वालि की अंत्येष्टि क्रिया

किष्किन्धाकाण्ड का पच्चीसवाँ सर्ग वालि के अंतिम संस्कार का वर्णन करता है। राम के बाण से घायल वालि तारा की गोद में अंतिम साँस लेता है। राम के आदेश पर लक्ष्मण सुग्रीव के राज्याभिषेक हेतु साल वृक्षों को लाते हैं और वालि की चिता का निर्माण करते हैं। तारा का विलाप, वालि का अंतिम संस्कार और सुग्रीव का राज्याभिषेक इस सर्ग की मुख्य घटनाएँ हैं।

विवरण

पिछले सर्ग में राम के बाण से घायल होकर वालि मूर्छित हो गया था। अब इस सर्ग में वालि होश में आता है और अपनी पत्नी तारा की गोद में लेटकर अंतिम साँसें लेता है। तारा का करुण विलाप देखते ही बनता है। वह वालि के पराक्रम, उसकी वीरता और उसके साथ बिताए सुखद क्षणों को याद करती है। वालि की मृत्यु के बाद राम सुग्रीव को आदेश देते हैं कि वालि का राजोचित अंतिम संस्कार किया जाए। राम के आदेश पर लक्ष्मण साल वृक्षों को लाते हैं और चिता का निर्माण करते हैं। वालि के पुत्र अंगद सहित सभी वानर वालि के पार्थिव शरीर को चिता पर रखते हैं और अंतिम संस्कार की क्रियाएँ सम्पन्न करते हैं। अंत में राम सुग्रीव का राज्याभिषेक करने का आदेश देते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २५

(वालि की अंत्येष्टि क्रिया – तारा का विलाप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के बाण से घायल वालि भूमि पर गिर पड़ा है। उसकी पत्नी तारा उसके पास आकर विलाप कर रही है। वालि अब अंतिम साँसें गिन रहा है। यह सर्ग वालि की मृत्यु, तारा के विलाप और वालि के अंतिम संस्कार की मार्मिक कथा प्रस्तुत करता है।

