सुग्रीव द्वारा पूर्व दिशा में खोज का आदेश

किष्किन्धाकाण्ड के चालीसवें सर्ग में सुग्रीव वर्षा ऋतु समाप्त होने पर वानरों को चारों दिशाओं में सीता की खोज हेतु भेजते हैं। इस सर्ग में विशेष रूप से पूर्व दिशा में भेजे गए वानर-दल का वर्णन है, जिसका नेतृत्व विनत आदि वीर वानर करते हैं। सुग्रीव उन्हें मार्ग में पड़ने वाले पर्वतों, नदियों, देशों और राक्षसों के बारे में बताते हैं और सीता का पता लगाने का निर्देश देते हैं।

विवरण

वर्षा ऋतु की समाप्ति पर सुग्रीव को राम का कर्तव्य स्मरण होता है। वे तुरन्त वानर-सेना को बुलाकर सीता की खोज हेतु चारों दिशाओं में भेजने की तैयारी करते हैं। सबसे पहले वे पूर्व दिशा के लिए विनत, शतबलि, सुषेण आदि प्रमुख वानरों का एक विशाल दल तैयार करते हैं। उन्हें आदेश देते हैं कि वे पूर्व दिशा में स्थित सभी देशों, पर्वतों, वनों और नगरों में सीता को खोजें। सुग्रीव स्वयं उन्हें उस मार्ग का विस्तृत वर्णन करते हैं जहाँ-जहाँ उन्हें जाना है – यक्ष देश, काश्मीर, हिमालय की पूर्वी चोटियाँ, कामरूप, समुद्र तट, ताम्रपर्णी नदी, तथा अन्त में समुद्र के पार स्थित अनेक द्वीप। वे यह भी बताते हैं कि वहाँ रहने वाले राक्षसों और यक्षों से सावधान रहना होगा। यदि कहीं सीता का पता न चले तो वापस लौट आना। इस प्रकार सुग्रीव द्वारा नियुक्त वानर-दल पूर्व दिशा की ओर प्रस्थान करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ४०

(सुग्रीव द्वारा पूर्व दिशा में खोज का आदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : चार महीने की वर्षा ऋतु बीत चुकी है। सुग्रीव राज्य-सुख में इतने मग्न हो गए थे कि वे राम के कार्य को भूल गए। अब राम द्वारा भेजे गए लक्ष्मण के कठोर वचन सुनकर वे सचेत हुए और तुरन्त वानर-सेना को सीता की खोज हेतु चारों दिशाओं में भेजने का आदेश दिया। इस सर्ग में पूर्व दिशा में जाने वाले वानर-दल का निर्देश एवं मार्ग-वर्णन है।

