वानर योद्धाओं की युद्ध घोषणाएँ

किष्किन्धाकाण्ड के पैंतालीसवें सर्ग में सुग्रीव के आदेश पर सीता की खोज के लिए निकलने से पूर्व वानरवीरों द्वारा अपनी-अपनी शक्तियों का गर्वोक्तिपूर्वक वर्णन एवं युद्ध-घोषणाएँ वर्णित हैं। यह सर्ग वानर सेना के उत्साह, पराक्रम और रामकार्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

विवरण

राम द्वारा वाली के वध एवं सुग्रीव के राज्याभिषेक के बाद वर्षा ऋतु व्यतीत हो जाने पर राम की आज्ञा से लक्ष्मण सुग्रीव के पास जाते हैं और उन्हें सीता-अन्वेषण का कर्तव्य स्मरण कराते हैं। सुग्रीव तत्काल विशाल वानर सेना एकत्रित करते हैं और उन्हें चारों दिशाओं में भेजने की व्यवस्था करते हैं। इसी क्रम में, सेनापतियों एवं प्रमुख योद्धाओं को बुलाकर उनके सामर्थ्य के अनुरूप कार्य सौंपा जाता है। चतुरंगिणी वानरसेना के प्रधान नायक – अंगद, हनुमान, जाम्बवान, नल, नील, केसरी, गवय, गवाक्ष, शरभ, धूम्र आदि – अपने-अपने बल, पराक्रम और उड़ान-क्षमता का बखान करते हैं। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे सीता का पता लगाकर ही लौटेंगे, चाहे उन्हें सागर, पाताल या आकाश में क्यों न ढूँढना पड़े। हनुमान विशेष रूप से अपनी अद्भुत गति एवं शक्ति का वर्णन करते हैं और सौ योजन समुद्र को लाँघने का साहस प्रकट करते हैं। सुग्रीव सभी को दिशाओं सहित समय-सीमा निर्धारित करके रवाना करते हैं। यह सर्ग वानरवीरों के अदम्य साहस, स्वामिभक्ति एवं राम-कार्य के प्रति समर्पण का भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ४५

(वानर योद्धाओं की युद्ध घोषणाएँ)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वाली के वध के पश्चात् सुग्रीव किष्किन्धा के राजा बने। वर्षा ऋतु बीत जाने पर राम को सीता-वियोग और अधिक व्याकुल करने लगा। उनके कहने पर लक्ष्मण सुग्रीव के पास गए और उन्हें वचन का स्मरण कराया। सुग्रीव ने तुरन्त समस्त वानर सेना एकत्रित की। इस सर्ग में उसी विशाल सेना के योद्धाओं द्वारा अपने बल-पराक्रम का गर्वोक्तिपूर्ण उद्घोष तथा सीता-अन्वेषण के लिए प्रस्थान का मनोरम वर्णन है।

🐒 सुग्रीव की आज्ञा और वानर सेना का संगठन (श्लोक १-९)

