सुग्रीव द्वारा पश्चिम दिशा में सेना भेजना

किष्किन्धाकाण्ड के बयालीसवें सर्ग में भगवान राम की आज्ञा से सुग्रीव पश्चिम दिशा में सीता की खोज हेतु वानर सेना भेजते हैं। वे सुषेण को सेनापति नियुक्त करते हैं और उन्हें मार्ग के विभिन्न स्थानों का वर्णन करते हैं, जैसे मधुपुरी, कालयवन का देश, और पश्चिमी पर्वत। वानरों को एक मास के भीतर लौटने का निर्देश दिया जाता है।

विवरण

सुग्रीव ने पूर्व और दक्षिण दिशा में वानर भेजने के बाद अब पश्चिम दिशा की ओर दल रवाना किया। इस दल का नेतृत्व सुषेण को सौंपा गया, जो तारा के पिता और एक बुद्धिमान वानर थे। सुग्रीव ने उन्हें पश्चिम के मार्ग का विस्तार से वर्णन किया। वहाँ जाने पर उन्हें मधु नामक नगर मिलेगा, जो लवणासुर का था (हालाँकि उसका वध शत्रुघ्न कर चुके थे)। फिर वे कालयवन के देश से गुजरेंगे, जहाँ बहुत सारे यवन रहते हैं। आगे बढ़ने पर उन्हें पश्चिमी समुद्र और सह्य, मलय आदि पर्वत मिलेंगे। वहाँ के द्वीपों और रत्नाकर का भी उल्लेख किया गया। सुग्रीव ने आदेश दिया कि वे सीता का पता लगाने का हरसंभव प्रयास करें और एक मास के भीतर वापस लौट आएँ। तदनन्तर वे सभी वानर उत्साहपूर्वक पश्चिम की ओर प्रस्थान कर गए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ४२

(सुग्रीव द्वारा पश्चिम दिशा में सेना भेजना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वर्षा ऋतु समाप्त होने पर सुग्रीव ने राम के कार्य को स्मरण किया और चारों दिशाओं में वानर दल भेजने का निश्चय किया। पूर्व और दक्षिण दिशा के बाद अब पश्चिम दिशा के लिए सुषेण के नेतृत्व में वानर सेना रवाना की जाती है। यह सर्ग उसी प्रस्थान और सुग्रीव द्वारा दिए गए मार्ग-निर्देशों का वर्णन करता है।

🌄 सुग्रीव का आदेश और सुषेण की नियुक्ति (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः सुग्रीवः प्रेषयामास सुषेणं वानरर्षभम् ।
पश्चिमां दिशमुद्दिश्य सीतायाः परिमार्गणे ॥
सुषेणः सुग्रीववचनात् प्रतस्थे वानरैः सह ।
बहुभिः कोटिशः सार्धं योजनानां शतं प्रति ॥
तमुवाच ततः सुग्रीवः सुषेणं वाक्यकोविदः ।
शृणु सुषेण वक्ष्यामि पश्चिमाया दिशो गतिम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुग्रीवः = सुग्रीव; प्रेषयामास = भेजा; सुषेणम् = सुषेण को; वानरर्षभम् = वानरश्रेष्ठ; पश्चिमाम् = पश्चिम; दिशम् = दिशा को; उद्दिश्य = लक्ष्य करके; सीतायाः = सीता की; परिमार्गणे = खोज में; सुषेणः = सुषेण; सुग्रीववचनात् = सुग्रीव के वचन से; प्रतस्थे = प्रस्थान किया; वानरैः = वानरों के; सह = साथ; बहुभिः = अनेक; कोटिशः = करोड़ों; सार्धम् = सहित; योजनानाम् = योजनों; शतम् = सौ; प्रति = के लिए; तम् = उससे; उवाच = बोले; ततः = फिर; सुग्रीवः = सुग्रीव; सुषेणम् = सुषेण से; वाक्यकोविदः = वाक्य कुशल; शृणु = सुनो; सुषेण = हे सुषेण; वक्ष्यामि = बताऊँगा; पश्चिमायाः = पश्चिम; दिशः = दिशा की; गतिम् = गति को।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सुग्रीव ने वानरश्रेष्ठ सुषेण को पश्चिम दिशा में सीता की खोज के लिए भेजा। सुग्रीव के आदेश से सुषेण अनेक करोड़ वानरों के साथ सैकड़ों योजनों की यात्रा के लिए प्रस्थान करने लगे। तब वाक्य-कुशल सुग्रीव ने सुषेण से कहा: "हे सुषेण! पश्चिम दिशा के मार्ग का वर्णन सुनो।"
🔍 व्याख्या : सुषेण तारा के पिता और अत्यन्त बुद्धिमान वानर थे। उन्हें पश्चिम दिशा का नेतृत्व सौंपना सुग्रीव की दूरदर्शिता को दर्शाता है।
॥ श्लोक ४-८ ॥
इक्षुरसोदं प्रथमं ततो मधुवनं महत् ।
ततश्च कालयवनं देशं प्राप्स्यथ वानराः ॥
तत्र वीर्यसमो नास्ति यवनानां महात्मनाम् ।
तेषामतिक्रमेणैव पश्चिमं पर्वतं व्रज ॥
तत्र सह्यं च मलयं च द्रक्ष्यथ पर्वतम् ।
तयोः सानुषु रम्येषु वसन्ति बहवो जनाः ॥
ततो गच्छेत समुद्रं पश्चिमं रत्नसंचयम् ।
तस्य द्वीपेषु सीतां च मृगध्वं सह वानरैः ॥
📖 भावार्थ : (सुग्रीव कहते हैं) हे वानरो! तुम पहले इक्षुरसोद (गन्ने के रस का समुद्र) और फिर विशाल मधुवन को पार करोगे। उसके बाद तुम कालयवन देश में पहुँचोगे। वहाँ के यवनों में तुम्हारे समान कोई वीर नहीं होगा। उन्हें पार करके पश्चिमी पर्वत पर जाओ। वहाँ तुम सह्य और मलय पर्वत देखोगे, जिनके रमणीय शिखरों पर बहुत से लोग रहते हैं। फिर पश्चिमी समुद्र में जाओ, जो रत्नों से भरा है। उसके द्वीपों में वानरों सहित सीता को ढूँढ़ो।
🔍 व्याख्या : इक्षुरसोद और मधुवन पौराणिक स्थल हैं। कालयवन देश संभवतः पश्चिम में यवनों (ग्रीक या मध्य एशियाई लोगों) का क्षेत्र था। सह्य और मलय पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ हैं।

