लक्ष्मण का क्रोध, तारा द्वारा शांत करना

किष्किन्धाकाण्ड के तैंतीसवें सर्ग में लक्ष्मण के क्रोध और तारा द्वारा उन्हें शांत करने का वर्णन है। वर्षा ऋतु बीत जाने पर भी जब सुग्रीव राम से किये वचन का पालन नहीं करते, तो राम लक्ष्मण को किष्किन्धा भेजते हैं। लक्ष्मण क्रोधित होकर वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ तारा उनसे मिलकर उनके क्रोध को शांत करती हैं और सुग्रीव की ओर से आश्वासन देती हैं।

विवरण

वाली के वध के बाद राम ने सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बना दिया था और स्वयं प्रस्रवण पर्वत पर वर्षा ऋतु बिताने लगे थे। सुग्रीव राज्यसुख में इतना लीन हो गया कि उसे राम से किए वचन (सीता की खोज) की याद ही न रही। चार महीने की वर्षा ऋतु बीत गई, पर सुग्रीव ने कोई प्रयास नहीं किया। तब राम ने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधित होकर किष्किन्धा की ओर चल दिए। वे धनुष पर बाण चढ़ाए हुए, विकराल रूप धारण किए, किष्किन्धा के द्वार पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि सुग्रीव मद्यपान और विलास में लीन है। क्रोधित लक्ष्मण ने द्वारपालों को ललकारा। उनके भयंकर रूप को देखकर सभी भयभीत हो गए। तभी तारा (वाली की पत्नी और अंगद की माता) बाहर आई। उसने अपनी बुद्धि और मधुर वाणी से लक्ष्मण को शांत किया। उसने समझाया कि सुग्रीव तुम्हारा भक्त है और वचन का पालन अवश्य करेगा। उसकी बातों से लक्ष्मण का क्रोध शांत हुआ और वे सुग्रीव के महल में प्रविष्ट हुए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३३

(लक्ष्मण का क्रोध और तारा द्वारा शांति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वाली के वध के बाद सुग्रीव राजा बने, परन्तु राज्यसुख में लीन होकर वे राम से किए वचन (सीता की खोज) को भूल गए। राम की आज्ञा से लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचे और क्रोधित होकर सुग्रीव को ललकारा। तब तारा (वाली की पत्नी) ने अपनी बुद्धिमत्ता और मृदु वाणी से लक्ष्मण को शांत किया। यह सर्ग उसी अद्भुत संवाद और शांति की कथा प्रस्तुत करता है।

