सप्तजन आश्रम

किष्किन्धाकाण्ड के तेरहवें सर्ग में भगवान राम, लक्ष्मण और सुग्रीव सप्तजन ऋषियों के आश्रम में जाते हैं। वहाँ वे सातों महर्षियों से मिलते हैं, जो राम के दर्शन से आनन्दित होते हैं और उन्हें राक्षसों के संहार का आशीर्वाद देते हैं। यह सर्ग राम के धर्म और करुणा को उजागर करता है।

विवरण

सुग्रीव से मित्रता करने के पश्चात् राम, लक्ष्मण सहित, सुग्रीव के साथ किष्किन्धा प्रदेश के विभिन्न पवित्र स्थानों का भ्रमण कर रहे थे। सुग्रीव ने राम को उस पर्वत के निकट स्थित सप्तजन ऋषियों के आश्रम के विषय में बताया। ये सात ऋषि – मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ – उस पवित्र स्थान पर तपस्या कर रहे थे। राम उनके दर्शन की इच्छा से वहाँ गए। ऋषियों ने राम में विष्णु के अंश को पहचाना और उनका विधिवत् स्वागत किया। उन्होंने राम को आशीर्वाद दिया कि वे राक्षसों का नाश करके धर्म की स्थापना करेंगे। ऋषियों ने राम को आतिथ्य दिया और उनसे अयोध्या के कुशल-क्षेम की बातें पूछीं। राम ने ऋषियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की और उनके आश्रम में कुछ समय बिताया। इस भेंट ने राम के वनवास के दौरान ऋषियों के साथ उनके सम्बन्ध को और प्रगाढ़ किया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – किष्किन्धाकाण्ड – सर्ग १३

(सप्तजन आश्रम – ऋषियों से भेंट)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सुग्रीव से मैत्री के पश्चात् राम उनके साथ किष्किन्धा के पवित्र स्थानों का भ्रमण कर रहे हैं। सुग्रीव उन्हें सप्तजन ऋषियों के आश्रम में ले जाते हैं, जहाँ सातों महर्षि तपस्या में लीन हैं। राम के दर्शन से ऋषि परमानन्दित होते हैं और उन्हें विजय का आशीर्वाद देते हैं। यह सर्ग राम की ऋषियों के प्रति श्रद्धा और विनम्रता को दर्शाता है।

