दूसरी चुनौती

किष्किन्धाकाण्ड के चौदहवें सर्ग में सुग्रीव द्वारा वाली को दूसरी बार ललकारने, घोर युद्ध और भगवान राम के बाण से वाली के वध का वर्णन है। यह सर्ग वाली के पतन और राम के धर्मयुद्ध के सिद्धान्त को उजागर करता है।

विवरण

वाली के वध के लिए सुग्रीव ने राम से सहायता माँगी थी। राम ने उसे विश्वास दिलाया और पहचान के लिए पुष्पमाला प्रदान की। इसके बाद सुग्रीव पुनः किष्किन्धा की ओर बढ़ा और वाली को युद्ध के लिए ललकारा। वाली, तारा के समझाने के बावजूद, क्रोध में आकर युद्ध के लिए निकल पड़ा। दोनों में भयंकर द्वन्द्व युद्ध हुआ। राम ने छिपकर वाली पर बाण चलाया, जिससे वह भूमि पर गिर पड़ा। वाली ने राम को धर्मभ्रष्टता का दोष दिया, परन्तु राम ने धर्मानुसार उत्तर दिया। अन्ततः वाली ने राम की महिमा स्वीकार की और प्राण त्याग दिए। इस सर्ग में वाली-राम संवाद तथा तारा-विलाप का भी वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग १४

(दूसरी चुनौती – सुग्रीव का पुनः आह्वान और वाली का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुर्दशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने सुग्रीव को पहचान के लिए पुष्पमाला देकर विदा किया। अब सुग्रीव, आत्मविश्वास से भरकर, वाली को दूसरी बार युद्ध के लिए ललकारने किष्किन्धा जाता है। यह सर्ग उस दूसरी चुनौती, भीषण युद्ध और राम के बाण से वाली के अन्त का वर्णन करता है।

🦍 सुग्रीव का पुनः आह्वान और वाली का क्रोध (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १ ॥
ततः सुग्रीव आरुह्य पर्वतं माल्यवन्तकम् ।
वालिनं नगरस्थं च प्रत्याह्वयत वीर्यवान् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुग्रीवः = सुग्रीव; आरुह्य = चढ़कर; पर्वतम् = पर्वत पर; माल्यवन्तकम् = माल्यवान् नामक; वालिनम् = वाली को; नगरस्थम् = नगर में स्थित; च = और; प्रत्याह्वयत = पुनः ललकारा; वीर्यवान् = पराक्रमी।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् पराक्रमी सुग्रीव माल्यवान् पर्वत पर चढ़कर नगर में स्थित वाली को पुनः ललकारा।
॥ श्लोक २ ॥
स नादं सुमहत् कृत्वा सिंहस्येव गभीरकम् ।
वालिनं समरे हन्तुं सज्जो भूत्वा व्यवस्थितः ॥
🔹 पदच्छेद : सः = उसने; नादम् = गर्जना; सुमहत् = बहुत बड़ी; कृत्वा = करके; सिंहस्य = सिंह की; इव = जैसी; गभीरकम् = गम्भीर; वालिनम् = वाली को; समरे = युद्ध में; हन्तुम् = मारने के लिए; सज्जः = तैयार; भूत्वा = होकर; व्यवस्थितः = स्थित हो गया।
📖 भावार्थ : उसने सिंह के समान गम्भीर, बहुत बड़ी गर्जना की और वाली को युद्ध में मारने के लिए तैयार होकर खड़ा हो गया।
॥ श्लोक ३ ॥
तं श्रुत्वा निनदं घोरं वाली वानरपुङ्गवः ।
उत्पपात तदा क्रुद्धो हेमपीठात् सुदुःसहः ॥
🔹 पदच्छेद : तम् = उस; श्रुत्वा = सुनकर; निनदम् = गर्जना को; घोरम् = भयंकर; वाली = वाली; वानरपुङ्गवः = वानरश्रेष्ठ; उत्पपात = उछल पड़ा; तदा = तब; क्रुद्धः = क्रोधित होकर; हेमपीठात् = सुनहरे आसन से; सुदुःसहः = बहुत दुःसह (क्रोधी)।
📖 भावार्थ : उस भयंकर गर्जना को सुनकर वानरश्रेष्ठ वाली अत्यन्त क्रोधित होकर अपने सुनहरे सिंहासन से उछल पड़ा।
॥ श्लोक ४ ॥
तं दृष्ट्वा तारया सार्धं सुग्रीवं समुपस्थितम् ।
उवाच तारा साध्वी सा वालिनं स्नेहविह्वला ॥
🔹 पदच्छेद : तम् = उस; दृष्ट्वा = देखकर; तारया = तारा के साथ; सार्धम् = साथ; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; समुपस्थितम् = सामने उपस्थित; उवाच = बोली; तारा = तारा; साध्वी = पतिव्रता; सा = वह; वालिनम् = वाली से; स्नेहविह्वला = स्नेह से विह्वल होकर।
📖 भावार्थ : तारा ने सुग्रीव को सामने खड़ा देखकर, पतिव्रता होने के कारण स्नेह से विह्वल होकर वाली से कहा।
॥ श्लोक ५ ॥
न त्वया योद्धुमुचितं सुग्रीवेण दुरात्मना ।
रामबाणाभिभूतस्त्वं नचिरान्मृत्युमेष्यसि ॥
🔹 पदच्छेद : न = नहीं; त्वया = आपको; योद्धुम् = युद्ध करना; उचितम् = उचित; सुग्रीवेण = सुग्रीव के साथ; दुरात्मना = दुष्ट; रामबाणाभिभूतः = राम के बाण से पीड़ित; त्वम् = तुम; नचिरात् = शीघ्र ही; मृत्युम् = मृत्यु को; एष्यसि = प्राप्त होगे।
📖 भावार्थ : "इस दुष्ट सुग्रीव के साथ युद्ध करना आपके लिए उचित नहीं है। राम के बाण से आप शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएँगे।"

