे = सब; दिशम् = दिशा को; दक्षिणाम् = दक्षिण; अन्वयुः = गए; न = नहीं; ददृशुः = देखा; च = और; वैदेहीम् = वैदेही को; निराशाः = निराश; भयम् = भय; आप्नुवन् = प्राप्त हुए; सागरम् = समुद्र को; प्राप्य = पाकर; ते = वे; सर्वे = सब; विषण्णवदनाः = उदास मुख वाले; भृशम् = अत्यधिक; निषेदुः = बैठ गए; चिन्तया = चिन्ता से; युक्ताः = युक्त; सुग्रीवभय = सुग्रीव के भय से; कर्शिताः = पीड़ित।
📖 भावार्थ : तब वे सब वानर दक्षिण दिशा में गए। उन्होंने वैदेही को नहीं देखा और निराश होकर भय को प्राप्त हुए। समुद्र के पास पहुँचकर वे सब अत्यधिक उदास मुख वाले, चिन्ता से युक्त और सुग्रीव के भय से पीड़ित होकर बैठ गए।
🔍 व्याख्या : सीता का पता न चलने से वानरों को सुग्रीव के क्रोध का भय सता रहा था। वे समुद्र तट पर निराश बैठ गए।
॥ श्लोक ३-४ ॥
तान् दृष्ट्वा पीडितान् सर्वान् अंगदो वाक्यमब्रवीत् ।
किमिदानीं करिष्यामः क्व गमिष्यामहे वयम् ॥
न हि सीतां परिद्रष्टुं शक्नुमः सागराम्बराम् ।
सुग्रीवस्य च संत्रासात् प्राणत्यागो विधीयताम् ॥
📖 भावार्थ : उन सबको पीड़ित देखकर अंगद ने कहा: "अब हम क्या करेंगे? हम कहाँ जाएंगे? हम समुद्र से घिरी सीता को खोज नहीं सके। सुग्रीव के भय से प्राण त्याग ही उचित है।"

🪦 अंगद द्वारा मृत्यु तक उपवास का प्रस्ताव (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१२ ॥
शृण्वन्तु मे वानरवीरमुख्याः सुग्रीवकोपाद्भयमस्ति घोरम् ।
अदृष्टसीता न गमिष्यामो यूयं प्रायोपवेशं विदधामु सर्वे ॥
इहैव वत्स्यामः समुद्रतीरे यावन्न दृष्टा जनकात्मजा सा ।
प्राणान् विहास्याम उपोषिताः स्मो न लौल्यमत्र प्रतिपत्स्यते नः ॥
🔹 पदच्छेद : शृण्वन्तु = सुनें; मे = मेरे; वानरवीरमुख्याः = वानरवीरों में मुख्य; सुग्रीवकोपात् = सुग्रीव के क्रोध से; भयम् = भय; अस्ति = है; घोरम् = भयंकर; अदृष्टसीता = बिना सीता को देखे; न = नहीं; गमिष्यामः = जाएंगे; यूयम् = आप; प्रायोपवेशम् = मृत्यु तक उपवास; विदधामु = करें; सर्वे = सब; इहैव = यहीं; वत्स्यामः = रहेंगे; समुद्रतीरे = समुद्र के किनारे; यावत् = जब तक; न = नहीं; दृष्टा = देखी गयी; जनकात्मजा = जनक की पुत्री; सा = वह; प्राणान् = प्राण; विहास्यामः = त्याग देंगे; उपोषिताः = उपवास किए हुए; स्मः = हम; न = नहीं; लौल्यम् = चंचलता; अत्र = यहाँ; प्रतिपत्स्यते = प्राप्त होगी; नः = हमें।
📖 भावार्थ : अंगद ने कहा: "हे वानरवीरो! सुनो। सुग्रीव का क्रोध भयंकर है। बिना सीता को खोजे हम नहीं लौटेंगे। हम सब यहीं प्रायोपवेश (मृत्यु तक उपवास) करें। हम समुद्र के तट पर तब तक रहेंगे जब तक जनकपुत्री नहीं मिल जाती। हम उपवास द्वारा प्राण त्याग देंगे, इससे हमारी चंचलता भी दूर होगी।"
🔍 व्याख्या : अंगद ने निराशा में भी एक प्रतिज्ञा का मार्ग दिखाया। प्रायोपवेश क्षत्रियों के लिए आत्महत्या का एक स्वीकार्य रूप था, विशेषकर जब कर्तव्यभंग का भय हो।

🙌 वानरों का समर्थन और उपवास संकल्प (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२२ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य अंगदस्य महात्मनः ।
ऊचुः सर्वे महात्मानः साधु साध्विति वानराः ॥
प्रायोपवेशनं कृत्वा दर्भानास्तीर्य सर्वतः ।
उपोषिताः स्थिताः सर्वे प्राङ्मुखाः प्रयताः शुचिः ॥
📖 भावार्थ : उस महात्मा अंगद का वचन सुनकर सब महात्मा वानरों ने 'साधु साधु' कहकर स्वीकार किया। फिर प्रायोपवेशन के लिए सब ओर दर्भ बिछाकर, उपवासपूर्वक, पूर्व की ओर मुख किए, संयत और शुद्ध होकर बैठ गए।

🔮 समाप्ति और अगले सर्ग की ओर संकेत

॥ श्लोक ३१-३२ ॥
तेषां तु तप्यतां तत्र प्राणांस्त्यक्तुं समुद्रतः ।
शुश्रुवुर्गृध्रराजस्तु सम्पातिर्नाम नामतः ॥
स तेषां करुणं वाक्यं श्रुत्वा संचिन्त्य चापि ह ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं भ्रातुर्ज्येष्ठस्य चिन्तयन् ॥
📖 भावार्थ : जब वे वहाँ समुद्र के पास प्राण त्यागने की तपस्या कर रहे थे, तब उनकी बातें सम्पाती नामक गृध्रराज ने सुनी। उनका करुण वचन सुनकर और मनन करके, उसने अपने बड़े भाई (जटायु) का स्मरण करते हुए मृदु वचन कहे।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार अंगद के उपवास प्रस्ताव से उत्पन्न निराशा के क्षण में ही सम्पाती का आगमन होता है, जो आगे चलकर सीता के पते का सुराग देता है। यह सर्ग उसी मोड़ पर समाप्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦧 अंगद का नेतृत्व

इस सर्ग में अंगद के नेतृत्व कौशल और कर्तव्यपरायणता का परिचय मिलता है। वह निराशा में भी वानरों को एकजुट रखता है और एक कठोर निर्णय लेता है।

⚖️ कर्तव्य और भय

सुग्रीव के क्रोध का भय और कर्तव्य में असफलता का प्रायश्चित – यह दुविधा वानरों को प्रायोपवेश की ओर ले जाती है। यह अधीनस्थों की मनःस्थिति को दर्शाता है।

🦅 सम्पाती का आगमन

इस सर्ग के अंत में सम्पाती का आना अगले सर्ग की भूमिका तैयार करता है। यह दर्शाता है कि प्रभु की लीला में निराशा के बाद ही आशा का संचार होता है।

📖 धार्मिक संकल्प

प्रायोपवेश (आमरण अनशन) एक प्राचीन धार्मिक प्रथा थी, जिसे संकट के समय अपनाया जाता था। यहाँ इसका प्रयोग कर्तव्य अकरण से उत्पन्न दोष से बचने के लिए किया गया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। अंगद ने निराशा में एक विकल्प प्रस्तुत किया, जिसने वानरों को एकत्र रखा। ईश्वर की कृपा से उसी संकट के क्षण में समाधान भी आ जाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।