🌿 सप्तजन आश्रम की ओर (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः सुग्रीवसहितो रामः सत्यपराक्रमः ।
ददर्शाश्रममुद्दिश्य सप्तजानां महात्मनाम् ॥
तदाश्रमपदं रम्यं नानावृक्षसमन्वितम् ।
सिद्धचारणसङ्घुष्टं मृगैश्चापरिवारितम् ॥
तत्र स्म परमप्रीता ददृशुस्ते तपोधनाः ।
रामं दाशरथिं प्राप्तं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुग्रीवसहितः = सुग्रीव के साथ; रामः = राम; सत्यपराक्रमः = सत्यपराक्रमी; ददर्श = देखा; आश्रमम् = आश्रम को; उद्दिश्य = इंगित करके; सप्तजानाम् = सात जनों (ऋषियों) का; महात्मनाम् = महात्माओं का; तत् = उस; आश्रमपदम् = आश्रम स्थान को; रम्यम् = रमणीय; नानावृक्षसमन्वितम् = अनेक वृक्षों से युक्त; सिद्धचारणसङ्घुष्टम् = सिद्धों और चारणों से सेवित; मृगैः = मृगों से; च = और; अपरिवारितम् = घिरा हुआ; तत्र = वहाँ; स्म = निश्चय ही; परमप्रीताः = अत्यन्त प्रसन्न; ददृशुः = देखा; ते = उन्होंने; तपोधनाः = तपस्वियों ने; रामम् = राम को; दाशरथिम् = दशरथपुत्र को; प्राप्तम् = प्राप्त हुए; सुग्रीवम् = सुग्रीव को; च = और; महाबलम् = महाबली को।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी राम ने सुग्रीव के साथ महात्मा सप्तजन ऋषियों के आश्रम की ओर प्रस्थान किया। वह आश्रम अत्यन्त रमणीय था, अनेक वृक्षों से युक्त था, सिद्धों और चारणों से सेवित था तथा मृगों से घिरा हुआ था। वहाँ उन तपस्वियों ने दशरथपुत्र राम और महाबली सुग्रीव को आया देखकर अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव किया।
🔍 व्याख्या : राम का आगमन देखकर ऋषिगण अत्यन्त हर्षित हुए। आश्रम की शान्त वातावरण और प्राकृतिक सुन्दरता का वर्णन इस प्रकार किया गया है।
॥ श्लोक ४-८ ॥
ते राममभिगम्याथ वन्यमाल्योपशोभिताः ।
अर्घ्यं पाद्यं च रामाय ददुर्विधिवदद्भुतम् ॥
रामस्तु तापसान् दृष्ट्वा सर्वानेवाभ्यपूजयत् ।
प्रतिगृह्य च तत्सर्वं यथार्हं प्रत्यपूजयत् ॥
ततः कथान्ते धर्मज्ञस्तानृषीन् परिपृच्छति ।
कच्चिद्वो वर्तते धर्मे तपोबलसमन्वितः ॥
कच्चिदत्र न वो बाधा राक्षसैः कामरूपिभिः ।
कच्चिन्न हीयते धर्मो भवतां दुष्टचारिभिः ॥
एवमुक्तास्तु ते सर्वे ऋषयो धर्मवत्सलाः ।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं रामं सत्यपराक्रमम् ॥
📖 भावार्थ : वे वन के पुष्पों की मालाओं से सुशोभित ऋषि राम के पास आए और विधिपूर्वक अद्भुत अर्घ्य एवं पाद्य प्रदान किया। राम ने उन सब तपस्वियों को देखकर उनका यथोचित सत्कार किया और उनकी पूजा की। फिर उन धर्मज्ञ राम ने बातचीत के अन्त में उन ऋषियों से पूछा: "क्या आप सब धर्मपूर्वक तपोबल से युक्त होकर निवास कर रहे हैं? कहीं कामरूपी राक्षस आपको बाधा तो नहीं पहुँचाते? कहीं दुष्टाचारियों के कारण आपका धर्म नष्ट तो नहीं हो रहा है?" इस प्रकार सत्यपराक्रमी राम के पूछने पर वे सब धर्मवत्सल ऋषि हाथ जोड़कर बोले।

🙏 ऋषियों का वरदान और राम की विनम्रता (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
राघव त्वामिहायातं विद्मो देवं सनातनम् ।
त्वया धर्मः प्रतिष्ठाप्यो राक्षसानां वधेन हि ॥
इमे घोरा महाकाया राक्षसाः कामरूपिणः ।
बाधन्ते बहुधा धीर तपोवननिवासिनः ॥
यज्ञविघ्नकराः पापा मांसशोणितभोजनाः ।
तान्निहन्तुं समर्थस्त्वं विष्णुना सदृशो युधि ॥
त्वया रक्षामहे राजन्वत्स्यामो विगतज्वराः ।
इत्युक्त्वा ते मुनिश्रेष्ठा राममेवाभ्यपूजयन् ॥
रामस्त्वृषिवचः श्रुत्वा प्रहर्षमतुलं ययौ ।
प्रतिजज्ञे वधं तेषां राक्षसानां दुरात्मनाम् ॥
📖 भावार्थ : "हे राघव! हम जानते हैं कि आप सनातन देव हैं। आप राक्षसों का वध करके धर्म की प्रतिष्ठा करेंगे। हे धीर! ये भयंकर कामरूपी राक्षस हम तपोवनवासियों को बहुत प्रकार से सताते हैं। वे पापी यज्ञों में विघ्न डालते हैं और मांस-रक्त भोजन करते हैं। उन्हें मारने में आप समर्थ हैं, क्योंकि युद्ध में आप विष्णु के समान हैं। हे राजन! आपसे रक्षा पाकर हम निर्भय होकर यहाँ निवास करेंगे।" ऐसा कहकर उन मुनिश्रेष्ठों ने राम की पूजा की। राम ने ऋषियों के वचन सुनकर अतुल हर्ष प्राप्त किया और उन दुरात्मा राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की।
🔍 व्याख्या : ऋषि राम की दिव्यता को पहचानते हैं और उनसे राक्षसों के संहार की प्रार्थना करते हैं। राम उन्हें अभयदान देते हैं और वचन देते हैं कि वे राक्षसों का नाश करेंगे।
॥ श्लोक १५-१८ ॥
तानुवाच ततो रामः प्राञ्जलिः शिरसा नतः ।
भवतां दर्शनादेव कृतकृत्योऽस्मि साम्प्रतम् ॥
यदाज्ञापयथ स्वामिन् करिष्ये नात्र संशयः ।
राक्षसान् नाशयिष्यामि शरणार्थिनमाश्रमम् ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्तमेव मया पुरा ।
तदेव रक्षितुं यत्नः क्रियतां मुनिपुंगवाः ॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामः सत्यपराक्रमः ।
न्यवसत्तत्र कालं स ऋषीणां शरणार्थिनाम् ॥
📖 भावार्थ : तब राम ने हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर उनसे कहा: "आपके दर्शन मात्र से मैं अब कृतकृत्य हो गया हूँ। हे स्वामिनो! आप जैसी आज्ञा दें, मैं उसका पालन करूँगा। आपके आश्रम में शरण चाहने वालों की रक्षा के लिए मैं राक्षसों का नाश करूँगा। मैंने पहले ही सभी प्राणियों को अभयदान दे रखा है; उसी अभय की रक्षा के लिए मैं प्रयत्न करूँगा, हे मुनिश्रेष्ठ!" ऐसा कहकर महातेजा सत्यपराक्रमी राम, उन शरण चाहने वाले ऋषियों के लिए वहाँ कुछ समय तक निवास करते रहे।