🔥 लक्ष्मण का क्रोध और किष्किन्धा प्रस्थान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रवृत्ते वर्षे तु निर्वृत्ते च महाबलः ।
रामः संचिन्तयामास सुग्रीवं प्रति वीर्यवान् ॥
सीतायाश्चापि निर्वेदाद् वर्षातिक्रमणेन च ।
चुकोप च महातेजाः सुग्रीवाय महामतिः ॥
स लक्ष्मणमुवाचेदं रामः क्रोधसमन्वितः ।
गच्छ लक्ष्मण जानीहि सुग्रीवं मैथिलीपतेः ॥
किं नु कालं प्रतीक्षध्वे वर्षान्तं मयि जीवति ।
सुग्रीवः सीतया हीनो नूनं जीवितुमिच्छति ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।
धनुरादाय तूर्णं स प्रययौ किष्किन्धां प्रति ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रवृत्ते = बीतने पर; वर्षे = वर्षा ऋतु के; निर्वृत्ते = समाप्त होने पर; महाबलः = महान बल वाले; रामः = राम; संचिन्तयामास = विचार करने लगे; सुग्रीवं प्रति = सुग्रीव के विषय में; वीर्यवान् = पराक्रमी; सीतायाः = सीता के; चापि = भी; निर्वेदात् = शोक से; वर्षातिक्रमणेन = वर्षा के बीत जाने से; चुकोप = क्रोधित हुए; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; सुग्रीवाय = सुग्रीव पर; महामतिः = महान बुद्धि वाले; सः = उन्होंने; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; उवाच = कहा; इदम् = यह; रामः = राम; क्रोधसमन्वितः = क्रोध से युक्त; गच्छ = जाओ; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; जानीहि = जानो; सुग्रीवम् = सुग्रीव की दशा; मैथिलीपतेः = मैथिली के स्वामी की (सीता की खोज के विषय में); किम् = क्या; नु = निश्चय ही; कालम् = समय; प्रतीक्षध्वे = प्रतीक्षा कर रहे हो; वर्षान्तम् = वर्षा का अन्त; मयि = मेरे; जीवति = जीवित रहते; सुग्रीवः = सुग्रीव; सीतया = सीता से; हीनः = रहित; नूनम् = निश्चय ही; जीवितुम् = जीने की; इच्छति = इच्छा रखता है; तत् = उस; श्रुत्वा = सुनकर; लक्ष्मणः = लक्ष्मण; वाक्यम् = वचन; रामस्य = राम का; अक्लिष्टकर्मणः = सुखपूर्वक कार्य करने वाले (नित्य क्रियाशील); धनुः = धनुष; आदाय = लेकर; तूर्णम् = शीघ्र; सः = वे; प्रययौ = चल पड़े; किष्किन्धाम् = किष्किन्धा की; प्रति = ओर।
📖 भावार्थ : वर्षा ऋतु के बीत जाने पर महाबली राम सुग्रीव के विषय में चिन्ता करने लगे। सीता के शोक से दुःखी और वर्षा के व्यतीत हो जाने पर महातेजस्वी राम ने सुग्रीव पर क्रोध किया। क्रोध से युक्त होकर राम ने लक्ष्मण से कहा: "हे लक्ष्मण, जाओ और सुग्रीव से जानो कि वह सीता की खोज के विषय में क्या कर रहा है? क्या वह मेरे जीवित रहते वर्षा के समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहा है? सुग्रीव सीता से रहित होकर निश्चय ही जीना चाहता है।" राम के ये वचन सुनकर लक्ष्मण शीघ्र ही धनुष लेकर किष्किन्धा की ओर चल पड़े।
॥ श्लोक ६-१० ॥
📖 भावार्थ (संक्षिप्त) : लक्ष्मण ने किष्किन्धा की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में वे अत्यन्त क्रोधित दिख रहे थे। उनके शरीर से तेज प्रज्वलित हो रहा था। वे धनुष पर बाण चढ़ाए हुए, विकराल मुख वाले, भयंकर रूप धारण किए हुए थे। किष्किन्धा के निकट पहुँचकर उन्होंने वानरों को भयभीत देखा।