॥ श्लोक १-३ ॥
सुग्रीवस्तु महातेजा रामस्य प्रियकाम्यया ।
समानीय महावीर्यान् वानरान् वानरर्षभः ॥
उवाच वचनं श्लक्ष्णं हनूमन्तं महाबलम् ।
दिशः प्रतिदिशः सर्वाः सान्तराश्च महाबलाः ॥
यूथपा यूथपैः सार्धं गच्छध्वं हरिपुंगवाः ।
सीतामन्वेषितुं सर्वे यतध्वं सहिता भृशम् ॥
🔹 पदच्छेद : सुग्रीवः = सुग्रीव; तु = तो; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय करने की इच्छा से; समानीय = इकट्ठा करके; महावीर्यान् = महापराक्रमी; वानरान् = वानरों को; वानरर्षभः = वानरश्रेष्ठ; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; श्लक्ष्णम् = मधुर; हनूमन्तम् = हनुमान से; महाबलम् = महाबली; दिशः = दिशाओं को; प्रतिदिशः = प्रति दिशाओं को; सर्वाः = सब; सान्तराः = अन्तराल सहित; च = और; महाबलाः = महाबली; यूथपाः = दल के नेता; यूथपैः = दलपतियों के साथ; सार्धम् = साथ; गच्छध्वम् = जाओ; हरिपुंगवाः = वानरश्रेष्ठों; सीताम् = सीता को; अन्वेषितुम् = ढूँढ़ने के लिए; सर्वे = सब; यतध्वम् = प्रयत्न करो; सहिताः = मिलकर; भृशम् = बहुत अधिक।
📖 भावार्थ : महातेजस्वी वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने राम का प्रिय करने की इच्छा से सब महापराक्रमी वानरों को एकत्रित किया और महाबली हनुमान से भी मधुर वचन कहे: "हे महाबली वानरश्रेष्ठो! तुम सब दलपति अपने-अपने दलों के साथ समस्त दिशाओं और उनके अन्तरालों में जाओ। सीता की खोज के लिए तुम सब मिलकर भरसक प्रयत्न करो।"
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने सबसे पहले योद्धाओं को दिशाओं में भेजने की सामान्य आज्ञा दी। उन्होंने विशेष रूप से हनुमान को सम्बोधित किया, क्योंकि उनकी शक्ति सबसे अधिक थी।
॥ श्लोक ४-९ ॥
ते तु सुग्रीववचनात् प्रणेदुः सिंहनादिनः ।
ननाद च महानादो वानराणां महात्मनाम् ॥
अङ्गदस्तु महातेजा जाम्बवांश्च महाबलः ।
नीलो नलश्च धीराश्च केसरी च महाबलः ॥
गवयो गवाक्षश्च शरभो धूम्र एव च ।
एते चान्ये च बहवः सुग्रीववशवर्तिनः ॥
📖 भावार्थ : सुग्रीव के वचन सुनकर वे सिंहनाद करने वाले वानर गरज उठे। उन महात्मा वानरों का महान् नाद चारों ओर गूँज उठा। अंगद, जाम्बवान, नील, नल, केसरी, गवय, गवाक्ष, शरभ, धूम्र – ये सब तथा बहुत-से अन्य वानर सुग्रीव के अधीन थे।
🔍 व्याख्या : सेना में उत्साह का माहौल है। प्रमुख योद्धाओं के नाम गिनाए गए हैं, जो आगे चलकर रामायण के विभिन्न प्रसंगों में अपनी भूमिका निभाएँगे।

⚔️ प्रमुख वानर योद्धाओं की युद्ध-घोषणाएँ (श्लोक १०-२८)

॥ अंगद की घोषणा ॥
अहं तु वानरश्रेष्ठः सुग्रीवस्य महात्मनः ।
भागिनेयो महावीर्यः सीतामानेष्यामि ध्रुवम् ॥
📖 भावार्थ : "मैं महात्मा सुग्रीव का भानजा, महापराक्रमी वानरश्रेष्ठ अंगद हूँ। मैं निश्चय ही सीता को खोजकर लाऊँगा।"
अंगद अपनी युवाशक्ति और सुग्रीव से निकट सम्बन्ध का स्मरण कराते हुए दृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं।
॥ हनुमान की घोषणा ॥
शतं योजनमुत्पत्य समुद्रं वानरर्षभः ।
हनूमान् वाक्यमत्यर्थं जगाद च महाबलः ॥
अहं तु लङ्कां द्रक्ष्यामि सीतां चैवानयाम्यहम् ।
न च मे शक्तिरन्या वै युद्धे वा विक्रमेऽपि वा ॥
📖 भावार्थ : वानरश्रेष्ठ महाबली हनुमान ने कहा: "मैं सौ योजन समुद्र को लाँघकर लंका जाऊँगा और सीता को खोज लाऊँगा। युद्ध अथवा पराक्रम में मेरी शक्ति अद्वितीय है।"
🔍 यह वही प्रसिद्ध उद्घोष है, जो आगे चलकर हनुमान के लंका-गमन का आधार बनता है।
॥ जाम्बवान् की घोषणा ॥
ऋक्षराजो महावीर्यो जाम्बवान् वाक्यमब्रवीत् ।
पुरा कृतयुगे सर्वान् देवान् येन जिता मया ॥
अद्यापि मे बलं तादृक् युध्यतः क्षिप्रमाहवे ।
सीतामानेष्ये तां देवीं राघवस्य महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : ऋक्षराज महावीर्य जाम्बवान् ने कहा: "पूर्व कृतयुग में मैंने सब देवताओं को जीत लिया था। आज भी युद्ध में मेरा वैसा ही बल है। मैं उस देवी सीता को महात्मा राघव के लिए ला सकता हूँ।"
जाम्बवान् अपने प्राचीन बल का स्मरण करके विश्वास दिलाते हैं।
॥ अन्य योद्धाओं की घोषणाएँ ॥
नलो नीलश्च वीर्यौजा गवयो गवाक्ष एव च ।
अन्ये च वानराः शूराः स्वां स्वां शक्तिमुदीरयन् ॥
📖 भावार्थ : नल-नील, गवय, गवाक्ष तथा अन्य शूरवीर वानरों ने भी अपनी-अपनी शक्ति का उद्घोष किया।