🏕️ आश्रम में निवास और आशीर्वाद

॥ श्लोक १९-२४ ॥
ततो रामो धनुष्पाणिः सुग्रीवेण समन्वितः ।
विचचार वने तस्मिन् ऋषीणां शरणार्थिनाम् ॥
स तत्र तापसैः सार्धं कथाश्चक्रे महाबलः ।
आश्रमेषु च सर्वेषु वसन् रामो महायशाः ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे रामेण समभिप्लुताः ।
विजहुर्भयमत्यर्थं राक्षसेभ्यो द्विजोत्तमाः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥
📖 भावार्थ : तब धनुष धारण किए हुए राम, सुग्रीव के साथ, उस वन में शरण चाहने वाले ऋषियों के लिए विचरण करने लगे। वहाँ वे महाबली राम तपस्वियों के साथ कथाएँ करते और सब आश्रमों में निवास करते। तब उन राम से रक्षा पाकर वे सब द्विजश्रेष्ठ तपस्वी राक्षसों के भय से सर्वथा मुक्त हो गए।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार राम ने सप्तजन आश्रम में ऋषियों को अभयदान दिया और उनके साथ कुछ समय बिताया। यह सर्ग राम के ऋषियों के प्रति आदर और राक्षसों के संहार के संकल्प को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🛡️ राम का रक्षक-धर्म

यह सर्ग राम के क्षत्रिय धर्म का निर्वाह दिखाता है। वे ऋषियों की रक्षा का वचन देते हैं, जो आगे चलकर राक्षसों के वध के रूप में पूरा होता है।

📜 ऋषियों का आतिथ्य

ऋषियों द्वारा राम का अर्घ्य-पाद्य से स्वागत करना भारतीय संस्कृति के अतिथि-सत्कार की परम्परा को दर्शाता है। साथ ही, यह राम की महानता को प्रदर्शित करता है कि वे तपस्वियों के भी आराध्य हैं।

🌗 सप्तजन आश्रम : तप और आशीर्वाद का संगम

सप्तजन आश्रम वह स्थान है जहाँ सातों महर्षि तपस्या करते हैं। यहाँ राम को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो उनके आगामी कार्यों के लिए प्रेरणादायक है।

🔱 प्रतिज्ञा का निर्वाह

राम ने पहले भी राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की थी। अब वे उसी प्रतिज्ञा को दोहराते हैं और ऋषियों को अभयदान देते हैं। इससे राम की वचनबद्धता स्पष्ट होती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन ही वीर का कर्तव्य है। राम ने ऋषियों की पीड़ा सुनकर तुरन्त उनकी रक्षा का बीड़ा उठाया। हमें भी समाज के दीन-दुखियों की यथाशक्ति सहायता करनी चाहिए। साथ ही, अपने वचन का पालन करना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे किष्किन्धाकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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