प्रसवन पर्वत पर राम

किष्किन्धाकाण्ड के सत्ताईसवें सर्ग में राम एवं लक्ष्मण के प्रस्रवण पर्वत पर निवास का वर्णन है। वर्षा ऋतु के आगमन पर राम सीता के वियोग में व्याकुल हो जाते हैं और लक्ष्मण उन्हें धैर्य बंधाते हैं।

विवरण

वालि का वध करके सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य सौंपने के बाद, राम और लक्ष्मण वर्षा ऋतु बिताने के लिए प्रस्रवण पर्वत की गुफा में निवास करते हैं। चारों ओर घने बादल छा जाते हैं, नदियाँ उफनाने लगती हैं, और वन नवीन जल से भर जाता है। यह दृश्य राम को सीता की अधिक स्मृति दिलाता है। वे करुण विलाप करते हैं और लक्ष्मण से कहते हैं कि कैसे वर्षा ऋतु उनके विरह को और भी दुःसह बना रही है। लक्ष्मण राम को समझाते हैं कि धैर्य रखें, क्योंकि वर्षा के बाद सुग्रीव सीता की खोज में सहायता करेंगे। इस प्रकार यह सर्ग राम के विरह-वेदना और प्रकृति के वर्णन से भरा है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २७

(प्रस्रवण पर्वत पर राम – वर्षा ऋतु और विरह-विलाप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वालि का वध कर सुग्रीव को राज्य सौंपने के बाद, राम और लक्ष्मण वर्षा ऋतु के आगमन तक प्रस्रवण पर्वत पर निवास करते हैं। चारों ओर घने बादल छा जाते हैं, मयूर नृत्य करते हैं, और नदियाँ उफनने लगती हैं। यह प्राकृतिक छटा राम के मन में सीता के विरह की ज्वाला को और प्रज्वलित कर देती है। लक्ष्मण उन्हें धैर्य का पाठ पढ़ाते हैं और भविष्य की योजना की ओर संकेत करते हैं।

⛰️ प्रस्रवण पर्वत और वर्षा ऋतु का प्रारम्भ (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
स तु प्रस्रवणे रामो वसन् पर्वत उत्तमे ।
ददर्श वार्षिकान् मेघान् गर्जतो जलदागमे ॥
तान् दृष्ट्वा मुदितान् मेघान् मत्तानिव महाद्विपान् ।
सीताविरहजं दुःखं पुनश्चापि स्मरन्निव ॥
सीतेति करुणं वाक्यमुक्त्वा बाष्पपरिप्लुतः ।
लक्ष्मणं दुःखसन्तप्त इदं वचनमब्रवीत् ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; तु = तो; प्रस्रवणे = प्रस्रवण पर्वत पर; रामः = राम; वसन् = निवास करते हुए; पर्वते = पर्वत पर; उत्तमे = उत्तम; ददर्श = देखा; वार्षिकान् = वर्षा के; मेघान् = बादलों को; गर्जतः = गरजते हुए; जलदागमे = वर्षा ऋतु के आगमन पर; तान् = उन्हें; दृष्ट्वा = देखकर; मुदितान् = प्रसन्न; मेघान् = बादलों को; मत्तान् = मतवाले; इव = जैसे; महाद्विपान् = महान हाथियों जैसे; सीताविरहजम् = सीता के विरह से उत्पन्न; दुःखम् = दुःख; पुनः = फिर से; चापि = भी; स्मरन् = स्मरण करते हुए; इव = मानो; सीता इति = सीता! इस प्रकार; करुणम् = करुण; वाक्यम् = वाक्य; उक्त्वा = कहकर; बाष्पपरिप्लुतः = आँसुओं से भीगे हुए; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; दुःखसन्तप्तः = दुःख से तपे हुए; इदम् = यह; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले।
📖 भावार्थ : उत्तम प्रस्रवण पर्वत पर निवास करते हुए राम ने वर्षा ऋतु के आगमन पर गरजते हुए बादलों को देखा। उन बादलों को, जो मतवाले महान हाथियों के समान प्रसन्न दिख रहे थे, देखकर राम सीता के विरह के दुःख को फिर से याद करने लगे। उन्होंने करुण स्वर में 'सीता' पुकारा और आँसुओं से भीगे हुए, दुःख से संतप्त होकर लक्ष्मण से यह वचन कहे।
🔍 व्याख्या : प्रकृति का परिवर्तन राम के मन में विरह की अग्नि को और भड़का देता है। बादलों की गर्जना उन्हें सीता की याद दिलाती है।
॥ श्लोक ४-८ ॥
नीलोत्पलदलश्यामाः क्वचित् पीताः क्वचिद् घनाः ।
विद्युद्भिः समलंकृताः प्रावृषि प्रत्यदृश्यत ॥
एते मेघा महाराज प्रवृत्ता वर्षधारिणः ।
उत्सङ्ग इव मे सीता शोकं जनयते भृशम् ॥
हृदयेनाभिसंतप्तो निश्वसन् गजविक्रमः ।
न शर्म लभते रामः सीतां स्मृत्वा यशस्विनीम् ॥
📖 भावार्थ : कहीं नीलकमल की पंखुड़ियों के समान श्याम, कहीं पीत वर्ण के बादल बिजलियों से सुशोभित होकर वर्षा ऋतु में दिखाई दे रहे हैं। हे लक्ष्मण (महाराज)! ये वर्षा धारण करने वाले बादल मेरे लिए सीता के आलिंगन के समान हैं, लेकिन ये मेरे शोक को बहुत बढ़ा रहे हैं। हृदय से संतप्त और गहरी साँसें भरते हुए गजविक्रम राम, यशस्विनी सीता का स्मरण करके सुख नहीं पाते।
🔍 व्याख्या : राम बादलों की तुलना सीता के आलिंगन से करते हैं, पर उनकी अनुपस्थिति उनके दुःख को दोगुना कर देती है।

