हनुमान् का श्री राम से मिलना
किष्किन्धाकाण्ड के तीसरे सर्ग में हनुमान जी का श्री राम और लक्ष्मण से प्रथम भेंट का वर्णन है। पम्पा सरोवर के तट पर राम-लक्ष्मण को देख हनुमान ब्रह्मचारी वेश में उनके पास आते हैं, उनकी सुन्दरता एवं तेज की प्रशंसा करते हैं, और अपना परिचय देते हुए उन्हें सुग्रीव से मिलाने का प्रस्ताव रखते हैं। राम हनुमान के वचनों से प्रसन्न होकर सुग्रीव से मित्रता करने को सहर्ष तैयार हो जाते हैं।
विवरण
पम्पा सरोवर के तट पर सीता की खोज में व्याकुल श्री राम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे थे। उसी समय सुग्रीव के मंत्री हनुमान जी वहाँ आए। वे पहले तो राम-लक्ष्मण के दिव्य रूप एवं तेज को देखकर चकित हुए। उन्होंने सोचा कि ये कोई राजकुमार अथवा देवता प्रतीत होते हैं। हनुमान ने ब्रह्मचारी का वेश धारण करके विनयपूर्वक उनके समीप जाकर उनका अभिवादन किया। उन्होंने राम और लक्ष्मण से उनके आगमन का कारण तथा उनके विषय में पूछा। हनुमान की वाणी और आकृति से प्रभावित होकर राम ने लक्ष्मण से कहा कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि अत्यन्त बुद्धिमान एवं शक्तिशाली प्रतीत होता है। लक्ष्मण ने हनुमान को उनके वन में भटकने और सीता की खोज की कथा सुनाई। तब हनुमान ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वे वानरराज सुग्रीव के मंत्री हैं और सुग्रीव ने उन्हें यहाँ भेजा है। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता करने का सुझाव दिया, क्योंकि सुग्रीव भी अपने भाई बालि से व्यथित हैं और राम की सहायता कर सकते हैं। राम हनुमान के प्रस्ताव पर सहमत हो गए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। इस प्रकार यह सर्ग राम-हनुमान की अटूट मित्रता की नींव रखता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग ३
(हनुमान् का श्री राम से मिलना)
🔆 प्रस्तावना : पम्पा सरोवर के तट पर सीता की खोज में व्याकुल श्री राम और लक्ष्मण विश्राम कर रहे हैं। उसी समय सुग्रीव के परम बुद्धिमान मंत्री हनुमान वहाँ आते हैं। वे ब्रह्मचारी का वेश धारण करके राम-लक्ष्मण के समीप जाते हैं और उनसे वार्तालाप करते हैं। यह सर्ग उस दिव्य भेंट का साक्षी है, जिसने राम-हनुमान की अविच्छिन्न मित्रता की आधारशिला रखी।
🕉️ हनुमान द्वारा राम-लक्ष्मण को देखना (श्लोक १-८)
ददर्श परमोदारं हनूमन्तं महाबलम् ॥
हनूमानपि तौ दृष्ट्वा रामलक्ष्मणावात्मवान् ।
हृष्टरोमा महातेजाः साधु साध्वित्यभाषत ॥
ब्रह्मचारिवपुः श्रीमानुपसंगम्य राघवम् ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ वाक्यमेतदुवाच ह ॥
कौ युवां सुमहाभागौ स्थितौ परमरूपिणौ ।
दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गौ दिव्याभरणभूषितौ ॥
💬 हनुमान का राम से संवाद (श्लोक ९-१८)
किमर्थमागतौ स्थाने दुर्गे राक्षससेविते ॥
कस्य वा कुलजातौ स्थः किमर्थं वा वनं गतौ ।
इत्येवं पृच्छतस्तस्य हनूमतो महात्मनः ॥
रामो लक्ष्मणमाभाष्य वाक्यमेतदुवाच ह ।
अनेन सह सुग्रीवः सख्यं कर्तुं त्वमर्हसि ॥
सुग्रीवो नाम राजर्षिर्वानरेन्द्रो महायशाः ।
तेनास्य सख्यं कर्तव्यं यदीच्छेथाः सहायताम् ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं हनूमन्तमुवाच ह ।
सुग्रीवो नाम यो राजा तेन सख्यं करोम्यहम् ॥
🙏 हनुमान का परिचय और सुग्रीव का संदेश (श्लोक १९-२६)
प्रेषितस्तेन वै दूतः सख्यं याचे नरोत्तमौ ॥
सुग्रीवो नाम राजर्षिर्भ्रात्रा बालिना विनाकृतः ।
वसते चापि ते शैले ऋष्यमूके सुदारुणे ॥
तस्य भार्या हृता बालिना समयं कृत्वया सह ।
तमर्हथ नरव्याघ्रौ साहाय्येन निवर्तितुम् ॥
तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं हर्षेण महतान्वितः ।
सुग्रीवायाभयं दत्त्वा प्रीतियुक्तोऽब्रवीद्वचः ॥
🤝 राम की सहमति और हनुमान का मार्गदर्शन (श्लोक २७-३४)
अद्यप्रभृति तस्याहं सखा भ्राता च संमतः ॥
हनूमंस्त्वं प्रियं कार्यं सुग्रीवस्य महात्मनः ।
नेष्यसि त्वं नरव्याघ्रौ यत्र सुग्रीववानरः ॥
तथेति हनुमानुक्त्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
जग्राह चरणौ रामलक्ष्मणौ विनयान्वितः ॥
ततस्तौ धनुषी गृह्य हनुमान् सह लक्ष्मणः ।
जग्मतुः पर्वतं शैलं यत्र सुग्रीववानरः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🤝 मित्रता का आदर्श
इस सर्ग में राम और हनुमान की प्रथम भेंट में ही इतना स्नेह और विश्वास उत्पन्न हो जाता है कि वे एक-दूसरे को अपना मान लेते हैं। यह आदर्श मित्रता का उत्तम उदाहरण है।
🕉️ हनुमान की बुद्धि एवं विनय
हनुमान ने ब्रह्मचारी वेश धारण कर पहले राम-लक्ष्मण की परीक्षा ली, फिर उचित समय पर अपना परिचय दिया। उनकी यह कूटनीति और विनम्रता सदैव अनुकरणीय है।
🙏 राम का अभयदान
राम ने बिना किसी स्वार्थ के सुग्रीव को अभयदान दिया। यह उनके करुणामय हृदय एवं क्षत्रिय धर्म का पालन है।
🌄 ऋष्यमूक पर्वत की ओर
यह सर्ग राम को सीता की खोज में सहायक मित्र मिलने की दिशा में पहला कदम है। अब राम सुग्रीव से मिलकर बालि का वध करेंगे और फिर सीता की खोज प्रारम्भ होगी।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्ची मित्रता न तो जाति-पाति देखती है, न ही किसी स्वार्थ पर टिकी होती है। राम ने हनुमान को पहचाना और हनुमान ने राम को। हमें भी योग्य मित्रों को पहचानकर उनके साथ निष्कपट व्यवहार करना चाहिए।