काली गुफा (ऋक्ष गुफा) की कथा

किष्किन्धाकाण्ड के इक्यावनवें सर्ग में वानर दल का दक्षिण दिशा में खोज के दौरान काली (ऋक्ष) नामक गुफा में प्रवेश तथा वहाँ तपस्विनी स्वयम्प्रभा से भेंट का वर्णन है। स्वयम्प्रभा उनका आतिथ्य करती हैं और गुफा के इतिहास से अवगत कराती हैं।

विवरण

सीता की खोज में नियुक्त वानर दल का नेतृत्व अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि कर रहे हैं। दक्षिण दिशा में बढ़ते हुए वे विन्ध्य पर्वत के निकट एक विशाल एवं भयानक गुफा (काली या ऋक्ष गुफा) में प्रवेश करते हैं। अन्धकार में भटकने के बाद उन्हें एक दिव्य प्रकाश दिखाई देता है। वहाँ वे स्वयम्प्रभा नामक एक तपस्विनी को देखते हैं, जो तेज से युक्त है। वह उनका सत्कार करती है और फल-मूल खाने को देती है। अंगद द्वारा अपना परिचय पूछे जाने पर वह बताती है कि वह इस गुफा में तपस्या कर रही है और उसे एक वरदान प्राप्त है। वह गुफा के इतिहास की कथा सुनाती है कि यहाँ पहले काली नामक राक्षस रहता था, जिसे ऋषि मतंग ने शाप देकर मार डाला था। तब से यह गुफा तपस्वियों का स्थान बन गई। अन्त में स्वयम्प्रभा अपनी योगशक्ति से सभी वानरों को गुफा से बाहर निकालती है, जिससे वे अपनी खोज जारी रख सकें।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५१

(काली गुफा (ऋक्ष गुफा) की कथा – वानरों का स्वयम्प्रभा से मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव के आदेशानुसार वानर दल चारों दिशाओं में सीता की खोज में निकल चुके हैं। दक्षिण दल का नेतृत्व अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि कर रहे हैं। वे घने वनों, पर्वतों और नदियों को पार करते हुए दक्षिण दिशा में अग्रसर होते हैं। इसी क्रम में उनका सामना एक रहस्यमयी गुफा से होता है, जिसे काली या ऋक्ष गुफा कहा जाता है। यह सर्ग उस गुफा के भीतर के रोमांचक वर्णन तथा वहाँ की तपस्विनी स्वयम्प्रभा से भेंट की कथा कहता है।

