तारा द्वारा लक्ष्मण को मनाना

किष्किन्धाकाण्ड के पैंतीसवें सर्ग में लक्ष्मण के क्रोध और तारा द्वारा उन्हें समझाने की कथा है। सुग्रीव कर्तव्य-विमुख हो जाते हैं, जिससे क्रोधित लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचते हैं। तारा अपनी बुद्धिमता से लक्ष्मण को शान्त करती हैं और सुग्रीव को कार्य में लगने का आश्वासन दिलाती हैं।

विवरण

वालि के वध के पश्चात् सुग्रीव का राज्याभिषेक हो चुका है। राम के कार्य को भूलकर सुग्रीव भोग-विलास में डूब जाता है। चार मास बीत जाने पर भी वह सीता की खोज हेतु वानर नहीं भेजता। राम के आदेश पर लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित होकर किष्किन्धा पहुँचते हैं। वे सुग्रीव को कर्तव्य का स्मरण दिलाना चाहते हैं, परन्तु उनका क्रोध उग्र रूप धारण कर लेता है। तब तारा, जो वालि की विधवा और अत्यन्त बुद्धिमती हैं, लक्ष्मण के सामने आती हैं। वे विनम्रता और तर्कपूर्ण वचनों से लक्ष्मण के क्रोध को शान्त करती हैं। तारा बताती हैं कि सुग्रीव ने आलस्य या प्रमाद के कारण नहीं, बल्कि वर्षाकाल की प्रतीक्षा और कार्य की गुरुता के कारण विलम्ब किया है। वे आश्वासन देती हैं कि वर्षा समाप्त होते ही सुग्रीव सभी दिशाओं में वानर भेज देगा। तारा के वचन सुनकर लक्ष्मण शान्त होते हैं और सुग्रीव का सम्मान करते हैं। इसके बाद सुग्रीव मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करके वानरों को सीता की खोज हेतु भेजने की तैयारी करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३५

(तारा द्वारा लक्ष्मण को मनाना – Tara Pacifies Lakshmana)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वालि के वध के पश्चात् सुग्रीव का राज्याभिषेक हो चुका है। परन्तु सुग्रीव भोग-विलास में डूबकर सीता की खोज हेतु वानर भेजने का कार्य भूल गया है। राम के आदेश पर लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित होकर किष्किन्धा पहुँचते हैं। वे सुग्रीव को उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाना चाहते हैं, परन्तु उनका क्रोध उग्र रूप धारण कर लेता है। तब तारा, जो वालि की विधवा और एक बुद्धिमती नारी हैं, लक्ष्मण के सामने आती हैं और उन्हें समझाने का प्रयास करती हैं। यह सर्ग तारा की वाक्पटुता, धैर्य और बुद्धि का अद्भुत उदाहरण है।