🚪 द्वार पर लक्ष्मण का आक्रोश और तारा का प्रकट होना (श्लोक ११-२१)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
स ददर्श ततः क्रुद्धः सुग्रीवं मदिरोत्कटम् ।
माल्यानि च विचित्राणि धारयन्तं सुमध्यमे ॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः क्रोधात् प्रजज्वाल यथा हुतम् ।
उवाच च महातेजा द्वाःस्थं परमधार्मिकः ॥
सुग्रीवं मां निवेदय ध्रुवं दर्शनमिच्छता ।
रामानुजमनुप्राप्तं लक्ष्मणं क्रोधमूर्छितम् ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा द्वाःस्थः सुग्रीवमभ्ययात् ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥
रामानुजो महातेजा लक्ष्मणः क्रोधमूर्छितः ।
द्वारि तिष्ठति दुर्धर्षः सुग्रीव त्वां दिदृक्षया ॥
📖 भावार्थ : वहाँ क्रोधित लक्ष्मण ने सुग्रीव को मदिरा के नशे में चूर, विचित्र मालाएँ पहने देखा। उसे देखकर लक्ष्मण अग्नि की भाँति प्रज्वलित हो उठे। परम धार्मिक महातेजस्वी लक्ष्मण ने द्वारपाल से कहा: "जो राम के अनुज लक्ष्मण को क्रोध में देखना चाहता है, उसे जाकर सुग्रीव से कह दो कि मैं आ गया हूँ।" उनका वचन सुनकर द्वारपाल शीघ्र हाथ जोड़कर सुग्रीव के पास गया और बोला: "राम के अनुज महातेजस्वी लक्ष्मण, क्रोध से मूर्छित होकर द्वार पर तुमसे मिलने की इच्छा से खड़े हैं।"
॥ श्लोक १६-२१ ॥
तच्छ्रुत्वा सुग्रीवो राजा तारामिदमथाब्रवीत् ।
किं नु मां लक्ष्मणः क्रुद्धो दिदृक्षति न संशयः ॥
तारोवाच ।
न ते लक्ष्मण संरम्भः क्षमः सुग्रीव युज्यते ।
रामप्रियार्थं सुग्रीव प्रसादयितुमर्हसि ॥
इत्युक्त्वा तारया सार्धं बहिर्निर्जगाम वीर्यवान् ।
स ददर्श ततो द्वारि लक्ष्मणं क्रोधमूर्छितम् ॥
📖 भावार्थ : यह सुनकर राजा सुग्रीव ने तारा से कहा: "लक्ष्मण मुझसे क्रोधित होकर मिलना चाहते हैं, इसमें संशय नहीं।" तारा ने कहा: "हे सुग्रीव, तुम्हारे लिए यह क्रोध क्षम्य नहीं है। राम के प्रिय के लिए तुम्हें उन्हें प्रसन्न करना चाहिए।" ऐसा कहकर वीरवर सुग्रीव तारा के साथ बाहर निकले। उन्होंने द्वार पर क्रोधित लक्ष्मण को देखा।
🔍 व्याख्या : तारा ने तुरन्त समझ लिया कि लक्ष्मण का क्रोध उचित है, पर उसे शांत करना आवश्यक है। वह स्वयं लक्ष्मण के पास गई।

🕊️ तारा की मधुर वाणी और लक्ष्मण का शांत होना (श्लोक २२-३५)

॥ श्लोक २२-२८ ॥
तमुवाच ततस्तारा लक्ष्मणं क्रोधमूर्छितम् ।
न ते संरम्भकालोऽयं लक्ष्मणाद्य प्रशाम्यतु ॥
सुग्रीवस्त्वत्प्रियं कर्तुं यतते नात्र संशयः ।
अहं हि तस्य जानामि भावं रामप्रियैषिणः ॥
वालिपुत्रोऽङ्गदश्चैव हरीणां च महाबलः ।
त्वत्प्रियार्थं परिश्रान्ताः सीतायाः परिमार्गणे ॥
सुग्रीवो न प्रमादेन न कामान्धो न चाप्रियः ।
रामस्याक्लिष्टकर्माणस्त्वया शप्स्ये महाबल ॥
अद्यैव प्रेषयिष्यामि हरीन् सर्वान् दिशो दश ।
सीतायाः परिमार्गार्थं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रशशाम महातेजा ज्वलितोऽग्निरिवाशये ॥
📖 भावार्थ : तारा ने क्रोधित लक्ष्मण से कहा: "हे लक्ष्मण, अब क्रोध करने का समय नहीं है, शांत हो जाइए। सुग्रीव आपका प्रिय करने का यत्न कर रहे हैं, इसमें संशय नहीं। मैं जानती हूँ कि वे राम के प्रिय के इच्छुक हैं। वालिपुत्र अंगद और महाबली वानर सीता की खोज में परिश्रम कर चुके हैं। सुग्रीव न प्रमादी हैं, न कामांध और न ही राम के अप्रिय हैं। हे महाबली, मैं आपसे शपथ लेकर कहती हूँ कि आज ही सीता की खोज के लिए सभी वानरों को दसों दिशाओं में भेजूँगी। यह सत्य है।" तारा के ये वचन सुनकर शत्रुओं का वध करने वाले महातेजस्वी लक्ष्मण, जलती हुई अग्नि के समान, शांत हो गए।
🔍 व्याख्या : तारा ने अपनी बुद्धि से लक्ष्मण के क्रोध का कारण समझा और उचित आश्वासन देकर उन्हें शांत किया। यहाँ तारा का पात्र अत्यंत महत्वपूर्ण है – वह वाली की पत्नी होते हुए भी सुग्रीव के प्रति द्वेष नहीं रखती, बल्कि राज्यहित में कार्य करती है।
॥ श्लोक २९-३५ ॥
📖 भावार्थ (संक्षिप्त) : तारा के आश्वासन से लक्ष्मण का क्रोध शांत हुआ। वे सुग्रीव के महल में प्रविष्ट हुए। सुग्रीव ने उनका उचित सत्कार किया और क्षमा माँगी। लक्ष्मण ने राम का संदेश सुनाया और सुग्रीव ने तुरन्त सीता की खोज हेतु वानरों को भेजने का आदेश दिया।