🌑 गुफा में प्रवेश और अन्धकार में भटकना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रयाता वैदेह्या मार्गमाणा महाबलाः ।
विन्ध्यपादपसङ्कीर्णं ददृशुर्गह्वरं महत् ॥
तत्र ते प्रविशन्तो वै ददृशुस्तिमिरावृतम् ।
गुहां कालीति विख्यातां ऋक्षेभ्यः परमद्भुताम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रयाता = जाते हुए; वैदेह्याः = सीता को; मार्गमाणाः = खोजते हुए; महाबलाः = महान बलवान; विन्ध्यपादपसङ्कीर्णम् = विन्ध्य के वृक्षों से घिरा हुआ; ददृशुः = देखा; गह्वरम् = गुफा; महत् = बड़ी; तत्र = वहाँ; ते = वे; प्रविशन्तः = प्रवेश करते हुए; वै = ही; ददृशुः = देखा; तिमिरावृतम् = अंधकार से घिरी; गुहाम् = गुफा; कालीति = काली के नाम से; विख्याताम् = प्रसिद्ध; ऋक्षेभ्यः = ऋषियों के लिए; परमद्भुताम् = अत्यन्त अद्भुत।
📖 भावार्थ : तब सीता की खोज में जाते हुए महाबली वानरों ने विन्ध्य पर्वत के वृक्षों से घिरी हुई एक विशाल गुफा देखी। उस गुफा में प्रवेश करते हुए उन्होंने घोर अन्धकार से भरी उस गुफा को देखा, जो काली के नाम से विख्यात थी और ऋषियों के लिए भी अद्भुत थी।
🔍 व्याख्या : यह गुफा रहस्यमयी और दुर्गम थी। वानरों ने साहस दिखाते हुए उसमें प्रवेश किया।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ते तत्र विचरन्तो वै क्षुत्पिपासाश्रमान्विताः ।
नापश्यन् भास्करं भानुं न दिशो न च देवताः ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य ददृशुस्ते महाप्रभम् ।
आश्रमं दिव्यसङ्काशं स्वयम्प्रभानिषेवितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ते = वे; तत्र = वहाँ; विचरन्तः = विचरण करते हुए; वै = ही; क्षुत्पिपासाश्रमान्विताः = भूख-प्यास से पीड़ित; न अपश्यन् = नहीं देखा; भास्करम् = सूर्य; भानुम् = प्रकाश; न = नहीं; दिशः = दिशाएँ; न च = और न ही; देवताः = देवता; अथ = तब; दीर्घस्य कालस्य = बहुत समय बाद; ददृशुः = देखा; ते = उन्होंने; महाप्रभम् = अत्यधिक प्रकाश वाला; आश्रमम् = आश्रम; दिव्यसङ्काशम् = दिव्य समान; स्वयम्प्रभानिषेवितम् = स्वयम्प्रभा द्वारा सेवित (जहाँ वह रहती थी)।
📖 भावार्थ : वहाँ विचरण करते हुए वे भूख-प्यास से पीड़ित हो गए। उन्हें न तो सूर्य का प्रकाश दिखा, न दिशाएँ, न देवता। तब बहुत समय बाद उन्होंने एक अत्यधिक प्रकाश वाले आश्रम को देखा, जो दिव्य सा था और स्वयम्प्रभा द्वारा सेवित था।

🙏 स्वयम्प्रभा से भेंट और आतिथ्य (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततस्तु ददृशुः सर्वे दिव्याभरणभूषिताम् ।
स्वयम्प्रभां तपोवृद्धां ज्वलन्तीमिव तेजसा ॥
तां दृष्ट्वा विस्मयाविष्टा वानराः शरणार्थिनः ।
नमश्चक्रुः प्रहृष्टाश्च पप्रच्छुश्च कुतो ह्यसि ॥
स्वयम्प्रभा तु तान् सर्वान् सम्भाष्य मधुरं वचः ।
आतिथ्यं चाकरोत् तेषां फलमूलान्नसम्पदा ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; ददृशुः = देखा; सर्वे = सबने; दिव्याभरणभूषिताम् = दिव्य आभूषणों से सुशोभित; स्वयम्प्रभाम् = स्वयम्प्रभा को; तपोवृद्धाम् = तप में वृद्ध; ज्वलन्तीम् = जलती हुई; इव = समान; तेजसा = तेज से; ताम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; विस्मयाविष्टाः = विस्मय से भरे; वानराः = वानर; शरणार्थिनः = शरण चाहने वाले; नमश्चक्रुः = नमस्कार किया; प्रहृष्टाः = प्रसन्न; च = और; पप्रच्छुः = पूछा; कुतः = कहाँ से; हि = ही; असि = आप हैं; स्वयम्प्रभा = स्वयम्प्रभा; तु = तो; तान् = उन; सर्वान् = सबको; सम्भाष्य = संबोधित कर; मधुरम् = मधुर; वचः = वचन; आतिथ्यम् = अतिथि सत्कार; अकरोत् = किया; तेषाम् = उनका; फलमूलान्नसम्पदा = फल, मूल और अन्न की सम्पदा से।
📖 भावार्थ : तब उन सबने दिव्य आभूषणों से विभूषित, तपस्या में वृद्ध, तेज से जलती हुई स्वयम्प्रभा को देखा। उन्हें देखकर विस्मय में भरे हुए वानर शरण चाहने वाले बनकर प्रसन्नतापूर्वक उन्हें नमस्कार करने लगे और पूछा कि आप कौन हैं और कहाँ से आई हैं? स्वयम्प्रभा ने उन सबको मधुर वचनों से संबोधित किया और फल-मूल तथा अन्न की समृद्धि से उनका आतिथ्य किया।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ते भुक्त्वा पाययित्वा च विश्रान्ताः सुखमासते ।
अथाब्रवीद् वचो वीरान् स्वयम्प्रभा तपोधना ॥
क इमे कस्य पुत्रा वा किमर्थमिह आगताः ।
वदताहं शुभं वाक्यं सत्यं सत्यपराक्रमाः ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा अंगदो वाक्यमब्रवीत् ।
रामस्यानुचराः सर्वे सीतामन्वेष्टुमागताः ॥
📖 भावार्थ : उन वानरों ने भोजन करके, पानी पीकर, विश्राम किया और सुखपूर्वक बैठे। तब तपोधना स्वयम्प्रभा ने वीरों से कहा: "ये कौन हैं? किसके पुत्र हैं? और किस प्रयोजन से यहाँ आए हैं? हे सत्यपराक्रमियों! आप मुझसे सत्य और कल्याणकारी वचन कहिए।" उसके उस वचन को सुनकर अंगद ने कहा: "ये सब राम के अनुचर हैं और सीता की खोज में आए हैं।"

