सुग्रीव का राज्याभिषेक
किष्किन्धाकाण्ड के छब्बीसवें सर्ग में वाली के वध के पश्चात् श्रीराम के आदेश से सुग्रीव का राज्याभिषेक किया जाता है। सुग्रीव किष्किन्धा के राजा बनते हैं और तारा को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करते हैं।
विवरण
वाली का वध हो जाने के बाद, राम सुग्रीव को राजा बनाने का निश्चय करते हैं। वे लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजते हैं और राज्याभिषेक की तैयारी करने को कहते हैं। लक्ष्मण के आदेश पर वानर सेना अभिषेक की सामग्री जुटाती है। हनुमान, अंगद, नल, नील, जाम्बवान आदि सभी वानरगण उपस्थित होते हैं। सुग्रीव को सिंहासन पर बिठाकर ऋक्षराज जाम्बवान एवं अन्य वानरों द्वारा मन्त्रपूर्वक उसका अभिषेक किया जाता है। सुग्रीव किष्किन्धा के राजा बन जाते हैं। तत्पश्चात् सुग्रीव, तारा को सान्त्वना देते हैं और उसे अपनी पत्नी बनाते हैं। वे सभी वानरों को आश्वस्त करते हैं कि वह न्यायपूर्वक राज्य करेंगे। इस सर्ग में सुग्रीव के राज्याभिषेक का विस्तार से वर्णन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २६
(सुग्रीवराज्याभिषेकः – सुग्रीव का राज्याभिषेक)
🔆 प्रस्तावना : वाली का वध करने के पश्चात् राम ने सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य सौंपने का निश्चय किया। उनके आदेश से लक्ष्मण अभिषेक की तैयारी करते हैं। यह सर्ग सुग्रीव के राजतिलक का मनोहारी वर्णन प्रस्तुत करता है।
🏹 राम का आदेश और अभिषेक की तैयारी (श्लोक १-१०)
अब्रवीद्वचनं श्रीमान् किष्किन्धां गन्तुमर्हसि ॥
सुग्रीवस्याभिषेकार्थं यथाशास्त्रं विधानतः ।
सम्भारान् सम्भर क्षिप्रं वानरेन्द्रस्य धीमतः ॥
इत्युक्तः स तु धर्मात्मा लक्ष्मणः शीघ्रविक्रमः ।
जगाम किष्किन्धां रामं प्रणम्य मुदितो ययौ ॥
ददर्श सुग्रीवमुखान् वानरान् हृष्टमानसान् ॥
ते दृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राप्तं वानराः शीघ्रमब्रुवन् ।
सुग्रीवं राजशार्दूलं लक्ष्मणः समुपस्थितः ॥
श्रुत्वा तु लक्ष्मणं प्राप्तं सुग्रीवः प्रत्यपूजयत् ।
अर्ध्येन च पदेन च राघवानुचरं प्रियम् ॥
आज्ञप्ताः कपिशार्दूलाः सम्भारान् समहर्षयः ॥
हनूमानङ्गदश्चैव नलश्चैव महाबलः ।
जाम्बवानृषभो नीलस्तारश्च सह गवयः ॥
गन्धमाल्यानि रत्नानि वासांसि विविधानि च ।
समानिन्युः प्रीतियुता राज्ञोऽभिषेककारणात् ॥
👑 सुग्रीव का राज्याभिषेक (श्लोक ११-२५)
अभ्यषिञ्चन् सुहृद्वीरं किष्किन्धायां महाबलम् ॥
जाम्बवान् च महातेजा हनूमांश्च महाबलः ।
अभ्यषिञ्चत सुग्रीवं राजानं वानरर्षभम् ॥
सागरोदककलशैः पूर्णै रत्नविभूषितैः ।
श्रिया जुष्टं यथा शक्रं देवराजं सुरेश्वराः ॥
ततः प्रहृष्टा वानराः सुग्रीवं प्रति हर्षिताः ।
ननृतुश्च जगुश्चैव वाद्यानि विविधानि च ॥
सुग्रीवः प्लवगाधीशः प्रतिजग्राह तां श्रियम् ।
तारां चैव महाभागां पत्नीत्वे समवाप्तवान् ॥
तारां परिष्वज्य भुजाभ्यां मुमुदे सह बान्धवैः ॥
आश्वासयत् स वानरान् मैत्र्या परमया युतः ।
अहं हि न्यायतो राज्यं करिष्ये वो हिते रतः ॥
💧 तारा का विलाप और सुग्रीव द्वारा सान्त्वना (श्लोक २१-३०)
चुक्रोश करुणं राज्ञी पतिमालोक्य दुःखिता ॥
सुग्रीवस्त्वब्रवीत् तारां मा शोकं कर्तुमर्हसि ।
अहं ते पतिरद्यापि राज्यं चेदं मया सह ॥
तारा शोकं परित्यज्य सुग्रीवं प्रत्यपद्यत ।
राज्ञीत्वे चाभिषिक्ता सा वानरेन्द्रेण धीमता ॥
🏕️ अभिषेक के बाद का दृश्य
प्रहृष्टाः पूजयामासु राघवौ सीतया सह ॥
लक्ष्मणं च महात्मानं रामं च सत्यविक्रमम् ।
पूजयित्वा यथान्यायं विसर्जयामासुरादृताः ॥
रामोऽपि सुग्रीवमिदं वचो जगाद धार्मिकः ।
त्वया वानरराजेन्द्र सीतायाश्च विचिन्त्यताम् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🤝 राम का राजनीतिक कौशल
राम ने वाली का वध करके सुग्रीव को राजा बनाया। यह उनकी कूटनीति और मैत्री निभाने का उदाहरण है। वे चाहते थे कि सुग्रीव सिंहासन पर आरूढ़ होकर सीता की खोज में सहायता करे।
👑 राज्याभिषेक का वैदिक विधान
इस सर्ग में अभिषेक की जो विधि वर्णित है, वह प्राचीन भारतीय राज्याभिषेक पद्धति का दिग्दर्शन कराती है। इसमें सागर-जल, रत्नजड़ित कलश, मन्त्रोच्चारण आदि का उल्लेख है।
💞 तारा का पुनर्विवाह
तारा का सुग्रीव को पति के रूप में स्वीकार करना उस युग की सामाजिक परम्परा को दर्शाता है, जहाँ राज्य की स्थिरता के लिए ऐसा कदम उठाया जाता था।
⏳ आगे की ओर संकेत
सर्ग के अन्त में राम द्वारा सीता की खोज हेतु कहना यह दर्शाता है कि अब किष्किन्धाकाण्ड का अगला भाग सीता-खोज और वानरों की यात्रा पर केन्द्रित होगा।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि मित्र के प्रति कृतज्ञता और कर्तव्य का पालन आवश्यक है। राम ने सुग्रीव को राज्य दिलाकर अपना वचन निभाया, और सुग्रीव को अब सीता की खोज का संकल्प पूरा करना है। साथ ही, न्यायपूर्वक राज्य-संचालन और सबके हित में कार्य करना ही आदर्श राजनीति है।