पूर्व, उत्तर और पश्चिम में सीता की खोज विफल

किष्किन्धाकाण्ड का सैंतालीसवाँ सर्ग वानरों द्वारा पूर्व, उत्तर और पश्चिम दिशाओं में की गई सीता की खोज के असफल परिणाम का वर्णन करता है। ये सभी दल निराश होकर किष्किन्धा लौट आते हैं और सुग्रीव को अपनी विफलता की सूचना देते हैं।

विवरण

सीता की खोज के लिए चारों दिशाओं में वानर दल भेजे गए थे। इस सर्ग में, सुग्रीव के पास पूर्व, उत्तर और पश्चिम दिशाओं में भेजे गए वानर दल वापस लौटते हैं। पूर्व दिशा में भेजे गए वानर, जिनका नेतृत्व विनत नामक वानर कर रहा था, विशाल पर्वतों, घने वनों और समुद्र के तट तक सीता को ढूंढ़ते हैं, लेकिन उनका कहीं पता नहीं चलता। वे भरत के नेतृत्व वाली अयोध्या की सेना को देखकर भी लौट आते हैं। इसी प्रकार, उत्तर दिशा में भेजा गया दल हिमालय, क्रौंच पर्वत और उससे आगे के दुर्गम प्रदेशों तक जाता है, परन्तु असफल रहता है। पश्चिम दिशा में भेजे गए वानर पश्चिमी सागर के तट और समीपवर्ती प्रदेशों में सघन खोजबीन करते हैं, किन्तु सीता का कोई अता-पता नहीं मिलता। तीनों दल निराश और हतोत्साहित होकर सुग्रीव के समक्ष उपस्थित होते हैं और अपनी असफलता की रिपोर्ट देते हैं। अब सारी आशा केवल दक्षिण दिशा में भेजे गए दल पर टिकी है, जिसका नेतृत्व अंगद कर रहे हैं और जिसमें हनुमान जैसे वीर शामिल हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ४७

(पूर्व, उत्तर और पश्चिम की खोज विफल)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता की खोज हेतु चारों दिशाओं में वानर दल भेजे जा चुके हैं। इस सर्ग में, पूर्व, उत्तर और पश्चिम की ओर गए वीर वानर निराश होकर लौट आते हैं। उनके प्रयासों के बावजूद, उन दिशाओं में सीता का कोई सुराग नहीं मिलता। अब सबकी निगाहें दक्षिण दल पर टिकी हैं, जहाँ हनुमान जैसे पराक्रमी वानर हैं।

🌄 पूर्व दिशा के वानरों की खोज और निराशा (श्लोक १-९)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो विनतपुत्राश्च ये च तैः सह वानराः।
पूर्वामेव दिशं याता ददृशुस्ते महागिरीन्॥
वनानि विविधाकारान्नदीश्च विमलोदकाः।
सीतामन्वेषमाणास्ते व्यचरन्त महाबलाः॥
ते समुद्रमनुप्राप्य महानद्याः समीपतः।
ददृशुः पर्वतं दिव्यं नानाधातुविभूषितम्॥
न तु सीतां ततोऽपश्यन्न च किञ्चिन्निशामयन्।
प्रत्यागमन्निराशास्ते सुग्रीवाय निवेदितुम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; विनतपुत्राः = विनत के पुत्र (गरुड़ के भाई); च = और; ये = जो; तैः = उनके; सह = साथ; वानराः = वानर; पूर्वाम् = पूर्व; एव = ही; दिशम् = दिशा को; याताः = गए; ददृशुः = देखा; ते = उन्होंने; महागिरीन् = महान पर्वतों को; वनानि = वनों को; विविधाकारान् = अनेक आकार वाले; नदीः = नदियों को; च = और; विमलोदकाः = स्वच्छ जल वाली; सीताम् = सीता को; अन्वेषमाणाः = ढूंढ़ते हुए; ते = वे; व्यचरन् = विचरण करने लगे; महाबलाः = महाबली; ते = वे; समुद्रम् = समुद्र को; अनुप्राप्य = पास पाकर; महानद्याः = महानदी के; समीपतः = समीप; ददृशुः = देखा; पर्वतम् = पर्वत को; दिव्यम् = दिव्य; नानाधातुविभूषितम् = अनेक धातुओं से विभूषित; न = नहीं; तु = परन्तु; सीताम् = सीता को; ततः = वहाँ; अपश्यन् = देखा; न = नहीं; च = और; किञ्चित् = कुछ भी; निशामयन् = जान सके; प्रत्यागमन् = वापस आ गए; निराशाः = निराश; ते = वे; सुग्रीवाय = सुग्रीव को; निवेदितुम् = बताने के लिए।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात्, विनत के पुत्र (अरुण और गरुड़) तथा उनके साथ गए अन्य वानर पूर्व दिशा की ओर गए। वे महान पर्वतों, अनेक प्रकार के वनों और स्वच्छ जल वाली नदियों को देखते हुए सीता की खोज करते रहे। वे महाबली वानर समुद्र और एक महानदी के समीप स्थित, अनेक खनिज पदार्थों से सुशोभित दिव्य पर्वत तक जा पहुँचे। किन्तु वहाँ भी उन्हें सीता के दर्शन नहीं हुए और न ही उनका कोई सुराग मिला। अन्ततः वे निराश होकर सुग्रीव को सूचना देने के लिए वापस लौट आए।

