अंगद द्वारा सभी वानरों का उत्साहवर्धन

सीता की खोज में निकले वानर दक्षिण दिशा में समुद्र तट पर पहुँचते हैं, किन्तु असफलता और समय समाप्त होने के कारण निराश हो जाते हैं। अंगद उन्हें सुग्रीव के कोप से बचने और कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करते हुए उत्साहवर्धन करते हैं।

विवरण

किष्किन्धाकाण्ड के इस सर्ग में वानर सेना के दक्षिणी दल का वर्णन है, जिसका नेतृत्व अंगद कर रहे हैं। हनुमान, जाम्बवान, नल, नील आदि प्रमुख वानर इस दल में शामिल हैं। वे सम्पूर्ण दक्षिण दिशा में सीता का अनुसंधान करते हुए अन्ततः समुद्र तट पर पहुँचते हैं। किन्तु सीता का कहीं पता न चलने पर और सुग्रीव द्वारा निर्धारित एक मास की समय सीमा समाप्त हो जाने पर सभी वानर अत्यन्त निराश और भयभीत हो जाते हैं। उन्हें सुग्रीव के क्रोध का भय सताने लगता है, क्योंकि असफल होने पर वे सभी मार दिए जाएँगे। ऐसी विकट स्थिति में राजकुमार अंगद सभी वानरों को सम्बोधित करते हैं। वे कहते हैं कि यदि हम बिना सीता का पता लगाए लौटे तो सुग्रीव हमें अवश्य दण्डित करेंगे। अतः बेहतर है कि हम यहीं प्राण त्याग दें, या समुद्र पार कर लंका जाकर रावण से युद्ध करें। अंगद के इस उत्साहवर्धक वचनों से सभी वानरों में नई ऊर्जा का संचार होता है और वे पुनः सीता की खोज में जुटने का संकल्प लेते हैं। यह सर्ग आगामी सर्ग में हनुमान की लंका यात्रा की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ४९

(अंगद द्वारा सभी वानरों का उत्साहवर्धन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथैकोनपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव के आदेशानुसार वानर सेना के दक्षिणी दल ने सम्पूर्ण दक्षिण दिशा में सीता का अन्वेषण किया, किन्तु कहीं उनका पता न चला। अन्त में वे समुद्र के उत्तरी तट पर जा पहुँचे, जहाँ आगे जलराशि देख उनके पैर रुक गए। ऊपर से सुग्रीव द्वारा निर्धारित एक मास की समय सीमा भी समाप्त हो चुकी थी। असफलता और सुग्रीव के कोप के भय से सभी वानर निराश होकर बैठ गए। तब वानरराजकुमार अंगद ने उन्हें सम्बोधित करते हुए उनका उत्साहवर्धन किया।

😔 वानरों की निराशा और सुग्रीव का भय (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः समुद्रतीरं ते ददृशुर्वानरर्षभाः ।
निराशाः सीतया राज्ञः सुग्रीवस्य च शासनात् ॥
अपश्यन्तो वैदेहीं ते दुःखशोकसमन्विताः ।
निपेतुर्धरणीं सर्वे मृतकल्पा विचेतसः ॥
तेषां बाष्पकलाः सर्वा वाचः शोकसमन्विताः ।
शुश्रुवुः सहसा राज्ञः सुग्रीवस्य भयातुराः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; समुद्रतीरम् = समुद्र के तट को; ते = वे; ददृशुः = देखा; वानरर्षभाः = श्रेष्ठ वानर; निराशाः = आशा रहित; सीतया = सीता के विषय में; राज्ञः = राजा के; सुग्रीवस्य = सुग्रीव के; च = और; शासनात् = आदेश से; अपश्यन्तः = न देखते हुए; वैदेहीम् = सीता को; ते = वे; दुःखशोकसमन्विताः = दुःख और शोक से युक्त; निपेतुः = गिर पड़े; धरणीम् = भूमि पर; सर्वे = सब; मृतकल्पाः = मृत के समान; विचेतसः = होश खोए हुए; तेषाम् = उनकी; बाष्पकलाः = आँसुओं से भरी; सर्वाः = सब; वाचः = वाणी; शोकसमन्विताः = शोक से युक्त; शुश्रुवुः = सुनी गईं; सहसा = सहसा; राज्ञः = राजा के; सुग्रीवस्य = सुग्रीव के; भयातुराः = भय से पीड़ित।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ वानर समुद्र के तट पर पहुँचे। सीता को न पाकर और राजा सुग्रीव की आज्ञा का स्मरण कर वे निराश हो गए। वैदेही को न देख पाने के कारण वे दुःख और शोक से व्याकुल होकर मूर्छित-से भूमि पर गिर पड़े। उन सबकी आँखों से अश्रु बह रहे थे और वे सुग्रीव के भय से व्याकुल होकर शोकपूर्ण वचन बोलने लगे।
🔍 व्याख्या : सीता का पता न लगने से वानरों को दोहरा कष्ट हुआ— एक तो स्वयं कर्तव्य में असफलता का दुःख, दूसरा सुग्रीव के क्रोध का भय। वे अपने को मृतप्राय समझने लगे।
॥ श्लोक ४-८ ॥
केचिदूचुः प्रवेक्ष्यामो जलमग्निं प्रवेक्ष्यतः ।
सुग्रीवस्य भयाद्वीरा न हि नो जीवितं प्रियम् ॥
एवं ब्रुवाणान् वानरान् दुःखार्तान् भयपीडितान् ।
अंगदः पितृवंशज्ञः सान्त्वयामास वानरान् ॥
📖 भावार्थ : कुछ वानर बोले— हम जल में प्रवेश करेंगे, कुछ ने कहा— अग्नि में प्रवेश करेंगे। सुग्रीव के भय से हे वीरो! हमें अपना जीवन प्रिय नहीं है। इस प्रकार दुःखार्त और भयपीड़ित वानरों को बोलते देख, पितृवंश के ज्ञाता अंगद ने उन वानरों को सान्त्वना दी।

