वालि की मृत्यु पर तारा का विलाप

वालि के वध के पश्चात उसकी पत्नी तारा विलाप करती है। वह वालि के प्रति अपने प्रेम और शोक को व्यक्त करती है तथा राम के इस कार्य पर मिश्रित भाव प्रकट करती है। अंत में राम उसे सांत्वना देते हैं और धर्म का उपदेश देते हैं।

विवरण

राम के बाण से घायल होकर वालि भूमि पर गिर पड़ता है। उसकी पत्नी तारा को जब यह समाचार मिलता है, तो वह व्याकुल होकर घटनास्थल पर आती है। वह वालि के निष्प्राण शरीर को देखकर विलाप करने लगती है। वह अपने पति के पराक्रम, उनके गुणों और उनके प्रति अपने प्रेम का स्मरण करती है। साथ ही वह राम की ओर भी देखती है, और उनके कार्य पर व्यंग्य और शोक मिश्रित वचन कहती है। वह कहती है कि जो राम धर्म के रक्षक कहलाते हैं, उन्होंने छल से वालि का वध किया। इस पर राम धर्म, राजनीति और काल के नियमों का उपदेश देते हुए तारा को सांत्वना देते हैं। अंत में तारा शांत होती है और वालि के अंतिम संस्कार की व्यवस्था होती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २३

(वालि की मृत्यु पर तारा का विलाप)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के बाण से वालि धराशायी हो चुका है। उसकी पत्नी तारा को जब यह दुःखद समाचार मिलता है, तो वह विलाप करती हुई रणभूमि की ओर दौड़ी आती है। यह सर्ग उसी करुण विलाप का मार्मिक चित्रण है, जिसमें पतिव्रता तारा के हृदय की टीस, राम के प्रति व्यंग्य और अंत में धर्मोपदेश से शांति का वर्णन है।

🌺 तारा का आगमन और करुण विलाप (श्लोक १-१६)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततस्तु तारा त्वरिता शोकेनाकुलितेन्द्रिया ।
निष्पपात हतं वालिनं द्रष्टुं वानरी सती ॥
सा वालिनं निपतितं ददर्श वसुधातले ।
शरैर्भृशं विद्धतनुं रुधिरेण समुक्षितम् ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ वालिनं वानरर्षभम् ।
तारा विलापयामास करुणं शोककर्शिता ॥
हा नाथ हा महाबाहो हा राजन् हा महाबल ।
हा प्रिय हा सुखश्रोत्र हा कान्त हा दयानिधे ॥
किं त्वया राम निष्ठूरं कृतमप्रतिपूजितम् ।
निहत्य वालिनं युद्धे धर्ममाश्रित्य पालयन् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; तु = पुनः; तारा = तारा; त्वरिता = शीघ्रता से; शोकेन = शोक से; आकुलितेन्द्रिया = व्याकुल इंद्रियों वाली; निष्पपात = निकल पड़ी; हतम् = मरे हुए; वालिनम् = वालि को; द्रष्टुम् = देखने के लिए; वानरी = वानरी; सती = पतिव्रता; सा = वह; वालिनम् = वालि को; निपतितम् = गिरे हुए; ददर्श = देखा; वसुधातले = भूमि पर; शरैः = बाणों से; भृशम् = अत्यधिक; विद्धतनुम् = विद्ध शरीर वाले; रुधिरेण = रक्त से; समुक्षितम् = भीगे हुए; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; पतितम् = गिरे हुए; भूमौ = भूमि पर; वालिनम् = वालि को; वानरर्षभम् = वानरश्रेष्ठ को; तारा = तारा; विलापयामास = विलाप करने लगी; करुणम् = करुण स्वर में; शोककर्शिता = शोक से कृश; हा = हा; नाथ = स्वामी; हा महाबाहो = हा महाबाहो; हा राजन् = हा राजन्; हा महाबल = हा महाबल; हा प्रिय = हा प्रिय; हा सुखश्रोत्र = हा सुखदायी कानों वाले; हा कान्त = हा कांत; हा दयानिधे = हा दया के धाम; किम् = क्या; त्वया = तुमने; राम = हे राम; निष्ठूरम् = क्रूर कार्य; कृतम् = किया; अप्रतिपूजितम् = अप्रतिपूजनीय (निंदनीय); निहत्य = मारकर; वालिनम् = वालि को; युद्धे = युद्ध में; धर्मम् = धर्म का; आश्रित्य = आश्रय लेकर; पालयन् = पालन करते हुए?
📖 भावार्थ : तब शोक से व्याकुल पतिव्रता वानरी तारा शीघ्रता से मरे हुए वालि को देखने के लिए दौड़ी। उसने भूमि पर गिरे हुए, बाणों से छलनी शरीर वाले, रक्त से भीगे हुए वालि को देखा। वानरश्रेष्ठ वालि को इस प्रकार धराशायी देख तारा शोक से कृश होकर करुण विलाप करने लगी – "हा नाथ! हा महाबाहो! हा राजन्! हा महाबल! हा प्रिय! हा सुखदाता! हा कांत! हा दयानिधे! हे राम, धर्म का आश्रय लेकर धर्म की रक्षा का दावा करने वाले आपने युद्ध में वालि को मारकर यह कैसा क्रूर और निंदनीय कार्य किया?"
🔍 व्याख्या : तारा के इन वचनों में पति के प्रति अनुराग और राम के कार्य पर गहरी व्यथा झलकती है। वह राम पर धर्म का ढोंग करके अधर्म करने का आक्षेप करती है।
॥ श्लोक ६-१६ ॥
नूनं त्वमसि काकुत्स्थ धर्मज्ञो धर्मवत्सलः ।
कथं धर्ममजानानो वालिनं पापमन्यसे ॥
यदि धर्मं चिकीर्षेस्त्वं यदि धर्मे स्थितो भवान् ।
वालिना यत्समागम्य कथं युद्धे हतस्त्वया ॥
इत्येवं विलपन्ती सा तारा शोकपरिप्लुता ।
निपपात भृशं वीर वालिनं प्रति सुन्दरी ॥
तामुवाच ततो रामो धर्म्यां वाचं सनातनीम् ।
वालिनश्च गतिं युक्त्या संबोध्य प्रियया सह ॥
📖 भावार्थ : "निश्चय ही आप काकुत्स्थ धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं; फिर धर्म को न जानने वाले की भाँति आप वालि को पापी कैसे मानते हैं? यदि आप धर्म की इच्छा रखते हैं, यदि आप धर्म में स्थित हैं, तो वालि से युद्ध करके आपने उसे कैसे मार डाला?" इस प्रकार विलाप करती हुई वह शोकाकुल सुन्दरी तारा वालि के पास गिर पड़ी। तब राम ने धर्मयुक्त सनातन वाणी में, युक्तिपूर्वक वालि की गति बताते हुए, तारा को संबोधित किया।