💔 वालि का अंतिम समय और तारा का विलाप (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः सम्प्राप्तमात्रस्तु वाली वानरपुङ्गवः ।
तारामिदं वचः प्राह संरम्भात् प्रसमीक्ष्य च ॥
इयन्तु तारा या पूर्वं मयोक्ता वरवर्णिनी ।
विवत्स्यतीति सा राजन्नद्य मां समुपस्थिता ॥
न हि शोच्यो मया तात न त्वया न च बान्धवैः ।
धर्ममेवानुपश्यन्त्या युद्ध एषा गतिर्ध्रुवा ॥
अहं तु खलु काकुत्स्थं युद्धे जित्वा महाबलम् ।
प्रवेक्ष्यामि पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे ॥
एवं ब्रुवाणं वालिन्तु तारा वचनमब्रवीत् ।
न मे जीवितुकामा त्वं मयि जीवितुमर्हसि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सम्प्राप्तमात्रः = आते ही; तु = तो; वाली = वालि; वानरपुङ्गवः = वानरश्रेष्ठ; ताराम् = तारा को; इदम् = यह; वचः = वचन; प्राह = बोला; संरम्भात् = क्रोध से; प्रसमीक्ष्य = देखकर; च = और; इयम् = यह; तु = तो; तारा = तारा; या = जो; पूर्वम् = पहले; मया = मेरे द्वारा; उक्ता = कही गई; वरवर्णिनी = सुन्दरी; विवत्स्यतीति = विधवा होगी; सा = वह; राजन् = हे राजन्; अद्य = आज; माम् = मुझे; समुपस्थिता = प्राप्त हुई; न = नहीं; हि = ही; शोच्यः = शोक करने योग्य; मया = मेरे द्वारा; तात = हे तात; न = नहीं; त्वया = तुम्हारे द्वारा; न = नहीं; च = और; बान्धवैः = बन्धुओं द्वारा; धर्मम् = धर्म को; एव = ही; अनुपश्यन्त्या = देखते हुए; युद्धे = युद्ध में; एषा = यह; गतिः = गति; ध्रुवा = निश्चित; अहम् = मैं; तु = तो; खलु = निश्चय ही; काकुत्स्थम् = ककुत्स्थवंशी राम को; युद्धे = युद्ध में; जित्वा = जीतकर; महाबलम् = महाबली; प्रवेक्ष्यामि = प्रवेश करूँगा; पुरीम् = नगरी; लङ्काम् = लंका में; हत्वा = मारकर; रावणम् = रावण को; आहवे = युद्ध में; एवम् = इस प्रकार; ब्रुवाणम् = कहते हुए; वालिन् = वालि को; तु = तो; तारा = तारा; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोली; न = नहीं; मे = मुझे; जीवितुकामा = जीने की इच्छा; त्वम् = तुम; मयि = मुझमें; जीवितुम् = जीने के लिए; अर्हसि = योग्य हो।
📖 भावार्थ : उसके बाद वानरश्रेष्ठ वालि ने आती हुई तारा को देखकर क्रोधपूर्वक यह वचन कहा: "हे राजन्! यह वही तारा है जिसके विषय में मैंने पहले कहा था कि यह सुन्दरी विधवा होगी। आज वह मुझे प्राप्त हुई है। हे तात! मेरे लिए, तुम्हारे लिए और बन्धुओं के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है। धर्म को देखते हुए युद्ध में यही निश्चित गति है। मैं तो निश्चय ही महाबली ककुत्स्थवंशी राम को युद्ध में जीतकर और रावण को मारकर लंका नगरी में प्रवेश करूँगा।" इस प्रकार कहते हुए वालि से तारा बोली: "मुझे जीने की इच्छा नहीं है, तुम मुझमें जीने के योग्य हो।"
🔍 व्याख्या : वालि मृत्यु के निकट होते हुए भी अपनी वीरता का परिचय दे रहा है। वह तारा को सान्त्वना देता हुआ कहता है कि युद्ध में मृत्यु निश्चित है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
त्वयि जीवति काकुत्स्थ कथं जीवामि निर्घृणे ।
हते त्वयि महाबाहो कथं जीवामि निर्घृणे ॥
नूनं स्त्रीहृदयं भीरु सुकुमारं च सर्वदा ।
यदहं त्वां समासाद्य गतासुं नावबुध्यसे ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे ननु त्वं वानरेश्वरः ।
मया सार्धमिहासीनो यथापूर्वमरिन्दम ॥
एवं विलपतीं तारां वाली वचनमब्रवीत् ।
गच्छ तारे मम वचः शृणु त्वं यदि मन्यसे ॥
📖 भावार्थ : "हे काकुत्स्थ! तुम्हारे जीते हुए मैं कैसे जीऊँ? हे निर्घृण! हे महाबाहो! तुम्हारे मारे जाने पर मैं कैसे जीऊँ?" "निश्चय ही स्त्री का हृदय भीरु और सदा सुकुमार होता है, जो मैं तुम्हें प्राप्त करके भी मृतप्राय नहीं समझती।" "उठो, उठो! तुम क्यों सो रहे हो? हे अरिन्दम! क्या तुम वानरेश्वर नहीं हो? पहले की भी मेरे साथ यहाँ बैठो।" इस प्रकार विलाप करती हुई तारा से वालि ने यह वचन कहा: "हे तारे! जाओ, यदि तुम मानो तो मेरा वचन सुनो।"
🔍 व्याख्या : तारा का यह विलाप अत्यन्त मार्मिक है। वह अपने पति को मृतप्राय देखकर अपनी व्यथा प्रकट कर रही है और उन्हें उठने के लिए कह रही है।

