मित्रता की शपथ (राम-सुग्रीव मैत्री)

किष्किन्धाकाण्ड के पांचवें सर्ग में राम और सुग्रीव के बीच मित्रता की स्थापना का वर्णन है। हनुमान राम के पास दूत बनकर आते हैं और सुग्रीव से मित्रता का प्रस्ताव रखते हैं। राम सुग्रीव से मिलकर अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता करते हैं और उसे बाली के भय से मुक्त कराने का वचन देते हैं।

विवरण

राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचते हैं, जहाँ सुग्रीव बाली के भय से छिपा रहता है। सुग्रीव राम को देखकर भयभीत होता है और हनुमान को जाँच के लिए भेजता है। हनुमान राम के पास जाकर उनकी वास्तविकता जान लेते हैं और सुग्रीव से मित्रता का प्रस्ताव रखते हैं। राम सुग्रीव से मिलने को सहमत होते हैं। दोनों का मिलन होता है और वे अग्नि के समक्ष मित्रता की शपथ लेते हैं। राम सुग्रीव को बाली को मारने का वचन देते हैं, और सुग्रीव राम को सीता की खोज में सहायता का वचन देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ५

(राम-सुग्रीव मैत्री – मित्रता की शपथ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पर आ पहुँचे हैं। यहाँ सुग्रीव अपने भाई बाली के भय से छिपा रहता है। वह राम-लक्ष्मण को देखकर भयभीत होता है और हनुमान को उनके विषय में जानने भेजता है। यह सर्ग हनुमान के माध्यम से हुए राम-सुग्रीव मिलन और अग्नि साक्षी मैत्री का वर्णन करता है।

🙈 सुग्रीव का भय और हनुमान का प्रेषण (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
सुग्रीवस्तु महातेजा रामं दृष्ट्वा सहानुजम् ।
चकार भयसंत्रस्तो न चचाल निरीक्ष्य तम् ॥
स हनूमन्तमाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ।
गच्छ जानीहि कौ तौ द्वौ सत्त्ववन्तौ वनौकसौ ॥
माया किमेषा रक्षसां प्रच्छन्ना वा भविष्यति ।
बालिना प्रहितौ वापि तन्मे ब्रूहि हनूमते ॥
🔹 पदच्छेद : सुग्रीवः = सुग्रीव; तु = तो; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामम् = राम को; दृष्ट्वा = देखकर; सहानुजम् = अनुज सहित; चकार = किया; भयसंत्रस्तः = भय से त्रस्त; न चचाल = नहीं हिला; निरीक्ष्य = देखकर; तम् = उनको; सः = उसने; हनूमन्तम् = हनुमान को; आहूय = बुलाकर; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच = कहा; ह = निश्चय ही; गच्छ = जाओ; जानीहि = जानो; कौ = कौन हैं; तौ = वे; द्वौ = दोनों; सत्त्ववन्तौ = बलवान; वनौकसौ = वनवासी; माया = माया; किम् = क्या; एषा = यह; रक्षसाम् = राक्षसों की; प्रच्छन्ना = छिपी हुई; वा = या; भविष्यति = होगी; बालिना = बाली द्वारा; प्रहितौ = भेजे गए; वापि = अथवा; तत् = वह; मे = मुझे; ब्रूहि = बताओ; हनूमन् = हे हनुमान।
📖 भावार्थ : महातेजस्वी सुग्रीव राम और लक्ष्मण को देखकर भयभीत हो गए और वे वहाँ से नहीं हिले। उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा: "हे हनुमान, जाओ और जानो कि वे दोनों बलवान वनवासी कौन हैं। क्या यह राक्षसों की माया है, या वे छिपे हुए हैं, या बाली ने उन्हें भेजा है? हे हनुमान, मुझे यह बताओ।"
🔍 व्याख्या : सुग्रीव बाली के अत्याचार से इतना भयभीत है कि किसी भी अज्ञात व्यक्ति को देखकर शंका करता है। हनुमान की बुद्धि और सामर्थ्य के कारण वह उन्हें जाँच के लिए भेजता है।

