तारा और सुग्रीव का वालि के साथ मरने का निश्चय
किष्किन्धाकाण्ड के चौबीसवें सर्ग में वालि की मृत्यु के पश्चात् तारा का विलाप, उसका सती होने का निश्चय तथा सुग्रीव का भी वालि के साथ प्राण त्यागने का दृढ़ संकल्प वर्णित है। राम के समझाने पर अन्ततः सुग्रीव का राज्याभिषेक होता है।
विवरण
वालि के रामबाण से मरने के बाद किष्किन्धा में शोक की लहर दौड़ जाती है। तारा पति के शव के पास आकर विलाप करती है। वह वालि के गुणों का स्मरण करती है, अपनी दुर्दशा पर शोक प्रकट करती है और अन्त में वालि के साथ ही चिता में जलने (सती होने) का निश्चय करती है। दूसरी ओर सुग्रीव भी भ्रातृ-स्नेह से विह्वल होकर आत्मग्लानि में डूब जाता है। वह सोचता है कि उसी के कारण वालि मारा गया, अतः वह भी प्राण त्याग देगा। तब भगवान राम वहाँ प्रकट होते हैं और सुग्रीव तथा तारा को धैर्य बँधाते हैं। वे सुग्रीव को राजा बनने और वानरों का नेतृत्व सम्भालने की प्रेरणा देते हैं। इस प्रकार यह सर्ग शोक से कर्तव्य की ओर मोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण प्रसंग है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २४
(तारा और सुग्रीव का वालि के साथ मरने का निश्चय)
🔆 प्रस्तावना : वालि राम के बाण से मृत्यु को प्राप्त हो चुका है। समस्त वानर सेना शोकाकुल है। वालि की पत्नी तारा पति के पार्थिव शरीर के पास आती है और विलाप करती है। उसका विलाप इतना मार्मिक है कि सभी की आँखें नम हो जाती हैं। वह वालि के साथ सती होने की इच्छा प्रकट करती है। दूसरी ओर सुग्रीव भी भ्रातृहत्या के पाप से ग्लानि में डूब जाता है और वह भी प्राण त्यागने का निश्चय कर लेता है। तब राम वहाँ पधारते हैं और उन्हें धैर्य बँधाते हुए कर्तव्यपथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
😢 तारा का करुण विलाप (श्लोक १-१२)
सुग्रीवमभिसम्प्रेक्ष्य रामं चाक्लिष्टकारिणम् ॥
विललाप महाभागा करुणं दीनया गिरा ।
हा नाथेति चुकोशोच्चैः पतिता भुवि दुःखिता ॥
उत्तिष्ठ वीर भद्रं ते किं शेषे रणमूर्धनि ।
हतो वा किं नु जीवासि किमिदं ते विचेष्टितम् ॥
शेषे वीर शिलातल्पे किं नु स्वपिषि मे प्रभो ॥
नूनं त्वं वानरश्रेष्ठ न मां सम्भाषसे प्रिये ।
अहं तारा महाभाग किं नु मां नाभिभाषसे ॥
अपि त्वां पाणिना स्पृष्ट्वा बोधयामि महाबल ।
उत्तिष्ठेति ब्रुवाणा तु न लज्जे वीर संयुगे ॥
पपात सहसा भूमौ विह्वला च पुनः पुनः ॥
समाश्वास्य च तां सुग्रीवो बाष्पपूर्णेक्षणस्तदा ।
उवाच धर्मसंयुक्तं वचनं शोककर्शितः ॥
💔 सुग्रीव का हृदयपरिवर्तन (श्लोक १३-२०)
मत्कृतेन चिरं शोच्यं सोढव्यं च त्वया प्रिये ॥
अहं हि पापकर्मा वै भ्रातृहा पापनिश्चयः ।
त्वादृशीनां च नारीणां दुःखमुत्पादयाम्यहम् ॥
न मे जीवितमर्थाय शोकस्यापनयाय च ।
त्यक्ष्याम्यद्यैव कल्याणि प्राणान् दुःखेन पीडितः ॥
आत्मानं हन्तुमारेभे तारा चैनमवारयत् ॥
तारोवाच – न त्वं वधार्हः सुग्रीव मा कृथा मतिमीदृशीम् ।
त्वयि जीवति मे नाथः सदृशः सम्प्रदृश्यते ॥
हनूमांश्च तदा वाक्यं सुग्रीवं प्रत्यभाषत ।
राघवः पालयेत् त्वां हि किमर्थं हातुमिच्छसि ॥
🕊️ राम का सान्त्वनादायक उपदेश (श्लोक २१-३४)
उवाच च महातेजाः सुग्रीवं शोककर्शितम् ॥
न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यो भुवि विद्यते ।
कालेन सर्वे निर्वाणाः कालो हि दुरतिक्रमः ॥
त्यज शोकं च मोहं च राज्यं च प्रतिपादय ।
धर्मार्थकामसंयुक्तं भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ॥
📜 श्लोक २६-३४ का सार : राम सुग्रीव को समझाते हैं कि वालि स्वर्ग सिधार गया, उसके लिए शोक करना व्यर्थ है। तुम राजा बनकर वानरों का नेतृत्व करो और मेरी सीता की खोज में सहायता करो। तारा को भी धैर्य बँधाते हैं कि वह पतिव्रता धर्म में स्थित रहे और पुत्र अंगद के पालन का उत्तरदायित्व निभाए। अन्त में सुग्रीव राम के उपदेश से सान्त्वना पाता है और राज्याभिषेक के लिए तैयार हो जाता है।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👸 तारा का पतिव्रत धर्म
तारा का विलाप और सती होने का निश्चय भारतीय नारी के पतिपरायणता का उत्कृष्ट उदाहरण है। वह न केवल पति के वियोग में व्याकुल है, वरन् उसकी मृत्यु के बाद भी उसके साथ रहने की इच्छा रखती है।
🌊 सुग्रीव का अपराधबोध
सुग्रीव का आत्मघात का विचार उसके चरित्र की संवेदनशीलता को दर्शाता है। यद्यपि वालि ने उसे सताया था, फिर भी भाई की मृत्यु पर उसे गहरा दुःख होता है। यह मानवीय भावनाओं का यथार्थ चित्रण है।
⚖️ राम का धैर्योपदेश
राम का सुग्रीव को दिया गया उपदेश जीवन के यथार्थ को समझने की प्रेरणा देता है – शोक और मोह से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य का पालन करना ही सच्ची मानवता है।
👑 राज्याभिषेक की भूमिका
यह सर्ग सुग्रीव के राज्याभिषेक का मार्ग प्रशस्त करता है। राम के सान्त्वना से सुग्रीव पुनः कर्तव्यपरायण बनता है और आगे चलकर सीता की खोज में सहायक होता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि दुःख और विपत्ति में धैर्य नहीं खोना चाहिए। जीवन में कर्तव्य ही सर्वोपरि है। राम की तरह हमें भी दूसरों को उनके कर्तव्य का बोध कराना चाहिए और उन्हें सही मार्ग पर लाना चाहिए। साथ ही, स्त्री-पुरुष के पारस्परिक प्रेम और त्याग की भावना भी सीखने योग्य है।