वानर प्रमुखों का पृथ्वी पर जाना

किष्किन्धाकाण्ड के सैंतीसवें सर्ग में वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद सुग्रीव राम के आदेश से वानर सेनापतियों को चारों दिशाओं में सीता की खोज के लिए भेजते हैं। हनुमान को विशेष रूप से दक्षिण दिशा में भेजा जाता है और राम अपनी अंगूठी हनुमान को सौंपते हैं।

विवरण

वर्षा ऋतु समाप्त होने पर राम सीता के विरह में अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं। वे सुग्रीव से खोज आरम्भ करने का आग्रह करते हैं। तब सुग्रीव सभी वानर यूथपतियों को बुलाकर उन्हें चारों दिशाओं में सीता की खोज के लिए भेजने की आज्ञा देते हैं। विनतापुत्र आदि पूर्व दिशा को, सुषेण के नेतृत्व में कुछ वानर पश्चिम दिशा को, शतबलि उत्तर दिशा को और हनुमान, अंगद, जाम्बवान आदि दक्षिण दिशा को प्रस्थान करते हैं। सुग्रीव हनुमान को विशेष रूप से दक्षिण दिशा में जाने का निर्देश देते हैं और राम की प्रेरणा से उन्हें अपनी अंगूठी सौंपते हैं, जिसे सीता को दिखाकर विश्वास दिलाया जा सके। सभी वानर अपने-अपने दलों सहित विभिन्न मार्गों से खोज करने निकल पड़ते हैं। कुछ वानर बिना सफलता के लौटते हैं, परन्तु हनुमान का अभियान आगे भी जारी रहता है। यह सर्ग वानरों के विशाल खोज अभियान का प्रारम्भ दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३७

(वानर प्रमुखों का पृथ्वी पर जाना – दिशाओं में प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी है। राम सीता की चिन्ता में व्याकुल होकर सुग्रीव से शीघ्र सीता की खोज आरम्भ करने का आग्रह करते हैं। तब सुग्रीव वानर सेनापतियों को बुलाकर उन्हें चारों दिशाओं में भेजने की तैयारी करता है। इस सर्ग में सुग्रीव द्वारा वानर प्रमुखों को नियुक्त करना और उनका पृथ्वी के विभिन्न भागों में प्रस्थान करना वर्णित है।

🐒 सुग्रीव की आज्ञा और वानरों का संघटन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः सुग्रीवो धर्मात्मा रामं प्रीत्या समागतम् ।
आजुहाव विनीतात्मा वानरान् वानरर्षभः ॥
ते च सर्वे समागम्य वानराः कामरूपिणः ।
अभिवाद्य सुग्रीवं च तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा ॥
स तानुवाच सुग्रीवो वचनं वदतां वरः ।
दिशः सर्वाः समीक्षध्वं सीतायाः परिमार्गणे ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुग्रीवः = सुग्रीव; धर्मात्मा = धर्मात्मा; रामम् = राम; प्रीत्या = प्रेमपूर्वक; समागतम् = आये हुए; आजुहाव = बुलाया; विनीतात्मा = विनीत मन वाले; वानरान् = वानरों को; वानरर्षभः = वानरों में श्रेष्ठ; ते = वे; च = और; सर्वे = सब; समागम्य = एकत्र होकर; वानराः = वानर; कामरूपिणः = इच्छानुसार रूप धारण करने वाले; अभिवाद्य = प्रणाम करके; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; च = तथा; तस्थुः = ठहरे; प्राञ्जलयः = हाथ जोड़े हुए; तदा = तब; सः = उसने; तान् = उनको; उवाच = कहा; सुग्रीवः = सुग्रीव ने; वचनम् = वचन; वदताम् = बोलने वालों में; वरः = श्रेष्ठ; दिशः = दिशाओं को; सर्वाः = सब; समीक्षध्वम् = देखो; सीतायाः = सीता की; परिमार्गणे = खोज में।
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा सुग्रीव ने, जो वानरों में श्रेष्ठ और विनीत थे, राम के साथ आकर प्रसन्नतापूर्वक सभी वानरों को बुलाया। इच्छानुसार रूप धारण करने वाले सभी वानर एकत्र हुए और सुग्रीव को प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गए। तब वक्ताओं में श्रेष्ठ सुग्रीव ने उनसे कहा: "तुम सब सीता की खोज के लिए सभी दिशाओं का अवलोकन करो।"
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने राम के आदेश पर वानर सेना को संगठित किया। ये वानर कामरूपी थे, अर्थात कोई भी रूप धारण कर सकते थे, जो खोज के लिए अत्यन्त उपयोगी था।
॥ श्लोक ४-१० ॥
प्राचीं दिशं महावीर्याः विनतात्मजपूर्वगाः ।
यूथपाः सह यूथैश्च प्रस्थिता रामशासनात् ॥
दक्षिणां दिशमत्युग्राः सुषेणप्रमुखा गताः ।
हनूमानङ्गदश्चैव जाम्बवांश्च महाबलः ॥
प्रतीचीं दिशमगच्छन् वानरा रणशालिनः ।
सुषेणो वीर्यसम्पन्नो वानरैर्बहुभिर्वृतः ॥
उदीचीं दिशमागच्छन् शतबलिप्रमुखा गणाः ।
इत्याज्ञप्तास्तु सुग्रीवेण वानरा हरियूथपाः ॥
📖 भावार्थ : महावीर्य वानर, जिनके अग्रणी विनतापुत्र (विनत के पुत्र) थे, राम की आज्ञा से अपने-अपने यूथों सहित पूर्व दिशा की ओर प्रस्थित हुए। अत्यन्त उग्र सुषेण आदि प्रमुख वानर दक्षिण दिशा को गए, जिनमें हनुमान, अंगद और महाबलशाली जाम्बवान भी थे। रणशाली वानर पश्चिम दिशा को गए, जिनके नेता वीर्यसम्पन्न सुषेण थे, और अनेक वानरों से घिरे थे। शतबलि प्रमुख गण उत्तर दिशा को गए। इस प्रकार सुग्रीव द्वारा आज्ञप्त वे सभी हरियूथप (वानर सेनापति) चारों दिशाओं में फैल गए।