🦁 अंगद का वीरोचित भाषण (श्लोक ९-२२)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
अंगदः प्राह धर्मात्मा वानरान् शोककर्शितान् ।
किमिदं क्रियते वीरा न युक्तं वः कथंचन ॥
निराशाः सीतया केचिन्न भेतव्यं भयादपि ।
उत्तिष्ठत परित्यज्य शोकं मोहं च वानराः ॥
यदि वर्षशतं स्वप्याद्वानरो मधुभोजनः ।
न तृप्तिमधिगच्छेत वारिधेरिव वाडवः ॥
अहं वा सुग्रीवमुपस्थितो वा शरणं वा गमिष्यामि समुद्रमध्यम् ।
न वः करिष्याम्यहमप्रियं हि प्राणान् परित्यज्य गमिष्यामि वापि ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा अंगद ने शोक से कृश हुए वानरों से कहा— हे वीरो! यह तुम क्या कर रहे हो? यह तुम्हारे लिए किसी भी प्रकार उचित नहीं है। सीता के विषय में निराश होना ठीक नहीं, भय से भी नहीं डरना चाहिए। उठो! शोक और मोह को त्याग दो। यदि कोई वानर सौ वर्षों तक मधु खाकर सोता रहे, तो भी उसे तृप्ति नहीं होती, जैसे समुद्र में आग (वाडवाग्नि) तृप्त नहीं होती। मैं या तो सुग्रीव के सामने जाऊँगा, या समुद्र के मध्य में शरण लूँगा। मैं तुम्हें कोई अप्रिय नहीं करूँगा, या तो प्राण त्याग दूँगा या चला जाऊँगा।
🔍 व्याख्या : अंगद ने वानरों को उनके स्वभाव (मधुप्रियता) का स्मरण दिलाते हुए कहा कि हम वीर हैं, हमें भयभीत नहीं होना चाहिए। वे स्वयं सुग्रीव का दण्ड सहने को तैयार हो गए, ताकि अन्य वानरों का मनोबल बढ़े।
॥ श्लोक १३-२२ ॥
अहं हि राजा सुग्रीवं प्रसादयितुमर्हसि ।
युष्माकं च हितं वाक्यं वक्ष्यामि शृणुतानघाः ॥
इत्युक्त्वा वानरश्रेष्ठः प्लक्षमूलनिवासिनः ।
उवाच मधुरं वाक्यं सर्वानेव समागतान् ॥
नूनं सीतां न पश्यामः कृत्स्नां पृथ्वीं भ्रमन्ति हि ।
अवश्यं लङ्कया भाव्यं सीता तत्र न संशयः ॥
तस्माद्यत्नः कर्तव्यो वो लङ्कायां वानरर्षभाः ।
उपायैर्विविधैस्तीक्ष्णैः सीतामानयत द्रुतम् ॥
एवमुक्त्वा महातेजा अंगदः प्लवगर्षभः ।
तूष्णीमासीद्धि भूतानां हर्षयन् सर्ववानरान् ॥
📖 भावार्थ : "मैं राजा सुग्रीव को मना सकता हूँ, और तुम्हारे हित की बात कहूँगा, सुनो।" ऐसा कहकर वे प्लक्षमूल में निवास करने वाले वानरश्रेष्ठ अंगद ने सबको सम्बोधित करते हुए मधुर वाणी में कहा— निश्चय ही हम सीता को नहीं देख पाए, सारी पृथ्वी घूम गए। अब केवल लंका शेष है, सीता वहीं हैं, इसमें संदेह नहीं। अतः हे वानरो! लंका के लिए प्रयत्न करना चाहिए। तीक्ष्ण उपायों से सीता को शीघ्र लाओ। ऐसा कहकर महातेजा अंगद चुप हो गए, सब वानरों को हर्षित कर।