⚡ लक्ष्मण का क्रोध और किष्किन्धा में प्रवेश (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः कालेन महता सुग्रीवो वानरेश्वरः ।
रामकार्यमपि त्यक्त्वा भोगान् भोक्तुं प्रचक्रमे ॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः क्रुद्धो रामस्य प्रियकाम्यया ।
इदं वचनमव्यग्रं सुग्रीवं प्रत्यभाषत ॥
सुग्रीव त्वं कृतार्थोऽपि कृतं कार्यं न बुध्यसे ।
इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां प्रियं कर्तुं त्वमर्हसि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कालेन = समय बीतने पर; महता = बहुत अधिक; सुग्रीवः = सुग्रीव; वानरेश्वरः = वानरराज; रामकार्यम् = राम का कार्य; अपि = भी; त्यक्त्वा = छोड़कर; भोगान् = भोगों को; भोक्तुम् = भोगने के लिए; प्रचक्रमे = प्रवृत्त हुआ; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; क्रुद्धः = क्रोधित हुए; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय करने की इच्छा से; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अव्यग्रम् = अव्यग्र (स्पष्ट); सुग्रीवम् = सुग्रीव को; प्रत्यभाषत = बोले; सुग्रीव = हे सुग्रीव; त्वम् = तुम; कृतार्थः = कृतार्थ होकर; अपि = भी; कृतम् = किए जाने योग्य; कार्यम् = कार्य; न = नहीं; बुध्यसे = समझते हो; इक्ष्वाकूणाम् = इक्ष्वाकुओं का; हि = ही; सर्वेषाम् = सबका; प्रियम् = प्रिय; कर्तुम् = करने के लिए; त्वम् = तुम; अर्हसि = योग्य हो।
📖 भावार्थ : बहुत समय बीत जाने पर वानरराज सुग्रीव राम के कार्य को भूलकर भोग-विलास में लीन हो गए। उन्हें इस प्रकार देखकर राम के प्रिय की इच्छा रखने वाले लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित हुए और सुग्रीव से स्पष्ट वचन बोले: "हे सुग्रीव! तुम अपने उद्देश्य में सफल हो गए, परन्तु अब करने योग्य कार्य को नहीं समझ रहे हो। तुम्हें सभी इक्ष्वाकुओं का प्रिय करना चाहिए।"
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण का क्रोध उचित था क्योंकि सुग्रीव ने राम की सहायता के बिना राज्य प्राप्त किया था और बदले में सीता की खोज का वचन दिया था। किन्तु चार महीने बीत जाने पर भी उसने कोई प्रयास नहीं किया। लक्ष्मण इसीलिए क्रोधित होकर किष्किन्धा पहुँचे।
॥ श्लोक ४-७ ॥
यदि कामकृते राज्यं सुग्रीवः प्राप्तवानिमम् ।
धर्मतः सत्यतश्चापि कथं नो नाभिनन्दति ॥
इत्येवं ब्रुवति क्रुद्धे लक्ष्मणे रामलक्ष्मणे ।
तारा नाम वरारोहा सुग्रीवं प्रत्यभाषत ॥
न रोष्टुमर्हसि प्रीत्या वानरेन्द्रं यशस्विनम् ।
अहं हि ते प्रियं वाक्यं वक्ष्यामि शृणु लक्ष्मण ॥
📖 भावार्थ : "यदि सुग्रीव ने केवल भोग-लिप्सा के लिए यह राज्य प्राप्त किया है, तो धर्म और सत्य से वह हमारा आदर क्यों नहीं करता?" इस प्रकार क्रोध में लक्ष्मण के कहने पर, सुन्दर नारी तारा ने सुग्रीव की ओर देखते हुए कहा: "हे लक्ष्मण! तुम इस यशस्वी वानरेन्द्र पर प्रेमपूर्वक क्रोध करने योग्य नहीं हो। मैं तुमसे एक प्रिय वाक्य कहूँगी, उसे सुनो।"
🔍 व्याख्या : तारा ने लक्ष्मण के क्रोध को शान्त करने के लिए यह विनम्र प्रस्ताव रखा। वह जानती थी कि लक्ष्मण का क्रोध न्यायसंगत है, किन्तु उसे शान्त करने का उपाय विनय और तर्क है।

🕊️ तारा का उपदेश और तर्क (श्लोक ८-१५)

॥ श्लोक ८-११ ॥
वर्षाकालं प्रतीक्षध्वं विगते वर्षि वानराः ।
प्रयास्यन्ति दिशः सर्वा हेतुभिः प्रतिचोदिताः ॥
सुग्रीवो न प्रमादेन न कामान्धो न चालसः ।
कार्याणां हि गरीयस्त्वात्स्थित एष समाहितः ॥
इतः प्रभृति सुग्रीवः कर्ता ते प्रियमुत्तमम् ।
न चापि वाच्यस्ते क्रोधाद्भ्रातुर्वाक्यमिदं शृणु ॥
📖 भावार्थ : "हे लक्ष्मण! आप वर्षाकाल के समाप्त होने की प्रतीक्षा करें। वर्षा बीतते ही ये सभी वानर विभिन्न कारणों से प्रेरित होकर सभी दिशाओं में जाएँगे। सुग्रीव न तो प्रमाद के कारण, न कामान्ध होकर, न ही आलस्य से ऐसे हैं। वरन् कार्य की गुरुता के कारण वे इस प्रकार स्थित हैं (विचार कर रहे हैं)। अब से सुग्रीव आपका उत्तम प्रिय करेंगे। आप क्रोध से उन्हें न धिक्कारें, मेरे इस वाक्य को सुनें।"
🔍 व्याख्या : तारा ने सुग्रीव की ओर से दो तर्क दिए: पहला, वर्षाकाल में वानरों का एकत्रित होना और यात्रा करना कठिन है, अतः वर्षा समाप्ति की प्रतीक्षा की जा रही है। दूसरा, सुग्रीव ने कार्य को महत्त्व देते हुए उचित योजना बनाने में समय लिया है।
॥ श्लोक १२-१५ ॥
एष ते हृदयं वीर वानरेन्द्रः समाहितः ।
यथाक्रमं च कार्याणां कर्ता नात्र विचारणा ॥
तव चैवानुजानीहि सुग्रीवं मैथिलीप्रिय ।
अभयं च प्रयच्छस्व सर्वेषां वानरेश्वर ॥
ताराया वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रसन्नमनसो भूत्वा सुग्रीवं प्रत्यपूजयत् ॥
📖 भावार्थ : "हे वीर! यह वानरेन्द्र आपके हृदय को जानता है और कार्यों के क्रम के अनुसार ही करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। हे मैथिलीप्रिय! आप सुग्रीव को आज्ञा दें और सब वानरों को अभयदान दें।" तारा के वचन सुनकर परवीरहा लक्ष्मण प्रसन्नचित्त हो गए और उन्होंने सुग्रीव का सम्मान किया।

