लक्ष्मण द्वारा सुग्रीव की निन्दा

किष्किन्धाकाण्ड का चौंतीसवाँ सर्ग अत्यन्त क्रोधित लक्ष्मण के सुग्रीव को कठोर शब्दों में फटकारने का वर्णन करता है। वर्षा ऋतु बीत जाने पर भी सीता की खोज हेतु सेना न भेज पाने के कारण लक्ष्मण सुग्रीव की भर्त्सना करते हैं और उसे उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाते हैं।

विवरण

वर्षा ऋतु के चार महीने बीत चुके थे। राम का आज्ञा पालन करते हुए माल्यवान् पर्वत पर प्रतीक्षा कर रहे थे। परन्तु सुग्रीव अपने राज्य-सुख में इतना मग्न हो गया था कि वह सीता की खोज का अपना वचन पूरी तरह भूल चुका था। वह दिन-रात रुमा एवं तारा के साथ विलासिता के जीवन में डूबा रहता था। अन्ततः राम का धैर्य टूट गया। उन्होंने देखा कि सुग्रीव ने उपेक्षा की है। उनके क्रोध का पार न रहा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि सुग्रीव को उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाओ। तब लक्ष्मण अत्यन्त कुपित होकर सुग्रीव के पास गये। उनके मुख पर क्रोध था, नेत्र लाल थे और वे धनुष पर बाण चढ़ाये हुए थे। किष्किन्धा नगरी में प्रवेश करते ही उनका भयानक रूप देखकर सब वानर डर गये। लक्ष्मण ने सुग्रीव को कठोर शब्दों में फटकारा। उन्होंने उसे कृतघ्न, मित्रद्रोही और अधम बताया। उन्होंने सुग्रीव से कहा कि जो मित्र के काम न आये, वह जीवित ही मृतक समान है। लक्ष्मण की कठोर वाणी सुनकर सुग्रीव बहुत डर गया। अन्त में तारा ने लक्ष्मण को शान्त किया और सुग्रीव ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए सीता की खोज हेतु तुरन्त सेना भेजने का आश्वासन दिया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३४

(लक्ष्मण द्वारा सुग्रीव की निन्दा – मित्र के कर्तव्य का स्मरण)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वर्षा ऋतु बीत चुकी थी। राम प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पूर्व दिशा की ओर देखते और सीता के समाचार की प्रतीक्षा करते। परन्तु सुग्रीव राजसुख में इतना मग्न था कि उसे राम से किये वचन का स्मरण ही न रहा। अब राम का धैर्य टूट चुका था। उन्होंने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। यह सर्ग उसी क्रोधित लक्ष्मण के वज्र-समान वचनों की कथा है।

🔥 क्रोधित लक्ष्मण का किष्किन्धा में प्रवेश (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रातः समुत्थाय रामः सूर्योदये नृप ।
सुग्रीवमनुसंदष्टुं लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥
गच्छ लक्ष्मण जानीहि सुग्रीवं कृतनिश्चयम् ।
किं नु मां नाभिजानाति मत्तं वा कामभोगतः ॥
न हि मे विप्रियं कुर्यात्कामं क्रोधं च लक्ष्मण ।
तथा ब्रूयाश्च तं गत्वा यथा स सुमहायशाः ॥
📖 भावार्थ : हे राजन्! (वाल्मीकि ने कहा) तत्पश्चात प्रातःकाल सूर्योदय होने पर राम ने सुग्रीव को (उसके आलस्य पर) कठोर शब्द कहने के लिए लक्ष्मण से यह वाक्य कहा – "हे लक्ष्मण! जाओ और सुग्रीव का निश्चय जानो। क्या वह मुझे पहचानता नहीं? अथवा वह कामभोगों में मतवाला हो गया है? हे लक्ष्मण! मैं जानता हूँ कि वह मेरा अप्रिय नहीं कर सकता, न ही काम और क्रोध के वश में होकर ऐसा कर सकता है। तुम वहाँ जाकर ऐसा कहना कि वह महायशस्वी (सुग्रीव) (अपने कर्तव्य को समझे)।"
🔍 व्याख्या : राम अब भी सुग्रीव को दोष नहीं दे रहे, बल्कि उसकी स्थिति जानना चाहते हैं। वे जानते हैं कि सुग्रीव मूलतः कर्तव्यनिष्ठ है, परन्तु राजसुख ने उसे विचलित कर दिया है।
॥ श्लोक ४-७ ॥
इत्युक्तः स तु रामेण लक्ष्मणः शत्रुसूदनः ।
जगाम सहसा तत्र यत्र राजा कपीन्द्रः ॥
स ददर्श महातेजाः सुग्रीवं प्लवगाधिपम् ।
रुमया सहितं राजन् तारया च महाबलः ॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः क्रुद्धो वेगेनाभ्यपतद्द्रुतम् ।
ततो ददर्श तेजस्वी हनूमन्तं व्यवस्थितम् ॥
हनूमानपि तं दृष्ट्वा लक्ष्मणं रोषमूर्छितम् ।
उवाच वचनं राजन् सुग्रीवं प्रियमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : राम के ऐसा कहने पर शत्रुओं का संहार करने वाले लक्ष्मण शीघ्र ही वहाँ गये जहाँ वानरराज सुग्रीव था। हे राजन्! महातेजस्वी महाबली लक्ष्मण ने सुग्रीव को रुमा और तारा के साथ देखा। लक्ष्मण को देखकर क्रोधित होकर वे वेग से आगे बढ़े। तब तेजस्वी लक्ष्मण ने हनुमान को वहाँ स्थित देखा। हनुमान ने भी क्रोध से भरे लक्ष्मण को देखकर, हे राजन्! सुग्रीव से उत्तम प्रिय वचन कहे।

