वालि की मृत्यु पर तारा का विलाप
किष्किन्धाकाण्ड के बीसवें सर्ग में वालि के वध के पश्चात उसकी पत्नी तारा का विलाप वर्णित है। तारा युद्धस्थल पर आकर वालि के शव को देखकर अत्यन्त दुःखी होती है और करुण क्रन्दन करती है। वह सुग्रीव और राम को कटु वचन कहती है तथा वालि के पराक्रम, सौन्दर्य और उसके प्रति अपने प्रेम का स्मरण करती है। अन्त में वह वालि के साथ मरने की इच्छा प्रकट करती है, किन्तु सुग्रीव और राम उसे धैर्य बँधाते हैं।
विवरण
वालि के वध के बाद जब तारा को यह समाचार मिलता है, तो वह शोकविह्वल होकर युद्धभूमि की ओर दौड़ती है। वहाँ वह वालि को धरती पर पड़ा देखकर मूर्छित हो जाती है। होश में आने पर वह वालि के शव से लिपटकर करुण विलाप करती है। वह वालि के पराक्रम, उसकी सुन्दरता, उसके साथ बिताए सुखद क्षणों को याद करती है। साथ ही वह सुग्रीव को धिक्कारती है कि उसने बड़े भाई की हत्या करवाई, और राम पर क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध छिपकर वालि को मारने का आरोप लगाती है। तारा वालि के मृत शरीर के साथ चिता में जलने की इच्छा व्यक्त करती है। तब सुग्रीव और राम उसे समझाते हैं कि मृत्यु जीवन का नियम है और उसे अपने पुत्र अंगद के पालन-पोषण के लिए जीवित रहना चाहिए। अंततः तारा को धैर्य बँधता है और वह वालि के अंतिम संस्कार की तैयारी करती है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग २०
(वालि की मृत्यु पर तारा का विलाप)
🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में राम ने वालि का वध किया। अब युद्ध समाप्त हो चुका है, वालि धरती पर पड़ा है। सुग्रीव को राज्य सौंप दिया गया है। इधर तारा को जब वालि की मृत्यु का पता चलता है, तो वह विलाप करती हुई रणभूमि की ओर दौड़ी चली आती है। यह सर्ग उसी तारा के विलाप का वर्णन करता है – एक पत्नी का करुण क्रन्दन, जो अपने पति के शव से लिपटकर उसके गुणों को याद करती है और नियति को कोसती है।
🏹 वालि की मृत्यु और तारा का आगमन (श्लोक १-७)
श्रुत्वा सुदुःखसम्प्राप्ता विललाप सुदुःखिता ॥
सा दीनमनसा दीना रुदमाना सुदुःखिता ।
आजगाम वरारोहा यत्र वाली हतः स्थितः ॥
ततस्तां रुदतीं दीनां तारां शोकपरिप्लुताम् ।
ददर्श सुग्रीवो राजा धैर्यमालम्ब्य चोत्तमम् ॥
😭 तारा का विलाप – वालि के गुणों का स्मरण (श्लोक ८-१८)
हा वीर हा कृतात्मंस्त्वं क्व गतो हि मया विना ॥
यस्य बाहू समाश्रित्य निर्भया विचरामहे ।
स वध्यः पक्षिणामद्य शयिते धरणीतले ॥
किं नु वक्ष्यामि वैदेहीं कृतां काकपुरीं प्रति ।
यदर्थमिदमारब्धं तस्यैतत् फलमीदृशम् ॥
हा सत्यं हा महाबाहो हा धैर्यं हा स्मितं हा प्रियम् ॥
अनाथा वयमद्य त्वां गतसत्त्वं निरीक्ष्य च ।
कथं नु जीवितुं शक्यं विना त्वां रघुनन्दन ॥
इत्येवं विलपन्तीं तां तारां शोकपरिप्लुताम् ।
उवाच सुग्रीवो वाक्यं धैर्ययुक्तं सुखावहम् ॥
⚡ तारा का राम और सुग्रीव को उलाहना (श्लोक १९-२६)
न त्वां स्पृशेद्धर्मपथानुवृत्तं पापं हि ते वालिवधेन युक्तम् ॥
राम त्वया क्षत्रियधर्ममास्थितो यदन्तरिक्षे वालिनो वधः कृतः ।
धर्म्यं यशस्यं च यशः परं त्वया जितं यथा न त्वरया कृतं त्वया ॥
इत्येवमुक्त्वा तु तदा महात्मना तारा वचः शोकसमन्विता तदा ।
निपपात च भूतले सुदुःखिता विलप्य चैवं पुनरेव सुव्रता ॥
🌿 तारा को धैर्यबन्धन और अन्तिम संस्कार (श्लोक २७-३४)
त्यज शोकं त्वमित्युक्त्वा धर्म्यमर्थपदं शुभम् ॥
अयं तव सुतो ज्येष्ठो वालिनो हि महात्मनः ।
अङ्गदो नाम धर्मात्मा यस्त्वां शोकं प्रणेष्यति ॥
रामोऽपि धर्मशास्त्रज्ञो वचनं तामुवाच ह ।
धैर्यमालम्ब्य तिष्ठ त्वं पुत्रपौत्रवती भव ॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे वालिनं ज्वलनार्पितम् ।
चक्रुः संस्कारमव्यग्रास्तारया सह वानराः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
💔 पतिव्रता का विलाप
तारा का विलाप संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ करुण प्रसंगों में से एक है। इसमें पत्नी के हृदय की व्यथा का मार्मिक चित्रण हुआ है। तारा के शब्द वालि के प्रति उसके अनन्य प्रेम और समर्पण को दर्शाते हैं।
⚖️ धर्म और राजनीति का प्रश्न
तारा के आरोप राम की छल-नीति पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। इससे यह संदेह उठता है कि क्या क्षत्रिय धर्म में शत्रु को छल से मारना उचित है? राम अगले सर्ग में इसका उत्तर देंगे – वालि ने ऋष्यमूक पर आक्रमण किया था, इसलिए वह दण्ड का पात्र था। यह संवाद धर्म के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करता है।
👸 तारा का मातृत्व
अंत में तारा को अंगद के लिए जीने का उपदेश दिया जाता है, जो स्त्री के मातृत्व कर्तव्य को रेखांकित करता है। वह पत्नी होते हुए भी माँ है, और उसे पुत्र के पालन का दायित्व निभाना है।
📜 आगे की कथा की भूमिका
इस सर्ग में अंगद का नाम विशेष रूप से लिया गया है, जो आगे चलकर सुन्दरकाण्ड और युद्धकाण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहाँ उसके भविष्य के कर्तव्य का संकेत है।
🎯 शिक्षा : जीवन में शोक अवश्यम्भावी है, किन्तु धैर्य और कर्तव्य-बोध से उसका सामना करना चाहिए। तारा ने पति के वियोग में अत्यन्त दुःख सहा, फिर भी उसे पुत्र के पालन का दायित्व समझ में आया। साथ ही, यह सर्ग हमें यह भी सोचने पर विवश करता है कि धर्म और नीति के मार्ग पर चलते हुए भी कभी-कभी कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनका परिणाम निर्दोषों को भुगतना पड़ सकता है।