हनुमान् द्वारा तारा को सांत्वना
किष्किन्धाकाण्ड के इक्कीसवें सर्ग में वाली की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी तारा के विलाप और हनुमान् द्वारा उसे सांत्वना देने का वर्णन है। हनुमान् तारा को धैर्य बंधाते हैं, उसे राम की महिमा समझाते हैं और सुग्रीव के राज्याभिषेक को स्वीकार करने की सलाह देते हैं।
विवरण
वाली के वध के पश्चात् सम्पूर्ण किष्किन्धा नगरी शोक में डूब गई। तारा पति के वियोग में अत्यन्त व्याकुल होकर विलाप करने लगी। वह वाली के पार्थिव शरीर के पास गिर पड़ी और करुण क्रन्दन करते हुए अपने दुःख को प्रकट किया। उसकी यह दशा देखकर हनुमान् वहाँ पधारे। हनुमान् ने तारा को धैर्य दिलाते हुए कहा कि अब विलाप करना व्यर्थ है। उन्होंने तारा को समझाया कि वाली का वध धर्मानुसार हुआ है क्योंकि उसने राम की बहन की रक्षा नहीं की थी और सीता की खोज में सहायता नहीं दी थी। हनुमान् ने तारा को यह भी बताया कि सुग्रीव को राजा बनाना ही उचित है और अंगद को युवराज पद देना चाहिए। उन्होंने तारा को समझाया कि अब समय है कि वह सुग्रीव का साथ दे और नगरी में शान्ति स्थापित करे। अन्ततः तारा ने हनुमान् की बात मान ली और शोक संतप्त हृदय से वह सुग्रीव के पास गई।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २१
(हनुमान् द्वारा तारा को सांत्वना)
🔆 प्रस्तावना : राम के बाण से वाली का वध हो चुका है। सम्पूर्ण किष्किन्धा में शोक की लहर है। वाली की पटरानी तारा अपने पति के निधन से व्यथित होकर विलाप कर रही है। उसकी यह दशा देखकर महावीर हनुमान् वहाँ पधारते हैं और उसे धैर्य बंधाते हैं। यह सर्ग तारा के विलाप और हनुमान् के सांत्वनापूर्ण वचनों से परिपूर्ण है।
😢 तारा का विलाप (श्लोक १-१०)
भूमौ निपत्योरसि चैनमाराद्, विलापयामास सुदुःखिता सती॥
हा नाथ नाथेति चुक्रोश दीना, भृशं प्ररुद्य व्यसनाभितप्ता।
समीक्ष्य बाष्पपरिपूर्णनेत्रा, तारा वधूः शोकसमुद्धता सती॥
उत्तिष्ठ राजन् गमनाय याहि, किं शेषसे व्याकुलितेन्द्रियोऽयम्।
विमुक्तशस्त्राभरणः शयानः, कथं नु शेषे भुवि राक्षसेन्द्र॥
हा नाथ हे नाथ! इति = इस प्रकार; चुक्रोश = चिल्लाई; दीना = दीन; भृशम् = बहुत; प्ररुद्य = रोकर; व्यसनाभितप्ता = शोक से संतप्त; समीक्ष्य = देखकर; बाष्पपरिपूर्णनेत्रा = अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली; तारावधूः = तारा नाम की स्त्री; शोकसमुद्धता = शोक से व्याकुल; सती = पतिव्रता।
उत्तिष्ठ = उठो; राजन् = हे राजन्!; गमनाय = जाने के लिए; याहि = जाओ; किम् = क्यों; शेषसे = लेटे हो; व्याकुलितेन्द्रियः = व्याकुल इन्द्रियों वाले; अयम् = ये; विमुक्तशस्त्राभरणः = त्यागे हुए शस्त्र-आभूषण वाले; शयानः = सोए हुए; कथम् = कैसे; नु = निश्चय ही; शेषे = लेटे हो; भुवि = भूमि पर; राक्षसेन्द्र = हे राक्षसराज! (वाली)।
नूनं न जानासि ममार्तनादं, यथा रुदन्त्याः प्रिय दुःखितायाः॥
इति ब्रुवन्ती करुणं रुरोद, तारा सुतस्याग्रत एव राज्ञः।