🗺️ पश्चिम दिशा के मार्ग का वर्णन (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
ततः पर्वतमासाद्य हेममाल्योपशोभितम् ।
वानराः सीतया सार्धं द्रक्ष्यथाप्सरसां गणान् ॥
तत्र काञ्चनचित्राङ्गाः पन्नगाः सुमहाबलाः ।
निवसन्ति महारत्नैः पूजिताः सिद्धचारणैः ॥
ततो गत्वा महाभागा द्वीपं रत्नसमाकुलम् ।
तत्र सीतां च वैदेहीं मृगध्वं सह वानरैः ॥
तत्र वै श्रूयते सीता रावणेन दुरात्मना ।
हृता कथंचिदित्येव न निश्चय उपाविशत् ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सीतामन्वेष्टुमर्हथ ।
द्वीपेषु नगरेष्वपि वनेषूपवनेषु च ॥
एवमुक्त्वा तु सुग्रीवः सुषेणं प्रत्यभाषत ।
प्रयाणकालो वर्तेत यथासमयं लक्षय ॥
📖 भावार्थ : फिर सुग्रीव ने बताया: वहाँ स्वर्णमालाओं से सुशोभित पर्वत पर तुम अप्सराओं के समूह देखोगे। वहाँ सुनहले चित्तवाले महाबली पन्नग (सर्प) रहते हैं, जो महान रत्नों से पूजित हैं और सिद्ध-चारणों द्वारा सम्मानित हैं। उसके बाद रत्नों से भरे द्वीप में जाकर वहाँ सीता को खोजो। वहाँ यह सुना जाता है कि सीता को दुरात्मा रावण किसी प्रकार हर ले गया, पर यह निश्चित नहीं है। इसलिए तुम सब प्रयत्नों से सीता को द्वीपों, नगरों, वनों और उपवनों में ढूँढ़ो। ऐसा कहकर सुग्रीव ने सुषेण से फिर कहा: अब प्रस्थान का समय हुआ, तुम नियत अवधि का ध्यान रखो।
॥ श्लोक १५-२० ॥
मासेनैकेन सीतां तु यदि नैवोपलप्स्यथ ।
ततो मां पुनरासाद्य प्रवेक्ष्यथ हुताशनम् ॥
इत्युक्त्वा भाषितं तेन सुषेणो वानरैः सह ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रतस्थे पश्चिमां दिशम् ॥
ततः प्रयाते सुषेणे वानराः कोटिशोऽन्वयुः ।
गवाक्षगवयाक्षाश्च शरभो गन्धमादनः ॥
ते गत्वा दूरमध्वानं विचिन्वन्ति समन्ततः ।
नदीः पर्वतकूटांश्च दुर्गाणि विविधानि च ॥
📖 भावार्थ : "यदि एक मास में तुम सीता को नहीं पा सके, तो फिर मेरे पास लौटकर अग्नि में प्रवेश करना (अर्थात् मृत्यु दण्ड भोगना)।" ऐसा कहने पर सुषेण वानरों सहित धरती पर सिर झुकाकर प्रणाम करके पश्चिम दिशा को प्रस्थित हुए। सुषेण के प्रस्थान करने पर करोड़ों वानर उनके पीछे चले—गवाक्ष, गवय, अक्ष, शरभ और गन्धमादन आदि। वे दूर तक मार्ग जाकर नदियों, पर्वत शिखरों और अनेक दुर्गम स्थानों में सब ओर सीता को ढूँढ़ने लगे।
🔍 व्याख्या : सुग्रीव कठोर समय-सीमा देते हैं—एक मास। यह वानरों के उत्साह और अनुशासन को बढ़ाता है। गवाक्ष, गवय आदि प्रमुख वानर सुषेण के साथ गए।