🚀 वानरों का पुनः उत्साह और संकल्प (श्लोक २३-३०)

॥ श्लोक २३-३० ॥
ततस्ते वानराः सर्वे अंगदेन समीरिताः ।
त्यक्त्वा शोकं भयं चैव हर्षयुक्ता बभूविरे ॥
प्रणेमुस्ते महात्मानमंगदं जितकाशिनम् ।
ऊचुश्च वचनं वीराः करिष्यामो वचस्तव ॥
यदाह वानरश्रेष्ठः कर्तव्यं कर्म साम्प्रतम् ।
तत्करिष्यामहे सर्वे सीतामानयत द्रुतम् ॥
इत्युक्त्वा ते महात्मानो जाम्बवान् हनुमानपि ।
नलो नीलश्च तरसा चक्रुः सीताविचिन्तनम् ॥
अंगदस्य वचः श्रुत्वा हर्षयुक्ता वनौकसः ।
समुद्रं लंघयिष्यन्तो हनूमन्तमपूजयन् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब अंगद से प्रेरित होकर उन सब वानरों ने शोक और भय का त्याग कर दिया और हर्षित हो गए। उन्होंने उस महात्मा जितकाशी अंगद को प्रणाम किया और वीरों ने कहा— हम आपका वचन पालन करेंगे। वानरश्रेष्ठ ने जो उचित कर्म बताया, वह हम सब करेंगे— सीता को शीघ्र लाएँगे। ऐसा कहकर वे महात्मा जाम्बवान्, हनुमान, नल, नील आदि ने शीघ्रता से सीता के विषय में विचार किया। अंगद का वचन सुनकर हर्षित वानर समुद्र लाँघने के इच्छुक हनुमान की पूजा करने लगे।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार अंगद के उत्साहवर्धन से वानरों का मनोबल लौट आया और उन्होंने हनुमान को समुद्र लाँघने हेतु प्रेरित किया। यह सर्ग अगले सर्ग (जाम्बवान् द्वारा हनुमान की स्तुति) का मार्ग प्रशस्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦍 नेतृत्व का कौशल

अंगद ने इस सर्ग में अद्भुत नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने निराश वानरों को न केवल सुग्रीव के भय से मुक्त किया, बल्कि उन्हें लंका पर चढ़ाई करने के लिए तैयार कर दिया। एक कुशल सेनानायक वही होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सैनिकों का मनोबल बनाए रखे।

🧠 संकट में धैर्य और बुद्धि

अंगद ने भयभीत वानरों को सान्त्वना देते हुए तर्कपूर्ण बातें कहीं— यदि हम यहाँ बैठे रहेंगे तो भी मरेंगे और लौटेंगे तो भी मरेंगे, अतः वीरता से कार्य करना ही श्रेयस्कर है। यह हमें सिखाता है कि संकट में धैर्य और विवेक से ही मार्ग निकलता है।

🌊 हनुमान की भूमिका का बीज

इस सर्ग के अन्त में वानर हनुमान की ओर देखने लगते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि अगले सर्ग में हनुमान की महानता उभरकर सामने आएगी। अंगद ने भले ही सबका उत्साह बढ़ाया, परन्तु कार्य का भार हनुमान पर ही आने वाला है।

⚖️ राजभक्ति और कर्तव्यपरायणता

अंगद स्वयं सुग्रीव के पुत्र नहीं, बल्कि वालि के पुत्र हैं, जिन्हें सुग्रीव ने युवराज बनाया था। इसके बावजूद वे सुग्रीव के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते हैं और वानरों को उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाते हैं। यह उनकी उदारता और राजभक्ति को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि निराशा के क्षणों में भी धैर्य और साहस नहीं खोना चाहिए। एक प्रेरक नेता पूरी सेना का कायाकल्प कर सकता है। अंगद ने अपने वचनों से वानरों में नवचेतना भर दी, जिसके फलस्वरूप हनुमान की लंका यात्रा और सीता की खोज सफल हुई। हमें भी अपने जीवन में आए संकटों में इसी प्रकार दूसरों का उत्साहवर्धन करना चाहिए और मिलकर समस्याओं का सामना करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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