ऋक्ष गुफा में वानरों की खोज

किष्किन्धाकाण्ड के पचासवें सर्ग में वानर सेना दक्षिण दिशा में सीता की खोज करते हुए ऋक्ष गुफा में प्रवेश करती है। वहाँ उनकी भेंट तपस्विनी स्वयंप्रभा से होती है, जो उनका आतिथ्य सत्कार करती हैं।

विवरण

सुग्रीव के आदेशानुसार सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में अनेक पर्वतों, वनों और नदियों का भ्रमण करते हैं। अन्त में वे एक विशाल एवं भयानक गुफा के समीप पहुँचते हैं, जो ऋक्ष गुफा के नाम से विख्यात है। गुफा के मुख पर घने वृक्ष और लताएँ उगी हुई हैं, और उसका द्वार अत्यन्त गहरा एवं अंधकारमय प्रतीत होता है। वानर सेना के प्रमुख अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि गुफा में प्रवेश करने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि उन्हें आशा होती है कि सम्भवतः सीता यहाँ छिपी हों या कोई सुराग मिले। गुफा के भीतर प्रवेश करते ही घोर अंधकार छा जाता है; वे एक-दूसरे को नहीं देख पाते और भ्रमित हो जाते हैं। फिर भी वे साहस न छोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक अद्भुत दृश्य दिखाई देता है – वहाँ एक दिव्य तपस्विनी स्त्री तपस्या में लीन है, जिसके तेज से सम्पूर्ण गुफा प्रकाशित हो रही है। वानर उसके समीप जाकर विनम्रतापूर्वक उसका परिचय पूछते हैं। यह सर्ग गुफा में प्रवेश और उस तपस्विनी से प्रथम भेंट का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५०

(ऋक्ष गुफा में प्रवेश – स्वयंप्रभा से भेंट)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव की आज्ञा से चारों दिशाओं में वानर दल सीता की खोज में निकल चुके हैं। अंगद के नेतृत्व में दक्षिण दल विन्ध्याचल, सह्याद्रि आदि पर्वतों को पार करता हुआ अन्ततः एक रहस्यमयी गुफा के समीप पहुँचता है। यह गुफा ऋक्ष नाम से प्रसिद्ध है। इस सर्ग में वानरों द्वारा उस गुफा में प्रवेश और वहाँ तपस्या कर रही दिव्य नारी स्वयंप्रभा से उनकी प्रथम भेंट का वर्णन है।