🔱 हनुमान को विशेष दायित्व और राम का अंगूठी-दान (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः सुग्रीवो धर्मात्मा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
न त्वं विना हनूमन्तं गन्तुमर्हसि दक्षिणाम् ॥
तव गत्वा हनूमन् वै सीतादर्शनमस्ति वा ।
इति विज्ञाय कर्तव्यं यथायुक्तं त्वया विभो ॥
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै रामाङ्गुलीयकं शुभम् ।
हनूमते महातेजाः सुग्रीवो रामचोदितः ॥
गृहीत्वा तद्धनूमान् तु रामाङ्गुलीयकं महत् ।
प्रणम्य रामसुग्रीवौ प्रययौ दक्षिणां दिशम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा सुग्रीव ने हनुमान से कहा: "हे हनुमान! तुम्हारे बिना कोई दक्षिण दिशा में नहीं जा सकता। हे हनूमन! तुम जाकर ही सीता के दर्शन कर सकते हो। ऐसा समझकर हे विभो! तुम यथोचित प्रयत्न करो।" ऐसा कहकर राम की प्रेरणा से महातेजा सुग्रीव ने हनुमान को राम की शुभ अंगूठी प्रदान की। उस महान राम-अंगूठी को ग्रहण करके हनुमान ने राम और सुग्रीव को प्रणाम किया और दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : यह अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रसंग है। राम की अंगूठी सीता के लिए पहचान-चिह्न थी। हनुमान को विशेष रूप से दक्षिण दिशा में भेजा गया क्योंकि लंका दक्षिण में थी और हनुमान ही उस कठिन कार्य को करने में समर्थ थे।
॥ श्लोक १६-२२ ॥
ततोऽन्ये वानरश्रेष्ठा जग्मुः सर्वे दिशो दश ।
सुग्रीवेण समादिष्टाः सीतान्वेषणतत्पराः ॥
ते गत्वा बहुधा भूमिं ददृशुर्मार्गतत्पराः ।
नदीः पर्वतकान्तारान् ग्रामान् पुरपतेस्तथा ॥
न चापश्यन् वने सीतां रावणेन हृतां प्रियाम् ।
विषण्णवदना भूत्वा पुनर्यूथान्युपागमन् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव द्वारा आदिष्ट अन्य सभी वानरश्रेष्ठ भी सीता की खोज में दसों दिशाओं को चले गए। वे बहुत प्रकार से भूमि पर जाकर, मार्ग में नदियों, पर्वतों, वनों, गाँवों और राजाओं के नगरों को देखते हुए खोज करने लगे। परन्तु रावण द्वारा हर ली गई प्रिया सीता को वे वन में नहीं पा सके। तब वे निराश होकर पुनः अपने-अपने यूथों में लौट आए।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोकों में यह संकेत है कि आरम्भिक खोज में सीता नहीं मिली, जिससे वानर निराश हुए। किन्तु हनुमान का अभियान अभी शेष था, जो आगे सुन्दरकाण्ड में वर्णित है।

🌏 दिशाओं में प्रस्थान का महत्त्व

इस सर्ग में वानरों का चारों दिशाओं में प्रस्थान एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह राम-रावण युद्ध की भूमिका तैयार करता है। हनुमान को दक्षिण दिशा में भेजना और राम की अंगूठी देना यह सिद्ध करता है कि हनुमान ही इस महान कार्य को पूरा करेंगे। इस प्रकार किष्किन्धाकाण्ड का यह सर्ग वानरों के अभियान का शुभारम्भ बताता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧭 दिशा-निर्देश और संगठन

सुग्रीव ने चारों दिशाओं में वानरों को भेजकर एक सुव्यवस्थित खोज अभियान का प्रबन्ध किया। यह संगठन क्षमता को दर्शाता है।

💍 राम की अंगूठी

राम द्वारा हनुमान को अंगूठी देना न केवल पहचान का माध्यम था, बल्कि यह राम के अटूट विश्वास और हनुमान के प्रति स्नेह को भी दर्शाता है।

🌋 हनुमान का दक्षिणाभिमुख प्रस्थान

दक्षिण दिशा में लंका स्थित थी, अतः हनुमान का वहाँ जाना सुन्दरकाण्ड की पृष्ठभूमि तैयार करता है। यह रामायण की कथा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन बिन्दु है।

⚔️ वानर सेना का उत्साह

वानरों का उत्साह और निष्ठा यह सिद्ध करती है कि सुग्रीव एक कुशल नेता हैं और राम के प्रति उनकी भक्ति अटूट है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी कठिन कार्य को करने के लिए सही योजना, संगठन और विश्वसनीय सहायकों की आवश्यकता होती है। राम ने सुग्रीव के माध्यम से विशाल वानर सेना को चारों दिशाओं में भेजकर सीता की खोज का व्यापक प्रबन्ध किया। साथ ही, हनुमान जैसे सक्षम व्यक्ति को विशेष उत्तरदायित्व सौंपना यह दर्शाता है कि बड़े कार्यों के लिए योग्य व्यक्तियों का चयन आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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