🐒 हनुमान का राम से मिलन और संवाद (श्लोक ९-१६)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
हनूमांस्तु ततो गत्वा रामं सत्यपराक्रमम् ।
उवाच वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य महात्मनः ॥
राजर्षिर्वालिनो भ्राता सुग्रीवो नाम वानरः ।
बालिना निर्कृतो भ्रात्रा त्वत्सकाशमिहागतः ॥
स त्वां सख्येन संबद्धुमिच्छते रघुनन्दन ।
तन्मन्त्रयस्व धर्मज्ञ सुग्रीवेण समं विभो ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो रामो हनूमद्वाक्यकोविदम् ।
प्रत्युवाच महातेजा लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ॥
🔹 पदच्छेद : हनूमान् = हनुमान; तु = तो; ततः = वहाँ से; गत्वा = जाकर; रामम् = राम को; सत्यपराक्रमम् = सत्य पराक्रमी को; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; सुग्रीवस्य = सुग्रीव का; महात्मनः = महात्मा का; राजर्षिः = राजर्षि; वालिनः = बाली का; भ्राता = भाई; सुग्रीवः = सुग्रीव; नाम = नाम; वानरः = वानर; बालिना = बाली द्वारा; निर्कृतः = अपमानित; भ्रात्रा = भाई द्वारा; त्वत्सकाशम् = आपके पास; इह = यहाँ; आगतः = आया है; सः = वह; त्वाम् = आपसे; सख्येन = मित्रता से; संबद्धुम् = जुड़ना; इच्छते = चाहता है; रघुनन्दन = रघुनन्दन; तत् = इसलिए; मन्त्रयस्व = विचार करें; धर्मज्ञ = हे धर्मज्ञ; सुग्रीवेण = सुग्रीव के; समम् = साथ; विभो = हे प्रभो; एतत् = यह; श्रुत्वा = सुनकर; वचः = वचन; रामः = राम; हनूमत् = हनुमान के; वाक्यकोविदम् = वाक्य को जानने वाले; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महातेजाः = महातेजस्वी; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; च = और; इदम् = यह; अब्रवीत् = कहा।
📖 भावार्थ : हनुमान वहाँ से जाकर सत्यपराक्रमी राम के पास पहुँचे और सुग्रीव का संदेश सुनाया: "राजर्षि बाली के भाई सुग्रीव नामक वानर हैं, जो अपने भाई बाली द्वारा अपमानित होकर आपके पास आए हैं। हे रघुनन्दन, वह आपसे मित्रता करना चाहते हैं। हे धर्मज्ञ प्रभु, आप सुग्रीव के साथ इस विषय पर विचार करें।" यह सुनकर महातेजस्वी राम ने हनुमान को उत्तर दिया और लक्ष्मण से यह बात कही।
🔍 व्याख्या : हनुमान बड़ी कुशलता से राम के समक्ष सुग्रीव का परिचय और उनकी इच्छा प्रकट करते हैं। वे राम की सत्यवादिता और धर्मज्ञता की ओर संकेत करते हैं।

🤝 राम-सुग्रीव मिलन और अग्नि-साक्षी मैत्री (श्लोक १७-२४)

॥ श्लोक १७-२० ॥
ततः सुग्रीवसहितो रामः सत्यपराक्रमः ।
जगाम हनुमद्दृष्ट्या यत्र सुग्रीव आस्थितः ॥
सुग्रीवोऽपि महातेजा राममायान्तमैक्षत ।
प्रहर्षमतुलं लेभे सीतादर्शनलालसः ॥
तौ समेत्य तु धर्मज्ञौ परस्परजयैषिणौ ।
अन्योन्यमभिसंपूज्य चक्रतुः सख्यमुत्तमम् ॥
ततस्तु मैत्री संजज्ञे रामसुग्रीवयोः सह ।
अग्निं साक्षीकृत्य परं पावकं धर्मसंहितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुग्रीवसहितः = सुग्रीव के साथ; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; जगाम = गए; हनुमद्दृष्ट्या = हनुमान के दिखाए मार्ग से; यत्र = जहाँ; सुग्रीवः = सुग्रीव; आस्थितः = स्थित थे; सुग्रीवः = सुग्रीव; अपि = भी; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामम् = राम को; आयान्तम् = आते हुए; ऐक्षत = देखा; प्रहर्षम् = हर्ष; अतुलम् = अद्वितीय; लेभे = प्राप्त किया; सीतादर्शनलालसः = सीता के दर्शन की लालसा वाले; तौ = वे दोनों; समेत्य = मिलकर; तु = तो; धर्मज्ञौ = धर्मज्ञ; परस्परजयैषिणौ = परस्पर विजय की इच्छा रखने वाले; अन्योन्यम् = एक दूसरे का; अभिसंपूज्य = अच्छी तरह पूजन करके; चक्रतुः = किया; सख्यम् = मित्रता; उत्तमम् = उत्तम; ततः = फिर; तु = तो; मैत्री = मित्रता; संजज्ञे = उत्पन्न हुई; रामसुग्रीवयोः = राम और सुग्रीव के बीच; सह = साथ; अग्निम् = अग्नि को; साक्षीकृत्य = साक्षी करके; परम् = परम; पावकम् = पवित्र अग्नि को; धर्मसंहितम् = धर्मयुक्त।
📖 भावार्थ : फिर सत्यपराक्रमी राम सुग्रीव के साथ हनुमान के दिखाए मार्ग से उस स्थान पर गए जहाँ सुग्रीव थे। महातेजस्वी सुग्रीव ने राम को आते देखा और उन्हें अद्वितीय हर्ष हुआ। वे सीता के दर्शन की लालसा रखते थे। वे दोनों धर्मज्ञ, परस्पर विजय की इच्छा रखने वाले, मिलकर एक दूसरे का सत्कार करके उत्तम मित्रता की। फिर राम और सुग्रीव के बीच परम पवित्र धर्मयुक्त अग्नि को साक्षी करके मित्रता हुई।
🔍 व्याख्या : अग्नि साक्षी करके मित्रता करना वैदिक परंपरा में सबसे पवित्र बंधन माना जाता है। यह मित्रता अटूट और धर्म-संहित थी।