🐒 सुग्रीव का आदेश और पूर्व दिशा दल का गठन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
सुग्रीवस्तु महातेजा वानरान् समचोदयत् ।
पूर्वां दिशं महाभागान् विनीतप्रमुखान् कपीन् ॥
विनतं शतबलिं चैव सुषेणं च महाबलम् ।
तारं चैव महातेजा वानरं वानरर्षभम् ॥
ऋषभं गवयं चैव गवाक्षं च महाबलम् ।
गजं नलं नीलं चैव वीरान् वानरपुंगवान् ॥
🔹 पदच्छेद : सुग्रीवः = सुग्रीव; तु = तो; महातेजाः = महान तेजस्वी; वानरान् = वानरों को; समचोदयत् = प्रेरित किया; पूर्वाम् = पूर्व; दिशम् = दिशा के लिए; महाभागान् = महान भाग्यशालियों को; विनीतप्रमुखान् = विनत के नेतृत्व वाले; कपीन् = वानरों को; विनतम् = विनत को; शतबलिम् = शतबलि को; च = और; एव = ही; सुषेणम् = सुषेण को; च = और; महाबलम् = महाबली को; तारम् = तार को; च = और; एव = ही; महातेजाः = महान तेजस्वी; वानरम् = वानर को; वानरर्षभम् = वानरश्रेष्ठ को; ऋषभम् = ऋषभ को; गवयम् = गवय को; च = और; एव = ही; गवाक्षम् = गवाक्ष को; च = और; महाबलम् = महाबली को; गजम् = गज को; नलम् = नल को; नीलम् = नील को; च = और; एव = ही; वीरान् = वीरों को; वानरपुंगवान् = वानरश्रेष्ठों को।
📖 भावार्थ : महातेजस्वी सुग्रीव ने वानरों को प्रेरित किया। उन्होंने पूर्व दिशा के लिए विनत के नेतृत्व में महाभाग वानरों को भेजा – विनत, शतबलि, महाबली सुषेण, वानरश्रेष्ठ तार, ऋषभ, गवय, महाबली गवाक्ष, गज, नल और नील इन वीर वानरों को।
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने पूर्व दिशा के लिए अनेक पराक्रमी वानरों का चयन किया। ये सभी वानर अत्यन्त बलशाली और बुद्धिमान थे। विनत को सेनापति बनाया गया।
॥ श्लोक ४-८ ॥
तानुवाच हरीन् सर्वान् सुग्रीवः परवीरहा ।
शृणुध्वं वानरश्रेष्ठाः कर्म कार्यमिदं मम ॥
पूर्वस्यां दिशि वै देशा नानाविधाः समाकुलाः ।
सीतामन्वेषितुं यूयं गच्छध्वं सह सैनिकैः ॥
तत्र गत्वा प्रयत्नेन मार्गध्वं जानकीं प्रियाम् ।
यत्र यत्र भवेत् सीता तं देशं परिमार्गत ॥
नदीश्च विविधाः पुण्याः पर्वतांश्च समन्ततः ।
वनानि च विचित्राणि देशांश्च सरितस्तथा ॥
आसमुद्रक्षितीशांश्च द्वीपांश्च सरितां पतेः ।
अन्वेषयत काकुत्स्थां मम वाक्यान्न संशयः ॥
📖 भावार्थ : शत्रुओं का विनाश करने वाले सुग्रीव ने उन सब वानरों से कहा: "हे वानरश्रेष्ठो! मेरे इस कार्य को सुनो। पूर्व दिशा में अनेक प्रकार के देश हैं। तुम सब अपने सैनिकों के साथ वहाँ जाकर सीता को खोजो। वहाँ जाकर प्रिय जानकी को पूरे प्रयत्न से ढूँढ़ो। जहाँ-जहाँ सीता हो सकती हैं, उन देशों को अच्छी तरह खोजो। विविध पुण्य नदियाँ, चारों ओर के पर्वत, विचित्र वन, देश और सरिताएँ – समुद्र तक की भूमि और समुद्र के द्वीपों तक – सबमें राम की पत्नी को खोजो। मेरे वचन से ऐसा करो, इसमें संदेह नहीं।"
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने वानरों को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे पूर्व दिशा के समस्त भू-भाग को खंगाल डालें – पर्वत, नदियाँ, वन, देश, समुद्रतट और द्वीप। यह खोज अत्यन्त व्यापक होनी चाहिए।

