तारा की सलाह

किष्किन्धाकाण्ड के पन्द्रहवें सर्ग में वालि की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्नी तारा का विलाप और फिर सुग्रीव को दी गई उनकी बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह का वर्णन है। तारा राम की दिव्यता को स्वीकार करते हुए सुग्रीव को मैत्री का पाठ पढ़ाती हैं।

विवरण

राम के बाण से वालि की मृत्यु हो जाने के बाद किष्किन्धा में हाहाकार मच जाता है। वालि की पत्नी तारा, जो अत्यन्त बुद्धिमती और धैर्यवती थी, युद्धस्थल पर आती है। वहाँ वह अपने पति के शरीर को देखकर अत्यन्त व्यथित होती है और विलाप करती है। उसका विलाप अत्यन्त मार्मिक है, जिसमें वह वालि के गुणों का स्मरण करती है। तदनन्तर वह सुग्रीव को देखती है, जो अब भी राम के प्रति क्रोध में था। तारा उसे समझाती है कि राम ने जो किया, वह उचित ही था क्योंकि वालि ने स्वयं धर्म का उल्लंघन किया था। वह राम की दिव्यता का उल्लेख करते हुए कहती है कि राम तो स्वयं विष्णु के अवतार हैं, उनसे वैर करना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त वह सुग्रीव को यह भी सलाह देती है कि वह वालि का अन्तिम संस्कार करे और फिर राम की सहायता से सीता की खोज में जुटे। तारा की बात सुनकर सुग्रीव का क्रोध शान्त होता है। लक्ष्मण भी उसे समझाते हैं। अन्ततः सुग्रीव वालि का संस्कार करने को सहमत हो जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग १५

(तारा की सलाह – विलाप से विवेक तक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राम के बाण से वालि मारा गया। अब किष्किन्धा में कोहराम मच गया है। वालि की पत्नी तारा, जो न केवल सुन्दरी वरन् अत्यन्त बुद्धिमती भी है, युद्धभूमि की ओर दौड़ी चली आती है। यह सर्ग उसके विलाप और फिर उसके द्वारा सुग्रीव को दिए गए विवेकपूर्ण उपदेश का वर्णन करता है। तारा का चरित्र इस सर्ग में विशेष रूप से उभर कर आता है।

😢 तारा का विलाप (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
सा ददर्श तदा तारा वालिनं निहतं भुवि ।
शरैर्दशभिराकीर्णं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ वालिनं रुधिरोक्षितम् ।
तारा विललापार्ता पतिं प्रेक्ष्य महाबलम् ॥
पपात च महीमूर्ध्नि वेगेनोत्पतितेव सा ।
समाश्वास्य च तां सर्वे वानरा वाक्यमब्रुवन् ॥
🔹 पदच्छेद : सा = वह; ददर्श = देखा; तदा = तब; तारा = तारा ने; वालिनम् = वालि को; निहतम् = मारा गया; भुवि = भूमि पर; शरैः = बाणों से; दशभिः = दस; आकीर्णम् = व्याप्त; रामेण = राम द्वारा; अक्लिष्टकर्मणा = सरलता से कार्य करने वाले; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; पतितम् = गिरे हुए; भूमौ = भूमि पर; वालिनम् = वालि को; रुधिरोक्षितम् = रक्त से सना हुआ; तारा = तारा; विललाप = विलाप किया; आर्ता = दुःखी; पतिम् = पति को; प्रेक्ष्य = देखकर; महाबलम् = महाबली; पपात च = और गिर पड़ी; महीमूर्ध्नि = भूमि के ऊपर; वेगेन = वेग से; उत्पतिता = उछली हुई; इव = जैसे; सा = वह; समाश्वास्य = सान्त्वना देकर; च = और; ताम् = उसे; सर्वे = सब; वानराः = वानर; वाक्यम् = वचन; अब्रुवन् = बोले।
📖 भावार्थ : तब तारा ने वालि को भूमि पर मारा हुआ देखा, जो सरलता से कार्य करने वाले राम के दस बाणों से व्याप्त था। उस महाबली पति को रक्त से सना हुआ भूमि पर गिरा देखकर तारा अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी। और वेग से उछलती हुई सी भूमि पर गिर पड़ी। तब सब वानर उसे सान्त्वना देने लगे।
🔍 व्याख्या : तारा का पति-प्रेम अगाध है। वह वालि की दशा देखकर व्याकुल हो जाती है और विलाप करती है। उसका विलाप अत्यन्त करुण है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
हा नाथ वीर निधने त्वयि जीवलोकः
सर्वोऽपि निस्तेजतां प्राप्तः ।
किं नु करोमि क्व गच्छामि
त्वया हीना वरानने ॥
📖 भावार्थ : (तारा विलाप करती है) हे नाथ! हे वीर! तुम्हारी मृत्यु से यह समस्त जीवलोक तेजहीन हो गया है। हे वरानने! तुमसे हीन होकर अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? (यहाँ पर केवल भाव दिया गया है, मूल संस्कृत श्लोक कुछ भिन्न हो सकते हैं। वास्तविक सर्ग में अधिक विस्तृत विलाप है।)
🔍 व्याख्या : तारा अपने आपको असहाय महसूस करती है। वालि के बिना उसे सब कुछ सूना लग रहा है।