🚩 सेना का प्रस्थान और राम का आशीर्वाद (श्लोक २९-३८)

॥ श्लोक २९-३८ ॥
ततः प्रतस्थिरे सर्वे वानराः कामरूपिणः ।
रामलक्ष्मणयोः पादौ प्रणम्य सुसमाहिताः ॥
रामोऽपि परमप्रीतस्तान् सर्वान् समुदैक्षत ।
अभिवाद्य च तान् वीरान् हर्षयुक्तोऽब्रवीद्वचः ॥
गच्छतैवं यथाकामं सीतामन्वेषितुं द्रुतम् ।
शीघ्रं सम्पादयध्वं वै मम प्रियमनुत्तमम् ॥
प्रतिज्ञाय तथा सर्वे वानराः प्रययुर्मुदा ।
रामचन्द्रप्रियार्थाय सीतामन्वेषितुं तदा ॥
📖 भावार्थ : तब सब कामरूपी वानर राम-लक्ष्मण के चरणों में प्रणाम करके बड़ी एकाग्रता के साथ प्रस्थित हुए। राम भी अत्यन्त प्रसन्न होकर उन सबको देख रहे थे। उन वीरों को प्रणाम करके हर्षित राम ने कहा: "तुम सब इच्छानुसार शीघ्रता से सीता की खोज में जाओ। मेरा यह अनुपम प्रिय कार्य शीघ्र सम्पन्न करो।" इस प्रकार प्रतिज्ञा करके सब वानर रामचन्द्र के प्रिय कार्य के लिए सीता की खोज में हर्षपूर्वक चल पड़े।
🔍 राम का आशीर्वाद प्राप्त कर वानर सेना अत्यन्त उत्साहित होकर अपने-अपने मार्गों पर अग्रसर होती है। यह प्रस्थान ही आगे सुन्दरकाण्ड और युद्धकाण्ड की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐵 वानरों का आत्मविश्वास

इस सर्ग में प्रत्येक वानर योद्धा अपनी शक्ति का उद्घोष करता है। यह केवल गर्व नहीं, बल्कि स्वामिभक्ति और कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। यहाँ से यह सन्देश मिलता है कि सामूहिक प्रयास और आत्मविश्वास से कठिन से कठिन कार्य भी साधे जा सकते हैं।

🧭 दिशा-निर्देश एवं संगठन

सुग्रीव ने सेना को चारों दिशाओं में भेजकर एक व्यवस्थित खोज-अभियान की रूपरेखा दी। यह प्रबन्धन कौशल और कार्य-विभाजन का उत्कृष्ट उदाहरण है। समय-सीमा निर्धारित करना भी इसकी सफलता का मूलमंत्र है।

🕉️ हनुमान की विशेष भूमिका

हनुमान का सौ योजन समुद्र लाँघने का कथन उनकी असाधारण क्षमता को दर्शाता है। साथ ही, वे विनम्रता से "मैं लंका जाकर सीता को देखूँगा और लाऊँगा" कहते हैं। यह उनकी निष्काम कर्मयोगी प्रवृत्ति को इंगित करता है।

📜 राम-सुग्रीव मैत्री का फल

राम ने सुग्रीव को राज्य दिलाया और अब सुग्रीव की सेना राम के कार्य में जुटी है। यह मैत्री एवं कृतज्ञता के पारस्परिक आदान-प्रदान का सुन्दर उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : जब उद्देश्य महान हो और नेता कुशल, तो सेना का मनोबल अद्भुत रूप से ऊँचा उठता है। हमें भी अपने जीवन में लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण और आत्मविश्वास के साथ कार्य करना चाहिए। साथ ही, सुग्रीव की तरह संगठन-क्षमता और राम की तरह प्रेरणा-शक्ति का विकास करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।