🕳️ ऋक्ष गुफा का स्वरूप और वानरों का प्रवेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे दक्षिणां दिशमाश्रिताः ।
विचिन्वन्तो वनं घोरं प्राप्ता ऋक्षगुहां तदा ॥
दृष्ट्वा तु तां गुहां घोरां महतीं भीमदर्शनाम् ।
लतागुल्मसमाकीर्णां दुःप्रवेशां तमोवृताम् ॥
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रविविक्षुर्महाबलाः ।
अंगदप्रमुखाः सर्वे हनूमज्जाम्बवानपि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; वानराः = वानर; सर्वे = सब; दक्षिणाम् = दक्षिण; दिशम् = दिशा को; आश्रिताः = आश्रय लिए हुए; विचिन्वन्तः = खोज करते हुए; वनम् = वन; घोरम् = घोर; प्राप्ताः = पहुँचे; ऋक्षगुहाम् = ऋक्ष गुफा को; तदा = तब; दृष्ट्वा = देखकर; तु = तो; ताम् = उस; गुहाम् = गुफा को; घोराम् = भयानक; महतीम् = बड़ी; भीमदर्शनाम् = भयंकर दिखने वाली; लतागुल्मसमाकीर्णाम् = लताओं और झाड़ियों से घिरी; दुःप्रवेशाम् = कठिनता से प्रवेश करने योग्य; तमोवृताम् = अंधकार से घिरी; सीतायाः = सीता के; परिमार्गार्थम् = खोज के लिए; प्रविविक्षुः = प्रवेश करना चाहते थे; महाबलाः = महाबली; अंगदप्रमुखाः = अंगद के नेतृत्व वाले; सर्वे = सब; हनूमत् = हनुमान; जाम्बवान् = जाम्बवान; अपि = भी।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् वे सब वानर दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर घोर वन में भ्रमण करते हुए ऋक्ष गुफा में जा पहुँचे। उस गुफा को देखा – वह बहुत बड़ी, भयंकर दिखने वाली, लताओं-झाड़ियों से घिरी, कठिनाई से प्रवेश करने योग्य और अंधकार से भरी हुई थी। फिर भी सीता की खोज के लिए अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि सब महाबली वानर उसमें प्रवेश करना चाहते थे।
🔍 व्याख्या : गुफा के भयानक स्वरूप के बावजूद वानरों का साहस और कर्तव्यनिष्ठा दर्शनीय है। वे सीता की खोज के लिए किसी भी कठिनाई को पार करने को तत्पर हैं।
॥ श्लोक ४-८ ॥
प्रविष्टमात्रास्तु तदा तमसा समभिप्लुताः ।
न प्राज्ञायन्त ते मार्गं भ्रान्ता वानरपुंगवाः ॥
केषांचिद्वदनं दृष्ट्वा केचिदन्योन्यमीक्षिरे ।
हस्तैर्हस्तान्प्रगृह्णन्तो गच्छन्ति स्मान्ध्यसंप्लवे ॥
ततस्ते ददृशुः कांचित्स्त्रियं तपसि संस्थिताम् ।
दिव्यरूपधरां साध्वीं तेजसा प्रज्वलन्तीम् ॥
सा तु तान्वानरान्दृष्ट्वा विस्मिता समपद्यत ।
कुत आगम्यते ब्रूत का वश्चिन्ता वदस्व मे ॥
📖 भावार्थ : जैसे ही वे अन्दर प्रविष्ट हुए, अंधकार ने उन्हें आच्छादित कर लिया। वे वानरश्रेष्ठ भ्रमित होकर मार्ग नहीं पहचान पा रहे थे। कोई किसी के मुख को देखता, कोई एक-दूसरे को देखते। अंधकार के कारण हाथों से हाथ पकड़कर वे आगे बढ़ रहे थे। तब उन्होंने एक स्त्री को देखा, जो तपस्या में स्थित थी, दिव्य रूप धारण किए हुए, साध्वी, तेज से प्रज्वलित हो रही थी। उसने उन वानरों को देखकर आश्चर्यचकित होकर पूछा: "आप कहाँ से आए हैं? आपकी चिन्ता क्या है? मुझसे कहो।"
🔍 व्याख्या : गुफा के अंधकार में भटकते वानरों को दिव्य तेजस्विनी स्त्री के दर्शन होते हैं। यह स्त्री स्वयंप्रभा हैं, जो इस गुफा की स्वामिनी हैं और अपने तपोबल से सबको आश्चर्यचकित करती हैं।

🙏 स्वयंप्रभा से भेंट और प्रार्थना (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
तां दृष्ट्वा हर्षसंयुक्ता वानराः प्राञ्जलिं गताः ।
ऊचुः परमसंहृष्टाः का त्वं ब्रूहि तपोधने ॥
वयं तु वानराः सर्वे सुग्रीवस्य सखीयुताः ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रविष्टा गह्वरं महत् ॥
सा चास्माकं गतिर्देवि त्वमेव शरणं परम् ।
कुरु प्रसादं कल्याणि निर्देशं देहि साम्प्रतम् ॥
एवमुक्ता तु सा देवी वानरैर्हर्षितैस्तदा ।
प्रत्युवाच शुभं वाक्यं स्वागतं वो वरानने ॥
अहं स्वयंप्रभा नाम मेरुपृष्ठनिवासिनी ।
तपसा दग्धपाप्मा च गुहायामत्र संस्थिता ॥
भवद्भिरतिथिः पूज्या प्राप्ता भोज्यं ददामि वः ।
विश्रम्यतामिहैवाद्य श्वो यास्यत यथासुखम् ॥
📖 भावार्थ : उन्हें देखकर हर्षित वानर हाथ जोड़कर अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले: "हे तपोधने! आप कौन हैं? हम सब वानर हैं, सुग्रीव के सखा (राम) के अनुयायी हैं। सीता की खोज के लिए इस महान् गुफा में प्रविष्ट हुए हैं। हे देवि! आप ही हमारी गति और परम शरण हैं। हम पर कृपा करें और उचित मार्ग बताएँ।" उन हर्षित वानरों के इस प्रकार कहने पर वह देवी शुभ वाक्य बोलीं: "हे वरानने! आपका स्वागत है। मेरा नाम स्वयंप्रभा है, मैं मेरुपृष्ठ पर निवास करती हूँ, तपस्या से पापों को नष्ट करके इस गुफा में स्थित हूँ। आप पूज्य अतिथि हैं, मैं आपको भोजन दूँगी। आज यहीं विश्राम करें, कल सुखपूर्वक जाना।"
🔍 व्याख्या : स्वयंप्रभा न केवल तपस्विनी हैं, वरन् अतिथि-सत्कार में भी निपुण हैं। वे वानरों को भोजन कराकर उनका आदर करती हैं, जो भारतीय संस्कृति की अतिथि-देवो भवः की भावना को दर्शाता है।
॥ श्लोक १५-१८ ॥
ततः सा मुनिशार्दूली भोज्यं दिव्यं निवेद्य च ।
पानीयममृतप्रख्यं ददौ तेभ्यो यथाविधि ॥
ते भुक्त्वा पाययित्वा च विश्रम्य च यथासुखम् ।
तां देवीं पुनरूचुः प्राञ्जलयः कृताञ्जलिम् ॥
श्वः प्रभाते व्रजिष्यामः कार्यशेषं हि नः कृतम् ।
त्वत्प्रसादाद्गुहादस्मान्निर्गमिष्यामहे वयम् ॥
इत्युक्त्वा ते निशामेव तस्थुः सुप्तसमाहिताः ।
प्रभाते सा गुहाद्वारं दर्शयामास रश्मिभिः ॥
📖 भावार्थ : तब उस मुनिश्रेष्ठा ने दिव्य भोजन कराया और अमृत के समान पानी भी यथाविधि दिया। उन्होंने भोजन किया, पानी पिया और सुखपूर्वक विश्राम किया। फिर वे हाथ जोड़कर उस देवी से बोले: "कल प्रभात में हम जाएँगे, क्योंकि हमारा शेष कार्य शेष है। आपकी कृपा से हम इस गुफा से बाहर निकल जाएँगे।" ऐसा कहकर वे रातभर सुखपूर्वक सोते रहे। प्रभात होने पर उसने अपनी किरणों से (अपने तेज से) गुफा का द्वार दिखा दिया।
🔍 व्याख्या : स्वयंप्रभा ने वानरों को न केवल भोजन दिया, वरन् उन्हें गुफा से बाहर निकलने का मार्ग भी प्रदान किया। यह दैवीय सहायता का प्रतीक है।