🏔️ उत्तर दिशा के वानरों की खोज और असफलता (श्लोक १०-१७)

॥ श्लोक १०-१५ ॥
उदीचीं च दिशं याता हिमवन्तमुपागताः।
विचिन्वन्तो दरीकन्दान्नदीश्च विविधा गिरीन्॥
क्रौञ्चं मेनं च हिमवत्सुवेलं च महागिरिम्।
चक्रमुस्ते तदा सर्वं न सीतां ददृशुस्ततः॥
ते समुद्रं समासाद्य तिमिनक्रनिषेवितम्।
उत्तरं कुरुवर्षं च नानापुष्पफलद्रुमम्॥
ददृशुः सोमगिरिं चैव तथैवोत्तरपर्वतान्।
न चापश्यन् महाभागां सीतां जनकनन्दिनीम्॥
ततो निवृत्ता हरयः सुग्रीवं पुनरागताः।
निवेदयन्तो दुःखार्ता नाधिगच्छाम तां प्रियाम्॥
📖 भावार्थ : उत्तर दिशा में गए वानर हिमालय पर्वत तक पहुँच गए। वे पर्वतों की गुफाओं, कन्दराओं, अनेक नदियों और पर्वतों की खोज करते रहे। उन्होंने क्रौंच, मेन, हिमवान और सुवेल जैसे महान पर्वतों को छान मारा, किन्तु सीता का कहीं पता नहीं चला। वे आगे बढ़कर मगर और घड़ियालों से युक्त उत्तरी समुद्र तक जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने उत्तर कुरु देश को देखा, जो अनेक प्रकार के फल-फूलों से भरे वृक्षों से सुशोभित था। उन्होंने सोमगिरि और अन्य उत्तरी पर्वतों को भी देखा, परन्तु जनकनन्दिनी महाभागा सीता का उन्हें कहीं दर्शन नहीं हुआ। तब वे सभी वानर दुःखी होकर लौट आए और सुग्रीव से जाकर बोले, "हम उन प्रिय सीता का पता नहीं पा सके।"
🔍 व्याख्या : उत्तर दिशा के वर्णन में पौराणिक स्थलों और पर्वतों का उल्लेख है, जो उस समय की भूगोलिक अवधारणा को दर्शाता है। उत्तर कुरु देश को एक दिव्य और अत्यंत समृद्ध प्रदेश बताया गया है।

🌅 पश्चिम दिशा के वानरों की खोज और निराशा (श्लोक १८-२४)