🔥 वालि का अंतिम संस्कार (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
राघवः प्राह सुग्रीवं वालिनं प्रेतकारय ।
यथार्हं वानरश्रेष्ठ क्रियतामस्य सत्क्रिया ॥
ततः सुग्रीवनिर्देशाल्लक्ष्मणः शीघ्रमभ्ययात् ।
सालवृक्षान्महाकायान् समानीय महाबलः ॥
चितां चकार धर्मात्मा लक्ष्मणः परवीरहा ।
वालिनश्च यथान्यायं क्रियां चक्रुर्वनौकसः ॥
ततः सुग्रीवसहितो रामो वचनमब्रवीत् ।
अंगदं राज्यमिक्षस्व राजा भव महाबलः ॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा सुग्रीवं परिषस्वजे ।
लक्ष्मणं च परिष्वज्य वानरेन्द्रमथाब्रवीत् ॥
📖 भावार्थ : राघव ने सुग्रीव से कहा: "हे वानरश्रेष्ठ! वालि का प्रेतकार्य (अंतिम संस्कार) करो। इसकी यथोचित सत्क्रिया की जाए।" तब सुग्रीव के आदेश से महाबली लक्ष्मण शीघ्र ही गए और बड़े-बड़े साल वृक्षों को लाकर चिता का निर्माण किया। परवीरहा धर्मात्मा लक्ष्मण ने चिता बनाई और वानरों ने वालि का यथान्याय अंतिम संस्कार किया। तत्पश्चात् सुग्रीव के साथ राम ने अंगद से कहा: "हे महाबली! तुम राजा बनो।" ऐसा कहकर राघव ने सुग्रीव को गले लगाया और लक्ष्मण को भी गले लगाकर वानरेन्द्र से बोले।
🔍 व्याख्या : राम के आदेश पर लक्ष्मण ने वालि के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। यहाँ राम का धर्मपरायण स्वरूप दिखता है कि उन्होंने अपने हाथों से मारे गए वालि का राजोचित अंतिम संस्कार करवाया।
॥ श्लोक १६-२० ॥
प्रविश्य तु पुरीं रम्यां किष्किन्धां वालिना त्यजाम् ।
अभ्यषिञ्चत सुग्रीवं राघवो वानरेश्वरम् ॥
ततः सुग्रीवमासाद्य राजानं वानरर्षभाः ।
मुमुदुर्हृष्टमनसो ववृषुः पुष्पवृष्टयः ॥
तारा तु पुत्रमादाय रुदती शोककर्शिता ।
निष्पपात तदा दीना वेगेन महता भृशम् ॥
अंगदं पतितं भूमौ दृष्ट्वा रामो महाबलः ।
सान्त्वयामास तं दीनं तारा वचनमब्रवीत् ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : फिर वालि द्वारा त्यागी गई रम्य किष्किन्धा नगरी में प्रवेश करके राघव ने सुग्रीव का वानरेश्वर के रूप में अभिषेक किया। तब सुग्रीव के राजा बनने पर सभी वानरर्षभ हर्षित मन से मुदित हुए और पुष्पों की वर्षा की। तारा शोक से कृश होकर पुत्र (अंगद) को लेकर रोती हुई, अत्यन्त दीना होकर तीव्र वेग से बाहर निकली। महाबली राम ने भूमि पर गिरे हुए अंगद को देखकर उस दीन को सान्त्वना दी और तारा से वचन कहे।
🔍 व्याख्या : वालि के अंतिम संस्कार के बाद सुग्रीव का राज्याभिषेक हुआ। सभी वानर हर्षित थे, किन्तु तारा और अंगद शोक में डूबे हुए थे। राम ने उन्हें सान्त्वना दी।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😢 तारा का विलाप

तारा का विलाप संस्कृत साहित्य का एक अद्वितीय उदाहरण है। इसमें पतिव्रता स्त्री की करुणा, वेदना और अपने पति के प्रति अनन्य प्रेम का सजीव चित्रण है। यह विलाप वाल्मीकि की करुण रस पर अद्वितीय पकड़ को दर्शाता है।

⚖️ राम का धर्मपालन

राम ने वालि को मारा था, किन्तु उसके अंतिम संस्कार का पूरा ध्यान रखा। यह दर्शाता है कि राम शत्रु के प्रति भी धर्म का पालन करते हैं। वे वालि का राजोचित संस्कार करवाकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।

👑 सुग्रीव का राज्याभिषेक

वालि की मृत्यु के साथ ही सुग्रीव का राज्याभिषेक होता है। यह राम की सहायता से सुग्रीव के लंबे संघर्ष की परिणति है। राम ने अपना वचन पूरा किया और सुग्रीव को उसका राज्य वापस दिलाया।

🌳 साल वृक्षों का महत्त्व

लक्ष्मण द्वारा साल वृक्षों को लाकर चिता बनाना इस बात का प्रतीक है कि वानर जाति के अंतिम संस्कार में वृक्षों का विशेष महत्त्व होता है। यह उनकी प्राकृतिक जीवनशैली को भी दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि मृत्यु जीवन का अटल सत्य है। चाहे वालि जैसा वीर योद्धा हो या साधारण मनुष्य, मृत्यु सबको एक दिन आनी है। तारा का विलाप हमें सिखाता है कि नश्वर शरीर के मोह से ऊपर उठकर धर्म और कर्तव्य का पालन करना चाहिए। राम का वालि के अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना दर्शाता है कि शत्रु के प्रति भी मानवीय संवेदना होनी चाहिए और धर्म का पालन सदैव करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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