🚪 गुफा से निर्गमन का संकल्प

॥ श्लोक १९-२६ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे निर्गत्य तु गुहामुखात् ।
स्वयंप्रभां प्रशंसन्तो जग्मुर्वै दक्षिणामुखाः ॥
तया दत्तां गतिं लब्ध्वा प्रहृष्टा वानरर्षभाः ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रयाताः शीघ्रविक्रमाः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब वे सब वानर गुफा के मुख से बाहर निकलकर स्वयंप्रभा की प्रशंसा करते हुए दक्षिण दिशा की ओर बढ़े। उसके द्वारा दी गई दिव्य गति को पाकर वे वानरश्रेष्ठ अत्यन्त प्रसन्न हुए और सीता की खोज के लिए शीघ्रगामी होकर चल पड़े।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार स्वयंप्रभा की कृपा से वानरों को नई दिशा मिली। वे पुनः खोज में जुट जाते हैं। यह सर्ग उनकी दृढ़ता और दैवीय सहायता के संगम को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 तपस्या और आतिथ्य

स्वयंप्रभा का चरित्र तपस्विनी और गृहस्थिणी दोनों रूपों में आदर्श है। उन्होंने वानरों का सत्कार कर भारतीय संस्कृति के अतिथि-धर्म का पालन किया। साथ ही, उनके तपोबल से ही वे गुफा में प्रकाश फैलाने में सक्षम हैं।

🌑 अंधकार से प्रकाश की ओर

गुफा का अंधकार संशय, भ्रम और निराशा का प्रतीक है। वानर इस अंधकार में भटकते हैं, किन्तु तपस्विनी के दर्शन से उन्हें नई आशा और मार्ग मिलता है। यह जीवन में दैवीय सहायता के महत्त्व को रेखांकित करता है।

🔱 सुग्रीव-राम की मैत्री का प्रभाव

वानर राम के कार्य के लिए निकले हैं, और इस दिव्य सहायता से स्पष्ट होता है कि धर्म के पक्ष में खड़े होने पर ईश्वरीय सहायता स्वतः प्राप्त होती है। स्वयंप्रभा उनकी सहायता करती हैं, जो राम की महिमा का ही परिणाम है।

📜 स्वयंप्रभा का आख्यान

स्वयंप्रभा का परिचय आगे के सर्गों में और विस्तार से मिलेगा। वह मेरु पर्वत पर निवास करने वाली एक सिद्ध योगिनी हैं, जो अपने तपोबल से इस गुफा में रहती हैं। उनके माध्यम से वानरों को न केवल भोजन, वरन् आगे की यात्रा का सन्मार्ग भी मिलता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए। सज्जनों की सहायता के लिए दैवीय शक्तियाँ स्वयं आगे आती हैं। साथ ही, अतिथि-सत्कार का महत्त्व और तपस्या का बल हमें स्वयंप्रभा के चरित्र से मिलता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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