🕊️ राम का उपदेश और तारा की शांति (श्लोक १७-३२)

॥ श्लोक १७-२४ ॥
रामस्तु वचनं श्रुत्वा तारायाः करुणं तदा ।
प्रत्युवाच महातेजाः सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥
न त्वां शोचितुमर्हन्ती तारे धर्मविदां वरे ।
वाली चायं गतः स्वर्गं धर्मेणैव न संशयः ॥
क्षत्रधर्मे स्थितेनैव मया तत् समरं प्रति ।
वालिना सह धर्मज्ञे तस्माच्छोको न विद्यते ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं रामस्य विदितात्मनः ।
तारा प्रसन्नमनसा बभूव जनसंसदि ॥
📖 भावार्थ : राम ने तारा के करुण वचन सुनकर महातेजस्वी राम ने सान्त्वनापूर्वक यह वचन कहा: "हे तारे, तुम धर्मविदाओं में श्रेष्ठ हो, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। यह वालि धर्मपूर्वक ही स्वर्ग को प्राप्त हुआ है, इसमें संशय नहीं। मैंने क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए उसके साथ युद्ध किया है, इसलिए हे धर्मज्ञे, शोक का कोई कारण नहीं है।" आत्मज्ञानी राम के इस वचन को सुनकर तारा जनसभा में प्रसन्न मन से शांत हो गई।
॥ श्लोक २५-३२ ॥
ततः प्रसन्ना तारा तु रामं वचनमब्रवीत् ।
त्वया धर्मः सुविदितो धर्मज्ञेति मया श्रुतम् ॥
तदिदं सर्वमेवाज्ञं यथा वदसि राघव ।
न मे शोकः क्षतो राम नापि क्रोधो न विस्मयः ॥
इत्युक्त्वा सा तदा तारा वालिनं प्रति सुन्दरी ।
चकार साधु संस्कारं रामस्य वचनात्तदा ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न हुई तारा ने राम से कहा: "हे राम, आप धर्मज्ञ हैं, यह मैंने सुना था। आप जैसा कहते हैं, वह सब उचित ही है। हे राघव, अब न तो मुझे शोक है, न क्रोध और न आश्चर्य।" ऐसा कहकर उस सुन्दरी तारा ने राम के वचनानुसार वालि का उचित संस्कार (दाह-संस्कार) करवाया।
🔍 व्याख्या : राम के धर्मोपदेश से तारा का शोक शांत हो जाता है। वह राम के कार्य की आवश्यकता को समझ जाती है और अंतिम संस्कार में सहयोग करती है। यह तारा की बुद्धिमत्ता और राम की नीति-निपुणता का परिचायक है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 करुण रस का साक्षात् उदाहरण

तारा का विलाप करुण रस का अद्भुत उदाहरण है। इसमें पतिव्रता स्त्री के हृदय की व्यथा, विरह-वेदना और राम के प्रति व्यंग्य मार्मिकता से उकेरे गए हैं।

⚖️ धर्म और राजनीति का समन्वय

राम का उपदेश क्षत्रिय धर्म, प्राणियों के स्वर्गगमन के नियम और राजधर्म का समन्वय प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि राम केवल युद्धकुशल ही नहीं, बल्कि नीति-निपुण भी हैं।

🐒 तारा का चरित्र

तारा के विलाप और फिर शांत होने से उसकी बुद्धिमत्ता, संयम और पतिव्रता धर्म का पता चलता है। वह केवल विलाप करने वाली नहीं, अपितु सत्य को समझने वाली महिला है।

🚩 अगले सर्ग की ओर

इस सर्ग के अंत में वालि के संस्कार की तैयारी होती है। अगले सर्ग में सुग्रीव का राज्याभिषेक और वानरों का मिलन वर्णित होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाले को कभी-कभी कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं, किंतु उनमें भी दया और सांत्वना का भाव होना चाहिए। राम ने वालि का वध किया, पर तारा के विलाप पर उसे धर्म का ज्ञान देकर शांत किया। हमें भी कठोर परिस्थितियों में धैर्य और संयम रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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