🤝 लक्ष्मण का शांत होना और सुग्रीव से मिलन (श्लोक १६-२१)

॥ श्लोक १६-१८ ॥
ततः प्रसन्नवदनो लक्ष्मणः शुभलक्षणः ।
सुग्रीवमिदं वाक्यमुवाच हितमद्भुतम् ॥
राजन् कृतार्थः सुग्रीव मा भूस्त्वं विमना इव ।
रामप्रियार्थं यत्नस्ते कर्तव्यो नात्र संशयः ॥
एवमुक्त्वा तु लक्ष्मणः सुग्रीवेण समागतः ।
चकार सचिवैः सार्धं मन्त्रं रामार्थसिद्धये ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्नमुख लक्ष्मण ने सुग्रीव से यह हितकर एवं अद्भुत वचन कहा: "हे राजन् सुग्रीव! तुम कृतार्थ हो, अब उदास मत होओ। राम के प्रिय कार्य के लिए तुम्हें प्रयत्न करना ही चाहिए, इसमें संदेह नहीं।" ऐसा कहकर लक्ष्मण सुग्रीव के पास गए और मन्त्रियों के साथ राम के कार्य की सिद्धि के लिए मन्त्रणा करने लगे।
🔍 व्याख्या : तारा की बुद्धिमता ने लक्ष्मण के क्रोध को शान्त किया और सुग्रीव को कर्तव्य-बोध कराया। इसके बाद सुग्रीव ने वानरों को सीता की खोज हेतु भेजने का निश्चय किया, जिसकी चर्चा अगले सर्ग में होगी।
॥ श्लोक १९-२१ ॥
इति प्रसाद्य लक्ष्मणं तारा वाक्यविशारदा ।
ययौ स्वभवनं हृष्टा पूजिता लक्ष्मणेन च ॥
ततः सुग्रीवः सचिवैः सह सर्वैः समन्त्र्य च ।
दिशः प्रस्थापयामास वानरान् रामकाम्यया ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार वाक्य-विशारदा तारा ने लक्ष्मण को प्रसन्न करके, लक्ष्मण से पूजित होकर, प्रसन्नतापूर्वक अपने भवन को गई। तत्पश्चात् सुग्रीव ने सब मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करके राम के कार्य हेतु वानरों को सभी दिशाओं में भेजा।
यह किष्किन्धाकाण्ड का पैंतीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।

🔍 गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👸 तारा का बुद्धि-कौशल

तारा न केवल सुन्दरी हैं, वरन् अत्यन्त बुद्धिमती भी हैं। उन्होंने क्रोधित लक्ष्मण को शान्त करने हेतु मृदुता और तर्क दोनों का प्रयोग किया। उनका यह व्यवहार स्त्री-शक्ति और कूटनीति का उत्कृष्ट उदाहरण है।

⚖️ धर्म और क्रोध का सन्तुलन

लक्ष्मण का क्रोध धर्मयुक्त था, किन्तु क्रोध में किया गया कार्य विनाशकारी हो सकता था। तारा ने उन्हें धैर्य और विवेक का पाठ पढ़ाया। यह सिखाता है कि क्रोध पर नियन्त्रण आवश्यक है।

🗓️ काल-प्रतीक्षा का महत्त्व

तारा ने वर्षाकाल की प्रतीक्षा का तर्क दिया। यह बताता है कि कार्यसिद्धि के लिए उचित समय की प्रतीक्षा करना भी एक रणनीति है। अवसर देखकर किया गया कार्य ही सफल होता है।

🤲 कृतज्ञता का भाव

लक्ष्मण ने तारा की बात मानकर यह दिखाया कि सच्चा वीर वही है जो दूसरों की सलाह का सम्मान करे। राम-लक्ष्मण में यह गुण विद्यमान था।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध में आकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति की सलाह से मार्ग प्रशस्त होता है। साथ ही, मित्रता का निर्वाह करने के लिए समय-समय पर मधुर वचन और तर्क द्वारा समझाना आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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