॥ श्लोक १८-२२ ॥
तथैव प्रतीचीं च दिशं याता महाबलाः।
वारुणीं दिशमासाद्य समुद्रमपि पर्वतान्॥
नानावनगिरिद्रोणीः सीतामन्वेषमाणास्ते।
नापश्यन्नरशार्दूलीं सीतां जनकनन्दिनीम्॥
ते चापि वानराः सर्वे प्रत्यागम्य महाबलाः।
सुग्रीवं शरणं प्राप्य न्यवेदयन्न दृश्यते॥
ततस्ते सर्व एवैत्य किष्किन्धां वानरर्षभाः।
सुग्रीवं शरणं जग्मुर्नष्टसीतान्वये कृते॥
📖 भावार्थ : इसी प्रकार, महाबली वानर पश्चिम दिशा की ओर गए। वरुण की दिशा (पश्चिम) में जाकर उन्होंने समुद्र और पर्वतों को देखा। अनेक प्रकार के वनों, पर्वतों और घाटियों में सीता को ढूंढ़ते हुए भी वे नरशार्दूली, जनकनन्दिनी सीता को नहीं पा सके। वे सभी महाबली वानर भी वापस लौट आए और सुग्रीव की शरण में जाकर निवेदन किया, "सीता का पता नहीं चला।" इस प्रकार, सीता की खोज में लगे वे सभी श्रेष्ठ वानर किष्किन्धा में एकत्र हो गए और असफलता का समाचार लेकर सुग्रीव के पास आए।

🤔 दक्षिण दिशा की ओर आशा की किरण

॥ श्लोक २५-२८ ॥
ते सर्वे वानराः शूराः सुग्रीवमिदमब्रुवन्।
न दिशः प्रतिगच्छामो दक्षिणां हरिपुङ्गवाः॥
ते हि याता महात्मानो हनूमत्प्रमुखा बली।
तेषां प्रत्यागमं वीर प्रतिपालयितुं त्वया॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : वे सभी शूरवीर वानर सुग्रीव से बोले, "हे वानरश्रेष्ठ! हम तो सीता को न पा सके। अब केवल दक्षिण दिशा में गए हनूमत् प्रमुख महात्मा बलशाली वानर ही शेष हैं। हे वीर! अब आपको उनके लौटने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।"
🔍 व्याख्या : इस प्रकार तीनों दिशाओं से असफलता मिलने के बाद, सीता की खोज की सारी आशा दक्षिण दल पर टिक गई। यह सर्ग हनुमान के अभियान के महत्व को स्थापित करता है और अगले सर्ग में विनता की कथा के माध्यम से एक नया मोड़ लाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧭 विफलता का मनोविज्ञान

यह सर्ग मानवीय प्रयासों की सीमा और असफलता से उत्पन्न निराशा को दर्शाता है। बावजूद इसके कि वानरों ने हर संभव स्थान पर सीता को ढूंढ़ा, उन्हें सफलता नहीं मिली। यह जीवन का एक सत्य है कि परिश्रम करने पर भी कभी-कभी सफलता नहीं मिलती।

🌏 भारतीय भूगोल का चित्रण

इस सर्ग में वर्णित पूर्व, उत्तर और पश्चिम के पर्वत, समुद्र और प्रदेश प्राचीन भारतीय भूगोल की विस्तृत अवधारणा को प्रस्तुत करते हैं। यह रामायण काल में भौगोलिक ज्ञान की व्यापकता को दर्शाता है।

🎯 केन्द्रीय भूमिका का निर्धारण

तीन दिशाओं की विफलता स्वाभाविक रूप से दक्षिण दिशा और उसमें जाने वाले वीरों, विशेषकर हनुमान, के महत्व को बढ़ा देती है। यह कथा-तन्त्र को आगे बढ़ाने की एक कुशल रचना है।

⏳ प्रतीक्षा का धैर्य

सुग्रीव और अन्य वानरों को अब दक्षिण दल के लौटने की प्रतीक्षा करनी है। यह सिखाता है कि संकट के समय में धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना और आशा का केन्द्र बिन्दु न खोना आवश्यक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि जीवन में असफलताएँ आती हैं, लेकिन उनसे निराश नहीं होना चाहिए। जब तक एक भी रास्ता शेष है, आशा बनी रहती है। हमें अपने प्रयास जारी रखने चाहिए और धैर्यपूर्वक सफलता की प्रतीक्षा करनी चाहिए। साथ ही, यह सामूहिक प्रयास के महत्व को भी रेखांकित करता है, जहाँ सभी दल अपने-अपने क्षेत्रों में खोज करते हैं और मिलकर एक लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास करते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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