⚔️ प्रतिज्ञा और आगे की योजना (श्लोक २५-३०)

॥ श्लोक २५-२७ ॥
रामस्तु प्रतिजज्ञे वै सुग्रीवस्य महात्मनः ।
हनिष्यामि बलिं वीर सत्येनायुधमालभ ॥
सुग्रीवोऽपि तथा रामं प्रतिजज्ञे महाबलः ।
सीतायाः शोधनं कर्तुं ससैन्यो यत्नमात्मवान् ॥
एवं तौ सख्यमासाद्य परस्परहितैषिणौ ।
विचेरतु तदा वीरौ यथेष्टं धर्मसंहितौ ॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; तु = ने; प्रतिजज्ञे = प्रतिज्ञा की; वै = निश्चय ही; सुग्रीवस्य = सुग्रीव के लिए; महात्मनः = महान आत्मा वाले; हनिष्यामि = मारूँगा; बलिम् = बाली को; वीर = हे वीर; सत्येन = सत्य से; आयुधम् = अस्त्र को; आलभ = स्पर्श करो; सुग्रीवः = सुग्रीव; अपि = भी; तथा = वैसे ही; रामम् = राम के लिए; प्रतिजज्ञे = प्रतिज्ञा की; महाबलः = महान बल वाले; सीतायाः = सीता का; शोधनम् = पता लगाना; कर्तुम् = करने के लिए; ससैन्यः = सेना सहित; यत्नम् = प्रयत्न; आत्मवान् = बुद्धिमान; एवम् = इस प्रकार; तौ = वे दोनों; सख्यम् = मित्रता को; आसाद्य = प्राप्त करके; परस्परहितैषिणौ = परस्पर हित चाहने वाले; विचेरतुः = विचरण करने लगे; तदा = तब; वीरौ = दोनों वीर; यथेष्टम् = इच्छानुसार; धर्मसंहितौ = धर्मयुक्त।
📖 भावार्थ : राम ने महात्मा सुग्रीव के लिए प्रतिज्ञा की: "हे वीर, मैं बाली को मारूँगा, तुम सत्य के लिए मेरे अस्त्र का स्पर्श करो।" महाबली सुग्रीव ने भी राम के लिए प्रतिज्ञा की: "मैं बुद्धिमान हूँ, अपनी सेना सहित सीता का पता लगाने का पूरा प्रयत्न करूँगा।" इस प्रकार वे दोनों वीर परस्पर हितैषी बनकर, मित्रता प्राप्त कर, धर्मयुक्त होकर इच्छानुसार विचरण करने लगे।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग में हुई मित्रता और प्रतिज्ञाएँ ही आगे सम्पूर्ण रामायण की कथा को गति देती हैं। राम बाली का वध कर सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य दिलाते हैं, और सुग्रीव की सेना सीता की खोज में सहायता करती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🤲 मित्रता का आदर्श

यह सर्ग सच्ची मित्रता का आदर्श प्रस्तुत करता है। राम और सुग्रीव बिना किसी स्वार्थ के, केवल परस्पर सहायता के लिए मित्रता करते हैं। अग्नि साक्षी मैत्री भारतीय संस्कृति का अमूल्य अंग है।

🧠 हनुमान की दूतकला

हनुमान ने अत्यंत चतुराई से दोनों पक्षों का विश्वास जीता और मित्रता का सफल माध्यम बने। उनकी वाक्पटुता और बुद्धिमत्ता इस सर्ग में स्पष्ट दिखती है।

🔱 धर्म और प्रतिज्ञा

राम ने अस्त्र स्पर्श कर प्रतिज्ञा की कि वे सुग्रीव के शत्रु बाली का वध करेंगे। यह उनके धर्मपरायणता और वचनबद्धता को दर्शाता है।

🌅 आगे की कथा की भूमिका

इस मैत्री ने राम को वानर सेना प्रदान की, जो आगे सीता की खोज और लंका युद्ध में सहायक बनी। यह सर्ग सम्पूर्ण किष्किन्धाकाण्ड की धुरी है।

🎯 शिक्षा : सच्चा मित्र विपत्ति में काम आता है। राम और सुग्रीव ने एक-दूसरे की सहायता कर अपने लक्ष्य प्राप्त किए। हमें भी बिना भेदभाव के मित्रता करनी चाहिए और वचन का पालन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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