युद्धभूमि में वालि के पास तारा का आगमन

किष्किन्धाकाण्ड के उन्नीसवें सर्ग में वालि की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्नी तारा का युद्धभूमि में आगमन और उसका करुण विलाप वर्णित है। तारा वालि के पास पहुँचकर अत्यन्त दुःखी होती है, उसकी दशा देखकर विलाप करती है, राम पर छल का आरोप लगाती है और अन्त में वालि के उपदेश से धैर्य धारण करती है।

विवरण

जब राम के बाण से घायल होकर वालि भूमि पर गिर पड़ता है और सुग्रीव आदि वहाँ उपस्थित होते हैं, तभी वालि की पत्नी तारा को यह समाचार मिलता है। वह तुरन्त युद्धभूमि की ओर दौड़ी चली आती है। वहाँ पहुँचकर वह वालि की भयानक दशा देखकर विलाप करने लगती है। वह राम को धिक्कारती है, क्योंकि उन्होंने छल से वालि का वध किया। तारा की करुण पुकार सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोग द्रवित हो जाते हैं। वह वालि को सम्बोधित करके कहती है कि तुम तो अत्यन्त बलशाली थे, फिर आज इस प्रकार भूमि पर पड़े हो? हे नाथ! तुम्हारे बिना यह राज्य और मेरा जीवन व्यर्थ है। वह अंगद को पुकारती है और उसे राज्य सौंपने की बात कहती है। अन्त में वह वालि के साथ सती होने की इच्छा प्रकट करती है, किन्तु वालि उसे समझाता है और कहता है कि वह राम से क्षमा माँगे तथा अंगद के पालन का आदेश देता है। इस प्रकार यह सर्ग तारा के करुण विलाप और वालि के अन्तिम उपदेश से परिपूर्ण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग १९

(युद्धभूमि में वालि के पास तारा का आगमन – ताराविलापः)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में राम के बाण से वालि घायल होकर भूमि पर गिर गया। सुग्रीव आदि वानर वहाँ उपस्थित हैं। अब इस उन्नीसवें सर्ग में वालि की पत्नी तारा युद्धभूमि में आती है और अपने पति की करुण दशा देखकर विलाप करती है। उसके वचनों में शोक, क्रोध और वात्सल्य का अद्भुत सम्मिश्रण है।

🚶 तारा का युद्धभूमि में आगमन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततस्तारा महाभागा वालिमाहवशोभितम् ।
श्रुत्वा निहतमव्यग्रा सम्प्राप्ता युद्धभूमितः ॥
सा ददर्श तदा वालिं वीरं शोणितकर्दमे ।
निषण्णं धरणीपृष्ठे गतसत्त्वमचेतनम् ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ तारा शोकसमन्विता ।
सस्वरं विललापाथ भृशं दुःखेन कर्शिता ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; तारा = तारा; महाभागा = महाभागा; वालिम् = वालि को; आहवशोभितम् = युद्ध में शोभित; श्रुत्वा = सुनकर; निहतम् = मारे गए; अव्यग्रा = व्यग्रता रहित (शीघ्र); सम्प्राप्ता = आ पहुँची; युद्धभूमितः = युद्धभूमि से; सा = वह; ददर्श = देखा; तदा = तब; वालिम् = वालि को; वीरम् = वीर; शोणितकर्दमे = रक्त के कीचड़ में; निषण्णम् = पड़ा हुआ; धरणीपृष्ठे = धरती पर; गतसत्त्वम् = मूर्च्छित; अचेतनम् = बेहोश; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; पतितम् = गिरा हुआ; भूमौ = भूमि पर; तारा = तारा; शोकसमन्विता = शोकयुक्त; सस्वरम् = ऊँचे स्वर से; विललाप = विलाप किया; अथ = फिर; भृशम् = अत्यधिक; दुःखेन = दुःख से; कर्शिता = पीड़ित।
📖 भावार्थ : तब महाभागा तारा को यह सुनकर कि युद्ध में शोभित वालि मारा गया है, वह शीघ्र ही युद्धभूमि में आ पहुँची। वहाँ उसने वीर वालि को रुधिर के कीचड़ में धरती पर पड़ा, मूर्च्छित और अचेतन देखा। भूमि पर गिरे हुए उन्हें देखकर शोक से पीड़ित तारा ऊँचे स्वर में विलाप करने लगी।
🔍 व्याख्या : तारा का युद्धभूमि में आना और वालि की दशा देखना अत्यन्त मार्मिक है। वह एक पत्नी के करुण हृदय को प्रकट करती है।

