लक्ष्मण का क्रोध

किष्किन्धाकाण्ड का इकत्तीसवाँ सर्ग लक्ष्मण के प्रचण्ड क्रोध का वर्णन करता है। चार महीने बीत जाने पर भी जब सुग्रीव सीता की खोज के लिए वानर नहीं भेजता और आलस्य तथा भोग-विलास में पड़ा रहता है, तब अधीर होकर लक्ष्मण किष्किन्धा पहुँचते हैं और क्रोध में आकर सुग्रीव को उसकी प्रतिज्ञा का स्मरण दिलाते हैं।

विवरण

राम ने सुग्रीव से मित्रता की और उसे वालि का वध कराकर किष्किन्धा का राज्य दिलाया। बदले में सुग्रीव ने वर्षा ऋतु समाप्त होने पर सीता की खोज के लिए वानर दल भेजने का वचन दिया था। चार महीने की वर्षा ऋतु बीत जाने पर भी सुग्रीव अपने वचन को भूल गया और रुमा आदि स्त्रियों के साथ भोग-विलास में लीन हो गया। राम धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे, किन्तु लक्ष्मण क्रोध से भर उठे। उन्होंने राम की आज्ञा लेकर किष्किन्धा की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में उनका भयंकर रूप देखकर वानर डर गए और सुग्रीव को सचेत किया। सुग्रीव ने अपनी पत्नी रुमा को लक्ष्मण से मिलने के लिए भेजा, किन्तु लक्ष्मण ने उनकी ओर ध्यान न देते हुए क्रोधित स्वर में सुग्रीव को ललकारा और उसे उसकी कृतघ्नता तथा मूर्खता के लिए फटकार लगाई।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३१

(लक्ष्मण का क्रोध – सुग्रीव की फटकार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव से मित्रता कर, राम ने उसे राज्य दिलाया। बदले में सुग्रीव ने वर्षा ऋतु के पश्चात सीता की खोज का वचन दिया। चार मास बीत गए, प्रस्फुटित पुष्पों से शरद ऋतु का आगमन हो गया, किन्तु सुग्रीव अपने वचन को भूलकर भोग-विलास में मग्न था। धैर्य की सीमा समाप्त होने पर, कोप से दीप्त लक्ष्मण किष्किन्धा की ओर चल पड़े। यह सर्ग उसी दुर्दमनीय क्रोध और सुग्रीव के उपेक्षापूर्ण व्यवहार की कथा है।

