हनुमान् द्वारा सुग्रीव को सलाह
इस सर्ग में हनुमान् सुग्रीव को सलाह देते हैं कि वे लक्ष्मण के क्रोध को शांत करें और राम से की गई सहायता की प्रतिज्ञा पूरी करें।
विवरण
वर्षा ऋतु समाप्त होने पर भी सुग्रीव अपने राजसी सुखों में मग्न होकर राम से किए वचन को भूल गए। राम ने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। लक्ष्मण क्रोधित होकर किष्किन्धा पहुँचे। सुग्रीव भयभीत हो गए। तब हनुमान् ने सुग्रीव को समझाया कि वे निर्भय होकर लक्ष्मण से मिलें और विनम्रतापूर्वक उन्हें मनाएँ। हनुमान् ने सुग्रीव को उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाया और राम की महिमा बताई। सुग्रीव हनुमान् की सलाह मानकर लक्ष्मण के पास गए और क्षमा माँगी। लक्ष्मण का क्रोध शांत हुआ और वे सुग्रीव को लेकर राम के पास गए।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २९
(हनुमान् द्वारा सुग्रीव को सलाह)
🔆 प्रस्तावना : वर्षा ऋतु बीत जाने के बाद भी सुग्रीव राम के कार्य को भूलकर भोग-विलास में लीन हो गए। राम ने लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा। लक्ष्मण के क्रोधित स्वरूप को देख सुग्रीव भयभीत हो गए। तब हनुमान् ने सुग्रीव को उचित परामर्श दिया, जिससे वे लक्ष्मण को मनाने में सफल हुए।
🐒 सुग्रीव का भय और हनुमान् का आगमन (श्लोक १-८)
सुग्रीवः सहसा त्रस्तो हनुमन्तमुवाच ह ॥
हनुमन् पश्य लक्ष्मणं प्रविष्टं क्रोधमूर्छितम् ।
किं करोमीति मे ब्रूहि त्वं हि मे बुद्धिसत्तमः ॥
इति सुग्रीववचनाद्धनुमान् मारुतात्मजः ।
प्रत्युवाच महाप्राज्ञः सुग्रीवं सत्यविक्रमम् ॥
भयं त्यज महाराज मैवं गन्तुं त्वमर्हसि ।
रामप्रियार्थं यत्नस्ते कर्तव्यो विगतज्वरः ॥
🧠 हनुमान् का उपदेश (श्लोक ९-२०)
तस्य कार्यमिदं राजन् सुकृतं कर्तुमर्हसि ॥
यदि त्वं राघवं प्राप्य सीतां प्राप्स्यसि मैथिलीम् ।
न ते किंचिदवाप्यं स्यात्त्रैलोक्येऽपि महीपते ॥
तस्मात्कुरु महाराज रामप्रियहितं वचः ।
लक्ष्मणं प्रति गच्छ त्वं विनयावनतः प्रभो ॥
एवं हनुमता प्रोक्तः सुग्रीवः प्रत्युवाच ह ।
हनुमन् युक्तमुक्तं ते करिष्ये वचनं तव ॥
🤝 सुग्रीव का लक्ष्मण से मिलना और क्षमा याचना (श्लोक २१-२७)
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
अहं ते भ्रातृभावेन क्षन्तुमर्हसि मे प्रभो ।
राज्यमत्तोऽस्मि संभ्रान्तो न मे किंचिदतिक्रमम् ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणः क्रोधमत्यजत् ।
सुग्रीवं परिष्वज्य च इदं वचनमब्रवीत् ॥
मया ते वचनं दत्तं रामस्यार्थे न संशयः ।
क्षन्तव्यं ते मया राजन् यद्यत्किंचिदतिक्रमम् ॥