⚔️ वाली का युद्ध के लिए प्रस्थान और भीषण संग्राम (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९ ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा वाली क्रोधसमन्वितः ।
उवाच परुषं वाक्यं तारां भृशमपीडयत् ॥
🔹 पदच्छेद : तस्याः = उसके; तत् = उस; वचनम् = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; वाली = वाली; क्रोधसमन्वितः = क्रोध से युक्त; उवाच = बोला; परुषम् = कठोर; वाक्यम् = वाक्य; ताराम् = तारा से; भृशम् = बहुत; अपीडयत् = पीड़ा दी (कहा)।
📖 भावार्थ : उसके उस वचन को सुनकर वाली क्रोध से भर गया और तारा से कठोर वचन बोला, जिससे उसे बहुत पीड़ा हुई।
॥ श्लोक १० ॥
किं त्वया मे भयं प्रोक्तं रामाद्वानरसेविते ।
नाहं रामाद्बिभेम्यद्य न चान्यस्मात् सुरादपि ॥
🔹 पदच्छेद : किम् = क्या; त्वया = तुमने; मे = मेरे लिए; भयम् = भय; प्रोक्तम् = कहा; रामात् = राम से; वानरसेविते = वानरों द्वारा सेवित (हे वानरप्रिये); न = नहीं; अहम् = मैं; रामात् = राम से; बिभेमि = डरता हूँ; अद्य = आज; न = नहीं; च = और; अन्यस्मात् = अन्य किसी से; सुरात् = देवता से; अपि = भी।
📖 भावार्थ : "हे वानरप्रिये! तुमने मुझे राम से भय बताया? मैं न तो आज राम से डरता हूँ और न ही किसी अन्य देवता से।"
॥ श्लोक ११-१३ ॥
ततः प्रववृते युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ।
बाहुभिः पर्वताकारैः मुष्टिभिश्च परस्परम् ॥
नानाविधैश्चरणकैः सिंहवद्वनचारिणाम् ।
अन्योन्यमभिघातैश्च शोणिताक्तौ बभूवतुः ॥
तयोरासीद् द्वन्द्वयुद्धं घोरं वालिसुग्रीवयोः ।
देवासुररणप्रख्यं सर्वलोमविहर्षणम् ॥
🔹 पदच्छेद : (संक्षेप में) ततः = तब; प्रववृते = प्रारम्भ हुआ; युद्धम् = युद्ध; तुमुलम् = कोलाहलपूर्ण; रोमहर्षणम् = रोमांचकारी; बाहुभिः = भुजाओं से; पर्वताकारैः = पर्वत के समान; मुष्टिभिः = मुष्टियों से; च = और; परस्परम् = परस्पर; नानाविधैः = अनेक प्रकार के; चरणकैः = पैरों के प्रहारों से; सिंहवत् = सिंहों की तरह; वनचारिणाम् = वन में विचरने वालों के; अन्योन्यम् = एक-दूसरे पर; अभिघातैः = प्रहारों से; च = और; शोणिताक्तौ = रक्त से लथपथ; बभूवतुः = हो गए; तयोः = उन दोनों का; आसीत् = हुआ; द्वन्द्वयुद्धम् = द्वन्द्व युद्ध; घोरम् = भयंकर; वालिसुग्रीवयोः = वाली और सुग्रीव का; देवासुररणप्रख्यम् = देवताओं और असुरों के युद्ध के समान; सर्वलोमविहर्षणम् = सबके रोमांचकारी।
📖 भावार्थ : तब वाली और सुग्रीव के बीच भयंकर, रोमांचकारी द्वन्द्व युद्ध आरम्भ हुआ। वे पर्वताकार भुजाओं, मुष्टियों और अनेकों पैरों के प्रहारों से एक-दूसरे पर आक्रमण करते हुए रक्त से लथपथ हो गए। वह युद्ध देवासुर संग्राम के समान भयंकर था।