तामश्रुनेत्रां पतितां महीतले, ददर्श हनुमान् वालिनः प्रियाम्॥
🕊️ हनुमान् का सांत्वना वचन (श्लोक ११-२०)
उवाच वचनं धीमान् समीपमुपसृत्य ह॥
त्यज्यतां त्वया तारे शोकोऽयं नाम नाशनः।
न हि शोकेण कल्याणि प्रेताः सिद्धिं लभन्ति वै॥
सुग्रीवस्य प्रसादेन राज्यं प्राप्स्यसि शोभने।
अंगदश्चैव युवराजः क्रियतां वचनान्मम॥
राघवस्य प्रसादेन सुग्रीवो राज्यमाप्नुयात्।
तद्भवानपि तारे त्वं सौहृदं कर्तुमर्हसि॥
त्यज्यताम् = त्याग दो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; तारे = हे तारा!; शोकः = शोक; अयम् = यह; नामनाशनः = कीर्ति नाश करने वाला; न = नहीं; हि = ही; शोकेण = शोक से; कल्याणि = हे कल्याणी!; प्रेताः = मृत; सिद्धिम् = सद्गति; लभन्ति = पाते हैं; वै = निश्चय ही।
सुग्रीवस्य = सुग्रीव के; प्रसादेन = प्रसाद से; राज्यम् = राज्य; प्राप्स्यसि = पाओगी; शोभने = हे शोभने!; अंगदः = अंगद; च = और; एव = ही; युवराजः = युवराज; क्रियताम् = किया जाए; वचनात् = वचन से; मम = मेरे।
राघवस्य = राघव के; प्रसादेन = प्रसाद से; सुग्रीवः = सुग्रीव; राज्यम् = राज्य; आप्नुयात् = प्राप्त करे; तत् = इसलिए; भवान् = आप; अपि = भी; तारे = हे तारा!; त्वम् = तुम; सौहृदम् = स्नेह; कर्तुम् = करने के लिए; अर्हसि = योग्य हो।
हतः स तु समर्थेन धर्मेण च बलेन च॥
त्वया त्विदानीं कर्तव्यं सुग्रीवेण समं प्रिये।
सौहार्दं वालिनो नाशे न शोकः कर्तुमर्हसि॥
इत्युक्त्वा हनुमान् वीरस्तारां शोकपरायणाम्।
प्रत्यबोधयदव्यग्रां धैर्येण च बलेन च॥
🕊️ तारा का शोक त्यागना (श्लोक २१-२४)
प्रत्युवाच हनूमन्तं बाष्पव्याकुलया गिरा॥
यथाब्रवीर्हनूमंस्त्वं तथा तदुपपद्यते।
करिष्ये वचनं तुभ्यं यद्यपि स्याद्गरीयसि॥
इत्युक्त्वा तारया सार्धं हनूमान् वाक्यमब्रवीत्।
गच्छ तारे सुग्रीवाय निवेदय शुभं वचः॥
सा तु तारा हनूमन्तं प्रणम्य विरजस्कला।
ययौ सुग्रीवसकाशं धैर्यमालम्ब्य केवलम्॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧠 हनुमान् का कूटनीतिक कौशल
इस सर्ग में हनुमान् न केवल एक वीर योद्धा हैं, बल्कि एक कुशल वार्ताकार और मार्गदर्शक भी हैं। वे तारा को व्यावहारिकता और धर्म दोनों के आधार पर समझाते हैं।
👸 तारा का चरित्र
तारा यहाँ केवल विलाप करने वाली पत्नी नहीं है, वह राजनीति को समझने वाली बुद्धिमती स्त्री है, जो हनुमान् का उपदेश सुनकर सही निर्णय लेती है।
⚖️ धर्म और कर्तव्य
हनुमान् ने स्पष्ट किया कि राम ने धर्म से वाली का वध किया। यह राम के अवतारी पुरुष होने को प्रमाणित करता है।
👑 राज्य का सुचारु संचालन
यह सर्ग बताता है कि राज्य के सुचारु संचालन के लिए सभी वर्गों का सहयोग आवश्यक है, विशेषकर राजमाता और युवराज का।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और बुद्धि से काम लेना चाहिए। हनुमान् ने तारा को व्यर्थ शोक त्याग कर वर्तमान में जीने की प्रेरणा दी। हमें भी आपदाओं में धैर्य नहीं खोना चाहिए और समयानुकूल निर्णय लेने चाहिए।