हनुमान् द्वारा सीता की खोज
हनुमान् जी लंका में प्रवेश करके सीता जी की खोज करते हैं। वे रावण के महल, नगर और अन्तःपुर का निरीक्षण करते हैं, परन्तु सीता को नहीं पाते। अन्त में अशोक वाटिका में उन्हें सीता जी दिखाई देती हैं, जो राक्षसियों से घिरी हुई ध्यानमग्न हैं।
विवरण
समुद्र लांघकर हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं। रात्रि के समय वे अपने शरीर को अत्यन्त सूक्ष्म कर लेते हैं और लंका नगरी का भ्रमण करते हैं। वे रावण के भवन, सभा-भवन, और अन्तःपुर में सीता को ढूँढ़ते हैं, किन्तु नहीं पाते। वे रावण को निद्रामग्न देखते हैं, उसकी रानियों को देखते हैं, परन्तु सीता वहाँ नहीं होती। निराश होकर वे आगे बढ़ते हैं और अशोक वाटिका में जाते हैं। वहाँ उन्हें एक वृक्ष के नीचे मलिन वस्त्र धारण किए, राक्षसियों से घिरी हुई सीता दिखाई देती हैं। वे ध्यान कर रही हैं और राम का ही चिन्तन कर रही हैं। हनुमान् पुष्पों की ओट में छिपकर उनका दुःख देखते हैं और राम का संदेश देने की योजना बनाते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ४८
(हनुमान् द्वारा सीता की खोज)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान् ने समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश किया। अब वे सूक्ष्म रूप धारण कर रात्रि में नगरी का भ्रमण करते हुए सीता की खोज कर रहे हैं। यह सर्ग उनके खोज-अभियान का वर्णन करता है, जिसमें वे रावण के महल, अन्तःपुर और अन्ततः अशोक वाटिका में सीता का दर्शन करते हैं।
🏰 लंका में प्रवेश और रात्रि-विहार (श्लोक १-१०)
प्रविवेश निशीथे तु सूर्यरश्मिभिरावृताम् ॥
स तु रात्र्यां प्रविष्टायां सूक्ष्मरूपं समास्थितः ।
विचचार पुरीं लङ्कां राक्षसाधिपतिपालिताम् ॥
ददर्श विविधान् देशान् गृहान् रम्यान् समन्ततः ।
राक्षसैर्बहुभिः कीर्णान् नानाद्रुमलतावृतान् ॥
राक्षसेन्द्रगृहं रम्यं नानारत्नविभूषितम् ॥
तत्रापश्यन्महातेजा रावणं निद्रयावृतम् ।
स्त्रीसहस्रैः परिवृतं नानाभरणभूषितैः ॥
न च तत्रापि वैदेहीं ददर्श हरियूथपः ।
विचिन्वन् राक्षसेन्द्रस्य गृहे गृहवरोत्तमे ॥
🔍 अन्तःपुर और नगर में खोज (श्लोक ११-२५)
गृहान् गृहवरश्रेष्ठान् सर्वानेवान्वचिन्तयत् ॥
नापश्यत् तत्र वैदेहीं राघवस्य प्रियां सतीम् ।
ततः स चिन्तयामास भृशं दुःखसमन्वितः ॥
क्व नु सीता भवेदद्य मैथिली जनकात्मजा ।
या शोकाय महाबाहो राघवस्य भविष्यति ॥
अन्यान् देशान् दुराधर्षश्चचार स महाकपिः ॥
स राजमार्गं संप्राप्य राक्षसाधिपपालितम् ।
ददर्श विविधान् देशान् रम्यान् गृहवरांस्तथा ॥
न चापश्यत् ततः सीतां सर्वान् देशान् विचिन्वतः ।
🌿 अशोक वाटिका में सीता के दर्शन (श्लोक २६-३५)
ददर्श तरुणीं तत्र सीतामसितलोचनाम् ॥
शोकभारसमाविष्टां राक्षसीभिः समावृताम् ।
रामस्य हृदयानन्दां ध्यानस्थां पद्मलोचनाम् ॥
तां दृष्ट्वा हृष्टवान् वीरो हनुमान् हरियूथपः ।
रामस्य महिषीं दीनां लक्ष्मणस्य च संमताम् ॥
चिन्तयामास धर्मात्मा हनुमान् कार्यसिद्धये ॥
इयं सा जानकी देवी रामपत्नी पतिव्रता ।
यस्याः कृते महाबाहुः समुद्रं लङ्घयिष्यति ॥
इति संचिन्त्य मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ।
तस्थौ स तरुणां छायां समाश्रित्य महाबलः ॥
📜 उपसंहार एवं अगले सर्ग की ओर
रामस्य हृदयानन्दां चकार मतिमुत्तमाम् ॥
कथं संदेशमद्यैनं देयमस्या महात्मना ।
इति चिन्तापरो वीरो निषसाद महातरौ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे अष्टाचत्वारिंशः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕵️ हनुमान् की सूक्ष्मबुद्धि
हनुमान् ने अपने सूक्ष्म रूप से बिना किसी को सचेत किए संपूर्ण लंका का भ्रमण किया। यह उनकी बुद्धि कौशल एवं सावधानी को दर्शाता है।
💔 सीता का शोक
सीता की दशा का वर्णन करके वाल्मीकि ने विरह की मार्मिकता को उजागर किया है। राक्षसियों के बीच भी वे राम में ही लीन हैं, यह पातिव्रत्य का आदर्श है।
🌉 रामसेतु का पूर्वाभास
हनुमान् सोचते हैं कि राम समुद्र लाँघेंगे – यह आगामी सेतुबंधन की ओर संकेत है।
🙏 धैर्य और संकल्प
हनुमान् का सीता को पाकर भी तुरन्त कार्य न करना, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ना, धैर्य एवं संकल्प की सीख देता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि बड़े कार्यों को करने से पहले पूरी जानकारी एवं योजना आवश्यक है। हनुमान् ने लंका का भली-भाँति निरीक्षण किया, फिर उचित समय पर कदम उठाया। हमें भी जीवन में धैर्य और विवेक से कार्य करना चाहिए।