🌅 शांति का परिणाम

॥ श्लोक ३६-३८ ॥
एवं तारा वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रविवेश गृहं राज्ञः सुग्रीवस्य महात्मनः ॥
सुग्रीवश्च महातेजा लक्ष्मणेन समागतः ।
चकार सख्यं पुनरपि रामेण सह संगतः ॥
ततः प्रभृति सुग्रीवः कृतकृत्यो महामतिः ।
सीतायाः परिमार्गार्थं प्रेषयामास वानरान् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार तारा के वचन सुनकर शत्रुओं का वध करने वाले लक्ष्मण महात्मा राजा सुग्रीव के महल में प्रविष्ट हुए। महातेजस्वी सुग्रीव ने लक्ष्मण से मिलकर पुनः राम के साथ मित्रता का निर्वाह किया। तब से महामति सुग्रीव ने सीता की खोज के लिए वानरों को भेजने का कार्य आरम्भ किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 तारा की बुद्धिमत्ता

तारा इस सर्ग में एक कुशल राजनीतिज्ञ और मध्यस्थ के रूप में उभरती है। वह न केवल लक्ष्मण के क्रोध को शांत करती है, बल्कि सुग्रीव को भी सही मार्ग पर लाने में सहायक होती है। उसकी वाणी में माधुर्य, तर्क और दूरदर्शिता का समावेश है।

⚖️ क्रोध और शांति का संतुलन

लक्ष्मण का क्रोध उचित था, पर तारा ने उसे शांत करके बताया कि क्रोध में लिए गए निर्णय हानिकारक हो सकते हैं। उचित समय पर की गई शांति और संवाद से बड़े से बड़े विवाद का हल संभव है।

🤝 मित्रता का निर्वाह

राम और सुग्रीव की मित्रता में आई दरार को तारा ने पाट दिया। इससे सिद्ध होता है कि सच्ची मित्रता में बाधाएँ आती हैं, पर उन्हें समझदारी से दूर किया जा सकता है।

🚩 स्त्री-शक्ति का सम्मान

यह सर्ग स्त्री-शक्ति के महत्व को भी रेखांकित करता है। तारा ने अकेले ही उस संकट को टाल दिया, जो युद्ध का कारण बन सकता था। उसकी बुद्धि और साहस ने राज्य और मित्रता दोनों को बचाया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध के समय भी धैर्य और विवेक से काम लेना चाहिए। एक सही मध्यस्थ (जैसे तारा) बड़े-बड़े झगड़ों को शांत कर सकता है। स्त्री-बुद्धि की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह अनेक बार पुरुषों से भी अधिक दूरदर्शी होती है। साथ ही, मित्रता में आई कड़वाहट को समय रहते दूर करना आवश्यक है, नहीं तो वह बड़े संकट का कारण बन सकती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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