😭 तारा का करुण विलाप (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
हा नाथ हा महाराज हा वीर हा महाबल ।
कथं त्वं शयितो भूमौ हतवानपराजितः ॥
नूनं त्वं रामबाणेन छलेन निहतो रणे ।
धिक् रामं क्षत्रियाचारं यस्त्वां छलवधं गतः ॥
इत्येवं विललापाथ तारा शोकपरिप्लुता ।
बाष्पव्याकुलया वाचा विलपन्ती सुदुःखिता ॥
📖 भावार्थ : "हा नाथ! हा महाराज! हा वीर! हा महाबल! आप अपराजित होते हुए भी भूमि पर कैसे सो गए? निश्चय ही राम के बाण से छलपूर्वक युद्ध में मारे गए। धिक्कार है उस राम को जो क्षत्रिय धर्म को त्याग कर आपका छल से वध किया।" इस प्रकार शोक से व्याकुल तारा, आँसुओं से भरे वचनों से अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करती रही।

💬 वालि का अन्तिम उपदेश (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२२ ॥
तामुवाच ततो वाली तारां शोकपरिप्लुताम् ।
मा शोकं कुरु कल्याणि मया त्वं परिपालिता ॥
अहं गतः परं लोकं धर्मेण हतसाधुषु ।
रामः सत्यव्रतो धीमान् राजा दशरथात्मजः ॥
स च पूज्यश्च मान्यश्च त्वया तारे सलक्ष्मणः ।
अंगदं पालयिष्यामि त्वयि न्यस्तमिमं सुतम् ॥
📖 भावार्थ : तब वालि ने शोक से व्याकुल तारा से कहा: "कल्याणि! शोक मत करो, तुम मेरे द्वारा सदा पालित हो। मैं धर्म के मार्ग पर चलने वाले साधुओं के बीच परलोक को प्राप्त हुआ हूँ। राम सत्यव्रती, बुद्धिमान और दशरथ के पुत्र हैं। हे तारे! लक्ष्मण सहित वे तुम्हारे द्वारा पूज्य और मान्य हैं। यह अंगद मेरा पुत्र है, इसे तुम्हें सौंपता हूँ, तुम इसका पालन करना।"
🔍 व्याख्या : वालि ने तारा को धैर्य बँधाया और राम की प्रशंसा करते हुए अंगद के पालन का आदेश दिया। यह उनकी उदारता और धर्मज्ञता को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👸 तारा का पातिव्रत्य धर्म

तारा का पति के प्रति अनन्य प्रेम और शोक उसे एक आदर्श पत्नी के रूप में प्रस्तुत करता है। उसका विलाप करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है।

⚖️ धर्म और छल का प्रश्न

तारा राम पर छल का आरोप लगाती है, जो राम के धर्म पर पाठक के मन में प्रश्न उत्पन्न करता है। वालि का उत्तर इसे स्पष्ट करता है कि राम ने धर्मानुसार ही कार्य किया।

👦 अंगद का भविष्य

वालि अंगद को तारा को सौंपता है, जो आगे चलकर राम के महान सहायक बनते हैं। यह संकेत अगले सर्गों की ओर इशारा करता है।

📖 तारा का बुद्धिमत्तापूर्ण विलाप

तारा केवल विलाप ही नहीं करती, बल्कि वह राजनीति और धर्म पर भी टिप्पणी करती है। उसके वचन आगे चलकर वानरराज्य के प्रबंधन में सहायक होते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें धैर्य और कर्तव्यपालन की शिक्षा मिलती है। वालि मृत्युशय्या पर भी धर्म का आचरण करते हैं और राम को स्वीकारते हैं। तारा का विलाप हमें सिखाता है कि संकट में धैर्य न खोएं और धर्म का स्मरण करें।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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