🚩 वानरों का प्रस्थान और समय-सीमा (श्लोक २१-३१)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
ते विचिन्वन्ति वेगेन दरीः कन्दरगह्वरान् ।
प्रपातान् सरितश्चैव तथा गिरिनदीस्तटान् ॥
न चापश्यन् तदा सीतां रावणेन हृतां वने ।
ततः श्रान्ता भृशं सर्वे निराशाः प्रत्युपस्थिताः ॥
सुषेणस्तु तदा वीरः समाश्वास्य वानरान् ।
पुनरेव प्रयत्नेन चिन्तयामास राघवीम् ॥
ततस्ते वानराः सर्वे गत्वा पश्चिमसागरम् ।
ददृशुस्तं महाभागाः सर्वरत्नसमन्वितम् ॥
तत्र चिन्वन्ति वैदेहीं द्वीपेषूपवनेषु च ।
न चापश्यन् महात्मानस्ततः शोकपरायणाः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : वे वानर वेग से गुफाओं, कन्दराओं, दर्रों, नदियों और पर्वतों के तटों को ढूँढ़ने लगे। परंतु उन्होंने वन में रावण द्वारा हरी गई सीता को नहीं देखा। तब सब अत्यधिक श्रान्त और निराश हो गए। तब वीर सुषेण ने वानरों को आश्वस्त किया और पुनः प्रयत्नपूर्वक सीता के विषय में सोचा। फिर वे सब वानर पश्चिम सागर के पास गए और उस सर्वरत्नों से युक्त समुद्र को देखा। वहाँ द्वीपों और उपवनों में वैदेही को ढूँढ़ा, परंतु महात्मा वानरों ने उन्हें नहीं पाया, इसलिए वे शोक में डूब गए।
🔍 व्याख्या : इस सर्ग के अन्त में वानर निराश होते हैं, किंतु सुषेण उन्हें पुनः प्रयत्न करने को प्रेरित करते हैं। यह अगले सर्गों में आगे के प्रयासों की भूमिका बनाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌍 प्राचीन भूगोल का ज्ञान

इस सर्ग में वर्णित पश्चिमी क्षेत्र—जैसे इक्षुरसोद, मधुवन, कालयवन देश, सह्य, मलय, तथा पश्चिमी समुद्र के द्वीप—प्राचीन भारत के भूगोल और समुद्री मार्गों की जानकारी देते हैं। यह उस समय की व्यापारिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों पर प्रकाश डालता है।

⏳ समय-सीमा का महत्त्व

सुग्रीव द्वारा निर्धारित एक मास की समय-सीमा दर्शाती है कि कार्यों में समयबद्धता कितनी आवश्यक है। यह वानरों में त्वरा और अनुशासन उत्पन्न करती है।

🐒 सुषेण का नेतृत्व

सुषेण, तारा के पिता, एक अनुभवी एवं बुद्धिमान वानर हैं। उन्हें पश्चिम दिशा का नेतृत्व सौंपकर सुग्रीव ने योग्य व्यक्ति को योग्य कार्य दिया। उनका वानरों को आश्वस्त करना तथा पुनः प्रयत्न हेतु प्रेरित करना सफल नेतृत्व के गुण हैं।

🔱 राम-कार्य में तत्परता

यह सर्ग राम के प्रति सुग्रीव और वानरों की निष्ठा एवं तत्परता को उजागर करता है। वे सीता की खोज में कोई कसर नहीं छोड़ते, भले ही अन्त में उन्हें असफलता ही क्यों न मिले।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि बड़े कार्यों में उचित योजना, योग्य नेतृत्व और समय-सीमा का पालन आवश्यक है। असफलता मिलने पर धैर्य न खोते हुए पुनः प्रयास करना चाहिए। सुषेण की भाँति सेनापति को अपने दल का मनोबल बनाए रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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