हनुमान् द्वारा सुग्रीव को सलाह

इस सर्ग में हनुमान् जी सुग्रीव को उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाते हैं। वे सुग्रीव को राम से क्षमा माँगने और सीता की खोज में तत्पर होने की सलाह देते हैं, जिससे सुग्रीव अपनी भूल सुधारते हैं और लक्ष्मण को शांत करने का प्रयास करते हैं।

विवरण

वर्षा ऋतु समाप्त होने पर भी सुग्रीव अपने वचन को भूलकर भोग-विलास में लीन हो गए। राम ने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। लक्ष्मण क्रोधित होकर किष्किन्धा पहुँचे। सुग्रीव उनके क्रोध से भयभीत हो गए और हनुमान् से सलाह माँगी। हनुमान् ने सुग्रीव को समझाया कि राम की कृपा से ही उन्हें राज्य मिला है, अतः कृतघ्नता उचित नहीं। उन्होंने सुग्रीव को सलाह दी कि वे स्वयं राम के पास जाकर विनयपूर्वक क्षमा माँगें और सीता की खोज के लिए तुरंत वानर सेना भेजें। हनुमान् ने यह भी कहा कि राम उदार हैं और उनकी भूल क्षमा कर देंगे। सुग्रीव हनुमान् की सलाह मानकर लक्ष्मण से मिलने को तैयार हो गए।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३२

(हनुमान् द्वारा सुग्रीव को सलाह)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वात्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने सुग्रीव को राजा बनाने में सहायता की थी, बदले में सुग्रीव ने सीता की खोज का वचन दिया था। किंतु वर्षा ऋतु बीत जाने पर भी सुग्रीव अपने वचन को भूलकर भोग-विलास में मग्न हो गए। राम ने लक्ष्मण को भेजा, जो क्रोधित होकर किष्किन्धा पहुँचे। सुग्रीव भयभीत हुए और हनुमान् से सलाह माँगी। यह सर्ग उसी संवाद को प्रस्तुत करता है।

🙇 सुग्रीव का भय और हनुमान् से निवेदन (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
सुग्रीवस्तु भयत्रस्तो लक्ष्मणं समुपस्थितम् ।
दृष्ट्वा चिन्तापरो भूत्वा हनूमन्तमभाषत ॥
हनूमन्पश्य लक्ष्मणं क्रोधसंरक्तलोचनम् ।
आगतं रामवचनात्किमर्थमिह सांप्रतम् ॥
त्वमेव हि गतिः कार्ये वानराणां प्लवंगम ।
उपायं चिन्तय क्षिप्रं येन शाम्यति स द्विजः ॥
🔹 पदच्छेद : सुग्रीवः = सुग्रीव; तु = तो; भयत्रस्तः = भय से त्रस्त; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; समुपस्थितम् = सामने उपस्थित; दृष्ट्वा = देखकर; चिन्तापरः = चिंतित; भूत्वा = होकर; हनूमन्तम् = हनुमान् से; अभाषत = बोले; हनूमन् = हे हनुमान्; पश्य = देखो; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण को; क्रोधसंरक्तलोचनम् = क्रोध से लाल नेत्रों वाले; आगतम् = आए हुए; रामवचनात् = राम के आदेश से; किमर्थम् = किसलिए; इह = यहाँ; सांप्रतम् = अब; त्वम् = आप; एव = ही; हि = निश्चय; गतिः = आश्रय; कार्ये = इस कार्य में; वानराणाम् = वानरों के; प्लवंगम = हे वानरश्रेष्ठ; उपायम् = उपाय; चिन्तय = सोचिए; क्षिप्रम् = शीघ्र; येन = जिससे; शाम्यति = शांत हो; सः = वह; द्विजः = लक्ष्मण (द्विज – क्षत्रिय) ।
📖 भावार्थ : सुग्रीव ने लक्ष्मण को सामने आया देखा तो वे भयभीत हो गए। वे चिंतित होकर हनुमान् से बोले – 'हे हनुमान्! देखो, लक्ष्मण क्रोध से लाल-लाल नेत्र किए हुए राम के आदेश से यहाँ आए हैं। अब हे वानरश्रेष्ठ! इस संकट में आप ही हमारे आश्रय हैं। कृपया कोई ऐसा उपाय सोचिए जिससे ये शांत हो जाएँ।'
॥ श्लोक ४-६ ॥
इति सुग्रीववचनात् हनूमान् बुद्धिमत्तरः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञः सुग्रीवं सत्यसंगरम् ॥
न खल्वेतद्वचः सौम्य युक्तं त्वयि विशेषतः ।
यदनुक्त्वा गुरून्कार्यं करोषि हरिपुंगव ॥
राघवः परमोदारस्त्वयि प्रीतिं करोति यत् ।
तस्य त्वं प्रत्युपेक्षां च कर्तुमिच्छसि दुर्मते ॥
📖 भावार्थ : सुग्रीव के ऐसा कहने पर अत्यन्त बुद्धिमान हनुमान् ने उनसे कहा – 'हे सौम्य! तुम्हारी यह बात उचित नहीं है, विशेषकर तुम्हारे लिए तो बिल्कुल भी नहीं कि गुरुजनों से बिना पूछे कोई कार्य कर बैठे। हे वानरश्रेष्ठ! राघव अत्यन्त उदार हैं और तुमसे प्रेम करते हैं, फिर भी तुम उनकी उपेक्षा करना चाहते हो, यह तुम्हारी दुर्मति है।'