⚡ लक्ष्मण का क्रोध और किष्किन्धा गमन (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः प्रवृत्ते शरदि दिव्यपुष्पफलद्रुमे।
रामो ददर्श चाकाशं गतमेघमनाविलम्॥
सुग्रीवं च समासीनं भोगमध्ये महोदयम्।
न च स्मरन्तं तद्वाक्यं रामकार्यार्थसाधनम्॥
ततो लक्ष्मणमाहेदं रामः क्रोधसमन्वितम्।
गच्छ लक्ष्मण जानीहि सुग्रीवस्य च चेष्टितम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रवृत्ते = प्रारम्भ हुई; शरदि = शरद ऋतु में; दिव्यपुष्पफलद्रुमे = उत्तम पुष्पों एवं फलों वाले वृक्षों से युक्त; रामः = राम ने; ददर्श = देखा; चाकाशम् = आकाश को; गतमेघम् = मेघों से रहित; अनाविलम् = स्वच्छ; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; च = और; समासीनम् = बैठे हुए; भोगमध्ये = भोगों के मध्य; महोदयम् = अत्यन्त प्रसन्न; न च स्मरन्तम् = और स्मरण न करते हुए; तद्वाक्यम् = उस वचन को; रामकार्यार्थसाधनम् = राम के कार्य को सिद्ध करने वाला; ततः = तब; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; आह = कहा; इदम् = यह; रामः = राम ने; क्रोधसमन्वितम् = क्रोध से युक्त; गच्छ = जाओ; लक्ष्मण = हे लक्ष्मण; जानीहि = जानो; सुग्रीवस्य = सुग्रीव के; च = और; चेष्टितम् = आचरण को।
📖 भावार्थ : जब शरद ऋतु आई, जिसमें वृक्ष दिव्य पुष्पों एवं फलों से भर गए, राम ने आकाश को बादलों से रहित एवं स्वच्छ देखा। किन्तु सुग्रीव को वे भोग-विलास के मध्य बैठे देखा, और उन्हें राम के कार्य को सिद्ध करने वाला अपना वचन स्मरण नहीं था। तब राम ने क्रोध से युक्त लक्ष्मण से कहा: "हे लक्ष्मण! जाओ और सुग्रीव के आचरण को जानो।"
🔍 व्याख्या : प्रकृति का परिवर्तन समय बीतने का सूचक है। स्वच्छ आकाश यह संकेत दे रहा है कि अब कार्य करने का समय आ गया है, किन्तु सुग्रीव इससे बेखबर है।
॥ श्लोक ९-१५ ॥
ततः स रोषादुःखेन लक्ष्मणः शीघ्रविक्रमः।
धनुरादाय चाप्राप्तः किष्किन्धां द्रष्टुमर्हति॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे भयार्ता विप्रदुद्रुवुः।
सुग्रीवस्य निवेद्याथ लक्ष्मणागमनं महत्॥
📖 भावार्थ : तब रोष और दुःख से युक्त, शीघ्र पराक्रम करने वाले लक्ष्मण धनुष लेकर किष्किन्धा पहुँचे। उन्हें देखकर सभी वानर भय से व्याकुल होकर इधर-उधर भागने लगे और उन्होंने सुग्रीव को लक्ष्मण के महान आगमन की सूचना दी।
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण का तेजस्वी रूप और क्रोध इतना प्रचंड था कि उनके दर्शन मात्र से वानर सेना में हाहाकार मच गया।

🗣️ सुग्रीव की दुर्दशा और लक्ष्मण की फटकार (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२५ ॥
ततः सुग्रीवः संत्रस्तो रुमां दृष्ट्वा व्यसर्जयत्।
सा लक्ष्मणं समासाद्य वचनं चेदमब्रवीत्॥
रुमोवाच: अयमागमने हेतुः किं ते वीर वदस्व मे।
सुग्रीवः कुशली राजा त्वया द्रष्टुं समाहितः॥
लक्ष्मण उवाच: न रुमे त्वां वदिष्यामि गच्छ त्वं सुग्रीवमचिरादिह।
न हि ते वचनं श्रुत्वा शमं यास्यति मे मनः॥
📖 भावार्थ : तब भयभीत सुग्रीव ने रुमा (अपनी पत्नी) को आगे भेजा। वह लक्ष्मण के पास जाकर बोली: "हे वीर! आपके आगमन का क्या कारण है? राजा सुग्रीव कुशलपूर्वक हैं और आपसे मिलने के लिए तत्पर हैं।" लक्ष्मण ने उत्तर दिया: "हे रुमे! मैं तुमसे यह नहीं कहूँगा। तुम अभी सुग्रीव को यहाँ बुलाओ। तुम्हारा वचन सुनकर मेरा मन शांत नहीं होगा।"
🔍 व्याख्या : सुग्रीव ने अपनी पत्नी को आगे कर एक कूटनीतिक चाल चली, किन्तु लक्ष्मण उसके प्रपंच में नहीं फँसे। वे सीधे सुग्रीव से बात करना चाहते थे।
॥ श्लोक २६-३० ॥
रुमागमनमासाद्य लक्ष्मणः परवीरहा।
सुग्रीवं क्रोधताम्राक्षः प्रत्युवाचेदमञ्जसा॥
यो वै राज्यमिदं प्राप्य भुजाभ्यां राघवस्य च।
न स्मरत्यपकारी सन् कृतं कार्यं महात्मनः॥
तं त्वामहं कृतघ्नं च मिथ्याप्रज्ञमचेतसम्।
नेष्यामि यमसादनम्॥
📖 भावार्थ : रुमा के आगमन के बाद भी, शत्रुओं का वध करने वाले लक्ष्मण, क्रोध से ताम्र-नेत्र होकर सुग्रीव से सीधे बोले: "जो इस राज्य को पाकर, जो राघव की भुजाओं से प्राप्त किया है, वह अपकारी होकर उन महात्मा के किए हुए कार्य को स्मरण नहीं करता। उस कृतघ्न, मिथ्याबुद्धि, मूर्ख तुझे मैं यमलोक पहुँचा दूँगा।"
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण ने सुग्रीव को कृतघ्न और मिथ्याप्रज्ञ कहकर उसकी नीयत पर प्रश्नचिह्न लगाया। यह उनके क्रोध का चरम बिन्दु है।