🌏 पूर्व दिशा का भूगोल – पर्वत, नदियाँ, देश (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
तत्र यक्षान् महाभागान् काश्मीरान् गन्धकांस्तथा ।
हिमवन्तं च गिरिवरं पूर्वां चैवोत्तरां दिशम् ॥
कामरूपान् सुदुर्गांश्च प्राग्ज्योतिषपुरं तथा ।
समुद्रं चापि तत्रैव रत्नाकरमनुत्तमम् ॥
ताम्रारुणां नदीं पुण्यां तथा ताम्रापर्णीमपि ।
तरङ्गिणीमहाभागां चन्दनाधिवासिनीम् ॥
द्वीपांश्च विविधांस्तत्र ये च केचन सागरे ।
सुवर्णरूप्यकांश्चैव ये च केचन द्वीपिनः ॥
📖 भावार्थ : "वहाँ यक्षों के देश, काश्मीर, गन्धक देश, हिमालय पर्वत, पूर्वोत्तर दिशा, सुदुर्ग कामरूप देश, प्राग्ज्योतिषपुर, रत्नाकर समुद्र, पुण्य ताम्रारुणा नदी, ताम्रापर्णी नदी, चन्दन से सुशोभित तरङ्गिणी, समुद्र में स्थित अनेक द्वीप, सुवर्ण-रूप्यक द्वीप तथा जितने भी द्वीप हैं, सबको खोजना।"
🔍 व्याख्या : वाल्मीकि ने पूर्वी भारत के भूगोल का अद्भुत चित्रण किया है – कश्मीर से लेकर असम (कामरूप), बंगाल की खाड़ी तक, तथा समुद्र पार के द्वीप (सुमात्रा, जावा आदि) तक का उल्लेख है। यह प्राचीन भारतीयों की भौगोलिक जानकारी को दर्शाता है।
॥ श्लोक १५-२० ॥
तत्र राक्षसयक्षांश्च गन्धर्वान् मनुजानपि ।
नदीः पर्वतदुर्गाणि वनान्युपवनानि च ॥
यदि सीता भवेत् तत्र तां चापि परिमार्गथ ।
गृध्रराजसखो वीरः सम्पातिर्नाम नामतः ॥
स तु वृद्धो महातेजा भ्राता जटायुषः प्रियः ।
तस्मादपि च विज्ञेयं सीतायाश्चरितं महत् ॥
इत्युक्त्वा वानरश्रेष्ठान् सुग्रीवः प्लवगेश्वरः ।
विसर्जयामास तदा पूर्वां दिशमरिन्दमः ॥
📖 भावार्थ : "वहाँ राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और मनुष्य भी हैं। नदियाँ, पर्वतों के दुर्ग, वन और उपवन – सब जगह खोज करो। यदि सीता वहाँ हों तो उन्हें ढूँढ़ो। गृध्रराज के मित्र, वीर सम्पाति नामक एक गृध्र है, जो बूढ़ा है और जटायु का प्रिय भाई है। उससे भी सीता के चरित्र के बारे में पता चल सकता है।" ऐसा कहकर वानरश्रेष्ठों को आदेश देकर शत्रुओं को पीड़ित करने वाले सुग्रीव ने उन्हें पूर्व दिशा में विदा किया।
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने सम्पाति का उल्लेख किया, जो जटायु का भाई था। बाद में वानरों को सम्पाति से ही सीता के लंका में होने का पता चलेगा। यहाँ सुग्रीव पूर्व दिशा के लिए सम्पाति का नाम लेते हैं, किन्तु वास्तव में सम्पाति का मिलन दक्षिण दिशा के वानरों से होता है। यह संभवतः पाठान्तर या आगामी घटना की ओर संकेत है।