⚡ लक्ष्मण की कठोर वाणी (श्लोक ८-२१)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
किमिदं वानरश्रेष्ठ यशसा परिहीयसे ।
धर्ममर्थं च कामं च यशश्च प्रतिपद्यसे ॥
यस्य ते धर्मकामार्था यशश्च न भविष्यति ।
किं करिष्यसि दुर्बुद्धे प्राप्य राज्यमकण्टकम् ॥
मैवं वोढुं त्वया राजन् राज्यं भ्रातृसमीपतः ।
यथेष्टं चर कामांस्त्वं मा स्म तात विचारय ॥
अहं हि रामं वक्ष्यामि यथावृत्तं तवानघ ।
स चापि रामः काकुत्स्थः करिष्यति मतं मम ॥
न हि त्वां प्राप्य राज्यं तु रामः सौमित्रिणा सह ।
उपेक्षितुं क्षमः कोपात्तस्मात्त्वं शरणं व्रज ॥
📖 भावार्थ : (लक्ष्मण ने कहा) "हे वानरश्रेष्ठ! यह क्या? तुम अपने यश से गिर रहे हो? जिसे धर्म, अर्थ, काम और यश प्राप्त होते हैं – हे दुर्बुद्धे! जिसके ये धर्म, काम, अर्थ और यश नहीं रहेंगे, वह निष्कण्टक राज्य पाकर क्या करेगा? हे राजन्! भाई के समीप से राज्य पाकर तुझे ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए। तू इच्छानुसार भोग भोग, परन्तु हे तात! विचार तो कर। मैं तेरा यह वृत्तान्त राम से कहूँगा, और वे राम मेरी बात मानेंगे। क्योंकि राम सौमित्रि (लक्ष्मण) सहित तुझे राज्य देकर अब क्रोध में उपेक्षा नहीं कर सकते। इसलिए तू उनकी शरण में जा।"
॥ श्लोक १३-२१ ॥
अनृतं वाच्यमानं तु सुग्रीवं वानरर्षभम् ।
प्रत्युवाच ततो राजा क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥
न च मे ऽनृतमित्युक्त्वा प्रतिज्ञां हातुमुत्सहे ।
न च मां राममुख्यो ऽयं भर्त्सयेत्पुरुषर्षभः ॥
तव चैवापराधेन भ्रातुश्चैव महात्मनः ।
न मे कोपः प्रवर्तेत त्वयि वीर कथंचन ॥
एवमुक्त्वा तु सुग्रीवो लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ।
न मे ऽपराधो भद्रं ते तारया ह्यस्मि वारितः ॥
तारा मां वारयामास न गन्तव्यमिति प्रभो ।
त्वं तु मे वचनं श्रुत्वा क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार वानरश्रेष्ठ सुग्रीव को झूठा कहे जाने पर, क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाले राजा सुग्रीव ने (लक्ष्मण को) उत्तर दिया: "मैं झूठा नहीं हूँ, और न ही अपनी प्रतिज्ञा को त्याग सकता हूँ। यह राम, पुरुषश्रेष्ठ, मुझे कभी नहीं डाँट सकते। तथा हे वीर! तेरे और तेरे महात्मा भाई के अपराध से मुझे तुझ पर क्रोध नहीं आना चाहिए।" ऐसा कहकर सुग्रीव ने लक्ष्मण से कहा: "मेरा कोई अपराध नहीं है, तुम्हारा कल्याण हो। तारा ने मुझे रोका था। हे प्रभो! तारा ने मुझे कहा – नहीं जाना चाहिए। तुम मेरी बात सुनकर क्षमा करने योग्य हो।"

🕊️ तारा द्वारा लक्ष्मण को शान्त करना (श्लोक २२-२९)