📜 गुफा का इतिहास और राक्षस काली की कथा (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
स्वयम्प्रभा उवाच –
इयं गुहा सुदुर्गा च काली नाम्ना प्रकीर्तिता ।
पुरा कालेन दैत्येन मतङ्गेन निपातिता ॥
तस्येदं भवनं राजन्बभूवाद्भुतदर्शनम् ।
मया च तपसा लब्धं वर्षाणामयुतं शुभम् ॥
ऋषयश्च महाभागास्तपःसिद्धाः समागताः ।
राक्षसा बाधिताः सर्वे मतङ्गस्य प्रसादतः ॥
🔹 पदच्छेद : स्वयम्प्रभा उवाच = स्वयम्प्रभा ने कहा; इयम् = यह; गुहा = गुफा; सुदुर्गा = अत्यन्त दुर्गम; च = और; काली = काली; नाम्ना = नाम से; प्रकीर्तिता = कही गई; पुरा = पहले; कालेन = काली नामक; दैत्येन = दैत्य द्वारा; मतङ्गेन = मतंग ऋषि द्वारा; निपातिता = मारी गई (उसका निवास था); तस्य = उसका; इदम् = यह; भवनम् = घर; राजन् = हे राजन्; बभूव = था; अद्भुतदर्शनम् = अद्भुत दिखने वाला; मया = मेरे द्वारा; च = और; तपसा = तप से; लब्धम् = प्राप्त किया गया; वर्षाणाम् = वर्षों का; अयुतम् = दस हजार; शुभम् = शुभ; ऋषयः = ऋषिगण; च = भी; महाभागाः = महान भाग्यशाली; तपःसिद्धाः = तप से सिद्ध; समागताः = आए; राक्षसाः = राक्षस; बाधिताः = सताए गए; सर्वे = सब; मतङ्गस्य = मतंग के; प्रसादतः = प्रसाद से।
📖 भावार्थ : स्वयम्प्रभा ने कहा: "यह गुफा अत्यन्त दुर्गम है और काली के नाम से विख्यात है। पहले यहाँ काली नामक दैत्य रहता था, जिसे मतंग ऋषि ने मारा था। उसका यह भवन अद्भुत दिखने वाला था। और मैंने तपस्या के द्वारा इसे दस हजार वर्षों में प्राप्त किया है। महाभाग ऋषिगण, जो तप से सिद्ध हैं, यहाँ आए। मतंग के प्रसाद से सब राक्षस नष्ट हो गए।
॥ श्लोक २६-३० ॥
अहं तु तापसी नित्यं वत्स्यामि विगतज्वरा ।
यूयं केन च मार्गेण प्रविष्टा दुर्गमां गुहाम् ॥
न हि द्वारेण बहुना शक्या प्रवेष्टुमञ्जसा ।
कथं वा प्रविविक्षध्वं तन्मे ब्रूत वदत व्रतम् ॥
अंगदः प्रत्युवाचेदं वचनं वचनक्षमः ।
रामस्यान्वेषणे युक्ताः प्रविष्टाः स्म गुहामिमाम् ॥
📖 भावार्थ : "मैं तो नित्य तपस्विनी हूँ और निर्भय होकर यहाँ रहती हूँ। तुम लोग किस मार्ग से इस दुर्गम गुफा में प्रविष्ट हुए? इस गुफा में सीधे द्वार से प्रवेश करना सरल नहीं है। तुम कैसे प्रवेश कर सके? यह मुझे बताओ।" वचन में कुशल अंगद ने उत्तर दिया: "हम राम की खोज में लगे हुए इस गुफा में प्रविष्ट हुए हैं।"