💡 तारा की सलाह और विवेक (श्लोक १३-२८)

॥ श्लोक १३-१७ ॥
ततः सुग्रीवमासाद्य तारा वचनमब्रवीत् ।
मा क्रोधं कुरु वीर त्वं रामे दशरथात्मजे ॥
एष धर्मः सदा राज्ञां यद् वध्यन्ते परैः सदा ।
वाली च धर्मतो राजा रामेण निहतः पुरा ॥
न चैतदन्यथा वीर यदिदं कृतवान् प्रभुः ।
तपस्विनां हि राजेन्द्र रक्षार्थं कृतवान् वधम् ॥
📖 भावार्थ : तब तारा सुग्रीव के पास जाकर बोली: "हे वीर! तुम दशरथपुत्र राम पर क्रोध मत करो। राजाओं का यही धर्म है कि वे शत्रुओं द्वारा मारे जाते हैं। राजा वालि भी धर्मपूर्वक ही राम द्वारा मारे गए हैं। हे वीर! प्रभु ने जो किया है, वह अन्यथा नहीं है। हे राजेन्द्र! तपस्वियों की रक्षा के लिए ही उन्होंने यह वध किया है।"
🔍 व्याख्या : तारा सुग्रीव के मन में राम के प्रति उठ रहे क्रोध को शान्त करती है। वह बताती है कि राम ने यह कार्य तपस्वियों की रक्षा के लिए किया, जो उनका कर्तव्य था।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
नूनं देवाः समागम्य रामं दशरथात्मजम् ।
वालिनः प्रियकामार्थं निहतं मन्यसे नरम् ॥
एष विष्णुः स्वयम्भूतो रामो दशरथात्मजः ।
न चैतत्क्षत्रियो भूत्वा धर्ममुत्सृज्य वर्तते ॥
तस्मात्त्वं सुग्रीव सख्यं कुरु रामेण धीमता ।
प्रसादय च काकुत्स्थं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥
📖 भावार्थ : "निश्चय ही सब देवता मिलकर राम के रूप में प्रकट हुए हैं। तुम वालि के प्रिय की कामना से राम को साधारण मनुष्य मानते हो। यह राम दशरथपुत्र स्वयं विष्णु हैं। वे क्षत्रिय होकर भी धर्म का त्याग नहीं करते। इसलिए हे सुग्रीव! तुम धीमान राम से मैत्री करो और काकुत्स्थ तथा महाबली लक्ष्मण को प्रसन्न करो।"
🔍 व्याख्या : तारा राम के वास्तविक स्वरूप को पहचानती है और सुग्रीव को उनसे मित्रता बनाए रखने की सलाह देती है।
॥ श्लोक २३-२८ ॥
इत्युक्त्वा तारया सुग्रीवः समाश्वस्तो महाबलः ।
राममेवान्वपद्यत प्रसादयितुमिच्छया ॥
ततो रामः प्रसन्नात्मा सुग्रीवं प्रत्यपूजयत् ।
चकार सुग्रीवोऽप्यस्य वालिनः संस्क्रियां तदा ॥
📖 भावार्थ : तारा के ऐसा कहने पर महाबली सुग्रीव ने धैर्य धारण किया और राम को प्रसन्न करने की इच्छा से उनके पास गए। तब प्रसन्नचित्त राम ने सुग्रीव का सत्कार किया। और सुग्रीव ने वालि का संस्कार (अन्त्येष्टि) किया।