॥ श्लोक २२-२५ ॥
ततः प्रविश्य तारा तु सुग्रीवं वाक्यमब्रवीत् ।
मा भैः कपीन्द्र सुग्रीव न त्वं गन्तुमिहार्हसि ॥
अहं तु लक्ष्मणं वीरं प्रसादयितुमुत्सहे ।
ततः सा लक्ष्मणं वीरमुपागम्याभ्यवादयत् ॥
सा प्राञ्जलिरुवाचेदं लक्ष्मणं प्रियदर्शनम् ।
नायमपराधो वीर सुग्रीवस्य महात्मनः ॥
ममापराधेन हि ते निवृत्तः सुग्रीव एव हि ।
तं प्रसादयितुं युक्तं रामस्य च महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : तब तारा ने (हस्तक्षेप करते हुए) सुग्रीव से कहा: "हे कपीन्द्र सुग्रीव! डरो मत, तुम्हें यहाँ से जाना उचित नहीं। मैं वीर लक्ष्मण को प्रसन्न कर सकती हूँ।" फिर वह वीर लक्ष्मण के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया। प्रियदर्शन लक्ष्मण से हाथ जोड़कर वह बोली: "हे वीर! महात्मा सुग्रीव का यह अपराध नहीं है। मेरे अपराध से ही सुग्रीव रुके हुए हैं। आप महात्मा राम को प्रसन्न करने के योग्य हैं।"
॥ श्लोक २६-२९ ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं तारां मधुरया गिरा ॥
न मे तारे त्वयि क्रोधः सुग्रीवे न च मे क्रुधा ।
किं तु रामस्य काकुत्स्थः क्रुद्धो भवति वा न वा ॥
एवमुक्त्वा तु तारां तु लक्ष्मणः परवीरहा ।
न्यवर्तत महातेजा रामस्यानुचरः प्रियः ॥
ततो हनूमान्सुग्रीवमिदं वचनमब्रवीत् ।
गच्छ राजन् प्रसादय रामं सत्यपराक्रमम् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तारा के उस वचन को सुनकर परवीरहा लक्ष्मण ने मधुर वाणी में तारा से कहा: "हे तारे! मुझे तुझ पर कोई क्रोध नहीं है, न ही सुग्रीव पर मेरा क्रोध है। परन्तु काकुत्स्थ राम क्रुद्ध हों या न हों?" ऐसा कहकर परवीरहा लक्ष्मण, महातेजस्वी, राम के प्रिय अनुचर, तारा से कहकर लौट गये। तब हनुमान ने सुग्रीव से यह वचन कहा: "हे राजन्! जाओ और सत्यपराक्रमी राम को प्रसन्न करो।"
🔍 व्याख्या : तारा की बुद्धिमत्ता और मधुर वाणी ने लक्ष्मण के क्रोध को शान्त किया। उसने सुग्रीव के अपराध को अपने सिर ले लिया और लक्ष्मण को सन्तुष्ट किया। यहाँ तारा की राजनीतिक समझ और कूटनीतिक कौशल स्पष्ट होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚔️ लक्ष्मण का क्रोध

लक्ष्मण सामान्यतः शान्त रहते हैं, परन्तु जब भाई राम का अपमान होता है या उनकी उपेक्षा होती है, तो उनका क्रोध सात्विक एवं न्यायोचित हो जाता है। यह क्रोध क्षत्रिय धर्म का प्रतीक है।

🦧 सुग्रीव का विलास

राज्य-सुख में डूबा सुग्रीव मानवीय दुर्बलता का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि ऐश्वर्य और भोग मनुष्य को उसके मूल कर्तव्य से कैसे विमुख कर सकते हैं।

🧠 तारा का कूटनीतिक हस्तक्षेप

तारा की बुद्धिमत्ता इस सर्ग की केन्द्रबिन्दु है। वह न केवल लक्ष्मण को शान्त करती है, बल्कि सुग्रीव को भी संकट से बचाती है। उसकी वाणी में माधुर्य और तर्क दोनों हैं।

🤝 मित्रधर्म और कृतज्ञता

यह सर्ग मित्रता के मूल तत्वों – कृतज्ञता, समय पर सहायता और वचनबद्धता – पर गम्भीर प्रश्न उठाता है। लक्ष्मण के शब्द मित्रधर्म की व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि सुख-सुविधाओं में डूबकर हमें अपने मूल कर्तव्य नहीं भूलने चाहिए। जो मित्र हमारे कठिन समय में काम आये, उनके काम आना ही सच्ची मित्रता है। साथ ही, जब कोई हमें हमारी भूल का स्मरण कराये, तो उसे क्रोधित होने के बजाय, विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। तारा की तरह बुद्धि और वाणी से कठिन परिस्थितियों को सुगम बनाया जा सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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