💧 राम का विलाप और लक्ष्मण की सांत्वना (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
इमे मेघा महाराज प्रवृत्ता वर्षधारिणः ।
सीतां द्रक्ष्यामि हे लक्ष्मण मम चेतः प्रधावति ॥
नूनं मेघाश्रयं प्राप्य सीता वैहायसी यथा ।
निपतन्ति बहू रूपा मम शोकविवर्धनाः ॥
लक्ष्मणः प्रत्युवाचेदं धैर्यमालम्ब्य काकुत्स्थम् ।
नचिरात् काल आगामी सुग्रीवः प्रेषयिष्यति ॥
वानरीं वाहिनीं दिशः सीतायाः परिमार्गणे ।
तदलं शोकसंतापं त्यज राघव मानद ॥
अवश्यं हि कृतं कर्म फलति क्षिप्रमेव हि ।
तस्माद्धैर्यं च धृतिं च त्वमद्यालम्ब्य राघव ॥
📖 भावार्थ : राम ने कहाः "हे लक्ष्मण! ये वर्षा धारण करने वाले बादल देखकर मेरा मन सीता को देखने के लिए दौड़ता है। निश्चय ही बादलों का आश्रय लेकर सीता, आकाश में विचरती हुई, मेरे शोक को बढ़ाने वाले अनेक रूपों में प्रकट होती हैं।" लक्ष्मण ने धैर्य धारण करके कहाः "हे काकुत्स्थ! शीघ्र ही वह काल आएगा जब सुग्रीव सीता की खोज के लिए वानरों की सेना भेजेंगे। इसलिए हे राघव, शोक संताप को त्याग दीजिए। अवश्य ही किया गया कर्म शीघ्र ही फल देता है। अतः हे राघव! आप आज धैर्य और धृति का आलम्बन लीजिए।"
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण राम को सांत्वना देते हैं कि वर्षा ऋतु के बाद निश्चय ही सीता की खोज का प्रयास होगा।
॥ श्लोक १५-१८ ॥
एवमाश्वासितो रामो लक्ष्मणेन महात्मना ।
प्रस्रवणे निवसता धैर्यमालम्ब्य सत्वरः ॥
स तत्र तापसैः सार्धं कथाश्चक्रे महाबलः ।
आश्रमेषु च सर्वेषु वसन् रामो महायशाः ॥
वर्षारात्रिषु शीतासु रामो दुःखेन कर्शितः ।
सीतामेवानुशोचन् वै समये समये विभुः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार महात्मा लक्ष्मण द्वारा आश्वासन पाकर राम ने धैर्य धारण किया। वहाँ प्रस्रवण पर निवास करते हुए महाबली राम तपस्वियों के साथ कथाएँ करते और सब आश्रमों में निवास करते। ठंडी वर्षा की रातों में दुःख से कृश हुए राम, समय-समय पर सीता का ही स्मरण करते रहे।
🔍 व्याख्या : लक्ष्मण के समझाने पर राम धैर्य धारण करते हैं, परन्तु सीता की स्मृति उन्हें सताती रहती है।