🏹 राम का बाण – वाली का अन्त (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९ ॥
रामस्तु लक्ष्मणं प्राह पश्यैतौ वानरर्षभौ ।
सुग्रीवश्चिह्नितो माल्यैर्वाली निहन्यते मया ॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; तु = तो; लक्ष्मणम् = लक्ष्मण से; प्राह = बोले; पश्य = देखो; एतौ = इन दोनों; वानरर्षभौ = वानरश्रेष्ठों को; सुग्रीवः = सुग्रीव; चिह्नितः = चिह्नित है; माल्यैः = पुष्पमाला से; वाली = वाली; निहन्यते = मारा जाएगा; मया = मेरे द्वारा।
📖 भावार्थ : राम ने लक्ष्मण से कहा: "इन दोनों वानरश्रेष्ठों को देखो। सुग्रीव पुष्पमाला से चिह्नित है, वाली मेरे द्वारा मारा जाएगा।"
॥ श्लोक २० ॥
इत्युक्त्वा सज्यमाधाय धनुर्वज्रसमस्वनम् ।
वालिनं लक्ष्यमुद्दिश्य जगाम निशितैः शरैः ॥
🔹 पदच्छेद : इति = ऐसा; उक्त्वा = कहकर; सज्यम् = चढ़ाया हुआ; आधाय = लेकर; धनुः = धनुष; वज्रसमस्वनम् = वज्र के समान ध्वनि वाला; वालिनम् = वाली को; लक्ष्यम् = लक्ष्य; उद्दिश्य = बनाकर; जगाम = छोड़ा; निशितैः = तीक्ष्ण; शरैः = बाणों से।
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर उन्होंने वज्र के समान गर्जना करने वाला धनुष उठाया और वाली को लक्ष्य करके तीक्ष्ण बाण चला दिए।
॥ श्लोक २१ ॥
स बाणेन तु विद्धस्तु वाली वानरपुंगवः ।
पपात सहसा भूमौ वज्राहत इव द्रुमः ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; बाणेन = बाण से; तु = तो; विद्धः = बिंधा हुआ; तु = ही; वाली = वाली; वानरपुंगवः = वानरश्रेष्ठ; पपात = गिरा; सहसा = सहसा; भूमौ = भूमि पर; वज्राह्तः = वज्र से आहत; इव = जैसे; द्रुमः = वृक्ष।
📖 भावार्थ : वह वानरश्रेष्ठ वाली बाण से बिंधकर सहसा भूमि पर गिर पड़ा, जैसे वज्र से आहत वृक्ष गिरता है।
॥ श्लोक २२ ॥
तस्मिन्निपतिते भूमौ वालिनि प्राणसंशये ।
हाहाकारो महानासीत् सर्वेषां वानरेष्वथ ॥
🔹 पदच्छेद : तस्मिन् = उसके; निपतिते = गिर जाने पर; भूमौ = भूमि पर; वालिनि = वाली के; प्राणसंशये = प्राण संशय में पड़े; हाहाकारः = हाहाकार; महान् = बड़ा; आसीत् = हुआ; सर्वेषाम् = सब; वानरेषु = वानरों में; अथ = तब।
📖 भावार्थ : जब वाली धरती पर गिरकर प्राणों से हाथ धो बैठा, तब सब वानरों में बड़ा हाहाकार मच गया।