🧠 हनुमान् का उपदेश – कृतज्ञता का पाठ (श्लोक ७-१५)

॥ श्लोक ७-१० ॥
रामप्रसादलब्धं ते राज्यं भोगाश्च पुष्कलाः ।
तस्य त्वमपकाराय मनः क्रूरं विधत्स्वसे ॥
न कृतज्ञतया कश्चित् सुखी भवति वानर ।
अकृतज्ञो नरः पापात् नरकं प्रतिपद्यते ॥
तस्मात्त्वं राघवं गत्वा क्षमयस्व परंतप ।
स हि देवो मनुष्येषु क्षमां कर्तुं त्वय्यर्हति ॥
हनूमद्वचनं श्रुत्वा सुग्रीवः सहसा तदा ।
प्रत्युवाच महातेजा हनूमन्तं कृतांजलिः ॥
📖 भावार्थ : हनुमान् ने कहा – 'राम की कृपा से ही तुम्हें यह राज्य और अपार भोग मिले हैं, और तुम उनका अपमान करने का क्रूर मन बना रहे हो? हे वानर! कृतघ्नता से कोई सुखी नहीं होता। कृतघ्न मनुष्य पाप से नरक को प्राप्त होता है। इसलिए हे परंतप! तुम राघव के पास जाकर उनसे क्षमा माँगो। वे मनुष्य रूप में देवता हैं, वे तुम्हें क्षमा कर देंगे।' हनुमान् की बात सुनकर सुग्रीव ने हाथ जोड़कर उनसे कहा।
॥ श्लोक ११-१५ ॥
उपपन्नमिदं वाक्यं भवता यदुदाहृतम् ।
गृहीतं हृदये वाक्यं तव विज्ञापितं मया ॥
अहं तु राघवं गत्वा प्रसादयितुमुत्सहे ।
त्वया सह गमिष्यामि सान्त्वयिष्यामि लक्ष्मणम् ॥
इत्युक्त्वा स महातेजा हनूमन्तं महामतिः ।
निर्ययौ सहितस्तेन लक्ष्मणं प्रति वीर्यवान् ॥
ततः सुग्रीवसहितो हनूमान् मतिमत्तरः ।
लक्ष्मणं समुपागम्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥
📖 भावार्थ : सुग्रीव बोले – 'आपने जो कहा, वह सर्वथा उचित है। आपका कहा हुआ वचन मैंने हृदय में ग्रहण कर लिया। अब मैं राघव के पास जाकर उन्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मेरे साथ चलिए, हम मिलकर लक्ष्मण को शांत करेंगे।' ऐसा कहकर वे महातेजस्वी, महामति सुग्रीव हनुमान् के साथ लक्ष्मण के पास गए। तब हनुमान् ने लक्ष्मण से विनयपूर्वक बात की।

🤝 हनुमान् का लक्ष्मण को समझाना (श्लोक १६-२४)