🚩 पूर्व दिशा के वानरों का प्रस्थान (श्लोक २१-३२)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
ते वानरा महात्मानः सुग्रीववचनात् तदा ।
प्रययुः पूर्वां दिशममित्रनिबर्हणाः ॥
विनतेनाभ्यनुज्ञाताः सर्वे ते हरियूथपाः ।
वानराः कामरूपिणः प्रययुर्हृष्टमानसाः ॥
वनानि सरितश्चैव पर्वतान् काननानि च ।
विचिन्वन्तो महात्मानो न चापश्यन् महात्मिकाम् ॥
सीतां रामस्य महिषीं राक्षसाधिपमोहिताम् ।
सर्वे ते वानराः शूराः परं चक्रुः परिश्रमम् ॥
न च ददृशुरेकाग्रां वैदेहीं जनकात्मजाम् ।
ततस्ते विनिवृत्ताः स्म निराशाः प्राणहारिणि ॥
सुग्रीवं प्रति विक्रान्ताः समये समुपस्थिते ॥
📖 भावार्थ : सुग्रीव के वचन से वे महात्मा वानर, जो शत्रुओं का नाश करने वाले थे, पूर्व दिशा की ओर चल पड़े। विनत द्वारा अनुज्ञात वे सब वानर यूथपति, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, हर्षित मन से चले। वे वनों, सरिताओं, पर्वतों और काननों में खोज करते रहे, किन्तु उन्होंने राम की महिषी, राक्षसाधिप द्वारा मोहित सीता को नहीं पाया। उन शूर वीर वानरों ने बहुत परिश्रम किया, परन्तु जनकनन्दिनी वैदेही को न देख सके। तब वे सब निराश होकर, प्राणों को हरण करने वाले (अत्यन्त महत्वपूर्ण) कार्य में असफल हो, सुग्रीव के पास लौट आए।
🔍 व्याख्या : पूर्व दिशा के वानरों को सीता का पता नहीं चला। वे निराश होकर वापस लौट आए। यह बताता है कि सीता पूर्व दिशा में नहीं थीं। उनका पता दक्षिण दिशा में चलेगा।
॥ श्लोक २७-३२ ॥
सुग्रीवो ऽपि महातेजाः प्राप्तांस्तान् वानरर्षभान् ।
श्रुत्वा च वचनं तेषां सीताया अनिदर्शनम् ॥
चिन्तयामास धर्मात्मा रामकार्यहिते रतः ।
अन्यांश्च प्रेषयामास दिशः सर्वाः समन्ततः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी सुग्रीव ने उन वानरश्रेष्ठों के लौटने पर, उनसे सीता के न मिलने का वचन सुनकर, धर्मात्मा सुग्रीव राम के कार्य में लगे हुए, चिन्ता में पड़ गए। फिर उन्होंने अन्य वानरों को सभी दिशाओं में भेजा।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार पूर्व दिशा के वानर असफल रहे। अब सुग्रीव शेष दिशाओं (दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) में दल भेजेंगे, जिनका वर्णन आगे के सर्गों में है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐒 वानर-दल का गठन

सुग्रीव ने प्रत्येक दिशा के लिए पृथक् सेनापति और वीर वानर नियुक्त किए। यह संगठन कौशल और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। विनत, शतबलि, सुषेण आदि प्रमुख वानरों का चयन उनके पराक्रम और बुद्धि के आधार पर हुआ।

🗺️ प्राचीन भारत का भूगोल

इस सर्ग में वर्णित पूर्व दिशा के देश, पर्वत, नदियाँ और द्वीप प्राचीन भारतीय भूगोल की विस्तृत जानकारी देते हैं। यह ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कामरूप (असम), प्राग्ज्योतिषपुर, ताम्रापर्णी (ताप्ती या श्रीलंका की नदी?) आदि स्थानों के नाम आज भी प्रचलित हैं।

🕊️ सम्पाति का उल्लेख

सम्पाति का नाम पूर्व दिशा के वानरों को बताया गया है, किन्तु आगे चलकर दक्षिण दिशा के वानर सम्पाति से मिलेंगे। यहाँ यह संकेत मात्र है कि सम्पाति से सीता की जानकारी प्राप्त हो सकती है। यह पाठक को आगे की घटना के लिए उत्सुक करता है।

⏳ समय का महत्त्व

वर्षा ऋतु समाप्त होते ही सुग्रीव ने तुरन्त खोज आरम्भ कर दी। यह दर्शाता है कि कर्तव्यपालन में विलम्ब उचित नहीं है। राम के प्रति सुग्रीव की कृतज्ञता और मित्रता का यह व्यावहारिक रूप है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी कार्य को करने के लिए सही समय पर उचित योजना और संगठन आवश्यक है। सुग्रीव ने वानर-सेना को सुव्यवस्थित रूप से चारों दिशाओं में भेजा। साथ ही, भूगोल का ज्ञान और स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी भी सफलता के लिए आवश्यक है। असफलता से निराश न होकर अन्य प्रयास जारी रखना चाहिए – सुग्रीव ने पूर्व दिशा से निराश होकर अन्य दिशाओं में दल भेजे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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