💬 वाली का राम से संवाद और धर्मोपदेश (श्लोक २९-३८)

॥ श्लोक २९ ॥
ततः संज्ञामुपागम्य वाली राममभाषत ।
किं नु मे हेतुना राम त्वया विद्धस्य देहिनः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; संज्ञाम् = चेतना; उपागम्य = प्राप्त करके; वाली = वाली; रामम् = राम से; अभाषत = बोला; किम् = क्या; नु = निश्चय ही; मे = मेरे; हेतुना = कारण से; राम = हे राम; त्वया = तुम्हारे द्वारा; विद्धस्य = बिंधे हुए; देहिनः = शरीरधारी को।
📖 भावार्थ : तब चेतना लौटने पर वाली ने राम से कहा: "हे राम! मुझ शरीरधारी को आपने बाण मारा, उसका क्या कारण है?"
॥ श्लोक ३०-३५ ॥
न चापि दुष्कृतं किंचिद् राघव त्वयि मे कृतम् ।
तत्किमर्थं मया सार्धं वैरं ते विद्धि सुव्रत ॥
तमुवाच ततो रामो धर्मज्ञः सत्यविक्रमः ।
त्वया दुष्कृतकारी त्वं सुग्रीवस्य हितैषिणा ॥
अधर्मेण कृतं राज्यं हृतं चैव तवानुजात् ।
तेन त्वं निधनं प्राप्तो धर्मशास्त्रानुसारतः ॥
📖 भावार्थ : वाली ने कहा: "हे राघव! मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया। फिर आपने मुझसे वैर क्यों रखा?" राम ने उत्तर दिया: "तूने अपने छोटे भाई सुग्रीव का राज्य अधर्म से छीन लिया और उसे सताया। इसी अपराध के कारण धर्मशास्त्र के अनुसार तू मारा गया।"
॥ श्लोक ३६-३८ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रोवाच तं पुनः ।
न मे दोषो महाभाग त्वयि कश्चिद् भविष्यति ॥
इत्युक्त्वा स तदा वाली राममेवान्वपद्यत ।
जहौ देहं महातेजाः स्वर्गं प्राप सुदुर्लभम् ॥
ततो रामः सह भ्रात्रा सुग्रीवेण च लक्ष्मणः ।
चक्रुः संविधानं सर्वं यथाशास्त्रं यथाविधि ॥
📖 भावार्थ : राम के ऐसा कहने पर वाली ने कहा: "हे महाभाग! मुझे आपसे कोई दोष नहीं है।" ऐसा कहकर उस महातेजस्वी वाली ने देह त्याग दी और दुर्लभ स्वर्ग प्राप्त किया। तब राम, लक्ष्मण और सुग्रीव ने शास्त्रविधि से अन्त्येष्टि आदि का प्रबन्ध किया।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ धर्मरक्षा का आदर्श

इस सर्ग में राम ने धर्म की स्थापना के लिए छल (आड़ में रहकर बाण चलाना) का सहारा लिया। परन्तु वाली के राज्य हरण और सुग्रीव के प्रति अत्याचार के कारण राम ने इसे उचित ठहराया। यह दर्शाता है कि असाधारण परिस्थितियों में धर्म की रक्षा के लिए अपवाद स्वीकार्य हैं।

📜 वाली का आत्मसमर्पण

वाली अन्त में राम की महिमा स्वीकार करता है और उनमें लीन हो जाता है। यह भक्ति का उच्च स्तर है – शत्रु भी अन्त में भगवान् को पहचान कर मोक्ष प्राप्त करता है।

🌗 युद्ध और करुणा

वाली के पतन पर तारा का विलाप और सुग्रीव का पश्चाताप करुण रस को चरम पर पहुँचाता है। यह सर्ग वीर रस के साथ-साथ करुण रस का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।

🔱 सुग्रीव का राज्याभिषेक का मार्ग

वाली के वध के साथ ही सुग्रीव के राज्य का मार्ग प्रशस्त होता है। यह घटना आगे के काण्डों में हनुमान की खोज और सीता की प्राप्ति की दिशा में पहला कदम है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग सिखाता है कि धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। राम ने मित्र के प्रति अपने वचन का पालन किया और अधर्मी का दमन किया। साथ ही, वाली के माध्यम से यह भी ज्ञात होता है कि भगवान् के क्रोध का पात्र बनने पर भी यदि अन्त में भक्ति भाव आ जाए तो मोक्ष सुलभ है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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