🌧️ वर्षा ऋतु का प्रभाव

॥ श्लोक १९-३० ॥
वर्षासु च वहन्तीषु नद्यः पूर्णाः समन्ततः ।
रामः प्रेक्ष्य महाबाहुः शोकं पुनरुपागमत् ॥
ततः प्रवृत्ते संप्राप्ते शरदि ज्योत्स्नावती शुभा ।
सुग्रीवः प्रेषयामास वानरान् सीतया सह ॥
इति वाल्मीकिना प्रोक्तं किष्किन्धाकाण्डमुत्तमम् ।
शृण्वन् विमुच्यते पापात् रामभक्तिसमन्वितः ॥
📖 भावार्थ : वर्षाएँ बहने लगीं और चारों ओर नदियाँ भर गईं। उन्हें देखकर महाबाहु राम पुनः शोक से भर गए। तत्पश्चात् शरद ऋतु के आने पर, जो ज्योत्स्ना से युक्त और शुभ थी, सुग्रीव ने वानरों को सीता की खोज में भेजा। इस प्रकार वाल्मीकि द्वारा कहे गए उत्तम किष्किन्धाकाण्ड को सुनने वाला, रामभक्ति से युक्त होकर पापों से मुक्त हो जाता है।
🔍 व्याख्या : यह सर्ग वर्षा ऋतु के अंत और शरद के आगमन का संकेत देता है, जिससे सीता की खोज का मार्ग प्रशस्त होता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌧️ प्रकृति-चित्रण और मानवीय भावनाएँ

वाल्मीकि ने इस सर्ग में वर्षा ऋतु का अत्यन्त मनोहारी वर्णन किया है। बादल, बिजली, मयूर, नदियाँ—सभी राम के विरह-वेदना के सहचर बन जाते हैं। यह दर्शाता है कि प्रकृति मनुष्य की भावनाओं पर कितना गहरा प्रभाव डालती है।

🛡️ लक्ष्मण का धैर्य और कर्तव्य-पालन

लक्ष्मण न केवल राम के अनुचर हैं, वरन उनके मार्गदर्शक और धैर्य-स्तम्भ भी हैं। वे राम को सांत्वना देकर उन्हें कर्तव्यपथ पर स्थिर रखते हैं। यह सर्ग लक्ष्मण की वाक्पटुता और धैर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।

📜 कालचक्र और प्रतीक्षा

राम को वर्षा ऋतु बीतने तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह सिखाता है कि जीवन में कभी-कभी धैर्यपूर्वक समय का चक्र बीतने का इंतज़ार करना आवश्यक होता है।

🔱 सीता की अदृश्य उपस्थिति

इस पूरे सर्ग में सीता शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, फिर भी उनकी छवि हर श्लोक में व्याप्त है। यह राम के अटूट प्रेम और सीता के महत्व को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें धैर्य, प्रेम और कर्तव्यपरायणता की शिक्षा मिलती है। कठिन से कठिन समय में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। साथ ही, सच्चा प्रेम हर परिस्थिति में अपने प्रियतम का स्मरण कराता है। लक्ष्मण जैसा मित्र या भाई हो तो दुःख भी सहनीय हो जाता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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