🚪 गुफा से बाहर निकलना (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
स्वयम्प्रभा ततो धीरा योगात्संचोद्य वानरान् ।
मुहूर्तेन गुहाद्वारं निर्ययौ सह तैर्हरिभिः ॥
ते निर्गत्य गुहाद्वारात्प्रहृष्टा वानरर्षभाः ।
स्वयम्प्रभां प्रशंसन्तो जग्मुर्दक्षिणमार्गतः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥
🔹 पदच्छेद : स्वयम्प्रभा = स्वयम्प्रभा; ततः = तब; धीरा = धीर; योगात् = योगशक्ति से; संचोद्य = प्रेरित कर; वानरान् = वानरों को; मुहूर्तेन = क्षण भर में; गुहाद्वारम् = गुफा के द्वार; निर्ययौ = निकल गई; सह = साथ; तैः = उन; हरिभिः = वानरों के; ते = वे; निर्गत्य = निकलकर; गुहाद्वारात् = गुफा के द्वार से; प्रहृष्टाः = अत्यन्त प्रसन्न; वानरर्षभाः = श्रेष्ठ वानर; स्वयम्प्रभाम् = स्वयम्प्रभा की; प्रशंसन्तः = प्रशंसा करते हुए; जग्मुः = गए; दक्षिणमार्गतः = दक्षिण मार्ग से।
📖 भावार्थ : तब धीर स्वयम्प्रभा ने योगशक्ति से वानरों को प्रेरित किया और क्षण भर में उन सब वानरों के साथ गुफा के द्वार से बाहर निकल गई। गुफा के द्वार से निकलकर वे श्रेष्ठ वानर अत्यन्त प्रसन्न हुए और स्वयम्प्रभा की प्रशंसा करते हुए दक्षिण मार्ग से आगे बढ़े।
🔍 व्याख्या : स्वयम्प्रभा की कृपा से वानरों को न केवल विश्राम मिला, बल्कि वे गुफा के रहस्य से भी उजागर हुए। अब वे पुनः सीता की खोज में दक्षिण की ओर प्रस्थान करते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 स्वयम्प्रभा का चरित्र

स्वयम्प्रभा एक तपस्विनी हैं जो वर्षों से इस गुफा में तप कर रही हैं। उनका आतिथ्य और वात्सल्य वानरों को नई ऊर्जा प्रदान करता है। वह एक दिव्य स्त्री हैं, जो योगशक्ति से सम्पन्न हैं।

🗿 राक्षस काली का दमन

गुफा का इतिहास हमें बताता है कि यह स्थान पहले राक्षसों से पीड़ित था, किन्तु ऋषि मतंग के प्रताप से वहाँ शांति स्थापित हुई। यह धर्म की विजय का सूचक है।

🌌 रहस्यमयी गुफा का प्रतीकात्मक अर्थ

गुफा अन्धकार एवं अज्ञान का प्रतीक हो सकती है, जहाँ से स्वयम्प्रभा (आत्म-प्रकाश) वानरों (इन्द्रियों) को बाहर निकालती है और उन्हें सही मार्ग दिखाती है।

🗺️ खोज में मील का पत्थर

इस सर्ग में वानरों को गुफा से बाहर निकलने का मार्ग मिलता है, जिससे वे आगे की यात्रा जारी रख सकते हैं। यह उनकी खोज यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और तपस्या का सहारा लेकर हम मार्ग पा सकते हैं। स्वयम्प्रभा जैसे सज्जनों का सान्निध्य हमारा मार्गदर्शन करता है। साथ ही, यह भी दर्शाता है कि राक्षसी प्रवृत्तियों का अन्त धर्म के द्वारा ही होता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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