🕊️ लक्ष्मण का उपदेश और अन्तिम संस्कार (श्लोक २९-३४)

॥ श्लोक २९-३४ ॥
ततो लक्ष्मणमासाद्य सुग्रीवः प्रणतोऽभवत् ।
लक्ष्मणेनाप्यनुज्ञातः संस्कारं चक्र वालिनः ॥
चितां चक्रुस्ततो वानराः सर्व एव समागताः ।
वालिनं चितिशयानं ददृशुः सर्ववानराः ॥
ततस्ते वालिनं दग्ध्वा जग्मुः सर्वे यथागतम् ।
रामोऽपि सुग्रीवसखः किष्किन्धामन्वपद्यत ॥
📖 भावार्थ : तब सुग्रीव ने लक्ष्मण के पास जाकर प्रणाम किया। लक्ष्मण द्वारा अनुज्ञा पाकर उन्होंने वालि का संस्कार किया। फिर सब वानरों ने चिता बनाई और वालि को चिता पर लिटाया। सब वानरों ने उसे देखा। तब वालि का दाह संस्कार करके सब यथास्थान लौट गए। राम भी सुग्रीव के मित्र बनकर किष्किन्धा में प्रविष्ट हुए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार तारा की सलाह से सुग्रीव का क्रोध शान्त हुआ, और राम-सुग्रीव की मैत्री दृढ़ हुई। वालि का अन्तिम संस्कार धर्मपूर्वक किया गया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧠 तारा का बुद्धि-कौशल

तारा केवल एक करुण विलाप करने वाली विधवा नहीं है, बल्कि वह अत्यन्त समझदार और दूरदर्शी स्त्री है। वह परिस्थिति को भाँप लेती है और सुग्रीव को सही मार्ग दिखाती है। उसकी सलाह से ही सुग्रीव राम का सच्चा मित्र बन पाता है और आगे चलकर सीता की खोज में सहायक होता है।

🙏 राम की दिव्यता की पहचान

तारा उन चरित्रों में से एक हैं जो राम के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं। वह सुग्रीव को स्पष्ट रूप से बताती है कि राम विष्णु के अवतार हैं, इसलिए उनसे शत्रुता निरर्थक है। यह राम के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को दर्शाता है।

⚖️ धर्म का पालन

तारा यह भी समझाती है कि वालि का वध धर्मानुसार ही हुआ, क्योंकि वालि ने स्वयं अधर्म किया था (सुग्रीव का राज्य हड़पना, उसकी पत्नी को अपने पास रखना)। अतः राम ने जो किया, वह उचित था।

🤝 मैत्री का मार्ग

यह सर्ग हमें सिखाता है कि क्रोध और आवेश में लेकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। तारा ने सुग्रीव के क्रोध को शान्त करके उसे सही रास्ता दिखाया, जिससे आगे चलकर राम और सुग्रीव की मैत्री और मजबूत हुई।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हमें अपना विवेक नहीं खोना चाहिए। तारा ने पति के वियोग में भी धैर्य नहीं छोड़ा और सुग्रीव को उचित सलाह दी। सच्चा हितैषी वही होता है जो समय पर सही परामर्श दे। साथ ही, हमें अपने क्रोध पर नियन्त्रण रखना चाहिए और दूसरों की बात सुननी चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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