॥ श्लोक १६-२० ॥
हनूमान् लक्ष्मणं प्राह क्रोधस्त्यज्यतामच्युत ।
सुग्रीवः प्रणतो राजा तव भ्रातुरनन्तरम् ॥
अयं हि वानरपतिः कृतज्ञः सत्यविक्रमः ।
त्वरते देवि वैदेह्याः प्राप्तकालं परंतप ॥
न चैनमतिवर्तेरन् वानराः कामरूपिणः ।
वत्स्यन्ति हि समीपे ते यथेष्टं राघवस्य च ॥
श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं लक्ष्मणः शोककर्शितः ।
प्रत्युवाच महातेजा हनूमन्तं कृतांजलिम् ॥
📖 भावार्थ : हनुमान् ने लक्ष्मण से कहा – 'हे अच्युत! क्रोध छोड़िए। सुग्रीव राजा हैं और आपके भ्राता के सामने नतमस्तक हैं। ये वानरराज कृतज्ञ और सत्यविक्रमी हैं। हे परंतप! ये माता सीता के कार्य में शीघ्रता कर रहे हैं। सभी कामरूपी वानर इनकी आज्ञा का पालन करेंगे और राघव के समीप रहेंगे।' हनुमान् के ऐसे वचन सुनकर शोक से कृश लक्ष्मण ने हाथ जोड़े हुए हनुमान् से कहा।
॥ श्लोक २१-२४ ॥
लक्ष्मणः प्राह धर्मज्ञः हनूमन् वाक्यमुत्तमम् ।
यथोक्तं भवता सर्वं कर्तव्यं नात्र संशयः ॥
राघवः परमोदारः सुग्रीवे स्नेहमर्हति ।
इत्युक्त्वा सह सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना ॥
विवेश किष्किन्धां रम्यां हनूमत्सहितस्तदा ।
रामं प्रति महातेजाः सुग्रीवः प्रियकाम्यया ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : धर्मज्ञ लक्ष्मण ने कहा – 'हे हनुमान्! आपने उत्तम वचन कहे हैं। आपकी बात के अनुसार ही सब करना चाहिए, इसमें संशय नहीं। राघव अत्यन्त उदार हैं और सुग्रीव पर स्नेह रखते हैं।' ऐसा कहकर महात्मा लक्ष्मण के साथ, हनुमान् सहित सुग्रीव, राम को प्रसन्न करने की इच्छा से रम्य किष्किन्धा में प्रविष्ट हुए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार हनुमान् की सूझबूझ से सुग्रीव और लक्ष्मण के बीच संवाद सफल हुआ और सुग्रीव राम से मिलने को तत्पर हुए। यह सर्ग हनुमान् की दूरदर्शिता और कूटनीति को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 हनुमान् का कूटनीतिज्ञ रूप

इस सर्ग में हनुमान् एक कुशल सलाहकार और मित्र के रूप में दिखते हैं। वे सुग्रीव को उनके कर्तव्य का बोध कराते हैं और साथ ही लक्ष्मण को भी शांत करते हैं। यहाँ हनुमान् का बुद्धि कौशल स्पष्ट होता है।

🙏 कृतज्ञता का महत्व

हनुमान् ने सुग्रीव को स्पष्ट किया कि राम की कृपा से प्राप्त राज्य को भूलकर उनकी उपेक्षा करना कृतघ्नता है, जो पाप है। यह मानव जीवन के लिए शिक्षाप्रद है कि उपकार मानना और उसका प्रतिदान करना चाहिए।

🌉 संकट में मित्र की भूमिका

सुग्रीव जब संकट में पड़े, तो उन्होंने हनुमान् की शरण ली। हनुमान् ने न केवल उन्हें सही राह दिखाई, बल्कि लक्ष्मण के सामने भी उनका पक्ष रखा। सच्चा मित्र वही है जो संकट में काम आए।

⚖️ क्षमा का महत्व

हनुमान् ने लक्ष्मण को भी याद दिलाया कि राम उदार हैं और क्षमा करने वाले हैं। यह हमें सिखाता है कि क्रोध में आकर निर्णय न लें, बल्कि क्षमा और सद्भावना से काम लें।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य और बुद्धि से काम लेना चाहिए। कृतघ्नता महापाप है। सच्चा मित्र वही है जो हमें हमारी गलतियों का अहसास कराए और सही मार्ग पर चलाए। हनुमान् जैसा मार्गदर्शक मिलना सौभाग्य की बात है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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