🛡️ हनुमान का मध्यस्थता प्रयास

॥ श्लोक ३१-४५ ॥
ततः सुग्रीवः संभ्रान्तो हनूमन्तमभाषत।
गच्छ हे हनुमन् शीघ्रं लक्ष्मणं प्रति यत्नतः॥
हनूमान् प्राञ्जलिर्भूत्वा लक्ष्मणं प्रत्यबोधयत्।
नैष दोषो महाबाहो सुग्रीवस्य महात्मनः॥
स्मरते राघवस्यार्थं द्रुमराजनिवासिनः।
अहं तु वानरान् सर्वान् समादेक्ष्यामि मा शुचः॥
एवं ब्रुवति हनुमति लक्ष्मणः शनकैर्वचः।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञः सुग्रीवं प्रति हर्षयन्॥
📖 भावार्थ : तब व्याकुल सुग्रीव ने हनुमान से कहा: "हे हनुमान! शीघ्र जाओ और यत्नपूर्वक लक्ष्मण को मनाओ।" हनुमान ने हाथ जोड़कर लक्ष्मण को समझाया: "हे महाबाहो! यह दोष महात्मा सुग्रीव का नहीं है। वे पर्वत पर निवास करने वाले राघव के कार्य को स्मरण कर रहे हैं। मैं सभी वानरों को आदेश दे दूँगा। आप शोक न करें।" हनुमान के ऐसा कहने पर महाप्राज्ञ लक्ष्मण ने धीरे से सुग्रीव को प्रसन्न करते हुए उत्तर दिया।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपनी कूटनीति और विनम्रता से लक्ष्मण के क्रोध को शांत किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि कार्य शीघ्र ही होगा। अंततः लक्ष्मण का क्रोध शांत होता है और सुग्रीव अपनी भूल का प्रायश्चित करने को तैयार हो जाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😠 लक्ष्मण का उग्र रूप

यह सर्ग लक्ष्मण के शेषावतार के धैर्यवान स्वरूप के साथ-साथ उनके उग्र संकर्षण रूप को दर्शाता है। राम के कार्य में विघ्न देखकर उनका क्रोध असहनीय हो जाता है।

👑 राजधर्म और कृतज्ञता

सुग्रीव का विलास में लीन होना राजधर्म की अवहेलना है। लक्ष्मण उसे कृतघ्नता की सीमा तक जाते हुए देखते हैं, जो मित्रता की आधारशिला को कमजोर करता है।

🕊️ हनुमान की मध्यस्थता

हनुमान न केवल वीर हैं, अपितु कुशल वार्ताकार भी हैं। उनकी बुद्धिमत्ता ही दो मित्रों (राम-सुग्रीव) के बीच दरार को पड़ने से बचाती है और विशाल खोज अभियान का मार्ग प्रशस्त करती है।

⚖️ समय का मोल

शरद ऋतु का आगमन और सुग्रीव की उदासीनता, यह संदेश देता है कि समय पर कार्य न करना विनाश का कारण बन सकता है। लक्ष्मण का क्रोध समय बीतने की पीड़ा का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सफलता और ऐश्वर्य मिलने पर भी हमें अपने वचनों और कर्तव्यों को नहीं भूलना चाहिए। क्रोध कभी-कभी आवश्यक होता है, किन्तु उसे शीघ्र ही बुद्धि और मधुर संवाद (जैसा हनुमान ने किया) द्वारा शांत कर लेना चाहिए। मित्रता का सच्चा आधार परस्पर विश्वास और कर्तव्य-पालन ही है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे एकत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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